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Friday, 16 January 2015

दिल्ली की भावी मुख्यमंत्री 'किरण बेदी' - Delhi's future chief minister Kiran Bedi.

by on 04:51
किरण बेदी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. वर्तमान समय में यदि युवकों/ युवतियों से उनके आदर्श व्यक्तित्वों की सूची बनाने को कहा जाय, तो उनमें से अधिकांश की सूची में किरण बेदी का नाम टॉप-१० में जरूर होगा. बचपन से उनके किये गए कार्यों, उनकी सूझबूझ, उनका साहस, दूरदर्शिता और इन सबसे बड़ा उनका जुझारूपन सक्रीय और गंभीर युवाओं के लिए प्रेरणास्पद रहा है. स्कूली बच्चों और विशेषकर एनसीसी जैसे ट्रेनिंग संस्थाओं से जुड़ें व्यक्तियों के लिए वह सर्वोच्च प्रेरणादायक रही हैं. एक आदर्श और प्रामाणिक व्यक्तिगत जीवन के साथ किरण बेदी उन नामों में हैं, जिन्होंने अपने वजूद को कायम रखते हुए, सहकर्मियों से सार्थक तालमेल करते हुए अपने प्रोफेशन में ऊंचाई को छुआ. देश भर में छपी 'जीके' (सामान्य ज्ञान) की ऐसी कोई किताब नहीं होगी, जिसमें किरण बेदी का नाम न हो. किरण बेदी के जिस काम ने उनको विश्व-स्तरीय ख्याति दिलाई, वह उनका तिहाड़ जेल में कैदियों के सुधार से जुड़ा विषय है. किरण बेदी ने तिहाड़ जेल और कैदियों की दशा में सुधार के लिए जो कदम उठाए, वह कई जेलरों के लिए आज भी मिसाल है. उन्होंने साबित किया कि अगर कैदियों से मानवीय बर्ताव करते हुए उन्हें सुधार का मौका दिया जाए, तो वे समाज के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं. उनके प्रोफेशनल करियर में ट्रैफिक को सुधारने के लिए उनकी सख्ती और व्यवहारिकता का तालमेल भी हमेशा याद किया जाता रहेगा. इसके अतिरिक्त, वह बचपन से ही उन तमाम महिलाओं के लिए एक मिशाल रही हैं, जो अपने जीवन में कुछ करना चाहती हैं. आधुनिकता से तालमेल करते हुए, पारिवारिक जीवन से सामंजस्य बिठाते हुए अपने प्रोफेशनल दायित्वों को किस प्रकार, सजगता से निभाना चाहिए, इस बात का किरण बेदी से बेहतर उदाहरण कोई और नहीं.

इस कड़ी में किरण बेदी के जीवन पर एक फीचर फिल्म 'यस मैडम सर' बन चुकी है. इसे ऑस्ट्रेलियाई फिल्म निर्माता मेगन डोनेमन ने प्रोड्यूस किया है. इस फिल्म को दुनिया के कई फिल्म महोत्सवों में दिखाया गया है. पुरस्कारों की बात की जाय तो किरण बेदी को शौर्य पुरस्कार, 'एशिया का नोबेल पुरस्कार' कहा जाने वाला 'रमन मैग्सेसे पुरस्कार' के अलावा और भी कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. दिल्ली में अपने से कनिष्ठ पुलिस अधिकारी के कमिश्नर बनने के उपरांत किरण बेदी ने इस्तीफा देकर अपने आत्म सम्मान को बचाये रखा और उसके बाद उनका जीवन समाज-सेवा को अर्पित हो गया. कई गैर सरकारी संगठनों की स्थापना और सक्रीय कामकाज के अलावा वह २१वीं सदी के सबसे बड़े आंदोलन अन्ना-आंदोलन में बेहद महत्वपूर्ण चेहरा बनीं रहीं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले चले आंदोलन में किरण बेदी ने एक क्रन्तिकारी, अन्ना की विश्वासपात्र सहयोगी की भूमिका का बखूबी निर्वहन किया. भूख हड़ताल किया, जेल गयीं और तब देश की भ्रष्टाचारी सरकार को घुटने के बल टिकने को मजबूर कर दिया. बाद में इस बड़े आंदोलन से जुड़े कुछ लोगों द्वारा आंदोलन को हाईजैक करके उसको राजनीतिक रूप देने से अन्ना हज़ारे और किरण बेदी जैसे दूसरे वरिष्ठों ने किनारा कर लिया और परिणामस्वरूप यह गैर-राजनीतिक आंदोलन बिखर गया. किरण बेदी का जीवट इसके बाद भी कायम रहा और कई राजनीतिक पार्टियों के लुभावने ऑफर के बावजूद उन्होंने अपना आत्म सम्मान बनाये रखा.

किरण बेदी बदले राजनीतिक हालत में अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गयी हैं. उसका लाभ-हानि, गुणा-गणित अपनी जगह है, किन्तु इस बात के लिए हमें और भी kiran-bedi-delhi-politics-hindi-article-by-mithilesh-anbhigyaखुश होना चाहिए कि किरण जी पूरे स्वाभिमान के साथ राजनीति में आयी हैं, अपने वजूद के साथ उन्होंने खिलवाड़ नहीं किया है. वह चाहतीं तो लोकसभा के चुनाव के समय ही भाजपा में आ जातीं और बेहद आसानी से किसी मंत्रिपद की दावेदार भी होतीं, लेकिन तब उनकी छवि नहीं बचती, और उनके साथ भी लालची की छवि जुड़ जाती. यही नहीं, वह आम आदमी पार्टी से भी मुख्यमंत्री की उम्मीदवार बहुत पहले ही बन जातीं, किन्तु अरविन्द केजरीवाल द्वारा 'टीम-अन्ना' को धोखा देना और आंदोलन को हाईजैक करना उन्हें कभी रास नहीं आया. उनकी छवि पहले भी किसी मुख्यमंत्री से कम नहीं थी और कई लोगों की मुख्यमंत्री बन कर भी कोई छवि नहीं बनी. ठीक उसी प्रकार, जैसे हमारे पिछले प्रधानमंत्री, राजसेवक की छवि से बाहर नहीं निकल पाये. किरण बेदी के भाजपा में आने से विरोधी निश्चित रूप से सहज नहीं हैं और तमाम प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि 'अन्ना के सभी बच्चे सेटल हो गए'.तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि 'अरविन्द केजरीवाल', अन्ना आंदोलन की पहचान के मुहताज रहे हैं और उसका उन्होंने जमकर फायदा उठाया है और 'अल्पभोग' भी किया है. किरण बेदी, अन्ना और अब भाजपा नेता के अलावा भी पहचान रखती हैं और उनकी इस पहचान पर कोई दूसरी पहचान हावी नहीं होने वाली. यदि किसी को यकीन न हो तो, देश भर में किसी भी स्टोर से 'जीके' (सामान्य ज्ञान) की पुस्तक उठा कर देख लो. उसमें अन्ना या किसी दूसरे का नाम हो न हो, "किरण बेदी" का नाम जरूर मिल जायेगा.

हार के डर से कुछ लोग, किरण बेदी के उन पुराने ट्वीट्स को सामने ला रहे हैं, जिसमें उन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान भाजपा की खिंचाई की है. कई लोग भूल चुके हैं, लेकिन उस आंदोलन को याद रखने वाले जानते हैं कि उस समय पूरा देश ही भाजपा और कांग्रेस की सोच की बुराई कर रहा था. यहाँ तक कि संघ से जुड़े लोग भी भाजपा के खिलाफ आंदोलन से जुड़े थे. सवाल कांग्रेस या भाजपा का नहीं था तब, सवाल उनकी सोच को लेकर था. कांग्रेस बदली नहीं, इसलिए मिट गयी. केजरीवाल भी कमोबेश, कांग्रेस जैसी सोच के हो गए हैं, कांग्रेस के साथ सरकार भी चला चुके हैं, इसलिए वह भी रसातल में हैं. हाँ! भाजपा अन्ना आंदोलन के बाद बदली है, ऊपर से नीचे तक. इसलिए किरण बेदी जैसे कई लोगों का विचार भी बदला है. आज भाजपा देश को आगे ले जा रही है, तो देशवासियों, दिल्लीवासियों और किरण बेदी का उनसे जुड़ना कहाँ से गलत है? आज जब राजनेताओं की साख बची नहीं है और नेता बनने के लिए लोग गलत सही किसी भी रास्ते की परवाह नहीं करते हैं, उम्मीद है किरण जी, राजनीति में रहते हुए भी अपने स्वाभिमान के साथ कोई समझौता नहीं करेंगी और अपने प्रभाव से राजनीति के पेशे को भी गन्दगी से, कुछ हद तक ही सही, निजात दिला सकेंगी. दिल्लीवासियों ने पिछले सालों में बड़ी उठापठक का सामना किया है और अब दिल्लीवासियों का हक है कि उन्हें किरणबेदी जैसा सशक्त और दूरदर्शी नेतृत्व मिले. आखिर, राजधानी का इतना हक तो बनता ही है.

Delhi's future chief minister Kiran Bedi, article in Hindi by Mithilesh.

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– मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

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Saturday, 8 February 2014

राजनीति, संवैधानिकता एवं जनलोकपाल बिल - Janlokpal Bill

by on 03:05
देश की राजनीति पिछले ४ सालों से जनलोकपाल बिल से मुक्त नहीं हो पा रही है. पहले जहाँ आन्दोलनों, धरनों और प्रदर्शनों को इसके शुरूआती चरण के रूप में देखा गया, वहीं अब यह लड़ाई सरकार से होती हुई संवैधानिकता और अराजकता के प्रश्न पर आकर टिक गयी है. हर बार मोहरे पर होता है, कथित जनलोकपाल बिल. ऐसा नहीं है कि इसकी भनक तत्कालीन राजनैतिक तंत्र को नहीं रही होगी, और शायद इसीलिए इस मुद्दे को जल्द से जल्द ख़त्म करने के लिए परस्पर विरोधी राजनैतिक पार्टियां मिल गयीं और इस जनलोकपाल बिल के अगुआ रहे अन्ना हजारे को येन केन प्रकारेण साध लिया गया. आनन फानन में लोकसभा, राज्यसभा से यह बिल ध्वनिमत से पारित हुआ और लोगों ने समझा कि यह मुद्दा तो केजरीवाल से छिन गया. काफी हद तक यह सच भी है. अब केजरीवाल और उनके मित्र बिजली-पानी के मुद्दे पर आखिर कब तक लड़ते रहेंगे. हाँ, यदि जनलोकपाल का मुद्दा वह दुबारा जीवित करने में सफल रहे तो इसे पहले राज्य, उप-राज्यपाल, गृह-मंत्रालय से होते हुए संसद के मार्ग से देशव्यापी बनाने का मौका जरूर हाथ लग सकता है. अब बात बिलकुल साफ़ हो जाती है, जिसमें पुराना तंत्र इस मुद्दे को समाप्त करना चाहता है, और नयी उभरी ताकत इस मुद्दे को जीवित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार दिखती है.

जरा सोचिये, यह मुद्दा यदि केजरीवाल अपनी योजना के अनुसार धूम-धाम से किसी पार्क/ स्टेडियम में ले जाकर, विधानसभा का सत्र बुलाकर पास करा ले जाते हैं, तो उनकी लोकप्रियता का ग्राफ कहाँ से कहाँ तक पहुँच जाएगा और पुराने राजनैतिक तंत्र, जिसको वह भ्रष्टाचारी कह कहकर कठघरे में एक हद तक खड़ा कर चुके हैं, उसकी ब्रांडिंग का ग्राफ कितना नीचे आ जायेगा. राजनीति को समझने वाले घाघ राजनीतिज्ञ अब तक केजरीवाल को समझ चुके होंगे कि उनकी राजनैतिक जमीन क्या है, अथवा आम आदमी पार्टी अपना राजनैतिक अस्तित्व कहाँ ढूंढ रही है. बिलकुल साफ़ है, पुराना तंत्र ख़त्म करके या उसको करारी चोट पहुंचाकर ही आम आदमी आगे बढ़ सकती है. अपना इरादा वह जाहिर कर चुके हैं. यह बात सही है अथवा गलत यह एक बहस का मुद्दा जरूर हो सकता है. पुराना तंत्र इस बात की कवायद में लगा है कि नयी उभरती ताकत को समझौता करने के नाम पर सीमित कर दिया जाय और अपने अंदर समेट लिया जाय, लेकिन केजरीवाल और उनके तेज-तर्रार साथियों का विश्वास या आभाष दिल्ली की जीत के बाद और भी पक्का हो गया होगा कि वह पुराने तंत्र को समाप्त करके या सीमित करके अपना वर्चस्व स्थापित कर सकते हैं. वोटों के परिणाम के बारे में आंकलन तो खैर अभी नहीं किया जा सकता, लेकिन राजनैतिक तंत्र के खिलाफ जो जनता में आग लगी हुई है, उसको केजरीवाल और उनकी टीम ने बहुत पहले ही भांप लिया था और उस गुस्से से अपनी खिचड़ी पकाने लायक सामर्थ्य भी उन्होंने जुटा लिया है, या उनको ऐसा विश्वास है. अब जरा सोचिये, केजरीवाल कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों को समाप्त करके, तोड़ करके अपना उभार करने का सपना देख रहे हैं, और न सिर्फ देख रहे हैं, बल्कि जनलोकपाल बिल को आधार बनाकर अपनी चालें भी चल रहे हैं. अब सामने से लड़ाई आर-पार की दिख रही है, और यह लोकसभा के परिणामों तक सम्भवतः दिखेगी भी. हाँ, लोकसभा के परिणामों के बाद सभी दल अपना सामर्थ्य, जनता का समर्थन और उसकी आशा को समझ चुके होंगे, और तब फैसला होगा कौन रहेगा, कौन धूमिल होगा या कौन किस से मिलकर रहेगा. तब तक यह शह और मात का खेल चलता रहेगा. जहाँ तक बात जनलोकपाल की वैधानिकता का है तो इस बात पर भी खेल ही चल रहा है. पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मीडिया को एक खत दिया था, जिसमें लिखा गया था कि जस्टिस मुकुल मुद्गल, पीवी कपूर, केएन भट्ट और पिनाकी मिश्रा की राय लेने के बाद ही उन्होंने जनलोकपाल बिल को विधानसभा में पेश करने की तैयारी की थी. केजरीवाल ने दलील दी थी कि इनसे राय के बाद ही जनलोकपाल बिल का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन अब इन चार नामों में से दो - वरिष्ठ वकील केएन भट्ट और पिनाकी मिश्रा ने कहा है कि उन्होंने न तो बिल देखा है और न ही इस तरह की कोई राय दी है.

इससे केजरीवाल जरूर थोड़े बैकफूट पर आ गए हैं. थोडा उनपर दबाव इसलिए भी पड़ा है क्योंकि दिल्ली के उपराज्यपाल के पूछे जाने पर भारत के सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि जनलोकपाल बिल को बिना गृह मंत्रालय की मंजूरी के पास नहीं किया जा सकता है और बताया था कि यह तरीका असंवैधानिक होगा. लेकिन एक के बाद एक इसकी काट निकाली जायेगी, क्योंकि राजनीति में कुछ भी असम्भव नहीं होता है. और जब प्रश्न राजनैतिक अस्तित्व का हो तब तो हर तरह का रास्ता हर पक्ष निकालेगा. क्योंकि बदलाव चाहे कुछ आया हो अथवा नहीं आया हो, एक बदलाव तो आया ही है और वह है वर्त्तमान राजनैतिक तंत्र के मन में डर. अब तक तो उनको लगता था कि वह इस बार नहीं जीते, तो ५ साल बाद भी जोर-आजमाइश कर सकते हैं. लेकिन अब उन्हें यह डर है कि वह जिस प्रकार राजनीति करते आये हैं, वह राजनीति ही कहीं न बदल जाय. फिर नयी राजनीति में वह भला कहाँ फिट बैठेंगे. ऐसा नहीं है कि इस सवाल से सिर्फ पुराना तंत्र ही जूझ रहा है, बल्कि नए तंत्र की तो और भी समायाएं हैं. एक तो उन्हें खुद को साबित करने की जद्दोजहद है, दूसरे उन्हें राजनीति के पुराने नियम सिर्फ सीखने हैं, क्योंकि वह जब पुराना जानेंगे तभी तो अपना नया नियम बनाएंगे. इसमें बारीकी यह है कि पुराना नियम उन्हें सिर्फ सीखना है, अपनाना नहीं है, क्योंकि यदि वह वही नियम अपनाते हैं, जो पहले से हैं तो पुरानी राजनीति ही क्या बुरी है. मतलब साफ़ है, उन्हें राजनीति करनी तो है, लेकिन राजनीति के तात्कालिक फायदों से खुद को दूर रखना है. और उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनता की आशाएं और उम्मीदें सबसे ज्यादा होने के कारण उनकी बारीकी से शिनाख्त हो रही है और उसमें वह कई छेद नजर आ रहे हैं, जो शायद सामान्य रूप से नजर नहीं आते. संविधान का उल्लंघन, अराजकता, अनुभव की कमी से तो वह जूझ ही रहे हैं, साथ में उनकी एकमात्र पूंजी 'साफ़-नीयत' पर भी उनकी बड़ी महत्वाकांक्षा भारी पड़ती दिख रही है. क्योंकि साफ़ नीयत तो एक बेहद सटीक दैवीय गुण है, और यह अकेले नहीं चलता है, बल्कि धैर्य, सहिष्णुता, त्याग, संतुलन इत्यादि अन्य मानवीय गुणों का पूरक है. ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपनी मर्जी से एक सदगुण के प्रशंसक और फालोवर होने का दावा करें, और दूसरे मानवीय गुणों से आप कन्नी काट लें. यहीं तो संदिग्ध हो जाते हैं 'आप'. खैर, प्रयासों में काफी दम होता है और पुराने और नए दोनों तंत्रों के लिए यह सीखने का उचित अवसर है. पुराना अपनी गलती सुधारे, अन्यथा वह मिट जायेगा और नया अति-आत्मविश्वास से बचकर साफ़ नीयत से ही संतुलन बनाये अन्यथा उसकी भ्रूण-हत्या हो जायेगी. और इससे बड़ी बात यह है कि दोनों तंत्र एक दूसरे के प्रति सहिष्णु हों. आखिर यही तो है 'साफ़ नीयत'.

नए और पुराने राजनैतिक तंत्र को सामर्थ्य, महत्वाकांक्षा, संतुलन और कथित 'साफ़-नीयत' के पैमाने पर तौल रहे हैं मिथिलेश


मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Janlokpal Bill, Anna Movement article by Mithilesh.

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