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Wednesday, 9 September 2015

सम्मेलनों, दिवसों से काफी आगे है हिंदी

by on 12:13
Vishv Hindi Sammelan in Bhopal, Hindi diwas, hindi article by mithilesh, logo, iconदसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के सन्दर्भ में दो केंद्रीय मंत्रियों के बयान आये हैं जो अलग होने के बावजूद एक दिशा में ही दिखते हैं. पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में भाषा पर जोर रहेगा न कि साहित्य पर. यह बयान कुछ हद तक कन्फ्यूज करने वाला था, क्योंकि भाषा और साहित्य एक दुसरे के पूरक ही माने जाते रहे हैं. इस बयान से उत्पन्न संदेह तब दूर हो जाता है, जब विदेश राज्यमंत्री और पूर्व जनरल वी.के.सिंह का बयान आता है. केंद्रीय मंत्री ने कहा, 'पहले के नौ विश्व हिंदी सम्मेलनों में साहित्य और साहित्यकारों पर जोर होता था. लोग आते थे, लड़ते थे, आलोचना करते थे और वह खत्म हो जाता था. विदेश राज्यमंत्री यहीं नहीं रुके, आगे की परतें खोलते हुए उन्होंने नहले पर दहला मारा कि इस दौरान लेखक और साहित्यकार खाना खाने के लिए आते थे और शराब पीकर अपनी किताब का पाठ करते थे. अपने बयान में आगे जोड़ते हुए सिंह ने कहा कि इस बार के आयोजन में 'वैसे लेखकों' को निमंत्रण ही नहीं भेजा गया है. अब सुषमा स्वराज के बयान और जनरल वी.के.सिंह का बयान एक क्रम में हैं या नहीं, इसका फैसला हम सबके स्वविवेक के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए, मगर मूल प्रश्न यह है कि 'साहित्य' और 'साहित्यकारों' के ऊपर इस हद तक की कड़ी और 'जूतामार' टिप्पणी करने की जरूरत क्यों पड़ी, वह भी तब जब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 10 से 12 सितंबर तक 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भारत और 27 अन्य देशों से लगभग 2,000 प्रतिनिधियों के हिस्सा लेने की संभावना है. इसका उत्तर हम आगे की पंक्तियों में ढूंढने का प्रयत्न करेंगे, इससे पहले वी.के. सिंह के बयान पर एक स्वनामधन्य साहित्यकार की प्रतिक्रिया बतानाVishv Hindi Sammelan in Bhopal, Hindi diwas, hindi article by mithilesh, 10th conference article, sushma swaraj, vk singh आवश्यक है. आपसी बातचीत में, उन साहित्यकार महाशय ने तुरंत वी.के.सिंह की जन्मकुंडली निकाल ली और उसमें तमाम दोषों को गिना बैठे! वह यहीं नहीं रुके, बल्कि 'फौजियों' के बारे में टिप्पणी कर उठे कि 'इसीलिए सेना में रहे लोगों को किसी 'बौद्धिक' पद पर नहीं बिठाया जाना चाहिए. वह आगे न जाने क्या-क्या कहते कि हमने उन्हें टोक दिया कि 'क्या पूर्व जनरल ने वाकई असत्य बात कही है?' उन्होंने आग उगलते नेत्रों से मुझे देखा और चट कह उठे कि 'तुम्हारे जैसे लेखकों की वजह से ही लेखक-बिरादरी पर कोई भी ऊँगली उठा देता है, और ऐसे बयानों को उत्साहित करता है.' मैंने उन्हें तत्काल सफाई दी कि अभी तो हम दो चार लाइन लिख लेते हैं और मैं किसी साहित्यिक गुट में शामिल भी नहीं हूँ, न ही मुझे कोई हिंदी का जुगाड़ू अवार्ड प्राप्त हुआ है, साथ ही साथ मेरा सात - आठ साल का लेखकीय अनुभव भी आप गहराई वाले सुविज्ञों की तुलना में कुछ भी नहीं है, इसलिए हे सामाजिक दर्पण रुपी साहित्यकार महोदय! आपके इस आरोप के लायक मैं हूँ ही कहाँ? मेरा इतना कहना था कि मुंह बिजकाते वह तेजी से बाहर निकल गए. वैसे, उन जैसे अनेक महोदय आजकल नाराज दिख रहे हैं, जिनकी पीड़ा फेसबुक पर रुक-रुक कर निकल रही है कि आखिर उन जैसे महानतम साहित्यिक, सामाजिक, चारित्रिक, मानवीय गुणों के संवाहक, युवाओं को प्रेरित करने वाले मर्मज्ञों को विश्व हिंदी सम्मलेन में बुलाया क्यों नहीं गया?
Vishv Hindi Sammelan in Bhopal, Hindi diwas, hindi article by mithilesh, hindi bloggerखैर, उनके जैसी पीड़ा, बल्कि उनसे भी ज्यादे पीड़ा को हम युवा लेखकों से ज्यादा कौन समझता है भला, क्योंकि युवा ब्लॉगर्स के रूप में हिंदी की सेवा थोड़े ही होती है, यूट्यूब पर हिंदी वीडियो बनाकर तमाम तकनीक की जानकारियों को आम भारतीयों तक पहुंचाना हिंदी की सेवा कैसे हो सकती है भला? गूगल, फेसबुक और ऐसी ही विश्व की बड़ी से बड़ी कंपनियां आज हिंदी में अपने उत्पादों को लाने के लिए मजबूर हैं तो इसमें युवाओं का योगदान क्योंकर माना जाए? एडसेंस से लेकर, तमाम अफिलिएट नेटवर्क से हिंदीभाषियों के लिए, सरकार की मदद के बिना रोजगार के एक बड़े क्षेत्र को आयाम देने में युवाओं का योगदान किधर से हो गया भला? ई- बुक के रूप में सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का कार्य भाषा-सेवा है क्या? नहीं, नहीं, नहीं ... यह सभी प्रयास मुख्यधारा के थोड़े ही हैं. मुख्यधारा के प्रयास तो यही साहित्यकार लोग करते हैं, जिनमें किसी की बत्तीस तो किसी की छत्तीस किताबें छपी हैं, भले ही उसका प्राक्कथन भी पढ़ने योग्य न हो! मुख्यधारा साहित्य और भाषा की उन्नति का श्रेय तो उन्हीं मठाधीशों को जाता है, जो तमाम सरकारी संस्थानों और पुरस्कारों के साथ सरकारी संशाधनों पर भी कुंडली मारकर बैठे हैं! जी हाँ! ये मठाधीश कभी इस हिंदी भवन तो कभी उस साहित्य अकादमी में 25 -25 लाख या उससे भी ज्यादा राशि के बड़े-बड़े कार्यक्रम कराते हैं और हिंदी को शिखर पर पहुँचाने में युग परिवर्तनकारी भूमिका का निर्वहन करते हैं. यह अलग बात है कि उनके कार्यक्रम में, उन्हीं के सर्कल के 40 - 50 लोग आते हैं, मगर इससे क्या हुआ, एक शेर ही सौ गीदड़ों पर भारी पड़ता है और इन कार्यक्रमों में आने वाले 40 -50 लोग, चार-पांच हजार के बराबर होते हैं. ऐसे ही अनेक कारण हैं, जिसके कारण इनका महिमा-मंडन अवर्णनीय हो जाता है.
Vishv Hindi Sammelan in Bhopal, Hindi diwas, hindi article by mithilesh, hindi is our mother tongueजहाँ, तक विश्व हिंदी सम्मेलन का प्रश्न है तो प्रधानमंत्री के द्वारा इसका उद्घाटन होना यह बताता है कि सरकार की प्राथमिकता इस भाषा को लेकर कितनी गहराई तक है. यूं भी केंद्र सरकार हिंदी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर प्रयत्नशील है. इस कड़ी में महेश श्रीवास्तव द्वारा रचित दसवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी गान 'हिंदी का जयघोष गुँजाकर भारत माँ का मान बढ़ेगा' के शीर्षक वाली रचना में सभी पक्षों को संतुलित करने की कोशिश की गयी है, जिसमें अन्य भारतीय भाषाओँ को हिंदी की बहनें तो, युवा शक्ति और कंप्यूटर का ज़िक्र ऊर्जा के सन्दर्भ में सुन्दर ढंग से किया गया है. नागरिकों को देवनागरी के प्रयोग करने और हिंदी को लेकर हीन भावना से मुक्त होने की अपील सार्थक ही है. दिलचस्प यह है कि इस गान में भी साहित्य का ज़िक्र नहीं है. इसी कड़ी में, तीन दिवसीय सम्मेलन में होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा और बेहतर की जा सकती थी. विदेशों में हिंदी, प्रशासन, विज्ञान एवं संचार में हिंदी, विधि एवं न्याय क्षेत्र, बाल साहित्य, प्रकाशन, पत्रकारिता जैसे विषयों के अतिरिक्त 'ब्लॉगिंग शब्द (विषय) का न होना खटकता है. यह विषय अपने आप में दुसरे विषयों से ज्यादा नहीं तो बराबर महत्त्व अवश्य ही रखता है, और यह शब्द सिर्फ एक औपचारिकता भर नहीं हैं, जैसे कि उपरोक्त वर्णित तमाम विषय हैं, बल्कि 'ब्लॉगिंग' हिंदी को अर्थोपार्जन से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास बन रहा है. आखिर हिंदी इसीलिए तो पीछे हो रही है, क्योंकि अंग्रेजी पढ़ने वाले वर्ग को धनार्जन का बड़ा मार्ग दिखता है. इस सन्दर्भ में देश के बड़े चैनल ABP न्यूज़ का प्रयास सराहनीय कहा जा सकता है, जिसने इस सम्मलेन से पहले ही भारत के बेस्ट हिंदी ब्लॉगर्स को प्रोत्साहित करने का प्रयास करने का संकल्प लिया है. दैनिक जागरण जैसे बड़े हिंदी अख़बार को अगर कोई सरकारी नौकरशाह बारीकी से पढता होता तो उसे समझ आती कि यह अखबार भी 'जागरण जंक्शन ब्लॉग ' के नाम से अपने प्रिंट-एडिशन में परिवर्तन लाने की शुरुआत कर चुका है. ऐसे ही तमाम प्रयास होने शुरू हो गए हैं तो फिर दसवां विश्व हिंदी सम्मलेन इससे अछूता क्यों? हिंदी ब्लॉगिंग की वजह से ही आज हिंदी ऐसे सम्मेलनों और दिवसों की औपचारिकता से काफी आगे निकल चुकी है. इस सम्मलेन और इससे जुड़ेVishv Hindi Sammelan in Bhopal, Hindi diwas, hindi article by mithilesh, 10th conference article, bhopal pandal image कार्यक्रम निर्धारकों का एक यह भी कर्त्तव्य बनता था कि वह ऑक्सफ़ोर्ड जैसी विश्व-स्तरीय शब्दावलियों में आये परिवर्तन को भी समझने की कोशिश करता. हाल ही में अंग्रेजी भाषा में 1000 नए शब्दों को शामिल किया गया है, तो क्या हिंदी में इस तरह के प्रयास की आवश्यकता नहीं है जो भाषा के प्रवाह को बनाये रख सके. इस महत्वपूर्ण विषय का सम्मलेन में अलग सेशन न होना अपने अपने आप में चिंतनीय और दुख़द है. खैर, इन तथ्यों के साथ यह भी सत्य है कि सुधार प्रक्रिया धीरे-धीरे ही आगे बढ़ती है. इस सम्मलेन की और भी उपलब्धियां तो इसके समापन के बाद आंकलित की जाएँगी, किन्तु विदेश मंत्रियों के बयान ने साहित्यकारों को आइना जरूर दिखाया है. आइना यह दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजकों को भी है कि वह किस प्रकार दारूबाजी, गुटबाजी और चापलूसी से आगे इस सम्मेलन को ले जाते हैं, क्योंकि इन शब्दों को अब आधिकारिक ही माना जायेगा. सरकार से पूछा जायेगा कि अगर पिछले सम्मेलन दारूबाजी और गुटबाजी के कारण बर्बाद हो जाते थे तो इस सम्मेलन से क्या हासिल हुआ? देखने और समझने वाली असल बात यही है और इसका इन्तेजार आम-खास सभी को रहेगा... तथाकथित साहित्यकारों को भी, जिन पर सरकार ने खुल कर निशाना साधा है.
- मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर.
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Saturday, 13 September 2014

अर्थोपार्जन की भाषा बने हिंदी – Hindi

by on 17:02
Hindi is our mother language    हिंदी पखवाड़े के समापन के अवसर तक काफी विद्वानों ने विभिन्न मंचों पर अपने विचार व्यक्त किये हैं. स्वभाषा की बात हुई, साथ में स्वरोजगार की बात हुई, स्वशासन, स्वतंत्रता इत्यादि तमाम बातें भाषा से ही तो शुरू होती हैं. इस क्रम में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि देवनागरी लिपि विश्व भर की दूसरी लिपियों में सर्वाधिक वैज्ञानिक है. इसके साथ ही हिंदी भाषा, चीनी मंडारिन और अंग्रेजी के बाद विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा भी है. इसमें अंग्रेजी और हिंदी बोलने वालों की संख्या ५० करोड़ के आस पास ही है. सूचना प्रोद्योगिकी, वेबसाइट बिजनेस से जुड़ा हुआ हूँ, इसलिए ऑनलाइन बिजनेस से जुड़े हुए आंकड़ों पर जब नजर डालता हूँ तो देख कर ख़ुशी होती है कि लगभग सभी बड़े व्यापारिक घराने अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी अपनी वेबसाइट के माध्यम से उपस्थित रहने की सफल कोशिश कर रहे हैं. हालाँकि हिंदी कंप्यूटर इत्यादि माध्यमों के लिए उतनी सरल अभी भी नहीं बन पायी है, इसके बावजूद मेरे पास वेबसाइट जब वेबसाइट बनने के लिए आती है तो ३ में से १ कस्टमर वेबसाइट को हिंदी में भी रखने का आग्रह करता है. कुछ नहीं तो ऑनलाइन ट्रांसलेटर ही लगाने को कहता है, जिससे बिना कोई अतिरिक्त मेहनत किये, उसके अंग्रेजी कंटेंट ही हिंदी में देखे जा सकें. यह प्रयास 70 फीसदी से ज्यादा शुद्ध होता है. सरकारी स्तर पर भी लगभग सभी वेबसाइट हिंदी में भी उपलब्ध हैं. फेसबुक की दुनिया से हम सब जुड़े ही हैं. भारत में तो मुझे लगता है, देवनागरी में फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की संख्या अंग्रेजी से दोगुनी हो गयी है. हिंदी की सहयोगी अन्य भाषाओँ को मिला दिया जाय, तो यह संख्या फेसबुक की तीन चौथाई हो जाएगी.

लेकिन, ऑनलाइन बिजनेस से जुड़े होने के कारण इससे जुडी समस्याओं पर फोकस करना चाहूंगा. जब तक कोई भाषा, कोई संस्कृति, शिक्षा सीधे तौर से ‘अर्थोपार्जन’ से नही जुड़ पाती है, उसकी स्वाभाविक प्रगति संदिग्ध हो जाती है. हिंदी इस मामले में आज़ादी के बाद से ही दुर्भाग्यशाली रही है. उदाहरण के तौर पर ब्लॉगर्स की बात करूँगा. अपने ब्लॉग लिखकर कई अंग्रेजी के लेखक बढ़िया पैसे कमा रहे हैं, वहीं हिंदी लेख से युक्त ब्लॉग शुरू से दिक्कत में फंस जाता है, जबकि उनके पाठक भी पर्याप्त हो रहे हैं, इसके बावजूद यह हाल होता है कि हिंदी ब्लॉग/ वेबसाइट के लिए गूगल एडसेंस या दुसरे प्लेटफॉर्म एप्रूवल ही नहीं देते हैं. इसी तरह देशी, विदेशी जितने भी उत्पाद बन रहे हैं, उन सभी के मैनुअल हिंदी में हों तो हिंदी के जानकारों को न सिर्फ काम मिलेगा, बल्कि उस उत्पाद की समझ भी भारतीय खरीददारों को ठीक तरह से हो पायेगी. हेल्थ इन्सुरेंस, मोटर इन्सुरेंस या लाइफ इन्सुरेंस के अधिकांश मैनुअल, फॉर्म्स- प्रपत्र हिंदी में क्यों नहीं आते हैं, यह बात कई बार सोचने पर भी मुझे समझ नहीं आती है. यहाँ यह बताना मैं आवश्यक समझता हूँ कि देश में अंग्रेजी बोलने और समझने के बावजूद लोग हिंदी में ही सुविधा महसूस करते हैं. जैसे मैंने उपरोक्त प्रपत्रों की चर्चा की, जो अंग्रेजी में रहने पर हम उसकी हेडिंग या एक पैरा ही पढ़ पाते हैं, जबकि वह हिंदी में रहने पर उतने ही समय में हम पूरा पेज पढ़ जाएँ. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि फॉर्म भरने वालों में से 90 फीसदी लोग उसके बारीक प्रावधानों को पढ़ ही नहीं पाते हैं, न समझ पाते हैं, और इसका सबसे बड़ा कारण इन सबका हिंदी में नहीं होना है. प्रशासनिक दफ्तरों, अदालतों इत्यादि की कार्यवाही पर हिंदी के विषय में चर्चा न ही करना उचित है, क्योंकि इसे न कोई सुनने वाला है, न समझने वाला. अभी हाल ही में एक चर्चा बड़ी तेजी से फैली थी कि अदालती आदेश हिंदी में ही लिखे जाएँ, क्योंकि फैसले से सम्बंधित व्यक्ति उसे समझने के लिए वकील या दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं.

ऐसा नहीं है कि इन सब बातों से हम परिचित नहीं हैं. लेकिन यह बात बार-बार दोहराना पड़ेगा हमें, ताकि नीति-नियंत्रकों के कानों में यह बात हथौड़े की तरह लगे. पंहुचती तो वह पहले भी रही है. हालाँकि हिंदी मनाने और उसको प्रोत्साहित करने के तमाम सरकारी, गैर-सरकारी प्रयास हो रहे हैं. और इन सब प्रयासों का सकारात्मक असर भी दिख रहा है. सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि हिंदी, गैर-हिंदी भाषाओँ का मुद्दा समय के साथ राष्ट्रहित की खातिर सकारात्मक हो गया है. अब लगभग सभी लोग हिंदी की प्रगति की खातिर कमर कस रहे हैं. अनेक गैरहिंदी भाषाई साहित्यकारों द्वारा साहित्य रचनाएं हो रही हैं. लेकिन सरकार को उपरोक्त वर्णित मामलों में सख्ती से नियमन करना होगा, जिससे उत्पाद, अर्थोपार्जन में हिंदी की सहभागिता तेजी से बढे. और तभी हम हिंदी के पक्ष में सार्थक पहल होते देखेंगे और शायद तब हमें हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा मनाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. आखिर सार्थकता यही तो है हिंदी पखवाड़े की. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी क्या खूब कहा है -
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति का मूल”
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल”

- मिथिलेश, उत्तम नगर, नयी दिल्ली.

Article on Hindi Bhasha by mithilesh

Wednesday, 14 September 2011

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं !! ....... Hindi Diwas ki Shubhkamna

by on 09:48
सिर्फ यही भाषा हमें आगे की ओर ले जा सकती है, चौकिये मत आपको एक भारतीय की तरह आगे जाना है हर तरह से प्रोफेसनली, पर्सनली और/या पब्लिकली !! ..........

Hindi-Diwas-14-September
Hindi Diwas ki Shubhkamna in hindi language

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