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Tuesday, 6 January 2015

जलस्रोत बनाया मरूभूमि में ... Poem on Gurukul in Bhilwara, Rajasthan.

by on 05:13

प्रथम पूज्य गणपति विनायक
उनका नाम ही शुभ फलदायक
विघ्नों का पल में करते नाश
होते भक्तों के सदा सहायक



था राष्ट्र हमारा तब महान
गुरुकुल में मिलता था जो ज्ञान
स्वाभिमान की थी जब संस्कृति
नारी का होता था सम्मान



विकृति नहीं थी प्रकृति मेंMore-books-click-here
सुंदरता थी हर आकृति में
मन, हृदय हमारा स्वच्छ बने
फैले सुगंध देव संस्कृति में



विद्यापीठ के प्रांगण की हवा
गुरुजनों की सीख है और दुआ
हैं मंदिर, कोमल पुष्प यहीं
मानव-चरित्र की यही दवा



हैं कर्मवीर अभिमान शून्य
सींचा है नींव और लिया है पुण्यshiksha-kya-hai-book-search
जलस्रोत बनाया मरूभूमि में
अधिष्ठाता योगदान अमूल्य



हे देव विनायक! अर्पित तन-मन
विद्या हमें दो, हम हैं विपन्न
इस संस्थान से लें गुण अपार
बन राष्ट्र-भक्त सच करें सपन



(विनायक विद्यापीठ, भीलवाड़ा, राजस्थान के शैक्षणिक योगदान के प्रति समर्पित चंद पंक्तियाँ) guru-gurukool-education-shiksha
- मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.


Poem on Gurukul in Bhilwara, Rajasthan

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Thursday, 1 January 2015

'न्यू ईयर' का 'रतजगा' - Happy New Year 2015 Poem in Hindi

by on 14:25

सुबह-सुबह जब आज जगा था
सर्दी से सूरज भी डरा था
कल की रात न सोये हम सब
'न्यू ईयर' का रतजगा था


 

ठंडी में खूब शोर मचाकर
बेसुरा गाना गा गाकर
'बीजी' थे सब फोन में ऐसे
जैसे 'एप्स' हों ज्ञान का सागर


 

जाने कौन-कौन थे लोगMore-books-click-here
फास्ट- फूड, पिज्जा का डोज
इंग्लिश, पंजाबी, भोजपुरी
'पीके' फिल्म के जैसा रोग


 

मुझे समझ तो कुछ न आया
न्यू ईयर कह कर भरमाया
दादी का त्यौहार है बढिया
कर्म, धर्म का 'मर्म' बताया


- मिथिलेश (1 जनवरी 2015 की शाम, नई दिल्ली)

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Happy New Year 2015 Poem in Hindi

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Monday, 3 November 2014

दादी तुम रहती क्यों दूर ... Bal Kavita by Mithilesh

by on 05:32

दादी - दादी मुझे पढ़ाओ,
ढेरों फिर तुम बात बताओ
खेलो दिन और रात मेरे संग
करूँगा तुमको जी भर के तंग


 

मम्मी सुबह जगाती है,
फिर मुझको नहलाती है,
रोता हूँ मैं जी भर लेकिन
दया उसे नहीं आती है.


 

Buy-Related-Subject-Book-beछोटा हूँ मैं घर में सबसे
बड़ी बड़ी किताबें हैं
करना चाहूँ बात मैं सबसे
ढेरों पास में बातें हैं


 

मम्मी, काकी करतीं काम,
खाना वही बनाती हैं
कंप्यूटर पर करतीं खिट-पिट
टीवी दिखा, सुलाती हैं


 

काका, पापा के आने पर
पास में उनके जाता हूँ
कहते हैं वह थके बहुत हैं
मन मसोस रह जाता हूँ


 

दादी तुम रहती क्यों दूर
समझ नहीं यह पाता हूँ
गर्मी की छुट्टी में ही क्यों
गाँव तुम्हारे आता हूँ.


 

वहां थे आयुष और अनुकल्प
दिल्ली में नहीं कोई विकल्प
साथ रहो या साथ ले चलो
दादी मानो यह संकल्प.


 

शुभकामनाओं सहित,
-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली. (Bal Kavita by Mithilesh)

[caption id="attachment_228" align="alignnone" width="960"]Aaryansh-Dadi-Grand-Mother-Smt.-Meera-Devi आर्यांश अपनी दादी के साथ (Aaryansh with His Grandmother Smt. Meera Devi)[/caption]

Tuesday, 14 October 2014

लोक-संस्कृति का संवाहक है संयुक्त परिवार ! - festivals and family

by on 09:50
त्यौहारों का मौसम अपने शबाब पर है. नवरात्रों, दशहरा के बाद दीपावली के पावन पर्व का हम स्वागत कर रहे हैं. इस बात में दो राय नहीं है कि त्यौहार हमारे जीवन में न सिर्फ सजीवता लाते हैं, बल्कि मनुष्य को सामाजिक बनाने में इन त्यौहारों की बड़ी भूमिका होती है. और यही त्यौहार जब सामाजिक स्वीकृति के बाद घर-घर में प्रवेश कर जाते हैं, तो संस्कृति का निर्माण होता है. मन में बड़ा रोचक प्रश्न उठता है कि संस्कृति आखिर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक किस प्रकार जाती है. एक सदी से दूसरी सदी तक किस प्रकार ये त्यौहार अपना सफर तय करते हैं? क्या लोक-संस्कृति को भी किसी मानव की जीवन-यात्रा की तरह ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? तब तो निश्चय ही इन त्यौहारों और लोक-संस्कृति का स्वरुप भी बदलता होगा? कालांतर में इन बदलावों का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर एक नजर डालना सामयिक होगा.
उपरोक्त कथनों की गहराई में जाने के लिए मैं स्वामी विवेकानंद से लेकर आज के भारतीय प्रधानमंत्री तक, उन तमाम तेजस्वी महानुभावों का जिक्र करना चाहूंगा, जिन्होंने विदेशी धरती पर भारत को गौरवान्वित करने का प्रयास किया है. सभी महान भारतीय, विदेशी धरती पर उस भारतीय मंत्र का बड़े गौरव से ज़िक्र करते हैं, जो कहता है कि 'सम्पूर्ण विश्व हमारा परिवार है'. जी हाँ! मैं 'वसुधैव कुटुंबकम' की ही बात करता हूँ. यदि किसी भारतीय की मंशा पर कोई प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है, तो वह तत्काल इस मंत्र को उच्चारित करता है.

लेकिन बड़े आश्चर्य का विषय है कि विदेशों में इस मंत्र का बार-बार और लगातार गुणगान करने के बावजूद भारत में इस मंत्र को न कोई बोलता है, न कोई सुनता है, न कोई मानता है. यदि आपको विश्वास नहीं है इस कथन पर तो पिछले दस सालों से छप रहे पत्र-पत्रिकाओं को खंगाल लीजिये. उसमें इस कथन का प्रयोग आपको नहीं मिलेगा. यदा कदा मिल भी गया तो वह विदेशी उद्धरण से सम्बंधित होगा. कुटुंब, यानि परिवार क्या है, जरा इस बात पर फिर से विचार कीजिये. शिक्षण की भाषा में कहा गया है कि व्यक्ति की प्रथम पाठशाला उसका परिवार ही है. भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो, न सिर्फ प्रथम पाठशाला बल्कि व्यक्ति के पूरे जीवन की सबसे सशक्त पाठशाला है हमारा 'भारतीय परिवार'. जरा शब्दों पर गौर करें, मैंने प्रयोग किया है 'भारतीय परिवार' और भारतीय परिवार का एक ही मतलब है 'संयुक्त परिवार'. निश्चित रूप से इसी संयुक्त परिवार की भावना को आधार मानकर, और इस संस्था के द्वारा निर्मित भारतीयों पर विश्वास करके ही हमारे पूर्वजों ने 'वसुधैव कुटुंबकम' का मंत्र दिया होगा. उन्हें विश्वास था कि संयुक्त परिवार का जो मजबूत स्तम्भ, उन्होंने बनाया है, वह व्यक्ति निर्माण के लिए सर्वोत्तम विकल्प है. यह सर्वोत्तम क्यों है और इसकी वैज्ञानिकता क्या है, इसके बारे में आगे चर्चा करेंगे लेकिन इससे पहले आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ कि साथ रहने वाले न्यूक्लियर पति-पत्नी के लिए इस दिवाली का मतलब क्या होगा? सामान्यतः दिन में वह किसी मल्टीप्लेक्स में एक मूवी देखने जायेंगे, फिर कहीं रेस्टोरेंट में डिनर कर लेंगे, या घर पर पिज़्ज़ा आर्डर कर लेंगे. हाँ! एकाध मोमबत्तियां भी जला लेंगे. यदि उनका बेटा छोटा है, तो शाम को डर-डरकर एकाध फुलझड़ियाँ जला लेगा और यदि बेटा बड़ा है तो अपने दोस्तों के साथ या फेसबुक पर ....! तथाकथित 'न्यूक्लियर फेमिली' में यही स्थिति, प्रत्येक त्यौहार में बरकार रहती है, एक सामान्य 'हॉलिडे' की तरह. जरा विचार कीजिये! क्या यही मतलब है इन त्यौहारों का! क्या इसी रास्ते से बच्चों में संस्कार पनपेगा? क्या इसी रास्ते से पति-पत्नी का आपसी सम्बन्ध मजबूत होगा? क्या इसी रास्ते से समाज में समरसता आएगी? नहीं! नहीं! नहीं!

यहाँ स्पष्ट करना उचित रहेगा कि यह स्थिति आपके, हमारे चारो तरफ पनप रही है, जिसे लोक-संस्कृति तो कतई नहीं कहा जा सकता है, हाँ! कुसंस्कृति या मशीनी संस्कृति जरूर कह सकते हैं इसे. यह एक बड़ा कारण है कि आज के समय मनाये जाने वाले त्यौहारों से लोक का लोप हो गया है. अब की बार जो दिवाली मना रहे होंगे आप, उसमें न तो कुम्हार के बनाये दिए होंगे, न धुनिये का धुना रुई होगा, न किसान द्वारा उत्पादित सरसों का तेल होगा, न ग्वाले द्वारा निकाला गया देशी घी होगा. इसके बदले होंगे चाइनीज झालर, रेडीमेड नकली मिठाइयां, और देशी घी की पूड़ियों के बदले होगा, बासी और सड़ा हुआ पिज़्ज़ा. सच पूछिये तो 'न्यूक्लियर फेमिली' का कांसेप्ट न सिर्फ हमारे त्यौहारों की अहमियत समाप्त कर रहा है बल्कि हमारे समाज की रीढ़ को खोखला करता जा रहा है, लगातार ! इसके विपरीत आप कुछ बचे हुए संयुक्त परिवार के अवशेषों का ही अध्ययन कर लीजिये. वहां इस दीपावली में घर के मुखिया ने अपने छोटे भाइयों, बेटे-बेटियों को फोन कर दिया होगा कि दीपावली पर सभी को घर की पूजा में सम्मिलित होना है. न चाहते हुए भी आधुनिक किस्म के सदस्य वहां पहुंचेंगे, पूजा में सम्मिलित भी होंगे. एक-दुसरे से मिलेंगे, उनसे बातें करेंगे. दादा- दादी, चाचा- चाची, काका- काकी से औपचारिकता ही सही, लेकिन हाल-चाल पूछेंगे. पड़ोस के ताऊ को भी पूजा की मिठाई देने के बहाने मिल आएंगे, दो बातें सीख पाएंगे. अपने मोहल्ले से मेलजोल बढ़ाने को सज्ज हो पाएंगे. इन भारतीय परिवारों के छोटे बच्चे जो निश्छल हैं, बड़ों के बीच तनाव से बेखबर, वह भी घर के इस माहौल को देखकर आनंदित होंगे और लोक संस्कृति के संवहन की जिम्मेवारी जाने-अनजाने अपने ऊपर लेने को तत्पर होंगे. संयुक्त परिवार में त्यौहार के दृश्य का यह वर्णन आपको थोड़ा अटपटा लग सकता है, लेकिन आज के टूटन के इस दौर में यही सत्य है, शायद सुनने में कड़वा लगे. इसके साथ यह भी सत्य है कि संयुक्त परिवार या भारतीय परिवार अपनी बुरी हालत में भी तथाकथित न्यूक्लियर फेमिली से लाख गुना बेहतर है.

हालाँकि, संयुक्त परिवार के आलोचक भी कम नहीं हैं, इसकी कमियां एक-एक करके वह बता देंगे, जिनमें कई कमियां सच भी हो सकती हैं, मसलन, संयुक्त परिवार में तमाम आर्थिक कठिनाइयाँ हैं, तो नेतृत्व को लेकर टकराहट होती हैं, विकास अवरुद्ध हो जाता है. लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि इन सभी कमियों को दूर किया जा सकता है. यूनान, रोम सब इस जहाँ से मिट गए और हम भारतीय बचे हैं, तो इसके मूल में हमारी मानव-निर्माण की प्रथम पाठशाला ही है. हिन्दू धर्म के युगों के अनुसार सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग में आखिर संयुक्त परिवार ही तो रहे हैं, जिनके कंधे पर सवार होकर हमारी संस्कृति यहाँ तक पहुंची है. ज्ञात इतिहास में भी आज़ादी के पहले तक हमारी व्यवस्था यही भारतीय पारिवारिक व्यवस्था ही तो थी. अब जब अमेरिका, ब्रिटेन समेत तमाम विकसित देश मानव-निर्माण की प्रक्रिया में असफल होकर हमारे भारतीय दर्शन की तरफ देख रहे हैं, तो हम क्षणिक लिप्सा में फंसकर, संकुचित स्वार्थ की खातिर समाज को तोड़ रहे हैं, एकल परिवार जैसी विकृति फैलाकर भारतीय लोक-संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं. आखिर, भारतीय दर्शन हमारा लोक-व्यवहार ही तो है.
वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाय तो बच्चे की सीखने की उम्र १४ साल तक मानी गई है. १४ साल तक उसके चरित्र, बुद्धि का निर्माण ९० फीसदी तक हो चूका होता है. अब जरा इसको दुसरे नजरिये से देखें. एक युवक, युवती की शादी और संतानोत्पत्ति सामान्यतः २५ से ३५ साल के बीच में संपन्न हो जाती है. यह समय कैरियर के लिहाज से बड़े उथल-पुथल का समय होता है. युवक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक रूप से कड़े संघर्ष करता है इस वक्त. समय की कमी होती है, अनुभव की कमी होती है, धन की कमी होती है इस दौरान. अपनी संतान के लिए एकल-दंपत्ति के पास बिलकुल समय नहीं होता है. वह या तो नौकर के सहारे या बोर्डिंग स्कूल के सहारे, कंप्यूटर और टीवी के सहारे अपने बच्चे का पोषण करते हैं. जरा सोचिये! ऐसे पालन-पोषण से उस बच्चे की संवेदना बचेगी क्या? समस्त सुख-सुविधाएं, व्यवस्थाएं मानव-निर्माण से बढ़कर हैं क्या? हम इसकी क्या कीमत चूका रहे हैं? भारतीयता से दूर क्यों भाग रहे हैं हम? इस दीपावली को इस यक्ष प्रश्न पर विचार करना सामयिक होगा. और इस दीपावली को आप इस बात की कोशिश भी करें की यह त्यौहार आपके अपने परिवार के अधिकांश सदस्यों के बीच मनाया जाय. तभी हम भी अपनी महान लोक-संस्कृति को अगली पीढ़ी को सौंप पाएंगे, अन्यथा .... !

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

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गुजरात : विकास एवं संस्कृति का संगम - Gujarat Trip

by on 09:47
पिछले दिनों गुजरात की बड़ी चर्चा सुनने को मिली. यूं तो स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी, सरदार पटेल के गृह-राज्य गुजरात की चर्चा बहुत पहले से संपन्न राज्य के रूप में होती रही है, लेकिन इस राज्य की मार्केटिंग जिस तरह से पिछले दशक में हुई, वह निश्चित रूप से बेमिसाल है. किसी हॉलीवुड फिल्म की तरह गुजरात का प्रचार-प्रसार किया गया. दावे किये गए कि विकास का माहौल वहां सबसे अनुकूल है, तो टूरिज्म को लेकर इस बात को साबित भी किया गया. क्या देशी, क्या विदेशी, जो भी उद्योगपति, अभिनेता या सामान्य जन वहां गया, गुजरात की तारीफ़ करने से खुद को रोक नहीं सका. कई बुद्धिजीवी इस बात से काफी खिन्न दिखते हैं कि गुजरात की सम्पन्नता का श्रेय कोई एक बात भला कैसे ले सकता है. इन बुद्धिजीवियों की यह खिन्नता कुछ हद तक यथार्थ भी हो सकती है, लेकिन इस बात से भला कौन इंकार कर सकता है कि विकास की रफ़्तार एक बार तो शायद गति पकड़ भी ले, लेकिन उस गति को लगातार १२ सालों से ज्यादा कायम रखना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. यदि ऐसा नहीं होता तो, कुछ समय तक देश में सबसे आगे रहने वाला शहर कोलकाता, इतनी बुरी तरह बर्बाद और बदहाल नहीं होता. अभी भी विकसित राज्यों में गिना जाने वाला पंजाब, बिजली और कानून व्यवस्था की बुरी हालत से नहीं जूझ रहा होता. इसके विपरीत मात्र १० साल पहले जंगलराज की खातिर बदनाम रहा बिहार, इन दस सालों में सकारात्मक माहौल तैयार करने में असफल रहता. कुछ हद तक ही सही, लेकिन सुशासन बाबू कहे जाने वाले समाजवादी ने बदलाव तो किया ही है. इसी पैमाने पर हम गुजरात के शेर कहे जाने वाले राष्ट्रवादी नेता को भी श्रेय दे ही सकते हैं.

गुजरात की जब हम बात करते हैं तो २४ घंटे निर्बाध बिजली, अच्छी सड़कें, अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था, लालफीताशाही पर लगाम, एक हद तक ही सही, लेकिन है. व्यापार के लिए आकर्षित करने वाली मार्केटिंग, घुमक्क्डों के लिए साबरमती एवं अन्य तीर्थस्थानों का विकास, साफ़ सुथरी परिवहन व्यवस्था इस राज्य को देश के अन्य राज्यों से कई फर्लांग आगे खड़ा करती है. लेकिन इन सब व्यवस्थाओं के अतिरिक्त भी गुजरात का सकारात्मक चेहरा मुझे अपनी यात्रा के दौरान दिखा, जो कि उसके मानव-संशाधन के बारे में है, और यह उसकी सम्पन्नता का सर्वाधिक विशेष कारण भी है. लेकिन, इसकी चर्चा करने से पहले जरा एक नजर आप उत्तर प्रदेश, बिहार और दुसरे पिछड़े राज्यों पर डालें. बदहाल लोग, दूसरी जगह पलायन करते लोग, एक-दुसरे की टांग खींचते लोग, मेहनत की बजाय गप्पबाजी को अपना पेशा बना चुके लोग और ऐसी ही अन्य समस्याओं से दो-चार होते हुए अपराधी बनते लोग. इन बीमार राज्यों में रह रहे व्यक्तियों के पास खाली समय भरपूर है, लेकिन उसका प्रयोग यह लोग चुनावी राजनीति की चर्चा में नष्ट कर देते हैं. ये सभी समस्याएं और समाज को टुकड़ों के रूप में बाँट चुकी जातिवादी राजनीति ने इन बीमार प्रदेशों को आईसीयू में पहुंचा दिया है. और सिर्फ राजनीति ही क्यों, परिवार नामक संस्था तो कुढ़न, जलन और आपसी लड़ाई का अखाड़ा बन चुकी है, तो सामाजिक संस्थाएं, मंदिर इत्यादि बुराइयों का दूसरा अड्डा बन चुके हैं. वहां, न तो संस्कार मिलता है बच्चों को, न बड़ों को शांति मिलती है. हाँ! लूटमार, नशा, निम्न-स्तरीय राजनीति जरूर देखने को मिल जाती है. अब आप प्रश्न करेंगे कि क्या यह सभी समस्याएं गुजरात में नहीं हैं, तो मैं एक शब्द में कहूँगा, "नहीं". एक बार ऊपर के पैरा को आप फिर पढ़ें और फिर प्रश्न करें कि गुजरात इतना संपन्न क्यों हैं, तो आपको यही जवाब मिलेगा कि वहां के लोग सुबह उठने के बाद अपने पशुओं का दूध निकालने में लग जाते हैं, फिर पी.जे.कूरियन द्वारा स्थापित अमूल डेयरी के लिए पूरी वैज्ञानिक विधि से दूध इकठ्ठा करने में लग जाते हैं. यहाँ, यह बताना आवश्यक है कि सहकारिता के सिद्धांत से यह पूरी व्यवस्था गांव से शुरू होकर आगे तक जाती है. जिस गाँव पोगलू में मैं गया था, वहां सुबह बच्चे घरों में पढ़ रहे थे. औरतें काम में लगी थीं, दर्जी गाँव में ही कपड़ा सिल रहा था. दिन में हम एक नर्सिंग स्कूल के कार्यक्रम में गए, तो देखा बच्चे बेहद अनुशासित होकर बात सुन रहे थे, कह रहे थे. सच कहूँ, तो मुझे कोई निठल्ला दिखा नहीं. शाम होते ही, उस छोटे से गाँव के मंदिर में आरती शुरू हो गयी, और कई सारे बच्चे उसमें बिना किसी भेदभाव के इकठ्ठे हो गए. मंदिर के प्रांगण में गाँव के लोग, आते रहे और कुछ समय पुजारी जी के साथ बिता कर, कुछ चर्चा कर के जाते भी रहे. कहने का मतलब यह कि हर एक वहां एक दुसरे के समय के साथ खुद के समय की क़द्र करने के प्रति सचेत नजर आ रहा था.

जीवन के जो चार पुरुषार्थ बताये गए हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, उसमें से पहले तीन को पूरा करते देखा मैंने गुजरात के लोगों को. उत्तर प्रदेश एवं बिहार के बॉर्डर, बलिया में पैदा हुआ लड़का और दिल्ली में कई सालों से रहने के कारण, यह मेरे लिए निश्चित रूप से आश्चर्य का विषय था. लेकिन प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता भला कब होती है. कुछ बातें, खटकने वाली भी थीं, मसलन ५ दिनों में इस राज्य में हिंदी की उपेक्षा देखने के बाद मेरे मन में टीस उठ रही थी. साइन-बोर्ड, बातचीत, लेखन की भाषा पूरी तरह से गुजराती और कुछ अंग्रेजी थी. ऐसा प्रतीत होता है कि वहां योजनाबद्ध तरीके से हिंदी के ऊपर प्रहार किया गया हो. वहां के राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों से बातचीत करने पर यह स्पष्ट था कि पिछले दस सालों के दौरान वहां का नेतृत्व इसके लिए जिम्मेवार रहा है. इसी सन्दर्भ में यह कहना उचित होगा कि भारत के प्रधानमंत्री अभी अमेरिका की यात्रा (सितम्बर २०१४) पर हैं, और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना भाषण हिंदी में ही दिया है. इस भाषण में कई गलतियां भी मीडिया ने पकड़ी हैं. हिंदी के प्रति अचेत लोगों को इस वाकये से सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि विश्व-पटल पर भारत की पहचान हिंदी ही है. इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी कम नजर आयी, विशेषकर लड़कियों में. औसत से भी कम वजन वाली लडकियां आप को वहां हर जगह दिख जाएंगी. हालाँकि 'मद्यपान' सरकारी रूप से वहां प्रतिबंधित है, लेकिन इस पेय की कालाबाजारी वहां जोरों से है, बिना किसी ख़ास रोक-टोक के, सिर्फ सरकार को टैक्स नहीं मिलता.

सांस्कृतिक पर्व 'गरबा' की चर्चा किये बिना गुजरात की चर्चा पूरी नहीं होती है. लेकिन दुःख की बात यह है कि गरबा के वर्तमान स्वरुप से वहां के स्थानीय प्रबुद्ध जन नाखुश दिखे. हों भी क्यों नहीं, आखिर संस्कृति में अपसंस्कृति घुल जाने से किसे पीड़ा नहीं होगी. यह 'अपसंस्कृति' का जहर सिर्फ गुजराती 'गरबा' में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में घर कर गया है. हाँ! अंतर इतना जरूर है कि गुजरात के प्रबुद्ध इस बात पर चिंतित हैं, तो उत्तर प्रदेश के समाजवादी इस 'अपसंस्कृति' को बच्चों की भूल बता देते हैं. अंतर यह भी है कि गांधी के इस राज्य में कानून व्यवस्था बिगड़ने पर कार्रवाई होती है, तो दुसरे हिंदी भाषी राज्यों के नेता और संस्थाएं बेतुके बयान देकर पल्ला झाड़ लेती हैं. पिछले ही दिनों केरल के राज्यपाल से हटने वाली, दिल्ली की एक पूर्व मुख्यमंत्री ने कानून व्यवस्था के बारे में कहा था कि यह बाहर के लोगों के आने से बिगड़ जाती है. यहाँ यह बताना लाजमी रहेगा कि गुजरात में भी पूरे देश से लोग जाकर रोजी कमा रहे हैं. अतः बहानेबाजी से दूर हटकर राजनीतिज्ञों को, सामाजिक संस्थाओं को, धार्मिक संस्थाओं को एवं व्यक्तियों को पूरे देश के सन्दर्भ में गुजरात से सीख लेनी होगी, क्योंकि यह शायद भारतीय के सबसे नजदीक है, और हमारी ही संस्कृति है, जिसे अन्य राज्य पीछे छोड़ चुके हैं. समय मिलने पर आप भी जरूर जाइये गुजरात में, लेकिन सिर्फ शहर और दो चार पार्क घूमकर चले मत आइयेगा, बल्कि कुछेक दिन गुजराती गाँवों में जरूर गुजरिएगा, लोगों की कार्यप्रणाली को सीखिएगा, डेयरी उद्योग को देखिएगा. और तब आप दूसरों को भी कह सकेंगे कि 'कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में'!
मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

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