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Tuesday, 12 May 2015

न्यायिक अन्तर्विचार की आवश्यकता - Justice in Indian Democracy

by on 06:27
पिछले दिनों दो उच्च न्यायालयों द्वारा दो फैसले आये हैं, जिसने सोशल मीडिया समेत विभिन्न माध्यमों में व्यापक बहस छेड़ दी है. एक फैसला सिने-स्टार सलमान खान की मुंबई हाई कोर्ट द्वारा तीन घंटे में ज़मानत दिया जाना है तो दूसरा बहुचर्चित फैसला अन्नाद्रमुक की सुप्रीमो जे.जयललिता की चेन्नई हाई कोर्ट द्वारा बल्कि दोनों मामलों की सरसरी तुलना भी कर दे रहे हैं. ध्यान से देखा जाय तो दोनों मामलों की तुलना न्यायिक फैसले की सतही समझ है, क्योंकि दोनों मामलों की प्रवृत्ति में ज़मीन आसमान का अंतर है. जयललिता के खिलाफ श्रोत से अधिक आमदनी का मामला चलाया गया, जो पिछले दशक में विरोधियों के खिलाफ एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसके तार निश्चित रूप से कहीं न कहीं केंद्रीय जांच एजेंसी 'सीबीआई' से भी जुड़े हुए हैं, जिसका आरोप राजनेता लगाते ही रहते हैं. थोड़ा राजनैतिक दृष्टि से देखा जाय तो अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सत्तासीन है. नरेंद्र मोदी की जयललिता से नजदीकियों की खबर लगभग प्रत्येक अख़बार में छपती ही रहती है. ऐसे में हम सीबीआई के रोल का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं. सीबीआई के इसी तरह के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच एजेंसी को 'तोता' तक कह दिया था, जिस पर तब बड़ा हो हल्ला मचा था. जयललिता की ज़मानत के फैसले को देखा जाय तो आम जनमानस की वैसे भी इसमें कोई ख़ास रुचि नहीं हो सकती, क्योंकि नेता शब्द ही इस तरह के मामलों की लीपापोती करने में काफी साबित होगा. यह केस सोशल मीडिया इत्यादि माध्यमों पर चर्चा में इसलिए आ गया क्योंकि सलमान पर आये हाई-कोर्ट के फैसले ने मध्यम-वर्ग की सोच में एकबारगी उबाल तो ला ही दिया था, इसी बीच जयललिता पर कोर्ट का फैसला आ गया, अन्यथा यह मामला उतना चर्चित न होता. दूसरी ओर सिने स्टार सलमान खान पर हाई कोर्ट के फैसले से न सिर्फ आम जनमानस, बल्कि पूर्व पुलिस कमिश्नर और अब भाजपा के एमपी सत्यपाल सिंह, किरण बेदी सहित कई जाने माने न्यायविदों ने भी दबे स्वर में अपनी राय जाहिर की. वैसे भी सलमान खान का मामला कोई राजनीतिक मामला तो था नहीं, बल्कि उनकी लापरवाही से भारतीय नागरिकों के जान जाने और घायल होने का था. निचली अदालत ने बड़े स्पष्ट स्वरों में सलमान खान को दोषी साबित करते हुए अपने फैसले में कई मजबूत दलीलें पेश की थीं, जिसमें घटना के समय उनका भाग जाना और घायलों को अस्पताल न पहुँचाने जैसे चारित्रिक सवाल भी उठाये गए थे. इस मानवीय केस के हाई-प्रोफाइल होने से भी आम-ओ-ख़ास सबकी नजर बनी हुई थी और लोगों ने देखा कि कैसे भारत के बड़े वकीलों ने पूरे मामले को मैनेज किया. यही नहीं, जजों ने भी तय परम्पराओं से अलग हटते हुए देर शाम तक ऑफिस में कार्य किया और सिने स्टार की जमानत सुनिश्चित की. ऊपर से महाराष्ट्र सरकार ने सलमान को मिली ज़मानत का विरोध न करने का फैसला लेकर लोगों को यह व्याख्या करने को मजबूर किया कि कहीं सलमान खान के तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और अब देश के प्रधानमंत्री के साथ पूर्व में 'पतंग उड़ाने' का सरकारी लाभ तो नहीं मिल रहा है.  सच पूछा जाय तो दोनों मामलों में मूल अंतर यही था कि एक केस को आम आदमी खुद से जोड़कर देख रहा था, जबकि दूसरा केस निरा-राजनीतिक था. बुद्धिजीवी यह आशा करते हैं कि सलमान खान के बारे में आयी हाई कोर्ट की ज़मानत ने जिस तरह इस मुद्दे को हाई-लाइट किया, उससे आतंरिक तौर पर ही सही, भारत की न्याय-व्यवस्था भी आत्म-मंथन को तैयार हुई होगी. आखिर, इस देश में न्यायिक सुधार की बात कब से कही जा रही है, उस पर कुछ कार्यवाही तो होनी ही चाहिए क्योंकि जनता यह महसूस करती है कि संविधान की नजर में देश का प्रत्येक नागरिक समान है. आखिर यह कैसा लोकतंत्र और उसकी न्याय-व्यवस्था है कि लाखों कैदी बिना आरोप के जेलों में सड़ें और एक रसूखदार व्यक्ति को सुपर-स्पीड से ज़मानत मिल जाए, इस बात पर अन्तर्विचार होना ही चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र की न्यायिक मर्यादा सिर्फ इस अन्तर्विचार से ही सुरक्षित रह सकती है.
पिछली यूपीए की सरकार में जयललिता की विरोधी पार्टी द्रमुक शामिल थी, और
निचली अदालत के फैसले को रद्द करके पूर्व मुख्यमंत्री को ज़मानत दिया जाना है. सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा में दोनों मामलों की एक सिरे से तुलना करके न्याय के ऊपर पैसे और रसूख के हावी होने की चर्चा की जा रही है. हालाँकि, अदालती आदेश की अवहेलना अपने आप में एक अपराध है, फिर भी नपे-तुले, दबे स्वरों में लोग अलग तरीकों से दोनों फैसलों पर न सिर्फ नाराजगी जाहिर कर रहे हैं,
- मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

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Justice in Indian Democracy

Saturday, 31 January 2015

Friday, 21 November 2014

अनाथों का नाथ बनें; सीखें बिगड़ैल से... Orphan, Orphanages and Civil Society!

by on 04:34
कई बार लोग, जिन्हें बिगड़ैल, बद्तमीज और ऐसी ही अन्य संज्ञाओं से नवाजते हैं, वह दुनिया को कुछ ऐसी सीख दे जाते हैं, जिसकी मिसाल ढूंढें नहीं मिलती. बात इस बार मायानगरी से है. एक तरफ हिंदी फिल्में पूरे विश्व में भारत की एक खास पहचान बना चुकी हैं, वहीं देश में जिन दो चीजों के प्रति, गैर-परंपरागत रूप से सर्वाधिक आकर्षण है, वह निश्चित रूप से क्रिकेट और बॉलीवुड ही है. आज कल के शहरी और देहाती दोनों प्रकार के अधिकांश युवक या तो बड़े क्रिकेटर बनने का सपना देखते हैं अथवा किसी एक्टिंग क्लास में हीरो बनने का प्रयास दिख जाना सामान्य बात है. क्रिकेट में इन युवकों के आदर्श सचिन तेंदुलकर होते हैं, वहीं हीरोगिरी दिखाने के शौकीनों के सलमान खान. जी हाँ! खबर भी इन्हीं साहिबान की है. माचो मैन, मोस्ट एलिजिबल बैचलर, लेडी-किलर, दोस्तों का दोस्त, दुश्मनों का दुश्मन इत्यादि तमाम उपनाम इन्हें इस मायानगरी से मिले हैं. इनके कार्यों में तमाम हिट फिल्मों के अतिरिक्त किसी को भी थप्पड़ लगा देना, महिलाओं की बेइज्जती करना, गैर-कानूनी रूप से काले हिरणों का शिकार करना जैसे तमाम विवाद शामिल रहे हैं. आगे परिचय बढ़ाते हुए इनके बारे, इनकी समझ के बारे में राजनीति के लोग भी लोहा मानते हैं. आम चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी के साथ इनके पतंग उड़ाने को लेकर कड़ा विवाद उत्पन्न हो गया था, लेकिन विवाद और सलमान खान एक दुसरे के पूरक कहे ही जाते हैं, तो इसमें कोई नयी बात है नहीं.

पिछले दिनों से सलमान खान लगातार मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं और संयोग से इसका कारण सकारात्मक है. फूटपाथ पर मरी हुई माँ के पास एक छः महीने की बच्ची रो रही थी, जिसे सलमान खान के परिवार ने सहारा दिया. बिना इमोशनल सीन में घुसे आप इस बात पर भी गौर कीजिये कि इस बच्ची को पूरी कानूनी प्रक्रिया के बाद गोद लिया गया और उसके लालन-पालन में सलमान खान ने उसी सोशल स्टेटस को अपनाया, जो शायद उनके अपने परिवार के बच्चों को मिला है. दुनिया ने उनकी शादी की रस्म को देखा ही, समझा ही. इस बारे में अख़बारों में, चैनलों में खूब बातें कही गयीं, सुनीं गयीं, लेकिन कहीं भी इसके मानवीय पहलू पर चर्चा सुनने का अवसर नहीं मिला. संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिये कि कुछ लोग इस पूरे प्रकरण की चर्चा भाग्य के रूप में करते मिले कि उस फूटपाथ की लड़की की कितनी सुन्दर किस्मत है कि आज वह लाखों की गाड़ी पर चल रही है, करोड़ों के महलों में रह रही है. पूरी दुनिया की अजब हालत हो गयी है कि वह हर रिश्ते को अर्थ के तराजू में लाकर खड़ा कर देती है. उसके लिए संवेदना का मोल भी चंद सिक्के हो गए हैं. इस अर्थहीन, अंतहीन, निरर्थक, भाग्यवादी और लालची चर्चा ने इस पूरे उदाहरण को बहुत ही गलत तरीके से पेश किया है. नचनिया कह कर बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों के बीच अपमानित किया जाने वाला बॉलीवुड और इसके बिगड़ैल कहे जाने वाले सलमान खान ने अपने इस कृत्य से बुद्धिजीवियों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा है. थप्पड़ लगाने का अभ्यास तो उनको पहले ही था, लेकिन उनका यह तमाचा पूरे समाज पर पड़ा है. समाज के ठेकेदारों को यह बात समझ लेनी चाहिए.

More-books-click-here२०१३ में आयी एक रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में २० लाख बच्चे अनाथ हैं. कमोबेश, देश के सरकारी कर्मचारियों की संख्या भी इतनी ही है. राजनेता, अभिनेता, व्यापारी इत्यादि सक्षम लोगों का वर्ग छोड़ भी दें तो यह आंकड़ा शर्मिंदा करने वाला ही है. देश में करोड़ों ऐसे लोग हैं, जो सलमान खान की तरह एक-एक हाथ बढ़ाएं तो अनाथ होने का अभिशाप देश से २४ घंटे के भीतर समाप्त हो सकता है. लेकिन नहीं! यह हमारी जिम्मेवारी नहीं है, यह तो सरकार करेगी! किसी 'स्वच्छता-अभियान', 'आदर्श गावं अभियान' की तरह 'अनाथ-अभियान' चलाएगी, फिर सभी ५४३ सांसद एक-एक बच्चे को गोद लेकर फोटो खिंचायेंगे और बाद में उन लड़कों का भी पता नहीं चलेगा. एक और वाकया याद आ रहा है. एक दंपत्ति हैं, ईश्वर ने उन्हें धन-धान्य से परिपूर्ण किया है, लेकिन बिचारे संतानसुख से वंचित हैं वह. कभी उस दंपत्ति के मन में भी किसी को गोद लेने की इच्छा जगी होगी, तो वह अपने से छोटी जाति के गरीब बच्चे को शहर लाये. पढ़ाया लिखाया भी बिचारे को, लेकिन जब वह जवान हुआ तो उसके साथ इसलिए रिश्ता खत्म कर दिया, कि वह उनकी संपत्ति में हिस्सेदार न बन जाए. मतलब साफ़ है, उन्होंने उस बच्चे को कभी अपनाया ही नहीं, बल्कि दूसरी भाषा में कहा जाय तो उन्होंने उसे नौकर ही समझा. यह सिर्फ एक उदाहरण नहीं है, बल्कि आपको गोद लेने के नाम पर ऐसे तमाम वाकये नजर आ जायेंगे, जहाँ हमारा सभ्य समाज इनका शोषण करने में जरा भी कोताही नहीं करता है.

अनाथालय के नाम पर बच्चों से नशीली दवाओं का कारोबार कराना, भीख मांगने के लिए देश के बच्चों को विवश करना, उनके शारीरिक अंगों का व्यापार करना इत्यादि कुकृत्य बेहद आम हैं. शर्म आनी चाहिए, हमें खुद को सभ्य कहते हुए. हमसे अच्छा तो वह बिगड़ैल बच्चा है, जो किसी के भी गाल पर थप्पड़ लगा देता है, लेकिन किसी की आत्मा, जिस पर ज़िन्दगी भर थप्पड़ पड़ते, उसको उसने बचा लिया. एक की ही सही! आपसे भी तो एक की ही जिम्मेवारी लेने की अपेक्षा करता है देश का अनाथ! आप भी तो उसी परमात्मा के अंश हैं न, उसी नाथ की कृपादृष्टि से धनवान बने हैं, बड़े बने हैं, योग्यता हासिल की है, फिर क्या विवशता है इन बेसहारों के सर को छाँव देने में. स्वयं विचार करें !

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Orphan, Orphanages and Civil Society, article by Mithilesh in Hindi, related with Salman and Arpita Khan relations.

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