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Saturday, 6 June 2015

व्यापारिक सम्बन्ध हों प्रगाढ़

by on 06:56

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूं तो कई देशों की हाई-प्रोफाइल यात्राएं कर चुके हैं, लेकिन हमारे महत्वपूर्ण पड़ोसी बांग्लादेश की यात्रा कई मायनों में ख़ास है. बांग्लादेश का भारतीय इतिहास में बेहद खास स्थान रहा है. इतिहास के आईने में देखा जाय तो आज़ादी के समय देश का विभाजन, फिर चीन से जंग हारना हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व पर जब एक प्रश्न चिन्ह बन चूका था, ऐसे में देश की आयरन लेडी कही जाने वालीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश को आज़ाद कराने में सक्रिय भूमिका निभाकर हमारे राष्ट्रीय सम्मान की नींव मजबूत की. देखा जाय तो बांग्लादेश की मुक्ति के बाद ही भारत विश्व की बड़ी महाशक्तियों के साये से निकलकर बड़ी छलांग लगाने को तैयार हो सका. कुछ कड़वे अनुभवों को छोड़ दिया जाय तो बांग्लादेश के साथ भारत के सम्बन्ध मधुर ही रहे हैं. हालाँकि बांग्लादेश बनने के बाद, भारत के कई प्रधानमंत्रियों ने अपने इस महत्वपूर्ण पड़ोसी से उस तरह सम्बन्ध प्रगाढ़ नहीं किया जैसा उन्हें करना चाहिए था. अब विदेश नीति में बड़ी दिलचस्पी ले रहे प्रधानमंत्री मोदी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के साथ जब बांग्लादेश पहुंचे हैं, तो दो पड़ोसी देशों के अलावा चीन और पाकिस्तान की निगाह भी इस यात्रा पर टिक गयी होगी. इस पड़ोसी देश का महत्त्व इस तरीके से समझा जा सकता है कि भारतवर्ष के पड़ोसियों में एकमात्र बांग्लादेश ही ऐसा है, जिसकी सीधी सीमा चीन से नहीं लगती है. हालाँकि, हमारा पारम्परिक प्रतिद्वंदी चीन समुद्री रास्ते से बांग्लादेश के साथ व्यापार बढ़ाने और कूटनीतिक सम्बन्ध बनाने की काफी कोशिशें कर चूका है. पाकिस्तान भी अपने आईएसआई और आतंकी नेटवर्क के जरिये आतंकियों और जाली करेंसीज को बांग्लादेश के रास्ते भारत में एक्सपोर्ट करता रहा है. संबंधों की चाशनी में प्रधानमंत्री मोदी से इन मुद्दों पर बांग्लादेशी नेतृत्व के सामने बेबाकी से राय रखने की उम्मीद की जा सकती है. बांग्लादेश के साथ हमारी काफी बड़ी सीमा लगती है, ऐसे में दोनों देश के प्रधानमंत्रियों द्वारा किया गया भूमि समझौता महत्वपूर्ण हो जाता है. भारत की संसद पहले ही इसे मंजूरी दे चुकी है. अब जबकि लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट पर दोनों देशों ने दस्तखत कर दिए हैं, इस बाद की उम्मीद बढ़ जाती है कि बांग्लादेशी शरणार्थियों का अवैध आगमन, अवैध घुसपैठ और तस्करी भी रूकेगी. अगली कड़ी में सीमा विवाद सुलझाने के अलावा प्रधानमंत्री की यात्रा का मकसद बांग्लादेश में भारत के खिलाफ तैयार हुए माहौल को फीका करना भी रहेगा. दोनों देशों को इस यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों के नयी ऊंचाइयों तक पहुंचने और आर्थिक एवं व्यापारिक संबंधों की संभावना के दोहन करने की उम्मीद है. प्रधानमंत्री मोदी के भव्य स्वागत की तैयारियां दोनों देशों के पारस्परिक महत्त्व को रेखांकित करता है. सड़कों पर मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और इंदिरा गांधी के साथ बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के विशाल कटआउट्स लगे हैं. स्वागत की कड़ी में बांग्लादेश के लगभग सभी राजनीतिक दल एक सूर में बोल रहे हैं, लेकिन तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर बांग्लादेशियों में भावनात्मक विरोध भी है. जल का मुद्दा 21वीं सदी में बड़ा विकट मुद्दा बन चूका है. अपने देश में ही कई राज्य जल बंटवारे को लेकर आपस में भिड़ते रहते हैं. कर्णाटक- तमिलनाडु, दिल्ली हरियाणा जैसे राज्य जल विवाद को लेकर परेशान हैं. ऐसे में पड़ोसी देश से इस नाजुक मुद्दे को सुलझाने में कुछ और समय जरूर लग सकता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि बांग्लादेश शेष मुद्दों पर भारत के हितों का ध्यान रखेगा, विशेषकर अपनी सीमा से आतंकियों की घुसपैठ पर. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ढाका दौरे से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने बांग्लादेश को भारत का ‘सबसे अहम पड़ोसी’ बताया था, ऐसे में भारत की 'लुक-ईस्ट' की नीति में ढाका की अहमियत को समझा जा सकता है. व्यापारिक मोर्चे पर भारत के कुछ औद्योगिक घरानों ने प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान बांग्लादेश में निवेश करने की घोषणा जरूर की है, लेकिन भारत को अपने इस महत्वपूर्ण पड़ोसी से व्यापार बढ़ाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने चाहिए, क्योंकि जैसे मोदी विकसित देशों से अपने यहाँ निवेश लाने की गुहार लगा रहे हैं, वैसे ही हमारे कमजोर पड़ोसी भी हमसे आशा लगाये बैठे हैं. इस आर्थिक युग में यदि हम उनके यहाँ व्यापार को बढ़ावा नहीं दे सकते, तो संबंधों में प्रगाढ़ता आना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है. इन तमाम मुद्दों पर ध्यान रखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा सकारात्मक शुरुआत से होते हुए वास्तविक प्रगाढ़ता की ओर बढ़ेगी और यह तभी मुमकिन है जब दोनों देश एक दुसरे के हितों का विशेष ध्यान रखने को प्रतिबद्ध होंगे. मजबूत ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद भारतीय नेतृत्व को इस बात के लिए चिंतन करना ही होगा कि नेपाल, श्रीलंका, भूटान, वर्मा और बांग्लादेश जैसे देशों से उसके सम्बन्ध प्रगाढ़ता की उस बुलंदी को नहीं छू पाये हैं, जैसी प्रगाढ़ता अमेरिका और कनाडा के बीच या यूरोपीय यूनियनों के बीच देखने को मिल रही है. कहने को दक्षेस के रूप में संगठन मौजूद है, लेकिन यह संगठन महज खानापूर्ति का संगठन बन कर रह गया है. यदि हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में से दो राष्ट्र भी मजबूती से भारत के साथ खड़े हो जाएँ तो कोई वजह नहीं कि वैश्विक मंच पर हम एक महाशक्ति के रूप में पहचाने जाने लगेंगे. किन्तु, समस्या यह है कि हम समृद्ध देशों के साथ कारोबार को बढ़ावा देने की गलत रणनीति अपनाये हुए हैं. समृद्ध देश हमारे साथ सिर्फ मुनाफाखोरी करने की प्रचलित रणनीति अपनाते आये हैं. इसके विपरीत यदि हम बांग्लादेश सहित दुसरे, कमजोर पड़ोसियों के साथ आर्थिक सम्बन्ध मजबूत करते हैं तो वह हमारे पीछे न सिर्फ खड़े होंगे, बल्कि हमारी कूटनीतिक छवि को स्पष्ट धार भी देंगे. पर समस्या यह है कि खुद हमारे देश में अभी करोड़ों लोग भूखे सोने को विवश हैं, ऐसे में इन गरीब देशों के साथ हम तालमेल कैसे कर सकते हैं, यह देखने वाली बात होगी. क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह ऐतिहासिक यात्रा प्रगाढ़ता को बढ़ाने वाली साबित होगी या महज खानापूर्ति और क्षणिक उद्देश्य ही इसका लक्ष्य बन पायेगा, यह प्रश्न भविष्य के गर्त में छिपा हुआ है. 



Prime minister in Bangladesh tour, hindi article by mithilesh2020

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