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Thursday, 28 May 2015

आरक्षण का दावानल

by on 07:10

आरक्षण शब्द के ऊपर हमारे देश में इतना कहा सुना जा चुका है कि अब कुछ शेष नहीं है. 21वीं सदी में यह बात बेहद आश्चर्यजनक लगती है कि आरक्षण के लिए कुछ लोगों द्वारा रेल की पटरियां तक उखाड़ दी जा रही हैं. एक तरफ हमारे प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और दुसरे ऐसे ही नारे अपने सूटकेस में रखकर पूरे विश्व का भ्रमण कर रहे हैं और दूसरी ओर राजनीतिक शह पर बेतरतीब हो हल्ला मचाया जा रहा है. इस हंगामे से हो रहे नुकसान का आंकलन करने बैठा जाय तो सर दुखने लगता है. मौजूदा गुर्जर आंदोलन के कारण रेलवे को करीब 100 करोड़ रूपये का नुकसान झेलना पड़ा है. आंदोलन के चलते अभी तक कोटा-मथुरा मार्ग पर 326 मेल एवं एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करने या मार्ग परिवर्तित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इसके अतिरिक्त 21 मई से आईआरसीटीसी पर करीब 1.9 लाख टिकट रद्द किये गये हैं. इस रुट पर जाने वाले ग्राहकों को भारी परेशानियां उठानी पड़ रही हैं. कोटा.मथुरा मार्ग पर दक्षिण एवं उत्तर तथा उत्तर एवं पश्चिम के बीच प्रमुख रेल यातायात चलता है तथा आंदोलन के कारण यह मार्ग बाधित हो गया है. अब समझ यह नहीं आ रहा है कि कानून व्यवस्था का मजाक उड़ाने की अनुमति भला क्यों और कैसे दी जा रही है. इस पूरी कड़ी में हाई कोर्ट के सख्त संज्ञान के बाद भी आंदोलकारी आरक्षण के लिए किसकी शह पर डंटे हुए हैं, यह शोध का विषय हो सकता है. हालाँकि तमाम सियासी उठापटक और रेल से सड़क तक प्रदर्शन के बीच गुर्जर आंदोलन मामले में नया मोड़ आने की सम्भावना बढ़ी है. एक अपुष्ट खबर के अनुसार राजस्थान सरकार आख‍िरकार गुर्जरों को सरकारी नौकरी में पांच फीसदी आरक्षण को लेकर राजी हो गई है और वसुंधरा सरकार ने इसके लिए विधेयक लाने की बात कही है. पर प्रश्न और उसका हल यहीं तक हो तो बात समाप्त की जा सकती है, लेकिन आरक्षण से सम्बंधित छोटी सी भी सकारात्मक या नकारात्मक बात निकलती है तो दूर तलक जाती है. जाट आरक्षण, मुस्लिम आरक्षण और ऐसे ही अंतहीन यात्रा का साक्षी बनता रहा है यह शब्द. अर्थ तो खैर, आज तक समझ ही नहीं आया है इसका, क्योंकि संविधान बनाते समय इसका प्रावधान मात्र कुछ वर्षों के लिए दबे-कुचलों के लिए किया गया था, लेकिन कौन नहीं जानता है कि 'क्रीमी-लेयर' शब्द इसके साथ मजबूती से चिपक गया है और आरक्षण का 90 फीसदी से ज्यादा लाभ अयोग्य व्यक्ति ही ले रहे हैं. असली गरीब और इस आरक्षण का हकदार आज भी ठोकरें खाने को मजबूर है. कई जाने माने विद्वान और स्वतंत्र एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में आर्थिक आधार पर आरक्षण करने की वकालत की है, जबकि जातिगत आधार पर इसे ख़त्म करने की सिफारिशें भी हुई है, लेकिन इस दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ा जा सका है. सच बात तो यह है कि जब तक आरक्षण ख़त्म करने की पहल नहीं की जाएगी, तब तक गुर्जरों के इस आंदोलन की तरह विभिन्न समुदाय अपने स्वार्थ के लिए सरकारों पर दबाव बनाते रहेंगे. लेकिन, संविधान में आरक्षण समाप्त करने की बात भला कौन सुने, कई सरकारें इस बात पर आमादा हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50 फीसदी की सीमा को भी पार कर लिया जाए. राजनैतिक स्वार्थ से घिरी आरक्षण की काली दुनिया, देश की प्रतिभाओं का कब तक सत्यानाश करती रहेगी, यह अपने आप में यक्ष प्रश्न है. इस प्रश्न के उत्तर ढूंढने की ओर भला किसका ध्यान है कि गरीब और गरीब क्यों हो रहे हैं, जबकि अमीर और अमीर होते जा रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि सार्वजनिक संसाधनों पर अयोग्य और अनैतिक व्यक्तियों का कब्ज़ा होता जा रहा है. बेहतर यह होगा कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन करे, जो जातिगत आरक्षण ख़त्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की दिशा में नए सिरे से रिपोर्ट पेश करे. इस रिपोर्ट को लागू करने की अवधि 10 साल, 20 साल तक हो सकती है, लेकिन उसके बाद हमारी आने वाली पीढ़ियां कम से कम आरक्षण की इस काली आग से तो छुटकारा पा सकेंगी, अन्यथा.... धुंआ उठता रहेगा, इस काली आग का धुंआ, आरक्षण के अंतहीन दावानल का धुंआ !!

Friday, 27 February 2015

थैंक्यू से क्या होगा... ? Thank you se kya hoga, Hindi Short Story by Mithilesh

by on 00:46

थोड़ा तेज भगाओ भाई इस रेगिस्तान के जहाज को, सचिन ऊंट वाले से बोला!

premchand-ki-lokpriya-kahaniyanजैसलमेर के रेगिस्तान में ऊंट पर मैं अपने दोस्त सचिन के साथ बैठा हुआ था. उस रेगिस्तान में दूर-दूर तक पेड़ पौधों का नामोनिशान तक नहीं दिख रहा था सिवाय कुछ कंटीली झाड़ियों के. और साथ में रेत पर ढ़ेर सारी बियर की बोतलें भी बिखरी हुई थीं. इसके अतिरिक्त देश विदेश के तमाम सैलानी ऊंट की सवारी करते हुए जरूर दिख रहे थे. बातचीत के क्रम में पता चला कि वहां के लोगों की आजीविका का साधन टूरिज्म ही है. बियर! बियर! बियर! ठंडी बियर! एक 14 -15 साल का लड़का कंधे पर झोला लटकाए ऊंट के पीछे दौड़ने लगा. सचिन ने उसे छेड़ने के लिए पूछ लिया- कितने की दे रहा है? किंगफिशर की केन 150 की, टर्बो की 200 की! इतनी महँगी! दिल्ली में तो इसकी कीमत बहुत कम है. साहब! दूर से लाना पड़ता है और यह हमें 140 की पड़ती है, बस 10 रूपये लगाया है अपन ने! ऊंट के पीछे भागते हुए उसने बोला. नहीं चाहिए भाई. ले लो न साहब! अच्छा 140 में ही ले लो, उसने मोलभाव किया. नहीं चाहिए यार, थैंक यूं! सचिन ने जरा कठोरता से कहा... थैंक्यू से क्या होगा... ? वह बुदबुदाते हुए निराश हो गया, साथ में उसकी चाल भी धीमी हो गयी. वह पीछे छूट गया, और मेरे कानों में यूपी के गुटखा बेचने वाले छोटे बच्चों से लेकर, दिल्ली के फूटपाथ पर सोने वाले बच्चों तक के स्वर गूंजने लगे. थैंक्यू से क्या होगा... ?

-मिथिलेश 'अनभिज्ञ'

Thank you se kya hoga, Hindi Short Story by Mithilesh
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Wednesday, 14 January 2015

घास की रोटी - Ghas ki Roti, Short Story by Mithilesh 'Anbhigya'!

by on 15:55

राजस्थान के एक विद्यालय में कार्यक्रम चल रहा था. कवि, नेता, वक्ता अपनी प्रस्तुति देकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर रहे थे. वाह-वाह, तालियों से प्रस्तोताओं का उत्साह आसमान छू रहा था. स्टेज पर मंत्री, नामी लेखक, विद्वानों के साथ हमारे इतिहास पुरुष महाराणा प्रताप के वंशज 'हुकुम' का विराजमान होना कार्यक्रम को अलग ही गरिमा प्रदान कर रहा था. मैं श्रोताओं की अगली पंक्ति में बैठा 'हुकुम' के तेज को निहार रहा था और इतिहास की हल्दीघाटी और चेतक की टापों से भारत के वीरों को याद करते हुए गौरवान्वित हुए जा रहा था. कार्यक्रम की फोटो लेने के लिए अपने महंगे स्मार्टफोन लेकर दर्शक एक दुसरे से होड़ कर रहे थे. यूं भी कार्यक्रमों में अपने कैमरे से फोटो लेकर फेसबुक पर डालने का मजा आधुनिक पीढ़ी बखूबी समझती है. अपने देश के प्रधानमंत्री भी तो 'सेल्फ़ी' के दीवाने हैं. मेरे बगल में एक हृष्ट-पुष्ट अधेड़ विराजमान थे. मोटी और तनी हुई मूंछों के साथ, एक 6-7 साल का लड़का और उससे थोड़ी बड़ी लड़की उनके साथ थे. लडकियां वैसे भी धीर-गंभीर होती हैं, लेकिन लड़का बार-बार मचल रहा था और वह महाशय उसे इशारों से चुप कर बैठने को कह रहे थे. लड़का शायद अपने पापा का फोन मांग रहा था, फोटो खींचने के लिए.
मुझसे रहा न गया और मैंने उस लड़के की वकालत कर ही दी.
बिचारे हिचक रहे थे, लेकिन बच्चे के चेहरे की ओर देखकर उन्होंने अपना फोन निकाला. वह नोकिया का कोई पुराना मॉडल था, ब्लैक एंड वाइट मॉडल. बच्चा उसे देखकर खुश हो गया और फोटो खींचने का अभिनय करने लगा, क्योंकि कैमरा तो उसमें था नहीं. लड़की झेंप रही थी और चोर नजरों से मेरे हाथ में दबे लम्बी स्क्रीन के फोन को देख रही थी.
आप एक-दो फोटो निकाल दोगी, मैंने उससे कहा!
पहले उसने अपने पिता की तरफ देखा, फिर मजबूती से कहा, अंकल! मुझे नहीं आता... !
मंच पर मंचीय कवि महाराणा प्रताप के स्वाभिमान और मुसीबत में उनके परिवार द्वारा घास की रोटी खाने पर वीर-रस की कविता का पाठ कर रहे थे. मैंने चुपचाप अपना स्मार्टफोन जेब में रकह और सभागार से बाहर निकल आया. कवियों की आवाज के साथ, रात गहराती जा रही थी, सर्द, राजपुताना रात!


- मिथिलेश 'अनभिज्ञ'

Ghas ki Roti, Short Story by Mithilesh 'Anbhigya', in Hindi, based on Rajasthan Rajputana, Self esteem.

Books on 'Maharana Pratap' ...


Maharana-Pratap-on-Chetak-short-story-about-rajasthan-in-modern-era-by-mithilesh-anbhigya

 

Sunday, 16 November 2014

... नाम जिसका है 'जटायु' - Poem on Jatayu by Mithilesh

by on 01:14
बूढा, निःशब्द घायल,Jatayu-Maharana-Shivdan-Singh
कुछ कर न पाने की बेबशी में आहत सा
पर कट गए, वह गिर गया
उस घाव पर गाढ़ा रुधिर जम गया

क्षत-विक्षत हो गए अंग
पड़ गए शिथिल प्रत्यंग
घुटने झुके, कंधे झुके
पर गर्व से सीना औ माथा तन गया

दुर्नीति से वह ना डरा
सामर्थ्य संग वह भिड़ गया
नारी की रक्षा करने को
वह प्राण अपने तज गया

वह कर्मयोगी, नीति ज्ञानी
धर्म-रक्षक, स्वाभिमानी
बन शूर हो गया युग-युगों तक दीर्घायु
मन में बसाओ, नाम जिसका है 'जटायु'

(महाराणा प्रताप के वंशज, वर्तमान महाराणा शिवदान सिंह जी को समर्पित)
Poem on Jatayu by Mithilesh in Hindi.

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

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