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Friday, 27 February 2015

नौकर या उद्यमी : एक विश्लेषण - Job or Business, in context of India, article in Hindi

by on 04:38

dhandha-bookआर्थिक मुद्दे सदा से मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं, किन्तु आज के समय में लोग 'अर्थ' की प्रधानता को सर्वव्यापी व सभी समस्याओं के एकमात्र समाधान के रूप में भी देखते हैं. इस हवा में दूसरी बहुत महत्वपूर्ण चीजें भी गौण हो चुकी हैं, मसलन सम्बन्ध, चरित्र, सहयोग, शिक्षा, उद्यम इत्यादि. भारतवर्ष के वर्तमान प्रधानमंत्री भी तमाम जतन कर रहे हैं कि देश के किसान, नौजवान सशक्त हों, उनको रोजगार मिले. भूमि अधिग्रहण, जीएसटी जैसे तमाम बिल को तर्क-कुतर्क देकर संसद में पास कराये जाने की जरूरत बताई जा रही है. खैर, राजनीति एक अलग विषय है, और अर्थनीति अलग. भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि अर्थनीति पर आप ध्यान देंगे तो समझ जायेंगे कि यहाँ 'उद्यम' के अवसर पैदा करने की बजाय 'नौकरी' शब्द पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है. 'नौकरी' शब्द मूलतः 'नौकर', 'सर्वेंट', चाकर, सेवक, दास इत्यादि से ही बना है, जिसे हर हाल में 'मालिक' के अनुसार ही चलना होता है, ठीक किसी सामंतवादी या जमींदारी प्रथा की तरह (आधुनिकता के लिहाज से इसका प्रारूप जरूर बदला है, पर मूल भाव 'मानसिक गुलामी' का भाव वही है). हम सबको पता है कि यह शब्द 'नौकरी' कितना कचोट भरा होता है, और इसीलिए आज का शिक्षित युवक उद्यम करने की सोच रखता है, शुरू भी करता है, किन्तु तमाम अन्य समस्याओं के अलावा शुरुआत में 'मानव संशाधन' की कमी, उनकी वफादारी और संघर्ष के दौर में उनमें समर्पण का अभाव मुख्य समस्या के रूप में सामने आता है. जी हाँ! आप कोई भी रोजगार शुरू करते हैं तो उसमें पूँजी की सर्वाधिक खपत 'मानव संशाधन' पर ही खर्च होती है, उसके बावजूद भी अधिकांश उद्यमी शुरुआत में ही दम तोड़ देते हैं और फिर नौकरी की तरफ मुड़ जाते हैं. आखिर इसका कारण क्या है? इस बात को समझने के लिए मैंने कई पारम्परिक व्यापारियों (बनियों), पंजाबी परिवारों, जैन बंधुओं, मारवाड़ियों, बड़े और सफल किसान परिवारों का अध्ययन करने की कोशिश की तो निम्न बातें सामने आयीं-

  • इन सभी सफल उद्योगपतियों के अधिकांश परिवार 'संयुक्त' हैं. ध्यान रहे, इस एक शब्द 'संयुक्त' परिवार से मानव संशाधन की शुरूआती सभी समस्याओं में अधिकांश स्थाई रूप से हल हो जाती हैं, मसलन उनकी वफादारी, सहयोग, समर्पण और उद्योग शुरू होने के समय कम से कम जरूरतें इत्यादि.

  • इन सभी परिवारों के बच्चों को लगभग शुरू से ही उद्योग के प्रति प्रोत्साहित किया जाता है और वयस्क होते-होते उसकी मानसिकता स्वतः ही एक उद्यमी की हो जाती है और साथ में उसको व्यवसाय का व्यवहारिक ज्ञान भी प्राप्त हो जाता है. (ध्यान रहे, यह भी संयुक्त परिवार के होने से ही संभव हो पाता है, जब वह बच्चा अपने परिवार में चाचा, ताऊ, भाई इत्यादि को रोजगार करते देखता है और उसके विभिन्न पहलुओं पर घर में चर्चा होते सुनता है.)

  • More-books-click-hereइन परिवारों के युवा बच्चे जब रोजगार करते हैं, तो उनकी गलतियां आप ही न्यून हो जाती हैं, क्योंकि परिवार एक होने से बड़े-बुजुर्ग बारीक नजर रखते हैं. (यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि उन बुजुर्गों का हस्तक्षेप कम से कम होता है और सहयोग ज्यादा).

  • व्यवसाय सेट हो जाने के बाद यदि दो भाइयों में किसी विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इसका निपटारा बड़ी सरलता से घर के बुजुर्ग कर पाते हैं क्योंकि उनके दिमाग में यह विचार बहुत पहले से आया होता है और साथ में वह इसके समाधान पर भी लम्बे समय तक विचार कर पाते हैं.

  • इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि संयुक्त परिवार के बैकग्राउंड से होने के कारण सफल या औसत सफल व्यक्ति भी अनयंत्रित नहीं होता है, बल्कि एकल परिवार के किसी व्यक्ति की तुलना में वह एक हद तक समाज के दबाव को स्वीकार भी करता है और इस दबाव में वह जनविरोधी फैसले लेने से पहले हज़ार बार सोचता है.

  • इन संयुक्त परिवारों में एक बेहद मजबूत 'सहकारी व्यवस्था' का दर्शन भी होता है, मसलन ऋण लेना-देना, किसी संकट के समय तत्काल एक हो जाना इत्यादि. यह निश्चित रूप से परिवारों की साख के कारण हो पाता है और कोई सरकार मदद करे, न करे, उसका निचले लेवल पर कुछ ख़ास असर नहीं पड़ता है.

मेरा निष्कर्ष यही निकला कि आधुनिक युग में उद्यम के लिए 'संयुक्त परिवार' सबसे उत्तम प्लेटफॉर्म है, यदि सच में उसके सदस्य 'नौकरी' जैसे शब्द के 'कचोट' से सफलतापूर्वक बचना चाहते हैं और यदि साथ में कोई व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, सफलता की सर्वाधिक गारंटी के साथ. आप सब का क्या कहना है, इस विषय पर? साथ ही सरकार की इस नीति पर भी अपनी राय रखिये कि वह 'नौकरों' की संख्या बढ़ाना चाहती है कि 'उद्यमियों' की. - मिथिलेश कुमार सिंह Job or Business, in context of India, article in Hindi by Mithilesh.

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Friday, 13 February 2015

परिवार एवं धन का सामंजस्य - Family and Fund Priority

by on 00:33
परिवार से सम्बंधित मूल्यों पर विचार करें तो 'अर्थ' की बड़ी विचित्र स्थिति सामने आती है. निश्चित है कि यदि तीन-चार भाई हैं तो उसमें से कोई ज्यादा धन कमायेगा, कोई कम. अब यहाँ समीकरण बिगड़ने शुरू हो जाते हैं. जो ज्यादा धन कमाता है, वह परिवार से कटना शुरू हो जाता है. भाई तो भाई, कई बार वह लड़का अपने माँ-बाप के प्रति बेहद छोटी जिम्मेवारियां पूरी करने से बचने लगता है. ध्यान रहे कि यह वह लड़का होता है, जो अपने परिवार में सबसे ज्यादा धन कमाता है, और जैसे-जैसे धन बढ़ता जाता है, परिवार से वह उतनी ही तेजी से कटने भी लगता है. शादी के बाद वह अपना व्यक्तिगत स्टैण्डर्ड बढ़ाने की झूठी और भागमभाग वाली कोशिश करता है, और परिवार कहीं दूर छूट जाता है.... ... .. .
या तो ऐसे ही उसका जीवन यूँही कट जाता है या फिर अचानक उसको अहसास होता है कि अपने लिए, अपने बच्चों के लिए एक सोशल सर्कल भी होना जरूरी है, और वह अपना कमाया हुआ धन उन अनजान दोस्तों के साथ पार्टियों इत्यादि में खर्च करता है, जिनकी कुछ विशेष जिम्मेवारी हो नहीं सकती और न ही उसके बच्चों को इससे कुछ संस्कार मिल सकता है. वह अपना पैसा वाटर-पार्क, मूवी, देशी-विदेशी टूर जैसी जगहों पर बेतहाशा खर्च करता है, करता रहता है. और उसे आखिर में अहसास होता है कि इन सबके बावजूद वह अकेला है, उसकी पत्नी डिप्रेस्ड है, उसके बच्चे नालायक निकल गए हैं और उसके हाथ में अंततः शून्य है, क्योंकि संस्कार और अनुशासन तो 'संयुक्त परिवार' में ही विकसित हो सकता है.
फिर कई लोग अपने परिवार और अपने उन भाइयों की तरफ लौटने की सोचते भी हैं, जिन्हें वह अपना पैसा बचाने के लिए छोड़ आये थे, पर समय उनके हाथ से निकल चूका होता है. ...
--
जरा सोचिये, यदि 'अर्थ' की इस दूषित प्रवृत्ति को कथित 'योग्य और काबिल लोग' संतुलित करें, और अपने विकास के साथ अपने संयुक्त परिवार के लिए यथासंभव सिंचन का भाव जीवित रखें, तब शायद हमारे भीतर, हमारी पत्नी के भीतर और हमारे आने वाले बच्चों के संस्कारों पर कितना बड़ा प्रभाव पड़ेगा! परिवार में संबंधों को सींचने के लिए हमारा पैसा जरूर खर्च होगा, किन्तु क्या ईश्वर ने हमें इसीलिए काबिल नहीं बनाया है कि हम अपने कमजोर भाइयों, बहनों, भतीजों के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करें. आखिर, वह धन इसीलिए तो है कि हम अपने वास्तविक संबंधों को जिम्मेवारी से विकसित करें, क्योंकि परिवार के विकास में ही हमारा विकास भी है. अन्यथा हम तमाम सम्पदा के बावजूद अंततः 'भिखारी' ही साबित होते हैं.
जरूर विचार कीजिये !

-मिथिलेश कुमार सिंह

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Family and Fund Priority
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Saturday, 24 January 2015

परिवार - विखंडन में बुजुर्गों का कितना हिस्सा? - Role of Elders in Family Split, Joint Family Information.

by on 02:25
एक महानुभाव ने 'संयुक्त परिवार' में युवाओं की भूमिका पर तमाम प्रश्न चिन्ह दागते हुए कहा कि संयुक्त- संयुक्त कहने से ही संयुक्त परिवार नहीं चलता, उसके लिए परिवार को जोड़ने वाला गोंद बनना पड़ता है. धैर्य रखना पड़ता है, त्याग करना पड़ता है, बुजुर्गों की इज्जत करनी चाहिए इत्यादि- इत्यादि और आजकल के युवाओं में यह गुण है नहीं. एक हद तक उनकी बात ठीक भी लगी पर मैंने हिम्मत करके उनसे पूछ ही लिया कि-
हे मान्यवर! मैं अन्य युवाओं की तरह युवा ही हूँ, 30 वर्ष उम्र नहीं हुई है अभी. मेरे पास न तो अनुभवयुक्त ज्ञान है, न राजनीति की समझ, न त्याग का धैर्य है और न ही सत्ता, संपत्ति पर अधिकार. कहने के मतलब है, घर में मेरी कुछ ख़ास चल नहीं सकती. लेकिन, आप वरिष्ठों के पास इनमें से समस्त विद्याएं, अधिकार हैं. भारतीय व्यवस्था में युवाओं की आस्था भी आप पर है ही. फिर क्या कारण है कि यह व्यवस्था टूटती जा रही है और हज़ारों- हज़ार समस्याओं को जन्म दे रही है. स्वनामधन्य अधिकारीगण गण आप हैं, और दोषी युवा कैसे हैं विखंडन के लिए?

  • क्या इसका कारण सत्ता के प्रति 'आडवाणी-रुपी' लालसा नहीं है? जो 85 साल के हो जाने के बावजूद सत्ता से मोह का विखंडन नहीं कर पाती है. और परिणामस्वरूप नया नेतृत्व विकसित ही नहीं हो पाता?

  • क्या इसका कारण पुरानी पीढ़ी का धृतराष्ट्र रुपी मोह नहीं है, जो किसी मुर्ख को सत्ता का ख्वाब दिखाकर, योग्यता का दमन करता है? आज भी क्या यह सच नहीं है कि पुरानी पीढ़ी अपने ही दो पुत्रों के बीच में इस हद तक हस्तक्षेप करती है कि वह दूर भागने लगते हैं? आखिर हिन्दू-दर्शन में एक ख़ास उम्र के बाद 'सन्यास-आश्रम' का क्या यह अर्थ नहीं है कि पुरानी पीढ़ी सत्ता से दूरी बना लें और नयी पीढ़ी को उसकी योग्यतानुसार विकसित होने दें, और अपने अनुभव का बिना लिप्त हुए उनको सलाह दें ?

  • क्या इसका कारण यह नहीं है कि पुरानी पीढ़ी के वरिष्ठ बच्चे होने के नाते उनकी बातों को सुनना ही नहीं चाहते, बल्कि खुद को भगवान मानकर उनको इंसान की बजाय एक सेवक ही समझने की भूल करते हैं, जो वगैर किन्तु-परन्तु के आपकी गलत बातों को भी स्वीकार कर ले?


यहीं प्रश्न मेरा खुद जैसे युवाओं से भी है कि हम युवा अपने बच्चों के लिए किस प्रकार से आदर्श माँ - बाप बन सकते हैं? क्या संयुक्त परिवार विखंडन में बुजुर्गों का भी बड़ा रोल है? क्योंकि वह बदलते समय को स्वीकार करने को जरा भी तैयार नहीं हैं? और क्या हम भी ऐसे ही बुजुर्ग बनने वाले हैं? अपनी राय दें मित्रों!

-मिथिलेश कुमार सिंह

Role of Elders in Family Split, Joint Family Information in Hindi, written by Mithilesh.

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Wednesday, 7 January 2015

संयुक्त परिवार - United Family Concepts and Discussion

by on 10:46

भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में समस्त समस्याओं का सामने आना 'संयुक्त परिवार' नामक संस्था का असफल होना प्रतीत होता है... और समस्याओं का समाधान भी निश्चित रूप से इसकी सफलता ही है.
(...शेष आगे!)


United-Joint-Family-Discussion-Platform

 

 

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United Family Concepts and Discussion in Hindi, initiated by Mithilesh.

Monday, 3 November 2014

दादी तुम रहती क्यों दूर ... Bal Kavita by Mithilesh

by on 05:32

दादी - दादी मुझे पढ़ाओ,
ढेरों फिर तुम बात बताओ
खेलो दिन और रात मेरे संग
करूँगा तुमको जी भर के तंग


 

मम्मी सुबह जगाती है,
फिर मुझको नहलाती है,
रोता हूँ मैं जी भर लेकिन
दया उसे नहीं आती है.


 

Buy-Related-Subject-Book-beछोटा हूँ मैं घर में सबसे
बड़ी बड़ी किताबें हैं
करना चाहूँ बात मैं सबसे
ढेरों पास में बातें हैं


 

मम्मी, काकी करतीं काम,
खाना वही बनाती हैं
कंप्यूटर पर करतीं खिट-पिट
टीवी दिखा, सुलाती हैं


 

काका, पापा के आने पर
पास में उनके जाता हूँ
कहते हैं वह थके बहुत हैं
मन मसोस रह जाता हूँ


 

दादी तुम रहती क्यों दूर
समझ नहीं यह पाता हूँ
गर्मी की छुट्टी में ही क्यों
गाँव तुम्हारे आता हूँ.


 

वहां थे आयुष और अनुकल्प
दिल्ली में नहीं कोई विकल्प
साथ रहो या साथ ले चलो
दादी मानो यह संकल्प.


 

शुभकामनाओं सहित,
-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली. (Bal Kavita by Mithilesh)

[caption id="attachment_228" align="alignnone" width="960"]Aaryansh-Dadi-Grand-Mother-Smt.-Meera-Devi आर्यांश अपनी दादी के साथ (Aaryansh with His Grandmother Smt. Meera Devi)[/caption]

Friday, 12 September 2014

Sanyukt Parivar par charcha in Hindi

by on 08:39
Sanyukt Parivar par charcha in Hindi

 


जिस तरह पेड़ से पत्ता आज़ाद होकर कुछ देर हवा में उड़ता है, लेकिन अंततः वह निर्जीव हो जाता है, ठीक उसी प्रकार मानव अपने परिवार, या यूं कहें कि संयुक्त परिवार से अलग होकर लगभग मृत हो जाता है. ‪#‎family‬ ‪#‎UnitedFamily‬ ‪#‎CombinedFamily‬ ‪#‎human‬‪#‎culture‬





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  • Dinesh Goel किन्तु ये आजकल का चलन है, आजकल के बच्चे संयुक्त परिवारों की ज़िम्मेदारी से भागते हैं, और विकासवाद के राह पर चलते हुए सभी विदेशी कंपनियों माय ये सिखाया जाता है की तुम्हारा परिवार सिर्फ तुम्हारी बीवी और बच्चे हैं बाकी सब तुम्हारे ऊपर बोझ है या तुम्हारी तरक्की मे रुकावटें हैं, शायद इसीलिए आजकल बच्चे शादी करके माँ बाप से भी अलग हो जाते हैं और कहते हैं की अब हम बडे हो गए हैं















  • Mithilesh Kumar Singh जी, ठीक कहा आपने! लेकिन इसके जिम्मेवार क्या हम नहीं हैं. आखिर, बच्चे हमसे काट क्यों रहे हैं, इस प्रश्न पर विचार करना जरूरी है. यदि आप के पास समय हो तो इस विषय में मेरा प्रकाशित लेख अवश्य पढ़ें और अपनी बहुमूल्य राय से हमें पुनः अवगत कराएं... http://website.mithilesh2020.com/senior-citizens-india.../


















    What is the situation of Senior citizens in India is...


    WEBSITE.MITHILESH2020.COM



























  • Chander Prabha Sood परिवार एक वटवृक्ष की तरह होता है। जो शाखा अलग होगी उसकी स्थिति को सभी जानते हैं। एकल परिवार में बच्चों की सुरक्षा की समस्या अहम है। आज युवा पीढ़ी समझदार है वह परिवार की संयुक्तता को समझने लगी है। घर-परिवार में सामंजस्य बना रहे इसके लिए केवल बच्चों को या केवल बड़ों को ही नहीं बल्कि सभी का साँझा प्रयास आवश्यक है।

















  • Mithilesh Kumar Singh आपका कथन सौ फीसदी उपयुक्त है Chander Sood Ji. वस्तुतः जो हमारा सामजिक ढांचा अब तक मौजूद था, विभिन्न कारणों से वह कहीं न कहीं छिन्न भिन्न हो चूका है, जबकि नया ढांचा बनने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती है. जरूरत है समाजशास्त्रियों को इस विषय पर गंभीर चिंतन करने एवं समाज को सैद्धांतिक दिशा देने की. सिद्धांत के बाद उसके व्यवहारिक रूप पर कार्य शुरू हो सकेगा... आपके सार्थक विचार के लिए आपका बहुत आभार.















  • Manoj Kamboj संयुक्त परिवार यानी एक छत के नीचे, एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी. जहां सारे निर्णय मिल कर लिये जाते हों. परिवार का हर सदस्य एक-दूसरे के साथ तन्मयता से रहता हो! पिछले कुछ सालों में सोच के साथ-साथ लोगों के रहन-सहन व तौर-तरीके भी बदले हैं. पिछले कुछ वर्षो की बात करें, तो नौकरी के लिए युवाओं का पलायन एवं स्वतंत्रता के लिये संयुक्त परिवार तेजी से एकल परिवार में तब्दील हुए हैं। जिस पर चिंतन मनन करने की आवश्यकता हैं।














Sanyukt Parivar par charcha in Hindi

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Monday, 18 February 2013

न्याय, सभ्य समाज की पहली शर्त है ... - First Duty of Society is Justice

by on 16:09
किसी भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने और बचाए रखने के लिए न्याय सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है.  जिस भी समाज की न्याय-प्रणाली जितनी सुदृढ़ रहेगी, उस समाज की समृद्धि की उतनी अधिक संभावना रहेगी.

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थोडा विस्तृत और साधारण रूप से कहें तो – “कोई भी व्यवस्था हो, उसमे कमियाँ होती ही हैं, समस्याएं आती ही हैं, और न्याय-प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि उस समस्या का कारण क्या है और उस समस्या द्वारा हुई क्षति की क्षतिपूर्ति कैसे सुनिश्चित हो, ताकि भविष्य में भी उस तरह की समस्या उत्पन्न होने का खतरा न हो अथवा कम से कम खतरा हो.

इसके विपरीत, यदि न्याय-व्यवस्था नहीं होती है तो पूरी व्यवस्था को टूटने में क्षण भर भी नहीं लगता, बल्कि मै तो कहूँगा कि सिर्फ एक व्यवस्था नहीं टूटती है, बल्कि समाज की अन्य व्यवस्था को तोड़ने की नजीर भी बन जाती है. यह चाहे एक छोटे से परिवार की बात हो, अथवा बड़े संयुक्त परिवार की, या किसी संगठन की बात हो अथवा हम राष्ट्र की ही बात क्यों न कर लें.

तो यदि हम किसी व्यवस्था को बचाने की सोचते है, तो न्याय की एक समुचित प्रणाली हर स्तर पर विकसित करनी चाहिए, यह चाहे एक अनुभवी व्यक्ति के द्वारा हो अथवा अच्छे लोगो का एक न्यायिक समूह क्यों न हो.  कोशिश हमें यह भी करनी चाहिए कि- “न्याय को हर समय / परिस्थिति के अनुसार तौलें.” इसकी व्याख्या एक ही वस्तु के लिए भिन्न- भिन्न समय में अलग हो सकती है, अथवा एक ही अधिकार / कर्त्तव्य के लिए भिन्न- भिन्न मनुष्यों के लिए भी अलग हो सकती है.  बराबरी और न्याय में कई बार फर्क होता है, हमें प्राकृतिक न्याय पर ज्यादा भरोसा करना चाहिए जो परिस्थिति और व्यावहारिक दृष्टि से तर्कसंगत भी हो.



किसी ने सच ही कहा है- “जस्टिस इज गॉड”
First Duty of Society is Justice in Hindi.

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