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Tuesday, 1 September 2015

कॉर्पोरेट सहानुभूति

by on 08:00
कैरियर के लिहाज से बेहद सफल थी मेहनाज और उससे भी मजबूत था उसका नेटवर्क. मीडियाकर्मी, कॉर्पोरेट पर्सनालिटीज, नेता और लॉबिस्ट से उसके गहरे संपर्क थे. कहना मुश्किल था कि उससे जुड़े लोग उसकी अथाह दौलत के पीछे थे या उससे लगाव रखते थे. खैर, जो भी हो उसकी ज़िन्दगी सरपट दौड़ती जा रही थी.
इस बीच उसके परिवार में किसी की हत्या हो गयी और शक की सुई घुमी मेहनाज़ पर.
गिरफ्तारी के बाद शक यकीन में तब्दील होने लगा और चूँकि मामला हाई प्रोफाइल था, इसलिए मीडिया में मेहनाज़ के पास्ट की परतें खुलने लगीं. एक के बाद एक लगातार चार शादियां, होटलों में छापों के दौरान कॉल गर्ल के रूप में पकड़ा जाना, सरकारी अधिकारियों के साथ अंतरंग संबंधों की पड़ताल होने लगी. जाहिर था, ऊंचाइयां छूने के लिए मेहनाज़ ने अनेक मर्यादाओं को कुचल डाला था. मामला कुछ यूं चला कि मेहनाज़ का बचाव मुश्किल होता जा रहा था.
अगले ही दिन, एक बड़े पत्रकार का इंटरव्यू छपा जिसमें मेहनाज़ की ज़िन्दगी पर उन महाशय ने प्रकाश डालते हुए कहा कि मेहनाज़ के बचपन में उसका शोषण हुआ था, इसलिए उसकी मानसिक दशा कुंठा का शिकार हो सकती है. 
उसी दिन शाम को एक बड़े चैनल पर एक अन्य प्रभावशाली व्यक्ति कह रहे थे कि मेहनाज़ के पिता, बचपन में उसको बेरहमी से पीटा करते थे!
इन ट्वीस्ट से मीडिया की टीआरपी जहाँ आसमान छूने लगी, वहीं मेहनाज़ के प्रति 'सहानुभूति' का बीजारोपण होने लगा... या फिर किया जाने लगा... कॉर्पोरेट अंदाज में!!
 
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Sunday, 24 May 2015

तनु, मनु और सामाजिक बदलाव

by on 10:29
विश्व में सर्वाधिक फिल्में बनाने वालीं इंडस्ट्री बॉलीवुड में बेहद कम ऐसी फिल्में बनती हैं, जो अपने मूल उद्देश्य मनोरंजन के साथ साहित्यिक उद्देश्य को भी पूरा करती हैं. साहित्य को समाज का दर्पण बताया गया है और यह बेहद आवश्यक है कि किसी दर्पण की ही भांति समाज को उसका बदलता चेहरा दिखाने की कोशिश करते रहा जाय. पत्नी के काफी ज़ोर देने पर 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' की टिकट लेकर हम लोगों का सिनेमा जाना, कतई निराशाजनक नहीं रहा. हालाँकि, पिछले कुछ दिनों से आ रही फिल्मों को देखकर लगातार निराशा हो रही थी. कभी प्रयोगात्मक फिल्में बनाने के नाम पर, तो कभी चालू किस्म की मसाला फिल्मों के नाम पर दर्शकों का भेजा- फ्राय करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गयी. सच कहूँ तो इस पूरी फिल्म को देखते समय, सोचने समझने की जरूरत ही नहीं पड़ी और कथानक का एक-एक भाग स्वतः ही समझ आता गया. बिना तनाव के गुदगुदाते हुए इस फिल्म ने आज की ज्वलंत समस्या को बेहद मजबूती से सामने रखा. बॉलीवुड में अधिकतर रोमांटिक या रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में लड़का-लड़की को आख़िर में एक साथ दिखा देते हैं और फिल्म वहीं ख़त्म हो जाती है. लेकिन क्या फिल्में हमें उसके आगे की कहानी बताती हैं? आम ज़िंदगी के कई जोड़े शादी कर लेते हैं, लेकिन कुछ सालों में ही उनका रोमांस ख़त्म होने लगता है. इसके बाद दोनों एक-दूसरे की उन आदतों से वाकिफ होते हैं जो उन्हें शादी से पहले नहीं पता थीं या पता होते हुए भी वह उन आदतों को अनदेखा कर दिया करते थे. आज जब तमाम रिश्ते नाते बिखर रहे हैं, ऐसे में सात जन्मों का मजबूत रिश्ता समझा जाने वाला पति-पत्नी का बंधन भी इससे अछूता नहीं है. सात जन्म तो क्या, सात साल भी इन रिश्तों को निभाना आज की पीढ़ी के लिए कठिनतम कार्य साबित हो रहा है. फिल्म की कहानी हिमांशु शर्मा ने लिखी है जो बेहतरीन है और इस कहानी में एक तरफ जहाँ आज की लड़कियों को रूढ़िवादिता से मुक्त होते हुए अपने जीवन के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेते हुए दिखाया गया है, वहीं 'वफ़ा' की भारतीय परंपरा के प्रति भी फिल्म अपना असर छोड़ जाती है. चार साल की शादी शुदा ज़िन्दगी में एक-दुसरे से परेशान हो चुके तनु और मनु एकबारगी तो अलग चलने का फैसला कर लेते हैं, किन्तु फिल्म की अभिनेत्री का वह डायलॉग आपका दिल छू लेगा, जिसमें मनु कहती है "वाह शर्मा जी! हम थोड़े से बेवफा क्या हुए, आप तो बदचलन हो गए!"
देखा जाय तो इस संवाद में बदलते समाज की आहट स्पष्ट सुनायी देती है. लड़का, लड़की अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी से बेहद जल्दी बोर होने लगे हैं और इस क्रम में बेवफाई और बदचलनी की राह चुन लेना, उनके लिए बेहद साधारण सी बात बन गयी है. और इसके बाद, तलाक और अकेलापन. फिर कुछ दिन बाद, संभवतः दूसरी शादी, लिव-इन  और फिर वही असंतुष्टि. इस क्रम में, पढ़े-लिखे युवा समझ ही नहीं पाते कि बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स और प्रोग्राम्स को हल करने की क्षमता रखने वाले वह लोग शादीशुदा ज़िन्दगी के दो-चार साल में उलझ क्यों जाते हैं और न सिर्फ उलझ जाते हैं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत रूप से भारी असुरक्षा को जानबूझकर सब्सक्राइब कर लेते हैं. आश्चर्य की बात है कि, यह समस्त ऊहापोह शादी के 5 साल के दौरान ही उत्पन्न होती है. यदि, इतने साल बेहतरीन सामंजस्य बिठाने की कोशिश पति पत्नी की ओर से होती है और वह एक दुसरे को समय के साथ सम्मान देते हैं तो फिर यह रिश्ता चल जाता है. संयुक्त परिवार के दौर में सामाजिक दबाव, ऐसे रिश्तों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, लेकिन बदलता समय नयी चुनौतियों के साथ आया है. हालाँकि, कुछ मूलभूत संशोधन किया जाय, तो संयुक्त परिवार नामक संस्था औचित्यविहीन नहीं हुई है. संशोधन जैसे, व्यक्तिगत आर्थिक आज़ादी को सुनिश्चित कैसे किया जाय और नारी के आज़ादी अभियान के साथ परंपरा का तालमेल किस प्रकार बिठाया जाय. इसके अतिरिक्त भी विचारक कई अन्य व्यवहारिक उपायों पर चिंतन कर सकते हैं. बिडम्बना यह है कि परंपरा और आधुनिक बदलाव को कुछ विचारक परस्पर विरोधी समझने की भूल करते हैं, जबकि 'बदलाव' किसी पुरानी ईमारत के रख-रखाव जितना ही आवश्यक होता है. यही कारण है कि बदलते सामाजिक परिवेश को, विशेषकर नारी के सन्दर्भ में हमारे समाज में स्वीकृति आने में अपेक्षाकृत ज्यादा समय लग रहा है. 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' जैसी फिल्में प्रश्न को उठाती जरूर हैं, किन्तु इन प्रश्नों का उत्तर तो समाज और सामाजिक चिंतकों को ही ढूंढना होगा. नारी के साथ रिश्तों को लेकर हमारे भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी रूढ़िवादी बना हुआ है, जबकि वैश्विक बदलावों के बढ़ते असर ने तनु और दत्तो जैसी बिंदास, आज़ाद ख़याल लड़कियों की संख्या में बड़ा इजाफा किया है. हालाँकि, इन प्रश्नों का वन-शॉट-सॉल्यूशन ढूंढने की उम्मीद पालना बचकाना ही है, किन्तु प्रयास जारी रखना ही मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है और यह फिल्म भी इस तरह की सार्थक उम्मीद की एक कोशिश दिखती है. अपने तरीके से, स्पष्ट बात कहती हुई.... !!
- मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.
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Wednesday, 4 February 2015

मुद्दे और दृष्टिकोण - Mudde Aur Drishtikon, Book Written by Dr. Kiran Bedi, Must Read

by on 10:19
किरण बेदी बहुत पहले से ही किसी परिचय की मुहताज नहीं रही हैं और अब तो वह राजनीति के अखाड़े में रोज चर्चा का विषय बन रही हैं. उनकी हिंदी में लिखी पुस्तक 'मुद्दे और दृष्टिकोण' को पढ़ने का अवसर मिला. इस पुस्तक को यदि किरण बेदी के अनुभव का खज़ाना कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. किरण बेदी को जैसा कि आम जनमानस समझता है, वह एक सकारात्मक परिणाम देने वाली महिला हैं. इस किताब में भी व्यवहारिक दृष्टिकोण और उस पर आधारित कार्ययोजना की बात कही गयी हैं. खुद किरण बेदी के शब्दों में-
"मैं उन तमाम चीजों का क्या करूँ जिन्हें मैं देखती, सुनती पढ़ती और बनाती हूँ? अब या तो मैं उन्हें अनदेखा करूँ या भूल जाऊं या उनके बारे मैं शिकायत करूँ या फिर अपनी भड़ास निकालूँ. परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि जिन चीजों ने मुझे झंझोड़ा या प्रभावित किया है मुझे उन्हें सबके साथ बाँटना चाहिए."
एक स्वावलम्बी महिला, पुलिस विभाग जैसे सक्रीय महकमे में नौकरी और अब राजनेता जैसी तमाम भूमिका में एक सक्षम व्यक्तित्व की तरह डॉ. किरण बेदी सामने आयी हैं. उनकी इस पुस्तक में मुख्यतः छः भाग हैं-

  • नेतृत्व, शासन एवं भ्रष्टाचार: उन तमाम मुद्दों का संकलन जो नेतृत्व की संरचना, आम जनमानस के जीवन में उसका महत्त्व, कानूनी पहलू, वोट का अधिकार, न्याय व्यवस्था इत्यादि से सम्बंधित हैं. इस भाग में किरण बेदी ने बेहद व्यापक दृष्टिकोण का परिचय दिया है और कई समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करने की बात More-books-click-hereस्पष्टता से कही है.

  • भारतीय पुलिस: इसमें भारतीय पुलिस व्यवस्था की बारीक पड़ताल की गयी है. निश्चित रूप से यह किरण बेदी का सिद्धहस्त क्षेत्र है तो इसमें लेखन का अधिकांश भाग अनुभव की कसौटी पर खड़ा है. तकनीकी रूप से किताब का यह भाग बेहद दुरुस्त दीखता है.

  • महिला सशक्तिकरण: यदि भारतवर्ष को विकास करना है तो भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पर गंभीर चिंतन एवं उसमें अपेक्षित बदलाव किया जाना जरूरी है. लड़कियों की शिक्षा, बाल-विवाह, नारी की पहचान, विवाहेत्तर समस्याएं एवं समाधान, महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण, चुनाव प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका जैसे सामयिक विषय इस भाग में सम्मिलित किये गए हैं. किरण बेदी का लेखन इस भाग में कई जगहों पर भावुक हुआ है और भारतीय परिवार को लेकर वह उलझती भी दिखी हैं, किन्तु हार माने बिना वह समाधान खोजने की बात करती हैं. वस्तुतः यह मुद्दा इतना आसान है भी नहीं, किन्तु किरण बेदी के लेखों में उम्मीद की किरण अवश्य ही दिखती है.

  • कार्यस्थल पर: 'मुद्दे और दृष्टिकोण' पुस्तक के इस भाग में किरण बेदी का पुलिस विभाग के साथ दुसरे कार्यों का अनुभव शामिल किया गया है. संयुक्त राष्ट्र संघ में किरण बेदी का अनुभव, पुरुष एवं महिलाओं का कार्यस्थल इस भाग के मुख्य बिंदु हैं.

  • विदेशी परिदृश्य: आज के वैश्वीकरण के दौर में इस सेक्शन में भारत और दुसरे देशों की सुविधाओं, वास्तविकताओं पर चर्चा की गयी है, वहीं कई जगहों पर किरण बेदी ने भावनात्मक रूप से देश-प्रेम के चित्र को उकेरा है. 'मेरे शहर से प्यारा को नहीं' शीर्षक से लिखे गए लेख में आपको इस बात का बखूबी भान हो जायेगा.

  • इस किताब के अंतिम भाग में किरण बेदी ने माता-पिता, युवा और बुजुर्गों की देखभाल शीर्षक से मुद्दा उठाती हैं. यह बात खलती है कि भारतीय परिदृश्य में इस भाग पर पहले चर्चा क्यों नहीं की गयी. इस सेक्शन के विभिन्न लेखों को पढ़ने के बाद यह बात साफ़ हो जाती है कि किरण बेदी ने इन मुद्दों को किताब के अंतिम भाग में क्यों रखा है. अपने तमाम दुसरे अनुभवों के विपरीत किरण बेदी इस सेक्शन में काफी कमजोर नजर आती हैं. इस भाग में किरण बेदी इस बात पर चर्चा जरूर करती हैं कि 'हमारा अस्तित्व परस्पर निर्भरता में है', किन्तु वह भारतीय व्यवस्था की रीढ़ 'संयुक्त परिवार' व्यवस्था को भूल जाती हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय समाज के इस हिस्से के बारे में काफी कम जानकारी के साथ लेखन हुआ है. फिर भी बच्चों की शिक्षा, वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम जैसे मुद्दों को उठाया गया है और कुछ हद तक ही सही समाधान की बात भी कही गयी है.


 

इन विभिन्न भागों की विस्तृत चर्चा भी अपने अगले लेखों में जरूर करूँगा और साथ ही आप सबसे अपील भी करूँगा कि देश, समाज की विभिन्न समस्याओं को समझने के लिए आप डॉ.किरण बेदी की यह पुस्तक जरूर पढ़ें.

– मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.kiran-bedi-delhi-politics-article

Mudde Aur Drishtikon, Book Written by Dr. Kiran Bedi, Must Read

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Thursday, 4 December 2014

Rohtak Brave Girls and Public Debate

by on 05:31
Rohtak Brave Girls and Public Debate

 



... रोहतक की दो लड़कियों का चरित्र- हनन खूब किया जा रहा है. गाँव की राजनीति से लेकर, जाट-राजनीति तक पूरा पुरुष-समाज एक होकर उनको गलत साबित करने में लग गया है, जैसे वह लडकियां 'इस्लामिक स्टेट' की सदस्य हों-
"आक थू ... ऐसी मानसिकता पर"
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इन सभी के अनुसार उन लड़कियों को चुपचाप अपना 'रेप' करा लेना चाहिए था, ओह सॉरी, रेप नहीं 'गैंग-रेप' !!






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  • Ranbir S Phaugat कुछ ज्यादा ही आगे का सोच लिया है. आप और हम वहाँ नहीं थे, इसलिये ऐसी टिप्पणी को मैं उचित नहीं मानता.















  • Mithilesh Kumar Singh महोदय, हम यहाँ हैं और देख रहे हैं नारी का बलात्कार किसी प्रकार हो रहा है. और हाँ! लोग सच्चाई की बहुत दुहाई दे रहे हैं... आखिर सच्चाई-प्रिय देश के नागरिक जो हैं. बहुत खूब!















  • Mithilesh Kumar Singh ... सच्चाई की दुहाई देने वालों की असलियत आप और हम सभी जानते हैं. यदि उन सभी के सामने सड़क पर कोई बलात्कार हो तो वह लड़की को बचाएंगे कम और उसे 'छूने' की कोशिश ज्यादा करेंगे. उसे बचाकर किसी कोने में ले जाना चाहेंगे. आप हम क्या सुनना चाहते हैं. आंकड़े उठकर देख लीजिये, रोज देश में, दिल्ली में, हरियाणा में यही होता है. कोई शोर नहीं होता, कोई सच्चाई की बात नहीं होती, कोई आंदोलन नहीं होता. आज इतना शोर क्यों?? क्यों पुरुष घबरा गए हैं ?? क्यों डर गए हैं ??















  • Arun Kumar पुरुष सदा से ही कमजोर था, रहा है और रहेगा ...................उसे फिर से याद दिलाना होगा की जीवन का पहला थपड़ उसे नारी ने ही मारा था ................और अपने जीवन के ऐसे कई थप्पड़ वो............. १०-१२ साल कहा चुका है
    इसलिए उसके अन्दर हीन भाव स्थापित हुआ है...................ये सब उसके हीन भाव ग्रसित होने के लक्षण है















  • Dheeren Singh Janab ye mat bhuliye bina aag dhunaa nahi uthata....















  • Mithilesh Kumar Singh उन लड़कियों को निर्दोष साबित नहीं कर रहा हूँ मैं, लेकिन उनको माध्यम बनाकर पूरी औरत जात को गलत साबित करना का पिछले तीन-चार दिन से बेहद घिनौना प्रयास हो रहा है. यह प्रयास उसकी मुखरता को कुचल देने का है और टीवी चैनल से लेकर सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की एकतरफा टिप्पणियां चल रही हैं, वह निश्चय ही शर्मनाक है. कोई इस बात के लिए आवाज नहीं उठा रहा है कि यदि किसी भी लड़की के आत्मसम्मान पर कोई लड़का, युवक, पुरुष आँख उठा कर देखता है, तो उसकी उसी रूप में नारी जवाब दे सकती है.















  • Manoj Kamboj भाई साहब कहानी कुछ अोर ही हैं















  • Mithilesh Kumar Singh काम्बोज जी, इस मैटर को इतना हाईलाइट होना ही नहीं चाहिए था. पर न्यूज चैनलों की फितरत कौन बदले... अब यह मुद्दा कहीं से कहीं पहुँच गया है. अब इस चर्चा को अतिवादियों ने लड़कियों के खिलाफ हथियार बनाना शुरू कर दिया है. आपत्ति इस बात से है. लड़कियों पर कितना अत्याचार हो रहा है, इस बात को कौन नहीं जानता है. कोई चूं नहीं होती है, और इस एक व्यक्तिगत मैटर पर इतना हंगामा क्यों?? इसे कुंठित लोग अपनी आदत और वासना से जोड़कर इसको फैला रहे हैं और खूब मजे ले लेकर लड़कियों की इस वीडियो को, उस वीडियो को शेयर कर रहे हैं. न्यूज चैनलों की क्या कहें, वह तो ग्राम प्रधान से लेकर, पता नहीं किसको-किसको बैठा कर ... !!

















  • Ananadsuman Singh SEHMAT, YEH MANSIKTA UCHIT NAHIN















  • Rohit Yadav I agree with you Mithilesh Ji. I appreciate those girls for blowing the whistle. She herself mentioned in an interview that it was not the first time she has beaten such cheap boys. She claimed that she will continue doing so until people around her st...See More















  • Abhiraj Singh Thakurela Jaanch ke bad hi kuchh kaha ja skta h..aap aise kisi jati ki mansikta par thook ni skte Bhaisahab...Bina jaanch padtal ke natije nahi sunane chahiye aur na hi raay kayam krni chahiye...















  • Abhiraj Singh Thakurela Agar ladke doshi hn to saza jaroor honi chahiye...agar nahi to ldki ko saza honi chahiye...bat sahi aur galat ki h...kisi case ko lkr kisi jati ki mansikta tay ni ki ja skti...















  • Abhiraj Singh Thakurela Aur dusri bat is matter ko aapsi baton se suljha lena chahiye tha...ise itna badha diya ki ldko ke career pe aanch aa gyi...aur career se khilwaad hone se ek yuva galat raah pakad leta h...iske kai examples b hn...Aur dusri bat jat yuva ka dimag kharab ho to museebat duguni ho jati h kyunki wo ghayaal sher se jyada aakramak ho uthta h...















  • Kumar Chandra Bhushan Is episode ke baad girls jab bhi resist karengi to unhe apne pavitra hone ka certificate pahle dena parega,shame on this male dominated society















  • Merapata In मिथलेश जी लड़कियों को छेड़ना, परेशां करना गलत है लेकिन इस केस मैं ऐसा नहीं लगता है. एक बार ट्रेन मैं मेरे सामने एक लडकी ने एक अधेड उम्र के व्यक्ति को उठा कर बैठगई.और उस व्यक्ति को तमाम गन्दी गलिया देती रही. बार बार चप्पल से मारने कि धमकी देती रही.















  • Mithilesh Kumar Singh आपकी बात अपवाद ही है अभी। सवाल है कि पचास अत्याचार या कहें कि पचास हजार अत्याचार हम करते हैं, उनकी ओर से एक आवाज आयी तो तूफ़ान मच गया। हमारी सहिष्णुता की पराकाष्ठा है जी यह... ढोंग की पराकाष्ठा तो हम पहले ही पार कर चुके हैं।















  • Abhiraj Singh Thakurela Dhong koi b kar skta h chahe ldka ho ya ldki...koi patent ni h dhong ka ki ldke hi krenge ya ladkiyan krengi...justified bat honi chahiye...Bharat ke kanoon me likha h ki chahe nirdoshi ko bachane k liye 1000 gunahgaar chhodne pade to wo jaayaj h...Hum...See More

















  • Mithilesh Kumar Singh अभिराज बाबू, आपकी लाइब्रेरी में काफी किताबें हैं. इतिहास पढ़ो और समझो, फिर देखोगे कि ढोंग का ठेका पुरुष समाज ने अकेले उठा रखा है, तब से अब तक. ईमानदारी से तुलना करो... फिर आपको उनका दर्द पता चलेगा. और यही कारण है कि देश में साल भर में .२५००० रेप केसेज द...See More


















    Rape in India is the fourth most common crime against...


    EN.WIKIPEDIA.ORG



























  • Kumar Chandra Bhushan Salute these two brave girls who assaulted the boys may be on the reason of petty fight and not molestation but it will certainly inspire lakhs of girls who are subjected to all kind of atrocities by males on daily basis and every where.










  • Mithilesh Kumar Singh







Rohtak Brave Girls and Public Debate

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