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Monday, 29 June 2015

समाजवादी कार्यकर्ताओं की ज़मीनी राजनीति

by on 07:32
उत्तर प्रदेश का नाम कानून व्यवस्था के लिहाज से हमेशा ही 'अति' प्रशंसनीय रहा है. गुंडा, गुंडई, दादागिरी जैसे शब्द उत्तर प्रदेश की जनता के लिए आम शब्द जैसे प्रतीत होते हैं. हालाँकि, राजनीति में गुंडा फैक्टर इस्तेमाल करना भारतीय राजनेताओं के लिए कोई नई बात नहीं है, किंतु अन्य जगह यह बहुधा ऊपरी स्तर पर ही होता है, जिससे आम जनता को कोई विशेष मतलब नहीं होता है. परंतु उत्तर प्रदेश के नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता कुछ ज्यादे ही समाजवादी किस्म के हैं, इसलिए बड़े और छोटे में भेद नहीं करते, बल्कि सबको समान रूप से दुखी किया करते हैं. यह बात सिर्फ हम ही नहीं कह रहे हैं, बल्कि तमाम आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. इसी अपराध को लेकर अमिताभ बच्चन ने एक बार समाजवादी पार्टी के लिए विज्ञापन किया था कि 'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहाँ हैं कम'! इस विज्ञापन को लेकर जैसी छीछालेदर अमिताभ बच्चन की मची, उसे वह आज तक नहीं भूले होंगे. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी बुरी तरह से परास्त हुई थी. यह अलग बात है कि जातिवादी तिकड़मों और बेहतर विकल्प होने के अभाव में समाजवादी पार्टी ने सत्ता हासिल की, जिसमें युावा अखिलेश यादव का चुनाव प्रचार भी शामिल था. हालाँकि, सपा की जीत पर विश्लेषकों को आश्चर्यमिश्रित दुःख अवश्य हुआ होगा. अपराध की पुष्टि यूं तो कई एजेंसियां करती रही हैं, किन्तु यदि खुद पार्टी का प्रमुख नेता ही यदि अपनी ही पार्टी के नेताओं को गुंडा और जनता को परेशान करने वाला कहे तो ऐसी स्थिति को 'जनता को मुर्ख बनाने' की कला के अतिरिक्त और क्या कहा जाय. विदेशी पढाई कर लौटे और बड़ी उम्मीदों के साथ उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बैठे अखिलेश यादव कई सालों के बाद अगर यही अनुभव जुटा पाये हैं कि उनकी पार्टी के नेता गुंडे हैं और ज़मीन कब्ज़ा करने के साथ थाने की राजनीति में बड़ी दिलचस्पी लेते हैं, तो इसे उनकी नादानी समझी जाय अथवा इक्कीसवी सदी में जनता को नादान समझने की सोच! जी हाँ! उत्तर प्रदेश का यह अनुभव तो अधिकांश बाशिंदों को था ही, लेकिन इसकी सार्वजानिक स्वीकारोक्ति, वह भी एक कार्यरत मुख्यमंत्री के मुंह से, हमारी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है. याद दिलाना उचित होता कि यह वही अखिलेश यादव हैं, जिन्होंने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय की खुलेआम आलोचना की थी, जिसमें माननीय कोर्ट ने जनता के पैसे से नेताओं को अपना धुआंधार विज्ञापन करने पर सख्ती से निर्देश जारी किये थे. तब कड़ी टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने कहा था कि 'सुप्रीम कोर्ट हमें यह भी बता दे कि हमारा पहनावा क्या हो'! सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च न्यायिक संस्था के निर्णयों पर बारीक निगाह रखने वाले और उसका विरोध करने का साहस रखने वाले अखिलेश यादव, भला अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं के व्यवहार से अनजान कैसे बने रहे? या फिर यदि उनको इसके बारे में जानकारी थी तो उन्होंने इसे नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाये? इससे भी आगे बढ़कर कहा जाय तो अब जब उन्हें अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की असलियत पता चल गयी है तो वह इन्हें अनुशासित करने के लिए अब भी क्या कदम उठाने वाले हैं? यदि इन्हें नियंत्रित करने के लिए मुख्यमंत्री ठोस कदम नहीं उठाते हैं तो भला यह कैसे समझा जाय कि उनकी बातों में गंभीरता है और वह वास्तव में उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित करना चाहते हैं. वैसे यह पूरी बात अखिलेश यादव ने आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के सन्दर्भ में कही है. ऐसे में उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि वह पार्टी कार्यकर्ताओं को अनुशासित सिर्फ चुनाव तक ही करना चाहते हैं, फिर अगले चुनावों तक गुंडई करने की खुली छूट दे देंगे! वैसे, जिस प्रदेश में पत्रकारों पर घोर अत्याचार हो रहे हों, ज़िंदा जलने की घटनाएं सामने आ रही हों और खुद अखिलेश सरकार के मंत्री इसमें फंसे हों, तो भला ऐसे एकाध बयान देने के अतिरिक्त वह कर भी क्या सकते हैं. आखिर, अपनी झेंप भी तो मिटानी है. यह गुण निश्चित रूप से उन्होंने अपने पिता एवं चतुर राजनेता मुलायम सिंह यादव से हासिल किये होंगे. वह भी अपने कार्यकर्ताओं की बद्तमीजियों को सार्वजनिक रूप से डांट देते हैं, जबकि बाद में वह यह कहने से भी गुरेज नहीं करते हैं कि 'बच्चों से जवानी में गलतियां' हो जाती हैं.'  सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही क्यों, उनकी पार्टी का इतिहास भी मायावती के 'झूला फ़ाड़ कांड' के रास्ते से होकर गुजरा है और प्रदेश के तमाम बाहुबलियों की शरण स्थली बना रहा है. ऐसे में अखिलेश यादव का यह कहना बेमानी ही है कि उनकी पार्टी पर दूसरों की तुलना में ज्यादा जिम्मेदारी है. अब कार्यकर्ता थाने की राजनीति छोड़ दें. अब सपाईयो को ज्यादा पढऩे-लिखने की भी जरूरत है, जिससे कि गांव से लेकर शहर के कोने तक समाजवादी सिद्धांत जनता तक पहुंच सकें. हमको सत्ता में शीर्ष पर रहने के लिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है. आखिर, अब समाजवादी कार्यकर्त्ता कितनी मेहनत करें भला! रात दिन मेहनत कर करके इन्होंने पूरे भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में अपना नाम कमाया है. समाजवादी सिद्धांत को गाँव गाँव तक ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया है. आखिर, पत्रकारों के जलने से लेकर, जमींन कब्जाने और थाने की राजनीति करने की स्वीकृति खुद मुख्यमंत्री ने ही कर ली है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में कानून के राज पर भला किसे शक हो सकता है. आज 21वीं शदी, जब दुनिया चाँद को लांघकर मंगल और उससे आगे जाने के मंसूबे बाँध रही है, ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य, अदद कानून के राज के लिए तरसें, यह शर्मनाक विषय है. अखिलेश यादव ने जिस 'थाने की राजनीति' का ज़िक्र किया है, उसमें आम जनता ही पिसती है और उसे दलाली के रूपयों से लेकर पक्षपात तक का शिकार बनने पर मजबूर किया जाता है. ज़रा मुख्यमंत्री के बयान 'थाने की राजनीति' और पुलिस पर एक पत्रकार द्वारा खुद को मंत्री के दबाव में जलाये जाने वाले आरोप पर गौर कीजिये, आपको बहुत कुछ समानता नजर आ जाएगी. जांच रिपोर्ट चाहे जो भी कहे, किन्तु मुख्यमंत्री के उदगार बहुत कुछ बताने के लिए अपने आप में पर्याप्त हैं. निराशा की बात यह है कि आने वाले सालों में भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कानून का राज कैसे स्थापित हो इसकी दिशा दिख नहीं रही है, ऐसे में जातिवादी दंश को झेलना उत्तर प्रदेश की जनता की मजबूरी बने रहने की सम्भावना ज्यादा दिखती है. हाँ! यदि जनता खुद चेते और जातिवादी राजनीति को ठोकर मार कर किनारे करे और योग्यता के आधार पर चुनावों में वोट करे तो तस्वीर अवश्य ही बदलेगी! पर यक्ष प्रश्न यही है कि क्या वाकई में जनता यह सोचेगी? 
samajwadi party politics in up and crime graph in state, hindi article by mithilesh

Tuesday, 23 June 2015

विकास और जातीय राजनीति के दोराहे पर बिहार

by on 08:02
बिहार विधानसभा चुनाव की डुगडुगी बज चुकी है और तमाम राजनीतिक दलों ने कमर भी कस ली है. जब हम बिहार की राजनीति पर दृष्टिपात करते हैं तो क्या आम और क्या ख़ास, प्रत्येक आदमी सरकार बनाने और बिगाड़ने की बात सीना ठोक के कहता हुए, चाय और पान की दूकान के साथ बस, ट्रेन, ऑफिस या फूटपाथ हर जगह मिल जाता है. कहा तो यह भी जाता है कि यहाँ का बच्चा बच्चा राजनीति की एबीसीडी समझता है. पिछले दशकों में इस राजनीतिक जागरूकता का फायदा भी हुआ है, खासकर देश में आपातकाल लगाए जाने के समय जिस प्रकार का नेतृत्व बिहार ने पूरे देश को दिया, उसके लिए इस धरती को नमन किया जाना चाहिए. इसके उल्टा यह तर्क भी उतना ही सच है कि कालांतर में राजनीति की इतनी अधिकता होने लगी कि दुसरे सारे काम मसलन उद्योग-धंधे, शासन-प्रशासन इत्यादि ठप्प पड़ते चले गए. स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि यहाँ के लोग थोक के भाव, रोजी रोजगार के लिए बाहर निकलने को मजबूर हो गए. पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, दक्षिण भारत, दिल्ली इत्यादि क्षेत्रों में अपनी जन्मभूमि को छोड़कर निकलना निश्चित रूप से बिहारी लोगों के एक बड़े वर्ग को गहरे तक कचोट गया होगा. पर उनके सामने तत्कालीन 'जंगलराज' में लौट पाना मुमकिन भी कहाँ था. पिछले दिनों स्थिति इतनी ख़राब हो गयी थी कि अपहरण, फिरौती, गुंडई इत्यादि के लिए बिहार वैश्विक स्तर पर कुख्यात हो गया था. जनता के थोड़ा चेतने पर, स्थिति में कुछ सुधार होना शुरू ही हुआ था कि कमबख्त राजनीति ने फिर कुलबुलाना शुरू किया और उसके शिकार बने सुशासन बाबू के नाम से मशहूर नीतीश कुमार. दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि बिहार फिर से सुशासन की पटरी से उतरकर थोथी राजनीति और जंगलराज की ओर फिर बढ़ा तो उसके दोषी सुशासन बाबू ही माने जायेंगे. तमाम उठापटक के बावजूद यह बात भी सिद्ध है कि चुनाव जीतने के बाद भी, लालू और नीतीश का पुराना 'अहम' उन्हें साथ रहने नहीं देगा. यदि उन दोनों ने अपने इगो को किसी तरह समझा भी लिया तो, उनके तमाम प्रत्याशी, जिनको टिकट सिर्फ जीतने की क्षमता के आधार पर ही मिलने की सम्भावना है, सत्ता की बंदरबांट करते नजर आएंगे. अस्तित्व बचाने के लिए यह दोनों साथ जरूर आ गए हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है. चूँकि बिहार का प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में नेता है, तो वह भी यह गणित बखूबी समझ ही रहे होंगे. इन दोनों से आगे बढ़ते हैं तो बिहार भाजपा में भी कम कलह नहीं दिखती है. क्या वरिष्ठ, क्या कनिष्ठ सभी कैमरे के सामने खुद को मुख्यमंत्री का दावेदार घोषित करने में ज़रा भी देरी नहीं कर रहे हैं. हालाँकि, भाजपा में नरेंद्र मोदी की इतनी तो चलती ही है कि उनकी एक बात पर सब 'खामोश' हो जायेंगे, पर कोई सर्वमान्य प्रादेशिक नेता न होने की स्थिति में सर फुटव्वल की स्थिति बनी ही रहेगी. सबसे आश्चर्य की बात तब दिखी, जब केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा की छोटी पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री का दावेदार बताया. हालाँकि, यह दावा भाजपा नेताओं की सहमति से ही किया गया लगता है, जिससे अमित शाह और मोदी एनडीए में शामिल दलों को दबाव में लाने की रणनीति बना रहे होंगे. इसका असर भी तुरंत ही सामने आया, जब अपेक्षाकृत बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने सपाट शब्दों में कहा कि उन सबके नेता नरेंद्र मोदी हैं और वह घोड़े, गधे, बकरी .. जिसे भी कहेंगे, उसे वह मुख्यमंत्री स्वीकार कर लेंगे. हाल ही में बड़े कद के नेता बने मांझी के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं है, इसलिए भाजपा उन्हें जिस हाल में रखेगी, उन्हें वह स्वीकार होगा. हालाँकि, मांझी पर लालू की राजद ने कई बार डोरे डालने का प्रयास किया, किन्तु मांझी नीतीश कुमार की फितरत समझते हैं और वह यह जानते हैं कि एक बार बगावत कर लेने के बाद अब नीतीश के साथ उनका रहना संभव नहीं है. यहाँ तक कि इन नेताओं के बीच 'आम - लीची' तक का विवाद भी हो चूका है. इन हालातों में कागजों पर भाजपा बीस जरूर नजर आ रही है, किन्तु चुनाव मैदान में लड़े जाते हैं और वहां के समीकरण चुनाव के एक दिन पहले तक बनते बिगड़ते रहते है. यदि यादव, मुस्लिम और नीतीश का वोट बैंक एकजुट हो गया तो भाजपा-गठबंधन को नाकों चने चबाने को मजबूर होना पड़ सकता है, पर यदि यादव वोट बैंक में टूट हुई तो भाजपा का काम कुछ आसान जरूर हो जायेगा. राजद से हाल ही में अलग हुए बाहुबली नेता पप्पू यादव का भी कुछेक सीटों पर प्रभाव है, पर दो ध्रुवीय लड़ाई में छोटे नेता अक्सर गौण हो जाते हैं. बिहार के इस चुनाव में जो सबसे दुर्भाग्यशाली बात नजर आ रही है, वह वहां के जातीय राजनीति के चरम पर पहुँचने को लेकर है. इस चुनाव में जाति-विभाजन की जबरदस्त कोशिश प्रत्येक पार्टी के नेताओं द्वारा की जा रही है, ऐसे में सुशासन के दावों और वादों का कमजोर होना निश्चित है. जनता ने यदि समझदारी से एकमुश्त वोटिंग करने की हसरत नहीं दिखाई और जातीय राजनीति में बंटकर वोटिंग हुई तो बिहार का नुकसान होना तय है. हालाँकि, तथाकथित जंगलराज की याद अभी बिहार की जनता के जेहन से धुंधली नहीं हुई होगी और न ही वह दर्द, जो पलायन को मजबूर बिहारी भुगतता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि बिहार में राजनीतिक उथल पुथल से हटकर स्थिर और विकासवादी सरकार आएगी, जो इगो के बजाय विकासवादी राजनीति करेगी और बिहार सुशासन के पथ पर मात्र चलने के बजाय सरपट दौड़ लगाएगा. इसी में बिहार, बिहारी और देश का हित निहित है. इस बात की जिम्मेदारी राजनीतिक नेता उठाने से तो रहे, क्योंकि उनके सामने एक ही लक्ष्य बचा रह गया है 'येन केन प्रकारेण' चुनाव जीतना. ऐसे में जनता को स्वयं ही जातिगत राजनीति और समीकरणों से हटकर सपाट वोटिंग करनी होगी, अन्यथा राजनीतिक अस्थिरता के भंवर में बिहार फंसा ही रह जायेगा.


Hindi article on bihar assembly election by mithilesh2020

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