खैर, ऐसा कई लोगों के साथ होता है, कई प्रभावित करने वाले व्यक्तित्व मिलते हैं, बिछड़ते हैं और उनका प्रभाव समाप्त हो जाता है. संयोग से उनके देहावसान के कुछ महीनों बाद उनके सुपुत्र ने मुझसे संपर्क करके अपने पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व को संरक्षित करने के लिए वेबसाइट बनवाने हेतु मुझसे संपर्क किया तो मेरे सामने उनकी धुंधली पड़ती यादों को सहेजने का अवसर भी मिला. उनकी पहली पुण्यतिथि पर इस वेबसाइट का उद्घाटन उनके मित्रों एवं सम्बन्धियों द्वारा देवबंद में किया गया. लेकिन मुख्य बात इसके बाद की है जो आपसे ज़िक्र करना चाहता हूँ. इस पुण्य-तिथि के लिए डॉ.काम्बोज के परम मित्र और हमारे गुरु डॉ.विनोद बब्बर के अलावा नागरी लिपि परिषद जैसी महत्वपूर्ण संस्था के बड़े विद्वान के साथ मैं भी गाडी में बैठा हुआ था. दिल्ली से देवबंद का रास्ता लगभग ३ घंटे के आस पास है, तो इन ३ घंटों के दौरान कई मुद्दों पर महानुभावों की चर्चा भी सुनने को मिलती रही. युवाओं, उनकी साहित्यिक जागरूकता पर भी कई प्रश्न और उत्तर होते रहे. दिल्ली से देवबंद जाने के दौरान मैं भी युवाओं की साहित्यिक उदासीनता के प्रति थोड़ा निराश था, क्योंकि इससे पहले भी कई लोग इस आसान प्रश्न को उठाते ही रहते हैं.
कई दिनों, महीनों और सालों से इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने की कोशिश करता रहा था, लेकिन देवबंद की साहित्यिक धरती पर, स्व. काम्बोज जी की पहली पुण्यतिथि के कार्यक्रम ने इन समस्त सवालों की पोल खोल दी. डॉ.कांबोज जी के तमाम शिष्य, उनके आस पास के युवक थे, जो एक से बढ़कर एक कविताएं कह रहे थे, अपने गुरु के प्रति श्रद्धांजलि दे रहे थे, नम्र थे, सजग से और इन सबसे बढ़कर संवेदनशील थे. सभी के हृदय से यह भाव बारम्बार मुख पर आ रहा था कि उन्हें तो कलम पकड़ने का ढंग भी नहीं था, लेकिन डॉ. काम्बोज ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया, आगे बढ़ाया, प्रोत्साहित किया. यहाँ खुद को साहित्य-जगत का पुरोधा समझने वाले, युवकों की उदासीनता की शिकायत करते रहने वाले बड़े साहित्यकारों को दर्पण के सामने खड़ा होने की जरूरत है. यूं भी साहित्य की दो परिभाषाएं सर्वाधिक प्रचलित हैं. पहली 'साहित्य समाज का दर्पण है और दूसरी 'सबको साथ लेकर चलने वाला'. युवकों को नालायक, बदमिजाज, संस्कृतिविहीन और जाने क्या-क्या बताने वाले स्वनामधन्य साहित्यकार अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को इन दो परिभाषाओं की कसौटी पर कसने के लिए तैयार हैं क्या?
कृतित्व से जहाँ समाज में घट रही घटनाओं का विभिन्न विधाओं में, प्रचलित माध्यमों के द्वारा प्रकाशन है, जिससे समाज को सहज रूप से दर्पण की भांति अपनी तस्वीर दिख सके और अपनी कमियों का आंकलन कर वह उसमें सुधार कर सके. एक तरफ अधिकांश साहित्यकारों को यह पता ही नहीं चल पा रहा है कि समाज में कितनी तेजी से बदलाव आया है, रिश्ते-नातों की परिभाषाएं कहाँ से कहाँ तक पहुँच गयी हैं, तो वह साहित्य के नाम पर अपने कभी के पुराने अनुभव थोपते रहते हैं. जिन साहित्यकारों को थोड़ी बहुत आधुनिक परिप्रेक्ष्य, समाज की समझ भी है, उनके साहित्य में आत्म-प्रवंचना, स्व-दैनन्दिनी अथवा चाटुकारिता का पुट साफ़ झलकता है. क्या यही पढ़ने के लिए, यही समझने के लिए आप युवाओं को अपने पास बुलाना चाहते हैं? इस पैरा की पहली लाइन में मैंने माध्यमों की बात भी की है. बदलते तकनीकि युग में ८० फीसदी से ज्यादा साहित्यकार, उन्हीं पुराने माध्यमों की रट लगाये हुए हैं. उनके लिए वेबसाइट जैसे शब्द अनजान हैं, अधसुने हैं या फिर भ्रमित करने वाले हैं. जबकि युवा पीढ़ी के मामले में यही अनुपात बिलकुल उल्टा है. ८० फीसदी से ज्यादा युवा वेबसाइट के माध्यम से ही संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं. एक बड़ा गैप. अब समझना होगा कि एक ही कविता, एक ही वक्तव्य विभिन्न सभाओं में सुनाने वाले कथित 'साहित्यकारों' का कितना प्रभाव इन युवकों पर पड़ेगा, यह अपने आप समझ में आ जाने वाली बात है.
-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.
Youth and Writers, articles by Mithilesh in modern age perspective, in Hindi.
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