आपने मेरा पिछला लेख पढ़ा अन्ना हजारे के आन्दोलन पर (Click to read again…), आपकी प्रतिक्रियाएं पढ़कर मन इसलिए भी खुश हुआ की यह थोडा अलग तरह का लेख था, अक्सर हम किसी भी मुद्दे पर सीधे फायदे की ओर नजरें गड़ाएं रहते है जबकि उसके साथ तमाम और भी बातें होती है, जो कभी-कभी तो मूल बातों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण प्रभाव छोडती है | खैर, अन्य लेखकों की तरह मेरा उत्साह भी बढ़ा और ढूंढने लगा कोई अन्य मुद्दा, पर अभी लेखन का शुरूआती दौर होने से कोई मुद्दा जंचा ही नहीं | लेकिन पिछले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समाचार टी.वी. चैनलों पर पुरे दिन छाया रहा और हो भी क्यों नहीं, यह एक ऐसे विवादित राजनीतिज्ञ के बारे में था जिसे आम जनता और देश के बुद्धिजीवी तो राष्ट्रीय स्तर पर देखने की सोचते है पर उसे राजनीतिक रूप से अछूत करने का पिछले दस वर्षों से लगातार प्रचार चल रहा है |
भारत के सफल ब्यक्तियों की हम बात करें तो निःसंदेह उद्योगपतियों का नाम सबसे ऊपर आएगा| रतन टाटा, नारायणमूर्ति और अन्य पूरा उद्योग जगत एक स्वर में नरेन्द्र मोदी की न सिर्फ प्रशंशा करता है वरन उन्हें भारत के सर्वोच्च राजनैतिक पद पर आसीन देखना चाहता है| रतन टाटा जैसा उद्योगपति खुलेआम उनको ‘प्रधानमंत्री’ पद के काबिल बता चूका है| दूसरी तरफ प्रगतिशील मुस्लिम-वर्ग की बात करे तो वह भी गुजरात के सांप्रदायिक-सदभाव की खुलेआम तारीफ करता रहा है, देवबंद के प्रो. वस्तानावी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं, हालाँकि बाद में उनको उपकुलपति के पद से हाथ धोना पड़ा इसी सच्चाई को स्वीकारने के लिए| सामाजिक चेहरों की बात करें तो अभी-अभी एक बड़ा चेहरा बनकर उभरे अन्ना हजारे जी को भी तारीफ के बाद सहयोगियों के दबाव में पीछे हटना पड़ा था| दो प्रश्न उठते हैं यहाँ पर, पहला क्या उपरोक्त सारे प्रतिनिधि गुजरात-दंगो को भूल चुके हैं या यह सभी संवेदनहीन है ? हम सब इसका जवाब जानते है, और वह यह है की न तो ये सारे व्यक्तित्व संवेदनहीन हैं और न ही गुजरात दंगो को भुला पाएं है, तो फिर ऐसी कौन सी मजबूरी है की इन्हे नरेन्द्र-मोदी की प्रशंशा करनी ही पद रही है, कोई मुर्ख तो है नहीं ये सारे, इसका उत्तर आगे खोजने की कोशिश करेंगे इस लेख में|
दूसरा प्रश्न यह है की नरेन्द्र मोदी के इतना विकास करने के बावजूद, अपनी छवि स्वक्ष, प्रशाशन और उद्यम-आकर्षण के बावजूद उन्हें ही क्यों राजनीतिक निशाने पर लिया जा रहा है बार-बार, लगातार, बहार से भी और घर के अन्दर से भी, क्या इसके गर्भ में सिर्फ गुजरात दंगा ही है या बात कुछ आगे है| यदि उपरोक्त दोनों प्रश्नों के उत्तर हम ढूढ़ ले तो यकीन मानिये, हमारा देश राजनीतिक रूप से स्थिर तो होगा ही साथ-ही-साथ आर्थिक, सैन्य और तमाम अन्य मोर्चो पर हम भरी बढ़त हासिल कर पाएंगे|
फिर गंभीर हो गयी पंक्तियाँ, क्या करू नया-नया लिखना शुरू किया है ना, खैर ऊपर के दोनों प्रश्न आपको याद होंगे, उनमे से पहला यह था की ऐसी कौन सी मजबूरी है जो नरेन्द्र मोदी की तरफ बुद्धिजीवी समाज का ध्यान खींच रही है| सबसे बड़ा कारन है- अति मजबूत राजनीतिक इक्षाशक्ति (यह ‘अति’ शब्द नरेन्द्र मोदी को अपनों के बिच भी नुक्सान पहुंचा रहा है परन्तु इंदिरा गाँधी के बाद शायद मोदी ऐसी इक्षाशक्ति वाले इकलौते राजनेता हैं जिसकी देश को सख्त जरूरत है), इससे देश निश्चित तौर पर राजनैतिक स्थायित्व की तरफ अग्रसर होगा; दूसरा महत्वपूर्ण कारन है विकाश की उद्यमशीलता जो लगातार रोजगार और युवाओं में विश्वास पैदा करती जा रही है; तीसरा शशक्त प्रशाशन भी एक अति महत्वपूर्ण कारन है जो साम्प्रदायिकता से आगे सोचने को प्रेरित करता है, अल्पसंख्यको में विश्वास जगाता है, न्याय की उम्मीद जगाता है| इसके अलावा नरेन्द्र मोदी का अपना व्यक्तित्व, सजगता, अनुभव और राजनीतिक समझ उन्हें अलग ही श्रेणी में खड़ा करती है| ये सारे गुण, विशेषकर उपरोक्त तीन मुख्य गुण बुद्धिजीवियों को सिर्फ नरेन्द्र मोदी में ही दिख रहें है. प्रधानमंत्री के किसी अन्य उम्मीदवार में इन तीनो में से एक के भी दर्शन दुर्लभ है, यही एकमात्र कारन है नरेन्द्र मोदी को समर्थन के पीछे| ये सारे बुद्धिजीवी जानते है की देश में पहले भी दंगे हुए, ८४ में सिक्खों पर हुआ जुल्म आज तक कांग्रेस को परेशान कर रहा है, पर इस सिक्ख दंगे का मूल नेहरु परिवार तो राजनैतिक अछूत नहीं है, फिर मोदी ही क्यों ?? देश के सभी उद्यमी और बुद्धिजीवी जानते है की राजनीतिक लचरता से देश का क्या नुकसान होता है, यह कोई पश्चिम बंगाल से पूछे| दंगे की बात एक जगह है, पर कहीं भी यह सत्यापित नहीं हुआ है की नरेन्द्र मोदी ही साजिशकर्ता थे, किसी न्यायालय ने उन्हें दोषी करार नहीं दिया है| मै इससे आगे की बात करता हूँ, माना की नरेन्द्र मोदी दोषी है राजनीतिक रूप से, एकबारगी यह मान भी लिया जाये तो पिछले १० सालो से क्या इस नेता ने प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष अपनी गलती मानकर प्रायश्चित नहीं किया है, यकीन मानिये आज गुजरात में किसी भी प्रदेश के मुकाबले सबसे ज्यादा भाईचारा है, सबसे ज्यादा विकास है| नरेन्द्र मोदी ने कोई जान-बूझकर अपराध नहीं किया है, प्रशाशन में उनसे जरूर गलती हुई है और भरी गलती हुई है, पर वह उसका प्रायश्चित कर चुके है गुजरात के जनजीवन का स्तर ऊपर उठाकर, और सजा भुगत चुके है पिछले १० बर्षों से राजनीतिक-अछूत बनकर| क्या अब भी आप रतन टाटा, वस्तान्वी, अन्ना हजारे को गलत कहेंगे | उन्होंने जाने-अनजाने देश के भलाई की ही बात कही है और उनका यह मानना भी सत्य है की राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी जैसा व्यक्तित्व ही कुछ कर सकता है, भारत को ऐसे ही राजनेता की जरूरत है|
दूसरा प्रश्न इस व्याख्या से भी महत्वपूर्ण है की नरेन्द्र मोदी के लाख कोशिश करने के बावजूद क्यों राजनैतिक-वर्ग उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं है| इसका उत्तर कुछ सकारात्मक है तो कुछ नकारात्मक, सकारात्मक पहलू कहता है की नरेन्द्र मोदी को गुजरात दंगो की कालिख धोने के लिए अभी और प्रयास की जरूरत समझता है, वही कुछ वर्ग का यह भी मानना है की नरेन्द्र मोदी की तानाशाह छवि कही घातक न सिद्ध हो, कुछ उनके अकडू स्वाभाव को गलत मानते हैं, पर ये गलतियाँ अथवा सुधर संभव हैं और इसको नरेन्द्र मोदी भी बखूबी समझते हैं इसीलिए उनके अब के भाषणों और पिछले वक्त्ब्यों में साफ़ अंतर देखा जा सकता है| नकारात्मक पहलू कांग्रेस की अल्पसंख्यक-तुष्टिकरण की नीति रही है, जो इन दिनों कुछ ज्यादा ही मुखर हो उठी है, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और बिहार में लालू प्रसाद के कमजोर होने से मुस्लिम वोट-बैंक असमंजस में है और कांग्रेस येन-केन-प्रकारेण इस वोट बैंक को अपना बनने की कोशिश कर रही है बिना किसी रिस्क के| वह चाहे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह का ‘लादेन-जी और ठग-रामदेव’ का बयान हो, बटाला हाउस की छीछालेदर हो, अफजल की फांसी को लटकाना हो, या अभी कांग्रेस के समर्थन से कश्मीर-विधानसभा से अफजल की माफ़ी का प्रस्ताव हो, हर जगह इसकी बू आराम से महसूस की जा सकती है, आखिर कांग्रेस ऐसा क्यों ना करे, अब धीरे-धीरे मतदाता समझदार हो रहे है, सिर्फ मुस्लिम समुदाय ही ऐसा है जो कम-शिक्षित अथवा अशिक्षित माना जाता है, इनके बल पर राहुल को २०१४ में प्रधानमंत्री का पद सौपना आसान जो होगा| नरेन्द्र मोदी के नकारात्मक विरोध की एक और बड़ी वजह आर.एस.एस. से सम्बद्ध होना भी है, कांग्रेस स्वीकार करे ना करे परन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक बड़ी राजनीतिक और सामाजिक ताकत बनकर उभरा है, और जनमानस पर इसका सामाजिक प्रभाव काफी पहले से माना जाता रहा है, पर इन दिनों इसने राजनीति में भी कांग्रेस की जड़े हिलाने तक चुनौती दी है| अब आप सभी निष्कर्ष खुद निकाले और राजनीतिक रूप से जागरूक हो और अपने आसपास का वातावरण जागरूक करें, क्योंकि हमारे देश का राजनीतिक परिपक्व होना निहायत जरूरी है, इसके बिना किसी आन्दोलन का ठोश परिणाम नहीं आ सकता, चाहे जे.पी. का आन्दोलन रहा हो, या वी.पी. सिंह का अथवा वर्तमान नायक अन्ना हजारे का आन्दोलन हो| देश को अब एक शशक्त राजनीतिज्ञ चाहिए जो संपूर्ण देश को आगे लेकर चल सके, देश उसके लिए मिटने को भी तैयार है और देश उसके लिए संघर्ष करने को भी तैयार है, चाहे वह राजनीतिज्ञ नरेन्द्र मोदी हो अथवा कोई और|
सच्चाई को नमन || राष्ट्र को नमन !! राष्ट्र की जनता को नमन !! अन्ना हजारे को नमन !! अन्ना हजारे की टीम को नमन !! दोस्तों, “कुरुक्षेत्र फिल्म में एक गरीब लड़की का बलात्कार मुख्यमंत्री के बेटे द्वारा करने पर ईमानदार पुलिस आफिसर केस दर्ज करके कड़ी कार्रवाई करता है, थोड़े राजनीतिक सपोर्ट से केस को बल मिलता है और मुख्यमंत्री समझौते की कोशिश करता दीखता है, माफ़ी मांगता दीखता है और अपने बेटे को भी माफ़ी मांगने को कहता है | खैर, यह तो सामान्य बात हो गयी, मै जिस मुख्य बात कि तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहता हु, वह इस प्रकार है- ” जब मुख्यमंत्री का बेटा माफ़ी मांगता है तो उसके शब्द कुछ ऐसे है – “मै माफ़ी मांगता हु इन्स्पेक्टर, अगली बार से बलात्कार नहीं करूँगा| छोड़ न यार, कुछ ले-देकर ख़तम कर मामला, नहीं तो परिणाम भुगतने को तैयार रह″ !!
जरा गौर करें इस माफ़ी पर, इस माफ़ी के शब्दों पर | ऐसा नहीं है कि अन्ना हजारे से पहले नेताओं ने कोशिश नहीं कि पर वह इन्ही शब्दों में फंसकर रह जाते हैं और जन-भावनाओ के साथ न्याय नहीं कर पाते| न्याय से मेरा अभिप्राय है जनता के सम्मान की सचमुच रक्षा, हकीकत में अभिव्यक्ति| नेताओं ने पहले घोटाले किये, जनता को नौकर समझा, इनको घुटनों पर आकर माफ़ी मांगनी ही चाहिए थी, और वह भी ऐसी माफ़ी की उसके अलावा कोई रास्ता न हो, और जनता ताकतवर की तरफ माफ़ करे न की कमजोर की तरह| इसलिए भी यह जीत यादगार बन जाती है, क्योंकि यह जीत हमें जीत की ही तरह मिली है, किसी ने दी नहीं है यह जीत हमने लड़कर अपने बल से हासिल की है| कमजोरो की तरह नहीं मिली हमें यह जीत, इसी बात पर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक पंक्ति याद आती है -
जनता ने इस बार अन्ना हजारे के माध्यम से इस पंक्ति को चरितार्थ करते हुए जन-प्रतिनिधियों को चेतावनी देकर माफ़ी दी है कि जाओ और अपना काम ठीक से करो नहीं तो ….
लोकपाल तो सिर्फ एक निमित्त-मात्र है, और असली जीत भी नहीं है, असली जीत तो यह है की जनता ने ताकतवर की तरह जन-प्रतिनिधियों को माफ़ किया है और राजनीति के अलावा बिजनेस, मनोरंजन, आर्थिक इत्यादी सभी क्षेत्रो के प्रतिनिधियों को चेतावनी दी है कि सुधर जाओ, अन्यथा अपने अंजाम के जिम्मेवार खुद ही होगे तुम| और लोकतंत्र में निश्चय ही सभी को इस चेतावनी-सन्देश को गंभीरता से लेना ही होगा | महिंद्रा एंड महिंद्रा के चेयरमैन आनंद महिंद्रा कि टिपण्णी इस बारे में उल्लेखनीय है-
”रामलीला मैदान में जो कुछ हो रहा है, वह बड़े बदलाव का प्रतीक है। लोग अब न केवल राजनेताओं, बल्कि उद्योगपतियों से भी जवाबदेही चाहते हैं।”
कुछ और भी है चर्चा के लिए, जो शायद राजनीति कि समझ को ब्याख्यायित करें, आम जनता के लिए ये बहुत ही जरूरी है, कृपया देखें इसे -
कुछ जन-प्रतिनिधि तो कोशिश ही नहीं करते मुद्दे को समझने को और अपने हित साधने के अलावा उनके पास कोई दूसरा मसौदा नहीं पाया जाता है, जैसे कपिल सिब्बल, अग्निवेश (मै स्वामी कहना नहीं चाहूँगा ऐसे व्यक्ति को) |
कुछ समझ तो जाते हैं पर उनके अपने स्वार्थ होते है जिसके कारण वो मुद्दे को भटकाने कि पुरजोर कोशिश करते है | लालू प्रसाद कहते है कि वो गावं से आयें है, सब समझते है, निश्चित ही किसी को शक नहीं है उनकी जन-समझ पर, परन्तु इसका क्या करें कि “बिहार में राजनैतिक जमीन उनको दिख नहीं रही है और कांग्रेस का अंध-भक्त होने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है” | अपने १५-वर्ष के शाशन के दौरान उन्होंने बिहार कि जनता को न सिर्फ भारत में अपितु विश्व में पहचान दिलाई| वह यदि मुर्ख होते या हवाई नेता होते तो शायद दिल को संतोष होता, लेकिन वो जे.पी. आन्दोलन से निकले हुए जन-नेता थे और जन शब्द को उन्होंने अपनी जेब (पाकेट) से ज्यादा कुछ नहीं समझा | ऐसे ब्यक्ति राजनैतिक कलंक होते है, और ऐसों को राजनैतिक-अपराधी घोषित करने का विधेयक आना चाहिए | इसी कड़ी में माननीय अमर सिंह ‘ब्रोकर’ , राजा दिग्विजय सिंह इत्यादी का नाम ससम्मान लिया जा सकता है|
तीसरी जमात राजनैतिक-मूर्खों की होती है, जो जनता की शक्ति में अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा होने का माध्यम देखते हैं| इस कड़ी में मै जिसका नाम लूँगा शायद आप-सब के गुस्से का शिकार भी होना पड़े, पर आज मन मान नहीं रहा है और कलम चलती ही जा रही है | जी हाँ ! बाबा रामदेव जी इस कड़ी में मजबूती से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जनता उनके पास अपने दुःख-दर्द दूर करने आई थी, उसे उम्मीद थी की यह बंदा कुछ करेगा, योग के माध्यम से आस भी जगाई थी रामदेव ने| परन्तु, हाय रे राजनीति! तू फिर जीती और रामदेव होटलों में समझौते की बाट जोहते रहे| मै प्रत्येक क्षण टी.वी. पर लाइव उनकी भाव-भंगिमा देखता रहा ४ जून को, लगातार वो इस कोशिश में लगे रहे की कोई ऐसा समझौता हो जिससे की उनका कद बढ़ जाये, जनता का भला हो या नहीं, ये प्रश्न रामदेव के आन्दोलन में पीछे छूट गया था| अगला नाम आपको आश्चर्य में डालेगा, जी हाँ राहुल गाँधी जी! आज वो ज़माना पीछे छूट रहा है की सिर्फ विरासत के नाम पर भारतीय जनता आपको आँखों पर बिठा ले और हमेशा अपना भगवान बनाये रक्खे| राहुल गाँधी इस भ्रम में हैं की कुछ किसानो के घर उन्होंने भोजन कर लिया और वह ताउम्र उनका भक्त हो गया| बारीकी से देखें तो आप पाएंगे की शायद वह किसान भक्त हो भी जाए, पर उसी किसान/ गरीब का लड़का पढ़ा लिखा है और वह राहुल के भावनात्मक जाल में फंसने वाला नहीं है| राहुल जी आगे बढें हमारी शुभकामना है, पर जनता की क़द्र करना सीखना ही होगा उन्हें और राजनीति के ऊपर देश-सेवा को तरजीह देना ही होगा, ये आदेश है जनता का, रिक्वेस्ट नहीं है| मैंने सुना है की प्रियंका चाणक्य की भूमिका में है राहुल गाँधी के, पर प्रियंका इंदिरा गाँधी नहीं हैं की जन-समूह को अच्छे से समझ सकें, राहुल को अपनी समझ विकसित करनी ही होगी, दिग्विजय सिंह जैसों का मार्गदर्शन क्षणिक लाभ भले ही दिलाये पर दीर्घकालीन नुकसानदायक ही सिद्ध होगा |
जनलोकपाल के बारे में चाहे जो भी निर्णय संसद करे, पर इससे बड़ी जीत जनता को हासिल हो चुकी है| यह बात मै इसलिए कह रहा हूँ कि नेता कलाबाजी को अपना हथियार मानते है और अधिकांशतः नेता सुपिरियारिटी-काम्प्लेक्स से ग्रसित होते हैं और अपने करियर के अंतिम समय में अपनी सारी इज्ज़त/ प्रतिष्ठा खो देते है इसी कारण | अमर सिंह, लालू प्रसाद, ए.राजा, नटवर सिंह, दिग्विजय सिंह और तमाम नाम, शायद आपके आस-पास भी तमाम लोग हो ऐसे या शायद हम भी | सांसद बहुत ईमानदारी से बिल पास शायद ही करें, लेकिन उस निर्णय के पहले जो करारी चोट उनकी इगो पर होनी चाहिए, वो चोट हुई है और इससे बेहतर चोट नहीं हो सकती |
इसलिए देश अभी जश्न मनाये, क्योंकि जश्न मनाने का इससे बेहतर मौका एक देशवासी का शायद ही मिला हो, कमसे कम हमारी इस पीढ़ी को तो कतई नहीं |
दोस्तों, अहंकार की हंसी यदि न ही हंसी जाये तो बेहतर है, क्योंकि दुर्योधन पर द्रोपदी कि हंसी अभी भी मेरे कानो में गूंज रही है| लाख बुराइयों के बावजूद हमारा लोकतंत्र बहूत मजबूत स्थिति में है | मेरा ये लेख इस आन्दोलन की मूल भावना को उभारना है, न कि किसी को चोट पहुँचाना, जनता भी इस बात को समझे, इसी में हम सब कि गरिमा है, क्योंकि संसद और सांसद भी हम में से ही है, लोगो को राजनीति से नफ़रत नहीं होनी चाहिए,वरन राजनीति को सुद्ध करने के प्रयास होने चाहिए, अच्छे जन-प्रतिनिधिओं का चुनाव और अपने संवैधानिक अधिकारों को समझाना इसी प्रक्रिया की महत्वपूर्ण कड़ी है, क्योंकि इसके आभाव में तानाशाही कि संभावनाओं को इंकार नहीं किया जा सकता| लेकिन इन बातों को लेकर जन-प्रतिनिधि जनता को ब्लैकमेल नहीं कर सकते और लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेवारी सर्वाधिक जन-प्रतिनिधियों की ही है, क्योंकि वह जन-प्रतिनिधि है ही इसलिए, आम जनता से बुद्धि में आगे है, इसलिए उनकी भावनाओ का ख्याल रखते हुए लोकतंत्र को यही बचाएँ | इस सन्दर्भ में मै यही कहना चाहूँगा की लोकतंत्र को सिर्फ तानाशाही का डर दिखाकर जनता को मुर्ख नहीं बनाया जा सकता| योगीराज कृष्ण का उपदेश मुझे याद आ रहा है -
एक कडवी ब्याख्या यह भी है कि यदि ईश्वर भी आते हैं तो वह लोकतंत्र नहीं होगा, छुपे शब्दों में वह तानाशाही ही होगी| अब इन नेताओं को बहुत ही गंभीरता से सोचना होगा लोकतंत्र के बारे में क्योंकि जब-जब सच्चाई कि हार होगी भगवान तो आयेंगे ही और यदि वह आते है तो लोकतंत्र कहा होगा ? वह तो राजतन्त्र होगा| जनता का क्या है, उसके लिए वह भी ठीक, यह भी थोड़े-बहुत अंतर के साथ ठीक| तानाशाही में सर्वाधिक तकलीफ प्रतिनिधियों को ही होती है, इस बात का विशेष ख्याल रखें| आम जनता को मैंने यह कहते हुए सुना है की इससे अच्छा तो इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी ही थी, कुछ सनकी लोग तो यहाँ तक कहते है की ‘इन भारतीय लूटेरो से अच्छा तो अंग्रेज ही थे| लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए धर्म कि सुरक्षा करनी ही होगी, सच्चाई कि सुरक्षा करनी ही होगी, न्याय का शासन स्थापित करना ही होगा, तब ही लोकतंत्र कि रक्षा हो सकती है और वह लोकतंत्र ऐसा होगा कि शायद रामराज्य कि जगह हम उसका उदाहरण दें, और उसकी सर्वाधिक जिम्मेवारी सत्ता-प्रतिष्ठान की है|
-जय हिंद
Author- Mithilesh Kumar Singh (9990089080)
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