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Wednesday, 24 June 2015

'ब्रेन डेड' का अर्थ आगे भी है...

by on 09:03
भाजपा की नयी सरकार के कई फैसले चर्चा में रहे हैं, किन्तु जिस प्रकार नरेंद्र मोदी ने बुजुर्ग नेताओं को किनारे लगाया, उसने देश में
एक नए सिरे से चर्चा छेड़ दी. कई वरिष्ठों के बाद इस पार पार्टी के सीनियर नेता रहे यशवंत सिन्हा ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज करने के लिए प्रधानमंत्री पर जबरदस्त तरीके से निशाना साधते हुए कहा कि 'जिन लोगों की उम्र 75 साल ज्यादा है, 26 मई 2014 को उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया, जिनमें खुद पूर्व वित्त मंत्री भी शामिल हैं.' सिन्हा ने ये टिप्पणियां मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कीं. इससे पूर्व शत्रुघ्न सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी इत्यादि वरिष्ठ अपनी नाराजगी जता चुके हैं, लेकिन उनकी नाराजगी अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा थी. मोदी सरकार पर बुजुर्गों की अनदेखी करने और उनको 'ब्रेन डेड' करने की हद तक अनदेखा करने का आरोप लगाने वाले सिन्हा और उन जैसे वरिष्ठों का दर्द आसानी से समझा जा सकता है. आखिर, सत्ता और ताकत का मोह है ही ऐसा कि छुड़ाए नहीं छुटता है. सवाल यह है कि क्या वाकई नरेंद्र मोदी का यह फैसला इतना गलत है, कि उन पर इस हद तक आरोप चस्पा किये जाएँ. हिंदुत्व और परंपरा की सोच पर चलने वाली पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा का शीर्षस्थ नेता क्या वाकई अपने बुजुर्गों का सम्मान करना भूल चूका है? क्या उसकी नजर में वरिष्ठों के अनुभव की कोई कीमत नहीं रह गयी है?  इस प्रश्न पर  चर्चा करने से पहले उम्र और जीवन के बारे चर्चित उन चार आश्रमों को उद्धृत करना उचित होगा जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास के नाम से हिन्दू दर्शन में विख्यात हैं. कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे भारतीय बुजुर्ग इन सिद्धांतों को परे रखकर अपनी अगली पीढ़ी से सिर्फ श्रवण कुमार, रामचन्द्र या एकलव्य जैसी अपेक्षा पाल लेते हैं, जो वगैर किन्तु - परन्तु के उनके आदेश को शिरोधार्य करे और वन में चला जाय या अपना अंगूठा काट कर चरणों में डाल दे. पाठकों को यह बात जरा कड़वी लग सकती है, किन्तु पश्चिमी देशों के विकास और भारत के पिछड़ेपन के अनेक कारणों में यह भी एक बड़ा कारण हो सकता है. इसका मतलब यह भी नहीं कि पश्चिमी नंगेपन का समर्थन किया जाय, बल्कि इसके बजाय नयी और पुरानी पीढ़ी में तालमेल करने का रास्ता, भारतीय संस्कृति के दायरे में ही ढूंढने की आवश्यकता है. थोड़ा और स्पष्ट किया जाय तो यह रास्ता हिन्दू दर्शन में वर्णित उपरोक्त चार आश्रमों में ही निहित दिख जाएगा. यह कोई पुरातन युग की बात भी नहीं कही जा रही है, बल्कि आज के युग में भी भारतीय मानसिकता इस सोच से निकल नहीं पायी है. सिर्फ राजनीति ही क्यों, आप परिवार जैसी प्रथम सामाजिक ईकाई में देख लीजिये. जिस घर में बुजुर्ग का हुक्म चलता है, उसके बेटे बेशक बाप बन चुके हों, लेकिन वह घर के फैसलों में अपने बाप के आगे कुछ भी बोल नहीं सकते. चूँकि यह सतयुग या त्रेतायुग तो है नहीं, इसलिए कई लड़के इस तालमेल की कमी से बागी हो जाते हैं और बुजुर्गों से तनाव पाल बैठते हैं जो कई बार अत्याचार में भी परिणित हो जाता है. इसके साथ यदि अनुभवी और ज्ञानी बुजुर्ग तालमेल और परिवर्तन के सिद्धांत पर ध्यान दें तो समस्या सुलझती
नजर आ जाएगी. गीता के सिद्धांत में भी परिवर्तन की महत्ता को स्पष्टतः रेखांकित किया गया है कि पेड़ की पुरानी पत्तियां गिरेंगी, तो नई पत्तियां आएँगी. ठीक वैसे ही, वरिष्ठ अपनी जगह खाली करेंगे तो युवा जिम्मेवारी निभाने को तत्पर होंगे, अन्यथा अगली पीढ़ी का नेतृत्वविहीन अथवा असंवेदनशील होना तय है. परिवार के साथ साथ राजनीति और जीवन के दुसरे क्षेत्रों में भी यह परिवर्तन का सिद्धांत लागू होता ही है. मोदी सरकार पर वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी का आरोप लगाने वालों से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि यदि नवगठित 'आयुष मंत्रालय' के मंत्री मुरली मनोहर जोशी होते, तो क्या मोदी उसी अंदाज में उनको निर्देश दे सकते थे, जिस प्रकार उन्होंने श्रीपद नाइक को निर्देशित किया और 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' के अवसर पर पूरे विश्व में एक विशाल कार्यक्रम का आयोजन हुआ. यदि शहरी विकास मंत्रालय के मंत्री वेंकैया नायडू की जगह लाल कृष्ण आडवाणी होते तो क्या 'स्मार्ट सिटी' पर प्रधानमंत्री की योजना परवान चढ़ पाती. सवाल यहाँ सिर्फ वरिष्ठता का ही नहीं है, बल्कि ताकत के संतुलन का भी है. जो राजनेता या बुजुर्ग अपने उभार के दिनों में ताकत के शीर्ष पर हों, वह भला अपने जूनियर के अंडर में संतुलित ढंग से कार्य किस प्रकार कर सकता है. इसी कड़ी में सन्यास के तहत आधुनिक युग में वन या वृद्धाश्रम भेजने की बात भी समाज के साथ घोर अन्याय ही है, किन्तु अति सक्रियता और सत्ता का मोह छोड़ देने की उम्मीद बुजुर्गों से की ही जानी चाहिए. इस कसौटी पर यदि नरेंद्र मोदी ने 75 से ज्यादे उम्र के राजनेताओं को मंत्रिपद नहीं दिया है तो उनकी आलोचना भला कहाँ से उचित है, क्योंकि उन्हें सिर्फ अगले चार पांच साल ही नहीं, बल्कि इससे ज्यादे समय की प्लानिंग करनी है. उनके द्वारा घोषित प्रोग्राम इस ओर इशारा भी करते हैं. आखिर, मेक इन इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट कुछ सालों में तो परवान चढ़ने वाले हैं नहीं, ऐसे में लम्बी दौड़ के कई राजनीतिक घोड़ों की आवश्यकता देश को है. ऐसा भी नहीं है कि मंत्री नहीं बने तो शत्रुघ्न सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी या यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं का कैरियर समाप्त हो गया. यदि वह सक्रीय ही रहना चाहते हैं तो बजाय अपनी खुन्नस निकालने वाले बयान देने के वह किसी सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व कर सकते हैं, कोई राजनीतिक अकादमी खोल सकते हैं, कोई पुस्तक लिखकर देश के सामने मौजूद समस्याओं का हल प्रस्तुत कर सकते हैं अथवा सरकार को सकारात्मक सलाह ही दे सकते हैं. इसके कई उदाहरण भी सामने ही पड़े हैं, जैसे भाजपा से ही निष्काषित नेता के.एन.गोविंदाचार्य विभिन्न सामाजिक आंदोलनों में अपनी सक्रियता रखते ही हैं. सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता मंत्री नहीं बने हैं तो क्या उनके पोल खोल वाले प्रोग्राम बंद हो गए हैं. अब कोई बुजुर्ग मुख्य धारा की सत्ता पर अपना हक़ कब्र में लटकने तक जताता रहे तो उसे निश्चित रूप से सन्यास धर्म को याद दिलाना आवश्यक हो जाता है. यही प्रकृति का नियम है और इसका सामना सिर्फ भाजपा के वरिष्ठ नेता ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी भी इसी समस्या से ग्रस्त रहेगी, इसलिए जरूरी है कि वर्तमान पीढ़ी की सोच कम से कम सन्यास धर्म की महत्ता को समझकर बदलाव की प्रक्रिया को आत्मसात करे. इसके अभाव में वर्तमान में असंतुलन होगा तो भविष्य को कुंठित होने से बचाया नहीं जा सकता है.



article on brain dead statement of senior bjp leader yashwant sinha in hindi

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Wednesday, 3 June 2015

दंगे क्यों और न्याय क्यों नहीं ?

by on 07:47
भारतवर्ष की यदि कोई सबसे बड़ी त्रासदी रही है तो वह है दंगों का एक लम्बा इतिहास. पूरे वैश्विक पटल पर यह भारतवर्ष की छवि को धूमिल लेकिन उससे भी ज्यादा कोफ़्त तब होती है जब न्याय व्यवस्था अपनी कछुआ चाल से पीड़ितों के ज़ख्मों को सूखने नहीं देती है. 84 के दंगों पर दिल्ली की एक अदालत ने कभी दिग्गज कांग्रेस नेता रहे जगदीश टाइटलर पर 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास करने के आरोपों पर सीबीआई से जवाब तलब किया है, जबकि इस मामले में सीबीआई ने मामला बंद करने की रिपोर्ट दायर की है. सुनवाई के दौरान दंगा पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फुल्का ने अदालत को बताया कि टाइटलर ने कथित तौर पर इस मामले में मुख्य गवाह सुरेन्दर कुमार ग्रंथी के साथ सौदेबाजी की थी. इस केस से सम्बंधित यह बात भी सामने आयी कि जगदीश टाइटलर के पक्ष में बयान बदलने के लिए दबाव डाले गए. अब प्रश्न उठता है कि लगभग 30 साल बीत जाने के बाद भी जांच, सबूत इत्यादि की जरूरत भला कहाँ रह जाती है. राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण सीबीआई को 'तोता' की संज्ञा, माननीय उच्चतम न्यायालय दे ही चुका है. ऐसे में पीड़ितों को और अधिक परेशान करने की भला क्या जरूरत रह जाती है. क्यों नहीं इस केस को क्लोज करके पीड़ितों की न्यायिक-आशा पर विराम लगा दिया जाता है. आखिर, उनको यह बात तो पता चल जाएगी कि आम जनमानस को न्याय नहीं मिल सकता, जबकि रसूखदार व्यक्ति प्रत्येक स्थिति में कानून की पकड़ से बच निकलने में सक्षम हैं. यही बात कुछ दिन पहले मशहूर सिने-स्टार सलमान खान के केस में भी सामने आयी थी. 2002 में उन्होंने फूटपाथ पर सोये हुए गरीबों पर शराब के नशे में गाड़ी चढ़ा दी थी और कई साल के मुकदद्मे के बाद सेशन कोर्ट द्वारा 5 साल की सजा होने के बावजूद, उच्च न्यायालय के जज ने, बेहतरीन वकीलों के प्रयासों से देर शाम तक कार्य किया और सलमान खान को एक मिनट भी जेल के अंदर नहीं जाना पड़ा. बुद्धिजीवी इस मसले में अंदर ही अंदर कुढ़ कर रह गए, किन्तु कुढ़ने और दुखी होने से भला न्याय मिलता है कहीं, जो सिक्ख दंगे के पीड़ितों को या हिट और रन के पीड़ितों को न्याय मिलेगा. न्यायिक व्यवस्था से अलग हटकर देखते हैं तो यह बात सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि गुलामी काल के सैकड़ों, हज़ारों दंगों के बाद आज़ादी के बाद के काल में भी दंगे क्यों होते रहे हैं. क्या इसके पीछे हमारी राजनीतिक सोच ही जिम्मेवार है या दुसरे सामाजिक मुद्दे भी इसमें अहम भूमिका निभा रहे हैं. धर्म के नाम पर लाखों क़त्ल-ए-आम के बाद देश का बंटवारा तक हो गया, लेकिन दंगों से हमें मुक्ति नहीं मिली. दुःख की बात तो यह है कि किसी सशक्त राजनैतिक या सामाजिक कार्यकर्त्ता द्वारा इस प्रकार का बवंडर खड़ा ही नहीं हो पाया, या शायद करने का प्रयास ही समग्र रूप में नहीं किया गया. देश में अनगिनत दंगों में से सर्वाधिक चर्चित गोधरा में बंद ट्रेन में कारसेवकों को जलाने के कुकृत्य के बाद भड़के दंगों ने पूरे विश्व में भारत की छवि दागदार कर दी थी. यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने उन दंगों को 'राष्ट्रीय शर्म' तक की संज्ञा दे डाली थी. तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और अब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उन दंगों को लेकर कड़ा निशाना साधा जाता रहा और विश्व के कई देशों ने उनके अपने यहाँ आने पर रोक तक लगा रखी थी. हालाँकि, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें बाइज्जत बरी किया, जबकि नैतिक रूप से उन पर आज भी कई लोग ऊँगली उठाते रहते हैं. हालाँकि, नरेंद्र मोदी की एक बात के लिए खुलकर तारीफ़ करनी होगी कि 2002 के बाद उनके गृह राज्य में छोटा दंगा भी नहीं भड़का. इसके पीछे तमाम तर्क-कुतर्क दिए जा सकते हैं, लेकिन हाल ही जब प्रधानमंत्री से एक मुस्लिम-प्रतिनिधिमंडल मिला तो उनके उदगार में सांप्रदायिक राजनीति से मुक्ति की हलकी झलक दिखाई दी. मुस्लिम नेताओं से मुलाकात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिया कि आधी रात में भी मदद के लिए उनके दरवाजे खुले हैं. शब-ए-बारात के मौके पर मुस्लिम नेताओं के प्रतिनिधिमंडल में 30 नेता शामिल थे. पीएम ने ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के मुख्य इमाम उमर अहमद इल्यासी के नेतृत्व में गए प्रतिनिधिमंडल के साथ लगभग सवा घंटे बातचीत की और उन्हें अपने हाथों से चाय भी पिलाई. इस दौरान बेहद सफाई से उन्होंने कहा कि वह सांप्रदायिक राजनीति करने में यकीन नहीं रखते हैं.
हालाँकि, उनके आरएसएस बैकग्राउंड के होने से कई लोग उन्हें शक की निगाहों से अब भी देखते हैं, पर देश यदि दंगों की राजनीति से मुक्ति पा जाता है, तो इसे एक युगांतरकारी घटना ही माना जाएगा. भले ही यह नरेंद्र मोदी के हाथों ही क्यों न हो. कड़े और प्रतिबद्ध राजनीतिक नेतृत्व के अलावा, देश में चुनाव सुधार पर भी कार्य किये जाने की विशेष जरूरत है. जब तक धर्म और जाति के आधार पर वोट लिए और दिए जाते रहेंगे, तब तक समाज में विभाजन बना रहेगा. चुनाव सुधार के अतिरिक्त विकास के मोर्चे पर जबरदस्त कार्य किये जाने की आवश्यकता है, जिससे धर्म और जाति के ठेकेदार देश की जनता को अपने लिए इस्तेमाल न कर सकें. इसके अतिरिक्त भी समय-समय पर तमाम आयोगों ने दंगों पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट दी हैं, उनका अध्ययन करके कारण और निवारण पर जब तक एक सर्वमान्य हल निकालकर उस पर सख्ती से अमल नहीं किया जायेगा, तब तक दंगों की आग से देश को मुक्ति मिलना संभव नहीं होगा. कभी सिक्ख दंगा, कभी गुजरात तो कभी मुजफ्फरनगर दंगा होता ही रहेगा और भारतवर्ष की महान संस्कृति इस आग में झुलसती ही रहेगी. उम्मीद करनी चाहिए कि एक तरफ हमारी न्याय-व्यवस्था पीड़ितों को जल्द से जल्द इन्साफ दे पाने में सक्षम हो पायेगी और दूसरी ओर हमारा देश दंगों की आग से मुक्ति पाने में, २१ वीं सदी में ही सफल हो जायेगा.
करने का कार्य करता रहा है,
Cause and solutions of riots in India and related justice, hindi article by mithilesh2020

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