Monday, 31 August 2015

अवचेतन मन

by on 09:42
Price of onion, pyaj, hindi articleक्या आम क्या ख़ास, इस प्याज ने कइयों को उलझा रखा है तो कइयों की नाक में दम कर रखा है. प्याज से जुड़ा मेरा अनुभव भी है, जिसे लिखते वक्त मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इसे साहित्य की कौन सी विधा में शामिल किया जा सकता है. खैर, यह मेरी व्यक्तिगत समस्या है लेकिन उनका क्या करूँ, जिनको मैं प्याज देने का वादा कर चुका हूँ, वह भी पुराने दाम पर...
शहर के एक क्षेत्र में 'देशी प्याज' बेचने बिल्कुल सुबह-सुबह दो बन्दे आ धमकते थे. देशी प्याज के फायदे, उसके गुणों का बखान करता हुआ उनके ट्रैक्टर पर तेज आवाज में लॉउडस्पीकर बजता था और चूँकि वह बाजार भाव से 10 रूपये तक कम लगाता था तो ट्रैक्टर पर भीड़ लगी रहती थी. श्रीमतीजी की कई दिन की लगातार टोकाटाकी के बाद, अपनी नींद में खलल डालकर मैं भी पांच किलो एक साथ ले आता था, हालाँकि वह रोज या एक दिन छोड़कर आ ही जाता था, मगर रोज अपनी सुबह की प्यारी नींद कौन ख़राब करे? इधर कब प्याज की कीमत आसमान छूने लगी, मगर मेरे अवचेतन मन में वह देशी प्याज वाला ही बना हुआ था, जिसका अहसास मुझे तब हुआ जब एक एनजीओ के मित्र ने मुलाकात में मुझसे कहा, यार! प्याज का रेट आसमान छू रहा है. मेरे मुंह से तत्काल मेरे मोहल्ले के देसी प्याज वाली बात निकल गयी कि मेरे यहाँ तो 100 रूपये की पांच किलो है. बस मित्र महोदय ने तत्काल 100 का नोट हाथ में पकड़ाते हुए बनावटी कातर स्वर में बोले, यार 5 किलो मेरे लिए लेते आना और मैंने अवचेतन मन के प्रभाव में वह नोट पकड़ भी लिया. बस फिर क्या था, तभी से न उनके दफ्तर जा रहा हूँ और दुआ कर रहा हूँ कि कहीं किसी जगह उनसे सामना न हो जाय...
अवचेतन मन ने धोखा जो दे दिया था.
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Sunday, 30 August 2015

25 साल ...

by on 10:42
कालरा साहब का ग्राफ़िक डिज़ाइन और बैनर प्रिंटिंग का बिजनेस बढ़िया चल रहा था और इसी की बदौलत वह खटारा स्कूटर से होण्डा सिटी तक आ गए थे. इसके लिए न केवल उनकी मेहनत, बल्कि उनका स्टाफ भी सालों तक लगा रहा. राम बहादुर तो उनके पास 25 साल से लगा हुआ था और ऑफिस में झाड़ू लगाने से लेकर साइट पर जाने और ग्राहकों से पैसे वसूलने तक सभी काम बड़ी लगन से किया करता, हालाँकि वह चपरासी नहीं था बल्कि एक तरह से कालरा साहब का मुंहलगा था. राम बहादुर के अलावा भी सीटू, दिलीप, उमाकांत इत्यादि भी दसियों साल से कालरा साहब के पास जमे हुए थे, तब कंपनी की पहचान बनी थी.
मगर, पिछले दिनों से धीरे धीरे कालरा साहब के बदलते व्यवहार की बातें ऑफिस में होने लगीं तो राम बहादुर ने सबको धैर्य से समझाया था, मगर व्यवहार कहीं समझाने से बदलता है भला!
एक दिन दोपहर में कुर्सी पर बैठे-बैठे राम बहादुर को झपकी लग गयी कि कालरा साहब ने लगभग चिल्लाते हुए कहा कि पंखों पर धूल जमी है, उसे साफ़ कर दे. पता नहीं जानबूझकर या नींद के कारण राम बहादुर उठा नहीं तो कालरा साहब ने अपने केबिन से आकर उसे झिंझोड़ते हुए अपनी बात दुहराई तो राम बहादुर ने भी अनमने भाव से कहा कि पंखे साफ़ करना उसका काम नहीं है, चपरासी कर देगा.
उसका इतना कहना था कि कालरा साहब का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुँच गया और उसे लगभग धक्का देते हुए बोले, जुबान लड़ाता है , कल से ऑफिस आने की जरूरत नहीं है तुझे!
अगले दिन राम बहादुर ऑफिस नहीं आया तो उमाकांत के फोन करने पर वह फ़फ़क उठा. बोला- पूरी जवानी तो कालरा की कंपनी को दे दी. वह तो 'अम्बानी' बन गया मगर मैं अब बुढ़ापे में कहाँ जाऊं?
तीसरे दिन सुबह-सुबह ही उमा समेत, सीटू, दिलीप और चपरासी कालरा से हिसाब लेने उसके केबिन में पहुँच गए तो कालरा के पैरों तले जमीन ही खिसक गयी. फिर भी बात सँभालते हुए बोला कि तुम लोगों के बारे में कंपनी ने कितना सोचा है और कम से कम मुझे अल्टीमेटम तो देते तुम लो... ..
जब 25 साल देने वाले के बारे में नहीं सोचा कंपनी ने तो हमारे बारे में क्या ख़ाक सोचेगी? सीटू ने भी अपनी भड़ास निकाली..
तुम लोग करोगे क्या? कालरा ने आखिरी दांव फेंका.
हमने ऑफिस ले लिया है काम्प्लेक्स में... और उसका उद्घाटन राम बहादुर के हाथों कराएँगे ... ... कल!
कालरा ने अपने टेबल पर पड़े पानी की गिलास को झट से मुंह लगा लिया और पानी का धीमा घूँट भरते-भरते ही अपनी कंपनी के लिए अनुभवी डिज़ाइनर, राम बहादुर जैसा आल राउंडर और अपने ग्राहक टूटने का आंकलन कर रहा था...
उसका अनुभव उसे बता रहा था कि '25 साल' को धक्का मारना उसे महंगा नहीं बहुत महंगा पड़ने वाला था!
 
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Wednesday, 26 August 2015

जातिवाद ही खतरा है... Hindi poem by Mithilesh Anbhigya, based on casteism in India

by on 02:46
न भ्रष्टाचार खतरा है Hindi poem by Mithilesh Anbhigya, based on casteism in India, no reservation based on caste
न अत्याचार खतरा है
ऊंच- नीच, भेदभाव ने
 

न कोई हिन्दू खतरा है
न मुसलमान खतरा है
हज़ारों साल गुलामी के
 

Hindi poem by Mithilesh Anbhigya, based on casteism in India, in all religionन चीन ही खतरा है
न पाकिस्तान खतरा है
फ़िज़ा में जाति ज़हर है जो
 

न नक्सलवाद खतरा है
न आतंकवाद खतरा है
इस पावन मातृभूमि पर
 

 
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Thursday, 6 August 2015

प्रॉपर्टी / फ्लैट खरीदते समय सावधानियां - Precaution should be taken at the time of purchasing flat, plot

by on 11:54
घर बनाने का सपना लोगों में उस समय से ही घर करने लगता है जब वह शिक्षा ग्रहण करते हैं. उसी समय से ही घर की चाहत रखने वाले लोग एक-एक पैसा जुटाना शुरू कर देते हैं ताकि भविष्य में उनका सपना साकार हो सके. इस समय प्रॉपर्टी सबसे अधिक रिटर्न देने वाला निवेश बन चुका है. अगर आप भी चाहते हैं कि आपके पास भी अपनी प्रॉपर्टी हो तो इसके लिए जरूरी है कि आप एक जमीन का टुकड़ा याPrecaution should be taken at the time of purchasing flat, plot फ्लैट खरीदें. यहाँ समझना आवश्यक है कि प्रॉपर्टी कोई भी हो, उसकी कीमत इतनी तो होती ही है कि एक आम आदमी उस कीमत को जाेड़ने के लिए कई साल लगाता है. अगर बैंक लोन से भी प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं तो आपको बैंक लोन की कीमत कई साल चुकानी पड़ेगी. जब इतना लम्बा समय पैसों की अरेंजमेंट में लगाना ही है तो खरीददारी के समय थोड़ी पूछताछ क्यों न कर ली जाय... अगर किसी हाउसिंग प्रोजेक्ट में निवेश कर रहे हैं ताे यह जानना जरूरी है कि उस प्रोजेक्ट को डिप्टी डायरेक्टर लोकल बाडीज डिपार्टमेंट की ओर से पास किया गया है या नहीं? लोन लेते वक्त भी बैंक से लोन की पूरी जानकारी ले लें. इससे आप ठगी से बच सकते हैं. बिल्डर द्वारा किया जाने वाला एग्रीमेंट ध्यान से पढ़ना जरूरी है. ये ध्यान रखें कि जो एग्रीमेंट के समय आपको सुविधाएं बताई जा रही हैं वो बिल्डर अपको तय समय में दे रहा है या नहीं! अगर आप किसी बड़े प्रोजेक्ट की बजाए ऐसी रिहायशी कॉलोनी में घर खरीद रहे हैं कि जहां इंडिविजुअल प्लॉट्स या मकान हैं तो इनमें किसी धोखे से बचने के लिए राजस्व विभाग से पहले ही पड़ताल कर लेना ठीक रहता है. पटवारी के पास प्रत्येक प्रॉपर्टी के बारे में रिकार्ड मौजूद रहता है. यह भी पता चल जाता है कि किस कॉलोनी में किस नंबर का प्लाट किसके नाम है, यह प्लाट कब से किसके नाम हैं. इसके अलावा भारमुक्त सर्टिफिकेट भी खरीददार से लेना भूलना नहीं चाहिए. इन जनरल पॉइंट्स के अतिरिक्त नीचे कुछ तकनीकी टिप्स दिए जा रहे हैं जो आपको धोखाधड़ी से बचाने में मदद कर सकते हैं:
नकली डॉक्यूमेंट (Fake documents): बहुधा प्रॉपर्टी खरीदने वाले व्यक्तियों को बाद में पता चलता है कि उन्हें नकली डॉक्यूमेंट दे दिया गया है और वह अपनी गाढ़ी कमाई खो देते हैं. इससे बचने के लिए सब रजिस्ट्रार ऑफिस से प्रॉपर्टी की वेरिफिकेशन फायदेमंद रहती है.
Precaution should be taken at the time of purchasing flat, plot, hindi articleप्रॉपर्टी पर लोन/ कर्ज (double mortgage /loan): प्रॉपर्टी खरीदने के लिए बहुधा लोग प्रॉपर्टी डीलर/ एजेंट के पास जाते हैं और वह उन्हें अच्छी लोकेशन पर जगह दिखाता है. फिर पैसे का लेन-देन होता है और प्रॉपर्टी खरीददार के नाम पर रजिस्टर भी हो जाती है. कुछ दिनों बाद पता चलता है कि प्रॉपर्टी पर बैंक-लोन लिया गया है. कई बार एक से ज्यादे बैंको का लोन भी प्रॉपर्टी पर होता है, जबकि प्रॉपर्टी बेचने के बाद फ्रॉड व्यक्ति फरार हो जाता है और खरीददार बेचारा कोर्ट केस के चक्कर में फंस जाता है. इस तरह के संदेहात्मक प्लाट और फ्लैट खरीदते समय बेहद सावधानी आवश्यक है.
मल्टिपल 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (Multiple General Power of Attorney): प्रॉपर्टी खरीदने में आजकल पावर ऑफ़ अटॉर्नी का चलन है. यह एक के बाद दूसरी और फिर आगे तक एक लम्बी चेन बनती जाती है. कई बार एक ही प्रॉपर्टी की अलग अलग लोगों को पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी कर दी जाती है. कई बार दो से भी ज्यादा दावेदार हो जाते हैं सम्बंधित प्रॉपर्टी का फ्रॉड करने वाला व्यक्ति देश छोड़कर फरार हो जाता है. इससे बचने के लिए सब रजिस्ट्रार ऑफिस से सम्बंधित व्यक्ति की ओनरशिप वेरीफाई करनी आवश्यक है.
अनधिकृत लेआउट (Unauthorized Layouts): कई बार ऐसी केस भी आती हैं, जब प्रॉपर्टी डीलर गवर्नमेंट की प्रॉपर्टी को ही अपना बताकर बेच देते हैं. नकली कागजात बनाना फ्रॉड लोगों के लिए आसान है. इस विषय पर एक फिल्म 'खोसला का घोसला' भी बन चुकी है. इससे बचने के लिए जमीन के बारे में लोकल इन्क्वायरी आवश्यक हो जाती है जैसे पड़ोसियों, गांववालों से पूछताछ इत्यादि.
कब्ज़ा (Encroachments): कई बार प्रॉपर्टी डीलर कब्ज़ा किये हुए प्लाट को बेच देते हैं और बाद में जब खरीददार उस प्लाट पर पहुँचता है, तब उसे पता चलता है कि उसने किसी और का कब्ज़ा किया हुआ प्लाट खरीद लिया है और नतीजा यह होता है कि वह हाथ मलता रह जाता है.

वेरिफिकेशन के लिए इन डाक्यूमेंट्स पर नजर डालिये (Important documents to verify for property purchase):

  1. अपने क्षेत्र की म्युनिसिपालिटी या सब रजिस्ट्रार ऑफिस से ओनरशिप जरूर वेरीफाई कीजिये और जरूरत पड़ने पर लोकल पूछताछPrecaution should be taken at the time of purchasing flat, plot, hindi article by mithilesh और कानूनी सलाह जरूर लीजिये.
  2. सभी डाक्यूमेंट्स पर हस्ताक्षर जरूर चेक करें और फिंगर प्रिंट्स के साथ वेरीफाई करें.
  3. पावर ऑफ़ अटॉर्नी लेते समय ध्यान दें कि जो व्यक्ति आपको दे रहा है, वास्तव में उसे इसका अधिकार है कि नहीं. जरूरत पड़ने पर एक दो स्टेप पीछे जाएँ और सीरीज चेक करें.
  4. लैंड यूज चेक करना जरूरी है कि वह असाइन लैंड है, भूदान लैंड है, एग्रीकल्चर लैंड है या इनाम लैंड है.
  5. ज़मीन पर किसी तरह का बकाया तो नहीं है, मसलन ULC , SRO, बिजली, पानी, सीवर बिल इत्यादि.
  6. विवादित जमीन के लिए, Bailiff (कन्सर्न्ड कोर्ट) अथवा माननीय हाई कोर्ट द्वारा अपॉइंट किये गए 'Arbitrator' से कंसर्न करें.

जमीन के क्लियर टाइटल को MRO ऑफिस से चेक करें और निम्नलिखित कॉपी जरूर कलेक्ट करें:

  1. पहनी कॉपी 1956 से
  2. प्रोसिडिंग ऑफ़ पट्टा पासबुक
  3. स्टाम्प ड्यूटी पूरा पेड करें
  4. प्रॉपर्टी की फिजिकल डिलिवरी टाइटल deed के साथ प्राप्त करें.

इन तमाम तकनीकी बातों के अतिरिक्त, आप को निम्नलिखित पॉइंट्स पर भी ध्यान देना चाहिए:

  • आप जिस इलाके में घर लेने की सोच रहे हैं उस इलाके की कीमतों को सबसे पहले समझें. साथ ही यह भी ध्यान रखें कि आप किस तरह के प्रोजेक्ट में घर ले रहे हैं. उदाहरण के लिए एक ही इलाके में ग्रुप हाउसिंग और बिल्डर फ्लैट की कीमतें अलग-अलग होती हैं. अगर ग्रुप हाउसिंग में घर ले रहे हैं, तो उस प्रोजेक्ट की सभी यूनिटों के रेट्स ले लें. फिर उनकी तुलना करें.
  • प्रॉपर्टी की खरीदारी में बैंक लोन की एक अहम् भूमिका होती है. कर्ज लेने से पहले बैंकों की ब्याज दरों की तुलना अवश्य कर लें . जो बैंक सस्ता लोन दे रहा हो, उसी से लोन लेने की कोशिश करें. कर्ज के लिए बैंक से संपर्क करते समय एक पत्र तैयार करें जिसमें आप अपनी जरूरत की राशि और उसके लिए हर महीने देने वाले किश्त का जिक्र जरूर करें. महीने की आमदनी तथा क़र्ज़ की अवधि का भी ब्योरा स्पष्ट रूप से रखें. जिस प्रोजेक्ट को केवल एक बैंक लोन कर रहा हो वहां बिल्डर के दबाव में घर खरीदनें से बचना चाहिए
  • घर खरीदने से पहले उसकी लोकेशन तय करने का पैरामीटर हमेशा अपनी रोजमर्रे की जरूरत को बनाएं. उस इलाके का इन्फ्रास्ट्रक्चर, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, मेट्रो, स्कूल, हॉस्पिटल, बाजार और अपने ऑफिस की कनेक्टिविटी के बारे में छानबीन कर लें . आधुनिक दौर में मॉल और मनोरंजन के दूसरे स्थल भी काफी मायने रखने लगे हैं. क्यूंकि प्रॉपर्टी की कीमतें अब इनके आधार पर भी तय होने लगी है.
  • इस तरीके से आप ज़मीन या फ्लैट में अपने निवेश को काफी हद तक सुरक्षित बना सकते हैं. उपरोक्त वर्णित टिप्स के अलावा, आप की सक्रियता, बड़े- बुजुर्गों से सलाह सोने पर सुहागा होती है. सक्रीय रहने से यह फायदा होता है कि यदि ज़मीन से सम्बंधित कोई छुपा तथ्य हो तो वह सामने आ जाता है.
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Sunday, 26 July 2015

कैसे लें अपनी वर्डप्रेस वेबसाइट का बैकअप, हिंदी में जानकारी - How to take backup of your wordpress website, know in hindi

by on 08:59
वेबसाइट में सबसे महत्वपूर्ण काम इसका बैकअप(File backup) लेते रहना है. इंटरनेट की दुनिया में विभिन्न कारणों से ऐसा करना आवश्यक है, क्योंकि वायरस(Virus), सर्वर का बदलाव(Server shifting), फाइल करप्ट(File corruption) होना जैसे वाकये होते ही रहते हैं और यदि इस स्थिति में आपके पास बैकअप नहीं होता है तो आपका काम कई गुना न सिर्फ बढ़ जाता है, बल्कि कई बार यह शर्मिंदगी और भारी डेटा-लॉस(Data loss) का कारण भी बन जाता है. जैसा कि हम सब जानते हैं कि वर्डप्रेस एक पॉपुलर सीएमएस(cms) के रूप में सर्वाधिक प्रचलित है. इस लेख में हम इसी प्लेटफॉर्म में बैक अप लेने के विभिन्न उपायों पर चर्चा करेंगे:

मैन्युअल बैकअप(Manual Backup):

  1. यदि आप सीपैनल(cPanel) इस्तेमाल करते हैं तो आप डेटाबेस बैकअप के लिए PhpMyAdmin ओेपन कीजिये और सीधे “Export” टैब को क्लिक कीजिये, फिर मनचाहा कम्प्रेसन फॉर्मेट क्लिक करें और गो दबाते ही फाइल आपके कंप्यूटर में सेव होने लगेगी.
  2. इसके अतिरिक्त, आप सीपैनल में सीधे जाकर, फाइल सेक्शन के अंतर्गत, बैकअप पर क्लिक करें. इस सेक्शन में न केवल डेटाबेस का, बल्कि इसके साथ-साथ पूरी वेबसाइट(Website backup) का या होम डाइरेक्ट्री का या ईमेल फारवर्डर, ईमेल फिल्टर का भी बैकप लिया जा सकता है. इस सेक्शन में आपको यह सब रिस्टोर(Restore) करने का ऑप्शन भी दिखेगा.
  3. इसके आलावा, सीपैनल के फाइल सेक्शन में ही, बैकअप विज़ार्ड नाम से दूसरा ऑप्शन मिलेगा, जहाँ आप सिंगल क्लिक से ही वेबसाइट का पूरा या पार्शियल बैकअप(Partial backup) ले सकते हैं.
  4. फाइल सेक्शन में ही आप 'फाइल मैनेजर'(File manager) को क्लिक करेंगे तो खुलने वाली विंडो में सर्वर पर मौजूद सभी फाइल्स, फोल्डर की लिस्ट आपको दिखने लगेगी. आप यहाँ पर अपनी सुविधानुसार राइट क्लिक करके आसानी से फ़ोल्डर्स को मनचाहे फॉर्मेट में कम्प्रेस कर सकते हैं और फिर उसे डाउनलोड करके अपने कम्प्यूटर की हार्डडिस्क में सेव कर सकते हैं.
इसके अतिरिक्त, यदि आप सीपैनल में कम्फर्टेबल नहीं हैं तो आप वर्डप्रेस एडमिन में निम्नलिखित प्लगइन की सहायता से आसानी से काम चला सकते हैं. इनका इस्तेमाल आसान है और यदि कोई तकलीफ होती है तो इस नाम से यूट्यूब पर वीडियो देखना न भूलिए:
  1. https://wordpress.org/plugins/backwpup/
  2. http://austinmatzko.com/wordpress-plugins/wp-db-backup/
  3. https://wordpress.org/plugins/dropbox-backup/
  4. https://wordpress.org/plugins/backup-wp/




सर्विसिंग (हिंदी लघु कथा)

by on 05:12
साहब! बाइक की सर्विसिंग आप लेट मत कराया कीजिये, इंजिन को नुकसान पहुँचता है, देखिये बहुत कम तेल बचा है और इसका लुब्रिकेशन भी खत्म हो चुका है. हाँ! हाँ! अगली बार जल्दी करा लूंगा, कहकर राहुल ने अपने मुंहलगे मैकेनिक से पल्ला झाड़ लिया. वह अक्सर अपनी बाइक उसी मैकेनिक से ठीक कराया करता था. आदतन, अगली बार भी उसने सर्विसिंग में काफी लेट किया तो उसकी पुरानी बाइक का साइलेंसर धुंआ फेंकने लगा. उसने सोचा कि, अब सर्विस करा लेना चाहिए, लेकिन टालमटोल की आदत से मजबूर था, इसलिए आजकल पर टालता ही रहा. एक दिन वह सुबह-सुबह किसी से मिलने तेजी से जा रहा था कि उसकी गाडी चलते-चलते बंद हो गयी अचानक! उसने सोचा कि पेट्रोल खत्म हुआ होगा, इसलिए 'रिजर्व' में लगा कर किक मारने की फिर कोशिश की, लेकिन यह क्या! किक तो हिल भी नहीं रही थी.... उसने फिर ज़ोर लगाया, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही रहे! सुबह का समय था और आस पास किसी मैकेनिक की दुकान भी नहीं खुली थी. पूछते-पूछते आधे किलोमीटर दूर किसी मेकेनिक की दुकान तक बाइक को धक्के लगाता हुआ पहुंचा. दो घंटे के इन्तेजार के बाद मैकेनिक ने दुकान खोली तो राहुल ने चैन की सांस ली. हालाँकि, उसका चैन तब बेचैनी में बदल गया जब मैकेनिक ने बताया कि आपका इंजिन 'सीज़' हो गया है क्योंकि इसमें इंजिन-आयल खत्म हो चुका था. खर्चा कितना लगेगा, राहुल के मुंह से पहला शब्द निकला!
यही करीब, चार हजार से पैंतालीस सौ के आस पास पड़ जायेगा.
क्या? सहसा राहुल को विश्वास ही नहीं हुआ, तीन सौ के इंजिन ऑयल के बदले इतना ज्यादा खर्चा!
कुछ कम में जुगाड़ कर दो भाई, उसने रिक्वेस्ट की !
इसमें कोई जुगाड़ नहीं हो सकता, पूरा इंजिन खोलना पड़ेगा और पूरा दिन लग जायेगा साब!
राहुल को फिर भी विश्वास नहीं हुआ, उसने सोचा कि सुबह का समय पाकर यह मैकेनिक उसे ठग रहा है. तब तक दिन चढ़ चुका था और गर्मी की धूप अपनी चढ़ान पर थी. चूँकि, मोटे खर्चे की बात थी, इसलिए पूछते पूछते वह पास की मार्किट में अपनी बाइक को धक्के लगाता हुआ पहुंचा. एक मैकेनिक की दूकान पर उसने बाइक खड़ी कर दी. मैकेनिक ने पहले किक चेक किया, फिर तेल की टंकी उतारी, फिर इंजिन खोलना शुरू किया और उसने भी वही सारी बात कही, जिसका डर था. इंजिन जाम हो चुका था. पिस्टन, गरारियां, गराद और न जाने किन किन शब्दों से उसका परिचय एक के बाद एक से होता जा रहा था, साथ में मैकेनिक उसको यह भी याद दिलाता जा रहा था कि यदि उसने टाइम पर सर्विसिंग करा ली होती तो आज यह स्थिति न आती. घड़ी की सुइयां खिसकती जा रही थीं और ऑटोमोबाइल दूकान पर खड़ा राहुल सोच रहा था कि बाइक की 'सर्विसिंग' कराने में देरी ने उसे अच्छा सबक दिया आज! उसकी सोच का दायरा बाइक से हटकर, कार - सर्विसिंगbike, car, servicing, mechanic, lifestyle, service, views, vichar, mithilesh2020, laghukatha, short stories, hindi kahani और फिर 'जीवन की सर्विसिंग' पर घूमने लगीं. कार तक तो बात ठीक थी, किन्तु 'मानव जीवन की सर्विसिंग' पर वह कन्फ्यूज हो गया कि सच में ऐसी कोई सर्विसिंग होती है क्या? यदि हाँ! तो उसमें लापरवाही की सजा कितनी बड़ी होगी ... ??
इन विचारों से वह जब तक बाहर निकलता तब तक शाम के चार बज चुके थे और मैकेनिक उसे फिर समझा रहा था कि इंजिन खुलने के बाद बाइक को 500 किलोमीटर चलाते ही सर्विसिंग जरूर करा लीजियेगा, उसके बाद रेगुलर,यानि...
यानि 1500 किलोमीटर पर ही सर्विसिंग जरूरी है, मैकेनिक की बात राहुल ने पूरी कर दी और मुस्कुरा उठा!
घर आते समय उसके मन में कई शब्द और विचार गड्डमगड्ड हो रहे थे, लेकिन एक बात साफ़ थी कि बाइक की सर्विसिंग टाइम से जरूर करायेगा, नहीं तो इंजिन 'सीज़' हो जायेगा!
- मिथिलेश 'अनभिज्ञ'
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Friday, 3 July 2015

माननीयों की 'विशिष्टता' एवं सेलरी का अंकगणित

by on 10:04
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ दिनों से 'घरेलु गैस' के ऊपर सब्सिडी छोड़ने की ज़ोरदार अपील कर रहे हैं. देश के विकास के लिए चिंतित हमारे पीएम इस अपील को कई कई बार दोहरा चुके हैं. हालाँकि, देश की संसद के सदस्य और खुद भाजपा से जुड़े नेता भी इस अपील पर कितना ध्यान दे रहे हैं, यह देखने वाली बात है. सब्सिडी छोड़ने की बात आयी तो, प्रत्येक मुद्दे की तरह सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा होनी स्वाभाविक ही थी. बात होते - होते किसी ने संसद के कैंटीन में मिल रही जबरदस्त सरकारी सब्सिडी (80 फीसदी से भी ज्यादा) पर चर्चा छेड़ दी, यह मुद्दा भी गरम हो गया और लोग प्रधानमंत्री से संसद-कैंटीन को दी जा रही सब्सिडी रद्द करने की मांग करने लगे. इस से सम्बंधित समिति के एक सांसद ने तो कह दिया कि 'सांसदों' के पेट पर लात नहीं मारने दिया जायेगा, जबकि हमारे समझदार प्रधानमंत्री ने अब चुप रहना सीख ही लिया है, इसलिए उन्होंने दोबारा सब्सिडी के मुद्दे पर अपना मुंह नहीं खोला. खैर, यह तो एक बात थी, लेकिन दूसरी मुख्य बात यह है कि गोरखपुर से भाजपा-सांसद योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली एक समिति ने सांसदों के वेतन और पूर्व सांसदों की पेंशन में भारी बढ़ोतरी की सिफारिश कर दी. अब लोगों के जले पर नमक तो पड़ना ही था, क्योंकि लगभग हर तरह की सुख - सुविधा और पावर के साथ चलने वाले लोग भी सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ डालने को तत्पर रहेंगे तो देश में बाकी भूखों का क्या होगा? अभी हाल ही में आयी एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट में साफ़ कहा गया था कि भारत में 20 करोड़ से ज्यादे लोग आज भी भूखे सोने को मजबूर हैं. पंद्रह जून से सैनिक जंतर मंतर पर वेतन और पेंशन के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं लेकिन हमारे सांसद कितनी सहजता से अपनी सुख सुविधा और वेतनमान बढ़ाने का प्रस्ताव भेज देते हैं, यह अपने आप में आश्चर्य उत्त्पन्न करने वाला प्रश्न है. एक राष्ट्रीय अख़बार में ख़बर छपी कि संसदीय कमिटी ने सांसदों की तनख्वाह डबल करने का सुझाव दिया है. एक संसद सदस्य के ऊपर सामान्य रूप से कितना खर्च होता है, इसकी रूपरेखा कुछ यूं होती है, लोकसभा की वेबसाइट से एक सांसद की मार्च 2015 की सैलरी का हिसाब निकाला, तो  कुछ ऐसी तस्वीर बानी: मार्च 2015 में उन 'माननीय' को कुल 3 लाख 8 हज़ार 666 रुपये मिले थे, जिसमें बेसिक - 50,000, संसदीय क्षेत्र भत्ता - 45000, आफिस का खर्चा - 15000, सहायक की सैलरी - 30000, यात्रा और दैनिक भत्ता - 1,68,666. ऐसे में आप समझ सकते हैं कि दुसरे क्षेत्रों से तुलना करने पर इनका वेतनमान पहले ही कितना अधिक है. कमेटी ने सुझाव दिया है कि बेसिक को 50,000 से बढ़ाकर 1 लाख कर दिया जाए. पूर्व सांसद के पेंशन को 20,000 से बढ़ाकर 35,000 कर दिया जाए. सहायक को भी सांसद के साथ रेल में प्रथम श्रेणी एसी का फ्री टिकट मिले. पूर्व सांसद को भी एक साल में हवाई यात्रा के लिए 20-25 टिकट फ्री मिले. सवाल यह है कि सिर्फ सांसदों को ही सरकारी दामाद क्यों बनाया जाय? क्या वास्तव में लोकतान्त्रिक प्रणाली में वह किसी नागरिक से ज्यादा सुविधाओं के हकदार हैं? हालाँकि, इसके पीछे उनके ऊपर तमाम जिम्मेवारियों का लेखा - जोखा दिखाकर सेलरी की बात को जस्टिफाई करने की कोशिश की जा सकती है. लेकिन, यहाँ बताया जाना चाहिए कि देश में किस नागरिक या कर्मचारी के ऊपर जिम्मेवारियों का बोझ नहीं है. आखिर, दुसरे सार्वजानिक क्षेत्रों से अलग व्यवस्था माननीयों के लिए क्यों रहना चाहिए? इसके सन्दर्भ में यहाँ यह बात भी विचारणीय है कि एक बार सांसद या विधायक चुने जाने के बाद कई माननीय बंगला और दूसरी सरकारी सुविधाओं पर ताउम्र जमे रहते हैं, जिसके कई उदाहरण आपको आसानी से मिल जायेंगे. और सिर्फ माननीय ही क्यों, बल्कि उनके परिवार के साथ उनके चाहने वालों को भी वगैर नियम कानून के लाभ पहुँचाया जाता रहा है. समस्या यह है कि सरकारी कार्यों के अतिरिक्त, अनेक व्यक्तिगत कार्यों का बोझ भी ये माननीय सरकारी ख़ज़ाने पर डालना अपना संवैधानिक अधिकार क्यों समझते हैं. कई बार तो सिर्फ अपने महिमा - मंडन के लिए नेतागण कुख्यात हो जाते हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री ने हाल ही में अपने बजट में कई गुणा बढ़ोतरी की है, जिसे लेकर उनकी आलोचना हो रही है. इसी महिमा-मंडन के सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय का फैसला भी आया है, लेकिन उसकी मनमानी व्याख्या करके धज्जियां उड़ाने में कई मंत्री, मुख्यमंत्री कई कदम आगे हैं. इससे आगे बढ़कर कहा जाय तो अपने कई पिछले चुनावों का खर्च भी 'माननीय' 5 साल के दौरान ही वसूल लेना चाहते हैं. यह एक तथ्य है कि चुनाव सुधार के वगैर इस व्यवस्था में तमाम विकृतियां बनी ही रहेंगी, क्योंकि चुनावों में करोड़ों करोड़ रूपये एक माननीय के द्वारा खर्च किये जाते हैं और इसके मद में जीता हुआ कैंडिडेट अपनी बाकी उम्र और परिवार के लिए सुविधाओं की गारंटी दिमाग में बिठाकर चलता है. आखिर सरकारी अधिकारियों, आईएएस या सेना के ऑफिसर्स से ज्यादा वेतनमान और सुविधाएं किसी सांसद या विधायक को क्यों होनी चाहिए? और किसी नेता द्वारा चुनाव में जबरदस्त खर्च क्यों किया जाता है? जब तक इन प्रश्नों का हल नहीं ढूंढ लिया जाता है, तब तक इस तरह के प्रस्ताव आते ही रहेंगे और हमारे 'माननीय' करदाताओं के पैसे को कभी घोटालों के माध्यम से तो कभी बेतहाशा सब्सिडी के माध्यम से अपनी जेब में भरते ही रहेंगे. यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि किसी नेता का विदेशी टूर और दुसरे ऑफिसियल खर्चे पहले ही सरकार द्वारा वहां किये जाते हैं. अब कोई सांसद अपनी ससुराल पूरे लाव-लश्कर सहित जाय, या फिर कोई विधायक किसी शादी समारोह में जाए तो इन खर्चों को सरकारी कैसे माना जा सकता है? इन बातों की चर्चा होते समय एक अख़बार के संपादक महोदय ने मुझसे कहा कि सांसदों को बहुत लोगों से मिलना - जुलना होता है, इसलिए उनके वेतनमान में बढ़ोतरी का प्रस्ताव ठीक हो सकता है. उनकी बातों में सांसदों के प्रति 'विशिष्टता' को बोध देखकर मुझे गहरी पीड़ा हुई. लेकिन, यह एक सच्चाई और बिडम्बना है कि हमारे देश में 'नेता-वर्ग' को विशिष्ट भाव से देखा जाता है और 'माननीय' खुद भी स्वयं को विशिष्ट समझ कर राजनीति करते हैं, जबकि अमेरिका इत्यादि देशों में आपको यदि कोई सीनेटर अपनी गाड़ी साफ़ करता मिल जाए तो आश्चर्य नहीं होगा. समस्या इनको भी 'आम' बनाने की है, मगर 'आम' बनाये कौन? क्योंकि यह कार्य बिल्ली के गले में घंटी बांधने से भी ज्यादे कठिन लगता है, तभी तो आज तक संभव नहीं हो पाया है.


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Thursday, 2 July 2015

भारत में सोशल मीडिया, मतलब क्या ?

by on 06:45
आज के समय में सोशल मीडिया के इस्तेमाल न सिर्फ स्टेटस सिम्बल के लिए, बल्कि एक जरूरत के रूप में आकार ले चूका है. इस बात में कोई शक नहीं है कि इंटरनेट क्रांति के दौर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के रूप में दुनिया को एक बेहतरीन तोहफा मिला है. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सप्प, पिंटरेस्ट, टंब्लर, गूगल प्लस और ऐसे ही अनेक प्लेटफॉर्म पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोने की ताकत रखते हैं. यह बात कोई हवा हवाई नहीं है, बल्कि इन प्लेटफॉर्म्स ने विभिन्न अवसरों पर अपने महत्त्व को साबित भी किया है. चाहे देशी चुनाव हो अथवा विदेशी धरती पर कोई आंदोलन हो या फिर पर्सनल ब्रांडिंग ही क्यों न हो, आज लाइक्स, फालोवर्स, शेयर जैसे शब्द हर एक जुबान पर छाये हुए हैं. एक स्टडी के अनुसार 2014 में भारत के लोकसभा चुनाव में लगभग 150 सीटों पर सोशल मीडिया ने जीत में अपनी भूमिका निभाई थी, वहीं दिल्ली राज्य के बहुचर्चित चुनाव में अरविन्द केजरीवाल द्वारा नवगठित पार्टी ने अपना 80 फीसदी कैम्पेन सोशल मीडिया के माध्यम से ही किया, और परिणाम पूरी दुनिया ने देखा. इसके अतिरिक्त मिश्र देश में हुए आंदोलन में सोशल मीडिया की भूमिका हम सब जानते ही हैं और व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल नेताओं, खिलाडियों, अभिनेताओं द्वारा धड़ल्ले से किया जा रहा है. थोड़ा और आगे बढ़ा जाय, तो बड़े नेताओं के साथ छुटभैये नेता भी फेसबुक, ट्विटर प्रबंधन और मेलिंग के लिए आईटी- प्रोफेशनल्स से संपर्क साध रहे हैं, या फिर अपने किसी रिश्तेदार, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा हो, या जॉब कर रहा हो, उससे इस सम्बन्ध में सहायता ले रहे हैं. आप चाहे गाँव में ही क्यों न हों, आपको तमाम नवयुवक अपने फेसबुक और जुड़े मित्रों से सम्बंधित गतिविधियाँ शेयर करते नजर आएंगे. पर इन सकारात्मक दृश्यों के पीछे एक कड़वी परत भी दिखती है, जिसमें सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है. मुज़फ्फरनगर में पिछले दिनों हुए दंगों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल की खबरें बड़ी तेजी से फैली थीं, तो जम्मू कश्मीर में भी आये दिन इस तरह की खबरें देखने को मिलती ही रहती हैं. इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में नफरत भरे संदेशों को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाया जा रहा है, कई बार इरादतन और संगठित रूप में तो कई बार बहकावे में युवक - युवतियां ऐसे कदम उठा देते हैं, जो उनकी गिरफ़्तारी तक जा पहुँच जाता है. हालाँकि, इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, जिसमें तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गयी है, उससे इन माध्यमों का गलत इस्तेमाल करने वालों द्वारा फायदा उठाने की सम्भावना भी बढ़ सकती है. अभी हाल ही में कविता कृष्णन और बॉलीवुड के आदर्शवादी 'बाबूजी' कहे जाने वाले सीनियर अभिनेता आलोक नाथ के बीच ट्विटर पर गाली - गलौच किये जाने का शो हावी रहा, जिसको लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने ज़ोरदार, मगर नकारात्मक सक्रियता दिखाई. इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपना वह दर्द नहीं छुपा पाये, जिसे उन्होंने एक लम्बे समय तक झेला है. एक खबर के अनुसार पीएम ने सोशल मीडिया पर सक्रिय अपने 100 समर्थकों से बातचीत के दौरान कहा, 'सोशल मीडिया पर मुझे जिन भद्दे और गाली जैसे शब्दों का सामना करना पड़ा है, यदि उनके प्रिंट निकाले जाएं तो पूरा ताजमहल ढंक जाएगा.' इसके बावजूद पीएम मोदी ने आलोचनाओं को शालीनता से सुनते हुए अपने समर्थकों से परिपक्व बर्ताव करने की नसीहत दी, जिसे सराहा ही जाना चाहिए. वैसे, मजाक में कहा जा सकता है कि शायद सोशल मीडिया पर गाली - गलौच झेलने के बाद ही नरेंद्र मोदी इसके प्रति सीरियस हुए होंगे और तभी उनको इसकी मजबूती का अहसास भी हो गया होगा. वो कहते हैं न कि अपने ऊपर फेंके हुए पत्थरों से जो घर बना ले, असली विजेता वही है. नरेंद्र मोदी के मामले में यह बात चरितार्थ होती दिखी है. वैसे, यह एक बात है लेकिन प्रधानमंत्री की दूसरी बात पर गौर करना भी उतना ही आवश्यक है, जिसमें पीएम ने कहा है कि उनके समर्थक सकारात्मक सोच रखें, क्योंकि गलत भाषा का इस्तेमाल सोशल मीडिया जैसे रोमांचक माध्यम के लिए खतरा हो सकती है. यह बात दूरदर्शी होने के साथ साथ उतनी ही तथ्यात्मक भी है, क्योंकि गाली-गलौच होने से आम जनमानस की रुचि धीरे-धीरे कम होने लगती है और अंततः समाप्तप्राय हो जाती है. उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री की अपील का असर न सिर्फ उनके समर्थकों, बल्कि विरोधियों और ट्विटर इत्यादि को विवादित स्थल बनाने का प्रयास करने वाले सेलेब्स पर भी पड़ेगा. शायद इससे सोशल मीडिया का असली उद्देश्य समझने में सहायता मिलेगी और उसके सही प्रयोग की दिशा में हम एक कदम बढ़ा सकने में सफल होंगे. आखिर, सोशल मीडिया को विवादित बनाने में आम आदमी ही नहीं, बल्कि सेलेब्स भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. आपको गायक अभिजीत भट्टाचार्य का वह विवादित ट्वीट तो याद ही होगा, जिसमें उन्होंने गरीब आदमी को 'कुत्ता' कहते हुए ट्विटर पर लिखा कि 'कुत्ता सड़क पर सोयेगा तो मरेगा ही, सड़क गरीब के बाप की नहीं है.' वह बिचारे सलमान खान की चापलूसी या समर्थन कर रहे थे, लेकिन ट्विटर को खामख्वाह बदनाम कर गए. इसके अतिरिक्त आजकल देश से फरार, पूर्व क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी के ट्वीट्स ने देश की राजनीति में उथल-पुथल मचा रखी है. कहने का तात्पर्य यह है कि हम आज भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल विवाद फ़ैलाने में या अपनी कुंठित सोच को जाहिर करने में करते हैं, मगर हमें उन लोगों से प्रेरणा लेने में जाने क्यों संकोच हो जाता है, जो बेहतरीन नेटवर्किंग और ब्रांडिंग में इन प्लेटफॉर्म्स का बेहतरीन उपयोग करते नजर आते हैं. अपने देश में खुद प्रधानमंत्री इसके बेहतरीन उदाहरण हैं, जो अपने प्रत्येक मंतव्य को इंटरैक्टिव ढंग से लोगों के बीच ज़ोरदार ढंग से पहुँचाने की कोशिश करते हैं. दुसरे उदाहरणों के रूप में हम पर्सनल स्टाइल ब्लॉगर डैनियला बर्नस्टेन का नाम ले सकते हैं, जिन्हें एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए करीब 10 लाख रुपये तक मिलते हैं. उन्हें यह पैसा वे ब्रैंड्स देते हैं जो चाहते हैं कि उनके प्रॉडक्ट्स को वे 9,92,000 लोग फॉलो करें जो ऐप पर बर्नस्टेन को फॉलो करते हैं. समझा जा सकता है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल इस युवा लड़की ने किस प्रकार किया है. विदेशी उदाहरणों की ओर थोड़ा और बारीक दृष्टि से देखें तो एक - एक पेज की वेबसाइट बना बनाकर छोटे व्यापारी भी अपने प्रोडक्ट को वर्ल्डवाइड फैला देता हैं, जो संभव होता है सोशल मीडिया के माध्यम से. ब्लॉग, तस्वीर, पोस्ट, ट्वीट इत्यादि शब्दावलियाँ कितनी ताकतवर हो सकती हैं, हम इन उदाहरणों से समझ सकते हैं. व्हाट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर पर गाली-गलौच करने वाले हमारे देश के युवा क्या बेहतरीन ब्लॉगर बनकर सूचना के संसार में अपनी जगह नहीं बना सकते हैं? इन माध्यमों पर बौद्धिक विलास करने वाले बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिए कि वह खुद इस माध्यम पर मात्र पार्टीबाजी ही करते हैं अथवा युथ के लिए कुछ इंस्पिरेशन छोड़ने में सक्षम हो पाते हैं. समस्या सोच बदलने की है, जिससे सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स हमारे लिए वाकई बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं. जरूरत है इसकी उपयोगिता समझने की और इसको अपने जीवन में उपयोगी तरीके से ढालने की और इसके लिए नकारात्मकता हमें छोड़नी ही होगी, क्योंकि इसके सिवा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है.




Social Media use in India, hindi article on misuse of twitter, facebook by mithilesh2020

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Wednesday, 1 July 2015

आईटी 'यूथ' के लिए डिजिटल इण्डिया में क्या ?

by on 08:04
नौ-सूत्रीय अजेंडे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना डिजिटल-इंडिया को लांच कर दिया है. इस प्रोग्राम में मुख्य रूप से ब्रॉडबैंड हाइवेज, यूनिवर्सल एक्सेस तो फोन्स, पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम, ई-गवर्नेंस, ई-क्रांति, सभी के लिए सूचना, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, आईटी फॉर जॉब्स और अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम की चर्चा की गयी है. हालाँकि, तमाम शोर-शराबे के बावजूद इस 'डिजिटल इण्डिया' प्रोग्राम से आईटी यूथ कितना प्रभावित होगा, यह कहना मुश्किल है. एक बड़े प्रोग्राम में, तमाम सीनियर मंत्रियों और ब्यूरोक्रेट्स के साथ शीर्ष उद्योगपतियों की उपस्थिति में नरेंद्र मोदी ने इस प्रोग्राम को धूम - धड़ाके से लांच किया और यह उनके प्रबंधन का ही कमाल है कि देश के अनेक उद्योगपतियों ने भी इस प्रोग्राम में बड़े निवेश की घोषणा भी तत्काल कर दी. रिलायंस इंडस्‍ट्रीज डिजिटल इंडिया में 2,50,000 करोड़ का निवेश करेगी, तो आदित्य बिड़ला ग्रुप अगले पांच साल में 7 बिलियन डॉलर का निवेश करेंगे. टाटा सहित दुसरे ग्रुपों ने भी डिजिटल इंडिया में अपने योगदान को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री की जमकर तारीफ़ की. इस कड़ी में प्रधानमंत्री की इस बात के लिए तारीफ़ करनी होगी कि वह पुराने सामानों को बेहतरीन पैकिंग के साथ जोश-खरोश के साथ पेश करते हैं, जो सहयोगियों में नए उत्साह उत्पन्न करने में काफी हद तक सहायक होता है, लेकिन एक साल तैयारी करने के बाद इस प्रोग्राम में और भी बहुत कुछ शामिल किया जा सकता था. डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के कई भाग, मसलन देश को ब्रॉडबैंड से जोड़ना, मोबाइल फोन्स पर इंटरनेट की उपलब्धता, सभी के लिए सूचना इत्यादि पहले ही चल रहे हैं. यदि कुछ नए सिरे से जोड़ने की कोशिश की गयी है तो वह है गाँवों को भी ब्रॉडबैंड इंटरनेट से जोड़ने की घोषणा, जिसे 'ब्रॉडबैंड हाइवेज' नाम के जुमले से सम्बोधित किया गया है. हालाँकि, यह लक्ष्य कैसे पूरा होगा, इसकी चर्चा नहीं की गयी है. ऐसे में जिन गांवों में रोजगार नहीं हैं, कृषि छोड़कर लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं, ऐसे में यह लक्ष्य हवा - हवाई ज्यादा दिखता है. इसके अतिरिक्त घर-घर इंटरनेट पहुँचाने में सबसे बड़ी बाधा नेशनल ऑप्टिक फ़ाइबर नेटवर्क का प्रोग्राम है, जो निर्धारित समय से तीन-चार साल पीछे चल रहा है. सरकार को ये समझना होगा कि जब आप गांव-गांव तार बिछाने जाएंगे तो आप उन लोगों को ये काम नहीं सौंप सकते जो पिछले 50 साल से कुछ और बिछा रहे हैं. आपको वो लोग लगाने होंगे जो ऑप्टिक फ़ाइबर नेटवर्क के महत्त्व को समझते हैं और प्रतिबद्धता से अपने काम को पूरा करने की जिम्मेवारी उठाने का माद्दा रखते हैं. वैसे, शहरों में ई- गवर्नेंस को मजबूत करने के लिए मोदी सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाये हैं और पब्लिक से इंटरेक्शन करने हेतु कुछ बेहतरीन वेबसाइट का निर्माण भी कराया है, जिनमें मायजीओवी.इन और डिजिटललॉकर जैसी सुविधाएं उल्लेखनीय हैं. इसमें मायजीओवी जहाँ यूथ को सरकारी प्रोग्राम्स के बारे में जानकारी देने और सुझाव लेने का बेहतरीन प्लेटफॉर्म बनता जा रहा है, वहीं डिजिटल लॉकर भी आने वाले समय में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है. हालाँकि, इस तरह के प्राइवेट प्रोग्राम्स जैसे ड्रॉपबॉक्स, गूगल ड्राइव इत्यादि उपलब्ध हैं, किन्तु सरकारी वेबसाइट 'डिजिटल लॉकर' अपनी विश्वसनीयता के साथ-साथ आधार-कार्ड से लिंक की वजह से और दुसरे सरकारी विभागों से होने वाले सिंक्रोनाइजेशन के लिहाज से सर्वोत्तम विकल्प साबित हो सकती है. नयी बन रही वेबसाइट के लिए मोदी सरकार की इसलिए भी तारीफ़ करनी होगी कि वह पुरानी, थकी हुई सरकारी वेबसाइटों की तुलना में हज़ार गुना बेहतर और इंटरैक्टिव है, जो किसी निजी कंपनी से मुकाबला करती नजर आती है. सूचना के स्तर पर खुद प्रधानमंत्री का ऑफिस बेहद इंटरैक्टिव हो गया है और जनता से सीधे जुड़ने की कोशिश करता नजर आता है. इस प्रोग्राम की अगली कड़ी 'इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन' का लक्ष्य भी कुछ कम कठिन नहीं है. देश में अधिकतर विदेशी कंपनियों ने इस क्षेत्र में लगभग कब्ज़ा कर रक्खा है, चाहे मोबाइल हो, कम्प्यूटर हो या चिप-निर्माण ही क्यों न हो, भारत का स्थान इसमें कहीं नहीं दिखता है. कुछेक कंपनियां अपने देश में भी सक्रीय जरूर हैं, लेकिन वह असेम्ब्लिंग का काम ही ज्यादा करती हैं, बजाय कुछ ओरिजिनल पेश करने के अथवा विदेश में बनने वाले प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग और सर्विस भर करके संतुष्ट हो लेती हैं. इस प्रोग्राम की अगली कड़ी 'आईटी फॉर जॉब्स' का महत्त्व जरूर गिनाया जा रहा है, लेकिन सरकार इस क्षेत्र को समझ भी पायी है, इसमें संदेह दिखता है. आईटी में अब तक अपने देश ने बेहतर प्रगति की है, इसलिए गली कूचे से लेकर बड़े शहरों तक कम्प्यूटर-शिक्षा के साथ छोटे-छोटे रोजगार के बृहद अवसर उभरे हैं. मसलन डेटा-इंट्री जॉब्स, सोशल मीडिया एनालिसिस, डिज़ाइन एंड डेवलपमेंट जॉब्स इत्यादि महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरे हैं. बिना किसी बड़ी कम्पनी की सहायता के भी भारतीय युवा बेहतर तरीके से वैश्विक बाजारों में 'फ्रीलांसर' के रूप में अपना मजबूत दखल रखते हैं. लघु उद्योग के इस स्वरुप को समझकर संरक्षित करने की आवश्यकता थी, जो बिलकुल नहीं किया गया. इस क्षेत्र को थोड़ा और स्पष्ट किया जाय तो बड़ी कंपनियों की मार्केटिंग रणनीति से आप इसे समझ सकते हैं. गूगल 'एडसेंस' के माध्यम से तो अमेजन, फ्लिपकार्ट और दूसरी बड़ी कंपनियां अफिलिएट प्रोग्राम के माध्यम से 'फ्रीलांसर्स' तक सीधी पहुँच बना कर अपने वैश्विक कारोबार में बढ़ोतरी कर रही हैं. ऐसे में डिजिटल इण्डिया के सपने में, भारत सरकार द्वारा यह हिस्सा छूट गया लगता है. हालाँकि, मोदी सरकार की इस बात के लिए सराहना करनी चाहिए कि देश में पहली बार सूचना प्रोद्योगिकी को लेकर एकीकृत प्रयास करने की कोशिश हुई है, जो निश्चित रूप से भविष्य के लिए फलदायी साबित होगा. पर क्या यह बेहतर नहीं होता कि विदेशों से धन लाने वाले फ्रीलांसर्स को भी सहूलियतें दी जातीं. अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि बाहर से आने वाले फ्रीलांसर्स के पैसे पर 'बैंकिंग रवैया' बिलकुल ठीक नहीं है. पिछले दिनों गूगल एडसेंस की 100 - 100 डॉलर की पेमेंट मैंने दो बैंकों में मंगाई, जिसमें एक बड़ा प्राइवेट बैंक था तो एक सरकारी बैंक, पर दुर्भाग्य के साथ बताना पड़ रहा है कि दोनों ने एक बड़ा अमाउंट कमीशन के रूप में अपने आप काट लिया, जिसे मेरी पास-बुक में भी नहीं चढ़ाया गया. इसके अतिरिक्त, दिल्ली जैसे शहर में भी पैसे अकाउंट में आने में लगभग सप्ताह भर का समय लग गया. डिजिटल इण्डिया में बड़ा योगदान करने वाले आईटी यूथ की इसी तरह की दूसरी व्यवहारिक समस्याएं भी हैं, मसलन यदि किसी फ्रीलांसर की पेमेंट कहीं फंसती है (जो कि होता ही रहता है), तो वह बेचारा मन मसोसकर रह जाता है. जरूरत इस इंडस्ट्री को पहचान देने की है, जिससे फ्रीलांसर्स अपने भविष्य को सुरक्षित महसूस कर सकें और मुख्य धारा में अपने योगदान को पहचान सकें. सिर्फ विदेशी काम ही क्यों, बल्कि देश में भी डेटा-एनालिसिस इत्यादि के कामों का बड़े स्तर पर ठेका किसी विदेशी कंपनी को देकर छुटकारा पा लिया जाता है. क्या वाकई, इससे देश का सशक्तिकरण होता है? क्या ऐसे प्रोग्राम्स में आईटी यूथ को शार्ट-टर्म के लिए हायर किया जा सकता है, जिन्हें जरूरत पड़ने पर ट्रेनिंग देकर सशक्त बनाया जा सके. इन सभी बातों पर ध्यान देने से अभी काफी कुछ गुंजाइश नजर आती है, लेकिन हिंदी कहावत 'नहीं मामा से काना मामा अच्छा' के हिसाब से देखें तो 'डिजिटल इण्डिया' शुरुआती स्तर पर एक महत्वपूर्ण प्रोग्राम है, जिसकी जरूरत वाकई इंडिया को थी और इसके साथ यह भी सच है कि प्रत्येक प्रोग्राम की तरह आने वाले समय में इसमें सुधार की गुंजाइश भी बनी रहेगी.



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Monday, 29 June 2015

समाजवादी कार्यकर्ताओं की ज़मीनी राजनीति

by on 07:32
उत्तर प्रदेश का नाम कानून व्यवस्था के लिहाज से हमेशा ही 'अति' प्रशंसनीय रहा है. गुंडा, गुंडई, दादागिरी जैसे शब्द उत्तर प्रदेश की जनता के लिए आम शब्द जैसे प्रतीत होते हैं. हालाँकि, राजनीति में गुंडा फैक्टर इस्तेमाल करना भारतीय राजनेताओं के लिए कोई नई बात नहीं है, किंतु अन्य जगह यह बहुधा ऊपरी स्तर पर ही होता है, जिससे आम जनता को कोई विशेष मतलब नहीं होता है. परंतु उत्तर प्रदेश के नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता कुछ ज्यादे ही समाजवादी किस्म के हैं, इसलिए बड़े और छोटे में भेद नहीं करते, बल्कि सबको समान रूप से दुखी किया करते हैं. यह बात सिर्फ हम ही नहीं कह रहे हैं, बल्कि तमाम आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. इसी अपराध को लेकर अमिताभ बच्चन ने एक बार समाजवादी पार्टी के लिए विज्ञापन किया था कि 'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहाँ हैं कम'! इस विज्ञापन को लेकर जैसी छीछालेदर अमिताभ बच्चन की मची, उसे वह आज तक नहीं भूले होंगे. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी बुरी तरह से परास्त हुई थी. यह अलग बात है कि जातिवादी तिकड़मों और बेहतर विकल्प होने के अभाव में समाजवादी पार्टी ने सत्ता हासिल की, जिसमें युावा अखिलेश यादव का चुनाव प्रचार भी शामिल था. हालाँकि, सपा की जीत पर विश्लेषकों को आश्चर्यमिश्रित दुःख अवश्य हुआ होगा. अपराध की पुष्टि यूं तो कई एजेंसियां करती रही हैं, किन्तु यदि खुद पार्टी का प्रमुख नेता ही यदि अपनी ही पार्टी के नेताओं को गुंडा और जनता को परेशान करने वाला कहे तो ऐसी स्थिति को 'जनता को मुर्ख बनाने' की कला के अतिरिक्त और क्या कहा जाय. विदेशी पढाई कर लौटे और बड़ी उम्मीदों के साथ उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बैठे अखिलेश यादव कई सालों के बाद अगर यही अनुभव जुटा पाये हैं कि उनकी पार्टी के नेता गुंडे हैं और ज़मीन कब्ज़ा करने के साथ थाने की राजनीति में बड़ी दिलचस्पी लेते हैं, तो इसे उनकी नादानी समझी जाय अथवा इक्कीसवी सदी में जनता को नादान समझने की सोच! जी हाँ! उत्तर प्रदेश का यह अनुभव तो अधिकांश बाशिंदों को था ही, लेकिन इसकी सार्वजानिक स्वीकारोक्ति, वह भी एक कार्यरत मुख्यमंत्री के मुंह से, हमारी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है. याद दिलाना उचित होता कि यह वही अखिलेश यादव हैं, जिन्होंने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय की खुलेआम आलोचना की थी, जिसमें माननीय कोर्ट ने जनता के पैसे से नेताओं को अपना धुआंधार विज्ञापन करने पर सख्ती से निर्देश जारी किये थे. तब कड़ी टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने कहा था कि 'सुप्रीम कोर्ट हमें यह भी बता दे कि हमारा पहनावा क्या हो'! सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च न्यायिक संस्था के निर्णयों पर बारीक निगाह रखने वाले और उसका विरोध करने का साहस रखने वाले अखिलेश यादव, भला अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं के व्यवहार से अनजान कैसे बने रहे? या फिर यदि उनको इसके बारे में जानकारी थी तो उन्होंने इसे नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाये? इससे भी आगे बढ़कर कहा जाय तो अब जब उन्हें अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की असलियत पता चल गयी है तो वह इन्हें अनुशासित करने के लिए अब भी क्या कदम उठाने वाले हैं? यदि इन्हें नियंत्रित करने के लिए मुख्यमंत्री ठोस कदम नहीं उठाते हैं तो भला यह कैसे समझा जाय कि उनकी बातों में गंभीरता है और वह वास्तव में उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित करना चाहते हैं. वैसे यह पूरी बात अखिलेश यादव ने आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के सन्दर्भ में कही है. ऐसे में उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि वह पार्टी कार्यकर्ताओं को अनुशासित सिर्फ चुनाव तक ही करना चाहते हैं, फिर अगले चुनावों तक गुंडई करने की खुली छूट दे देंगे! वैसे, जिस प्रदेश में पत्रकारों पर घोर अत्याचार हो रहे हों, ज़िंदा जलने की घटनाएं सामने आ रही हों और खुद अखिलेश सरकार के मंत्री इसमें फंसे हों, तो भला ऐसे एकाध बयान देने के अतिरिक्त वह कर भी क्या सकते हैं. आखिर, अपनी झेंप भी तो मिटानी है. यह गुण निश्चित रूप से उन्होंने अपने पिता एवं चतुर राजनेता मुलायम सिंह यादव से हासिल किये होंगे. वह भी अपने कार्यकर्ताओं की बद्तमीजियों को सार्वजनिक रूप से डांट देते हैं, जबकि बाद में वह यह कहने से भी गुरेज नहीं करते हैं कि 'बच्चों से जवानी में गलतियां' हो जाती हैं.'  सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही क्यों, उनकी पार्टी का इतिहास भी मायावती के 'झूला फ़ाड़ कांड' के रास्ते से होकर गुजरा है और प्रदेश के तमाम बाहुबलियों की शरण स्थली बना रहा है. ऐसे में अखिलेश यादव का यह कहना बेमानी ही है कि उनकी पार्टी पर दूसरों की तुलना में ज्यादा जिम्मेदारी है. अब कार्यकर्ता थाने की राजनीति छोड़ दें. अब सपाईयो को ज्यादा पढऩे-लिखने की भी जरूरत है, जिससे कि गांव से लेकर शहर के कोने तक समाजवादी सिद्धांत जनता तक पहुंच सकें. हमको सत्ता में शीर्ष पर रहने के लिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है. आखिर, अब समाजवादी कार्यकर्त्ता कितनी मेहनत करें भला! रात दिन मेहनत कर करके इन्होंने पूरे भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में अपना नाम कमाया है. समाजवादी सिद्धांत को गाँव गाँव तक ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया है. आखिर, पत्रकारों के जलने से लेकर, जमींन कब्जाने और थाने की राजनीति करने की स्वीकृति खुद मुख्यमंत्री ने ही कर ली है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में कानून के राज पर भला किसे शक हो सकता है. आज 21वीं शदी, जब दुनिया चाँद को लांघकर मंगल और उससे आगे जाने के मंसूबे बाँध रही है, ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य, अदद कानून के राज के लिए तरसें, यह शर्मनाक विषय है. अखिलेश यादव ने जिस 'थाने की राजनीति' का ज़िक्र किया है, उसमें आम जनता ही पिसती है और उसे दलाली के रूपयों से लेकर पक्षपात तक का शिकार बनने पर मजबूर किया जाता है. ज़रा मुख्यमंत्री के बयान 'थाने की राजनीति' और पुलिस पर एक पत्रकार द्वारा खुद को मंत्री के दबाव में जलाये जाने वाले आरोप पर गौर कीजिये, आपको बहुत कुछ समानता नजर आ जाएगी. जांच रिपोर्ट चाहे जो भी कहे, किन्तु मुख्यमंत्री के उदगार बहुत कुछ बताने के लिए अपने आप में पर्याप्त हैं. निराशा की बात यह है कि आने वाले सालों में भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कानून का राज कैसे स्थापित हो इसकी दिशा दिख नहीं रही है, ऐसे में जातिवादी दंश को झेलना उत्तर प्रदेश की जनता की मजबूरी बने रहने की सम्भावना ज्यादा दिखती है. हाँ! यदि जनता खुद चेते और जातिवादी राजनीति को ठोकर मार कर किनारे करे और योग्यता के आधार पर चुनावों में वोट करे तो तस्वीर अवश्य ही बदलेगी! पर यक्ष प्रश्न यही है कि क्या वाकई में जनता यह सोचेगी? 
samajwadi party politics in up and crime graph in state, hindi article by mithilesh

Saturday, 27 June 2015

... सवालों की आबरू न रखिये !!

by on 07:21
तेरे हज़ार जवाबों से अच्छी मेरी ख़ामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली. यह एक शेर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के सवालों के बाद कहा था. यूपीए से 10 वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह का देश की अर्थव्यवस्था को उदारीकरण के रास्ते पर ले जाने में बड़ा हाथ माना जाता रहा है, किन्तु इस सहित उनके दुसरे छिटपुट योगदानों से भी बढ़कर राजनीति की दुनिया में उनके द्वारा दिया गया अनोखा योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन गया, जिसे विश्लेषकों द्वारा 'मौन' अथवा 'खामोश राजनीति' की संज्ञा दी गयी. उनकी ख़ामोशी के ऊपर अनेक चुटकुले बने तो घाघ नेताओं ने उनकी इस राजनीति को अपने लिए प्रेरणा मानने में भी देरी नहीं की. इस ख़ामोशी का आरोप अब देश के प्रखर वक्ताओं में शुमार वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लगा है. देश के राष्ट्रवादी विचारकों में शुमार के. एन. गोविंदाचार्य ने नरेंद्र मोदी को, हालिया समस्याओं पर इसी चुप्पी के लिए निशाने पर लिया है. गोविंदाचार्य ने ललित मोदी विवाद पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर चुटकी लेते हुए कहा कि लगता है कि प्रधानमंत्री अब चुप रहना सीख रहे हैं. मंत्रियों के इस्तीफे पर गोविंदाचार्य ने आगे कहा कि यह मसला ऐसा है, जिसमें प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों से इस्तीफा मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़नी चाहिए बल्कि ये इस्तीफे खुद ही नैतिकता के आधार पर होने चाहिए. हालाँकि, नैतिकता के बारे में प्रश्न उठाना और राजनीतिक नेतृत्व से उसकी उम्मीद करना, आज के समय में अपने आप में एक बड़ा आश्चर्य है. वैसे, नैतिकता के आधार पर इस्तीफा न देने वालीं भाजपा की दो बड़ी नेत्रियों ने मानवता के पक्ष में बातें जरूर की हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्होंने मानवता के आधार पर ललित मोदी की मदद की, वहीं वसुंधरा राजे की ओर से भी बयान आ चुका है कि उन्होंने भी मानवता के नाते ही ललित मोदी के लिए एफिडेविट पर हस्ताक्षर किये थे, क्योंकि ललित मोदी की पत्नी मीनल राजस्थान की मुख्यमंत्री की दोस्त रही हैं. अब यदि मानवीय मूल्यों के इतने बड़े पैरोकारों से गोविंदाचार्य जैसे नेता नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांग रहे हैं तो यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि मानवता और नैतिकता मिलते-जुलते गुण माने जा सकते हैं. हालाँकि, ग्रामर के हिसाब से दोनों अलग हैं, लेकिन जो मानवता को धारण करेगा, वह भला नैतिकता को कैसे त्याग सकता है? वैसे भी, भारतवर्ष को देवभूमि का दर्जा दिया जाता रहा है और यदि देवभूमि पर मानवता और नैतिकता की बात नहीं होगी, तो मानवता बचेगी कैसे? एक व्यंग्यकार ने चुटकी ली कि कलियुग में इतनी मानवता भला पचेगी कैसे? खैर, यह तो एक समस्या हुई, किन्तु हमारे देश के प्रधानमंत्री के सामने कई समस्याएं एक साथ आ खड़ी हुई हैं. ललितगेट को छोड़ भी दें तो महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे के ऊपर गंभीर घोटाले के आरोप सामने आ रहे हैं. वैसे, कुछ ख़बरों में इसे भाजपा की आतंरिक राजनीति से भी प्रेरित बताया जा रहा है, जिसमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस का नाम भी घसीटा जा रहा है. इस मामले में भी विपक्ष हमलावर रूख अपना रहा है और साथ ही साथ प्रधानमंत्री की मौन राजनीति भी जारी है. वैसे, यह उम्मीद करना कि हर छोटी बड़ी बात पर प्रधानमंत्री अपनी सफाई पेश करेंगे, थोड़ी अतिवादिता ही है, किन्तु इन दो बड़े विवादों पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा जा रहा है. हाँ! टीवी चैनलों पर जरूर कुछ भाजपा नेता अपनी सफाई प्रस्तुत करते दिख रहे हैं, लेकिन उनका कद मुद्दे के हिसाब से उपयुक्त नहीं है. सवाल इन दोनों मुद्दों का ही नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार, चुनी हुई दिल्ली सरकार के साथ भी विभिन्न मुद्दों पर लगातार उलझ रही है. अब इसके लिए चाहे जो सफाई पेश की जाय, किन्तु इसमें तालमेल की कमी तो है ही और केंद्र अपनी जिम्मेवारियों से भला कैसे बच सकता है. इन राजनीतिक मुद्दों को एक पल के लिए किनारे भी रख दें तो गोविंदाचार्य का वह कथन भी गौर करने लायक है, जिसमें उन्होंने कहा है कि 'कई लोगों में यह मैसेज जा रहा है कि सरकार में टीम भावना कमजोर हो रही है. संस्थाओं को कमज़ोर किया जा रहा है. सरकार में बैठे लोग सीएजी का मखौल उड़ा रहे हैं और लोकपाल पर ढिलाई बरती जा रही है.' अब इन आरोपों में सच्चाई कितनी है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा किन्तु सरकार को यह समझना ही पड़ेगा कि लोकतंत्र में संवाद और विश्वास दोनो बेहद जरूरी हैं. सम्मान और संवाद प्रत्येक पक्ष से होना आवश्यक है और बिना इसके सरकार में जनता का भरोसा लगातार कम होता चला जायेगा, जो निश्चित रूप से लोकतंत्र के हित में नहीं माना जा सकता. हालाँकि, मोदी सरकार के पिछले एक साल के कामकाज पर ध्यान दिया जाय तो सरकार सरपट दौड़ती नजर आ रही है. विदेश नीति से लेकर, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट, जन-धन योजना, मेक इन इंडिया जैसी अनेक दूरदर्शी योजनाएं पेश की गयी हैं, और आगे भी डिजिटल इण्डिया समेत अनेक प्रोजेक्ट पेश होने हैं. इन नीतियों और कार्यों को लेकर अनेक वैश्विक संस्थानों ने भी मोदी सरकार में अपना विश्वास व्यक्त किया है. ऐसी स्थिति में यह बेहद आवश्यक है कि अपने कार्यकाल के पहले बड़े राजनीतिक संकट में नरेंद्र मोदी सामने आएं और अपना मौन तोड़ें. ऐसा भी नहीं है कि वह मात्र आरोपों के दम पर अपनी योग्य टीम पर अविश्वास करें और उनका इस्तीफा मांग लें, किन्तु जनता में अपना भरोसा कायम रखने के लिए उन्हें ठोस कदम तो उठाने ही होंगे. इन ठोस कदमों का प्रारूप क्या हो, यह तय करने में प्रधानमंत्री अपने आप में सक्षम हैं और अपनी सक्षमता उन्होंने अनेक अवसरों पर साबित भी की है. उम्मीद की जानी चाहिए कि ख़ामोशी के आरोपों को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोपों पर जनता के साथ सीधा संवाद करके नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण का उदाहरण पेश करेंगे, क्योंकि जनता तो सिर्फ नरेंद्र मोदी को जानती है, शायद इसीलिए उनकी ख़ामोशी पर इतना शोर-शराबा मच रहा है. बिडम्बना यह है कि ललित मोदी प्रकरण और पंकजा मुंडे प्रकरण पर शोर मचाने वाली कांग्रेस का दामन खुद ही संदेह के घेरे में हैं. ललित मोदी एक सामान्य बिजनेसमैन से क्रिकेट के बड़े व्यक्तित्व कांग्रेसी शासनकाल में ही बने और शशि थरूर की कोच्चि टीम का विवाद भी कांग्रेसी शासनकाल का ही नतीजा था. इसके अतिरिक्त पंकजा मुंडे के जिस टेंडर पर सवाल उठाया जा रहा है, शुरूआती खबरों में वह टेंडर भी कांग्रेस के ही नेता को मिला है. इसके अतिरिक्त खुद ललित मोदी ने प्रियंका गांधी और रोबर्ट वाड्रा से मिलने की बात ट्वीट की है, जिसे हवा में नहीं उड़ाया जा सकता है. पिछली तमाम गलतियों से सीख लेते हुए जनता प्रधानमंत्री से यदि इतनी उम्मीद कर रही है कि भ्रष्टाचार के प्रत्येक मुद्दे पर ज़ीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाय, तो उसकी मांग नाजायज नहीं है. आखिर, देश के प्रधान चौकीदार होने की कसम नरेंद्र मोदी ने हर सभा में खाई है. 


Public needs action on corruption blame on bjp leaders, hindi article by mithilesh

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Thursday, 25 June 2015

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का क्रियान्वयन हो स्मार्ट

by on 21:45
नयी केंद्रीय सरकार की दूरदर्शी योजनाओं में एक और मील का पत्थर शामिल हो गया है. प्रधानमंत्री के अति महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट के रूप में दर्ज 'स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट' को निश्चित रूप से एक दूरदर्शी प्रोजेक्ट के रूप में देखा जा सकता है. गाँवों से पलायन करते लोगों की संख्या जिस प्रकार बड़े शहरों में बढ़ती जा रही है, उसने मेट्रो शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर को तहस-नहस करने की सीमा तक पहुंचा दिया है, ऐसे में इस योजना की आवश्यकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं उठाया जा सकता. इसके विपरीत यह कहा जा सकता है कि काश इस योजना का जन्म 20 साल पहले हुआ होता, तो भारत का बुनियादी विकास अब तक बेहद मजबूत स्थिति में खड़ा होता. जिस तेजी से मात्र एक साल पूरा होने तक, प्रधानमंत्री ने 100 स्मार्ट सिटी, 500 अमृत शहर और 2022 तक 2 करोड़ घरों को बनाने का खाका तैयार कर लिया है, उसके लिए प्रधानमंत्री के साथ शहरी विकास मंत्रालय और उसके मंत्री भी बधाई के पात्र हैं. इस प्रोजेक्ट से अनेक क्षेत्रों को बृहद स्तर पर फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. उद्योग मंडल पीएचडी चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज ने एक ताजा रिपोर्ट में कहा है कि बैंकों ने अपने फंसे कर्ज (एनपीए) को कम करने के लिये बड़ी संख्या में अटकी पड़ी परियोजनाओं का रास्ता साफ करने के लिये कमर कस ली है, इससे सड़क एवं परिवहन क्षेत्र को विशेष लाभ होने की उम्मीद है. गौरतलब है कि कोष तथा इक्विटी की कमी के कारण पिछले वित्त वर्ष में 3,500 किलोमीटर सड़क निर्माण के लक्ष्य से संबद्ध 33 सड़क परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ सकी थीं. सड़कों से आगे बढ़ते हैं तो 500 शहरों में शहरी सुधार और पुनरुद्धार के लिए अटल मिशन शुरू करने की घोषणा प्रधानमंत्री ने की है, जिसमें तक़रीबन पांच साल में 50,000 करोड़ रु.खर्च होंगे. कमजोर बुनियादी ढांचों के शिकार शहरों के लिए अमृत योजना, वास्तव में अमृत साबित हो सकती है, अगर इसमें राज्य सरकारों का मजबूत सहयोग मिला तो. आम जनमानस कि दृष्टि से देखें तो, वर्ष 2022 तक देश में सबको आवास उपलब्ध कराना सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनौती है. इस योजना पर सात साल में 3 लाख करोड़ रु. खर्च होने की बात कही गयी है, जिस पर बिचैलियों की भी निगाह जमी होगी. आवास योजना के तहत शहरों में झुग्गियों में रहने वालों एवं आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 2 करोड़ अफॉर्डेबल हाउस बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जो एक बड़ा लक्ष्य कहा जा सकता है. योजना की घोषणा के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेहद साफ़ दृष्टिकोण से अपनी बात रखी, जिससे योजना के प्रति उनकी गंभीरता का बोध होता है. इस पूरी योजना में, उनके भाषण का जो हिस्सा सबसे ज्यादा असरदार लगा, वह निश्चित रूप से भू-माफियाओं और बिल्डरों की छवि पर बात करना था. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि गरीबों के पूरे जीवन भर की कमाई से कई प्रॉपर्टी डीलर खिलवाड़ कर जाते हैं, जबकि बड़े बिल्डर, तमाम प्रोजेक्ट की घोषणा तो कर देते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाएं डेवेलप करने की जरा भी ज़हमत नहीं उठाते. प्रधानमंत्री का यह कहना भी सही है कि शहर की प्लानिंग यही बिल्डर्स तय कर देते हैं, जबकि इसकी प्लानिंग लोकल अथॉरिटीज की जिम्मेवारी होती है. तमाम सकारात्मक, नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देने के बाद प्रधानमंत्री की यह योजना मध्यवर्गीय शहरियों के जीवन स्तर में जबरदस्त उछाल ला सकती है, किन्तु मुख्य समस्या इसके कार्यान्वयन की है. हालाँकि, इसके कार्यान्वयन की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं की गयी है, पर यह तय है कि बिना पारदर्शी एक्जीक्यूशन के अधिकांश पैसा दलालों और बिचौलियों की जेब में चला जायेगा, और आम जनता को स्मार्ट सिटी के बजाय 'जर्जर सिटी' से ही संतोष करना पड़ेगा. समस्या इसी भ्रष्टाचारी लॉबिंग से निबटने की है, साथ ही साथ उन राज्य सरकारों से तालमेल इन प्रोजेक्ट्स की सफलता में अहम रोल निभाएगा, जिनमें भाजपा के अतिरिक्त दुसरे दलों की सरकारें हैं. शहरों के सौंदर्यीकरण के प्रयास पहले भी हुए हैं, किन्तु जिस प्रकार थोड़ी-बहुत अवैध कब्जे पर सीलिंग और तोड़फोड़ से ही राजनैतिक तूफ़ान खड़ा हो जाया करता है, उस हालत में इस प्रोजेक्ट के सफलतापूर्वक इम्प्लीमेंटेशन पर सवाल उठना लाजमी हो जाता है. देश में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होने ही हैं, ऐसे में मोदी सरकार के साथ सम्बंधित प्रदेश सरकार, वगैर वोट बैंक की परवाह किये, इन योजनाओं को और इन क्षेत्रों के साथ 'स्मार्ट- विलेज' की परिकल्पना की जाती तो देश की चालीस प्रतिशत ही नहीं, वरन 100 फीसदी आबादी को खुशहाल देखने का सपना साकार हो सकता था. अब तक अनदेखा रहे कृषि-क्षेत्र और कुटीर उद्योग क्षेत्र के स्मार्ट बने बिना आखिर, सम्पूर्ण भारत 'स्मार्ट' कैसे हो सकता है. लेकिन, इसके लिए यह तर्क भी दिया जा सकता है कि कार्य और योजनाएं एक-एक करके ही आगे बढ़ सकती हैं, जो कि उचित भी है. इसी में योजनाओं की सकारात्मकता भी होती है और वगैर किन्तु-परन्तु के पूरा होने की उम्मीद भी, क्योंकि एक-एक करके ही योजनाओं का स्मार्ट-क्रियान्वयन किया जा सकता है और स्मार्ट सिटी योजना के रूप में एक बड़ी योजना को कसौटी पर कसने का समय शुरू हो चूका है.

सख्ती से किस प्रकार लागू करती है, यह बात सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. हालाँकि, इस दूरदर्शी योजना को लागू करने की इच्छाशक्ति रखने वाले प्रधानमंत्री की फाइल में निश्चित तौर पर इन समस्याओं का उल्लेख होगा और हल निकलने की जद्दोजहद भी चल ही रही होगी. प्रत्येक शहरी और शहर में आने वाले लोग इन योजनाओं को लेकर बेहद आशान्वित हैं और उम्मीद यही की जानी चाहिए कि पहले के तमाम कार्यक्रमों की तरह यह योजना फुस्स नहीं होगी, बल्कि अपना लक्ष्य अवश्य ही प्राप्त करेगी. इसके अतिरिक्त इस योजना में यदि इस बात का भी प्रावधान होता कि शहरों की ओर पलायन करने वाले लोगों की संख्या में कमी आये, तो सोने पर सुहागा वाली बात होती. मतलब, यदि कृषि-क्षेत्र और कुटीर उद्योगों के प्रोत्साहन की रणनीति तय की जाती


Smart city projects needs smart execution also, hindi article by mithilesh2020

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Wednesday, 24 June 2015

'ब्रेन डेड' का अर्थ आगे भी है...

by on 09:03
भाजपा की नयी सरकार के कई फैसले चर्चा में रहे हैं, किन्तु जिस प्रकार नरेंद्र मोदी ने बुजुर्ग नेताओं को किनारे लगाया, उसने देश में
एक नए सिरे से चर्चा छेड़ दी. कई वरिष्ठों के बाद इस पार पार्टी के सीनियर नेता रहे यशवंत सिन्हा ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज करने के लिए प्रधानमंत्री पर जबरदस्त तरीके से निशाना साधते हुए कहा कि 'जिन लोगों की उम्र 75 साल ज्यादा है, 26 मई 2014 को उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया, जिनमें खुद पूर्व वित्त मंत्री भी शामिल हैं.' सिन्हा ने ये टिप्पणियां मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कीं. इससे पूर्व शत्रुघ्न सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी इत्यादि वरिष्ठ अपनी नाराजगी जता चुके हैं, लेकिन उनकी नाराजगी अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा थी. मोदी सरकार पर बुजुर्गों की अनदेखी करने और उनको 'ब्रेन डेड' करने की हद तक अनदेखा करने का आरोप लगाने वाले सिन्हा और उन जैसे वरिष्ठों का दर्द आसानी से समझा जा सकता है. आखिर, सत्ता और ताकत का मोह है ही ऐसा कि छुड़ाए नहीं छुटता है. सवाल यह है कि क्या वाकई नरेंद्र मोदी का यह फैसला इतना गलत है, कि उन पर इस हद तक आरोप चस्पा किये जाएँ. हिंदुत्व और परंपरा की सोच पर चलने वाली पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा का शीर्षस्थ नेता क्या वाकई अपने बुजुर्गों का सम्मान करना भूल चूका है? क्या उसकी नजर में वरिष्ठों के अनुभव की कोई कीमत नहीं रह गयी है?  इस प्रश्न पर  चर्चा करने से पहले उम्र और जीवन के बारे चर्चित उन चार आश्रमों को उद्धृत करना उचित होगा जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास के नाम से हिन्दू दर्शन में विख्यात हैं. कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे भारतीय बुजुर्ग इन सिद्धांतों को परे रखकर अपनी अगली पीढ़ी से सिर्फ श्रवण कुमार, रामचन्द्र या एकलव्य जैसी अपेक्षा पाल लेते हैं, जो वगैर किन्तु - परन्तु के उनके आदेश को शिरोधार्य करे और वन में चला जाय या अपना अंगूठा काट कर चरणों में डाल दे. पाठकों को यह बात जरा कड़वी लग सकती है, किन्तु पश्चिमी देशों के विकास और भारत के पिछड़ेपन के अनेक कारणों में यह भी एक बड़ा कारण हो सकता है. इसका मतलब यह भी नहीं कि पश्चिमी नंगेपन का समर्थन किया जाय, बल्कि इसके बजाय नयी और पुरानी पीढ़ी में तालमेल करने का रास्ता, भारतीय संस्कृति के दायरे में ही ढूंढने की आवश्यकता है. थोड़ा और स्पष्ट किया जाय तो यह रास्ता हिन्दू दर्शन में वर्णित उपरोक्त चार आश्रमों में ही निहित दिख जाएगा. यह कोई पुरातन युग की बात भी नहीं कही जा रही है, बल्कि आज के युग में भी भारतीय मानसिकता इस सोच से निकल नहीं पायी है. सिर्फ राजनीति ही क्यों, आप परिवार जैसी प्रथम सामाजिक ईकाई में देख लीजिये. जिस घर में बुजुर्ग का हुक्म चलता है, उसके बेटे बेशक बाप बन चुके हों, लेकिन वह घर के फैसलों में अपने बाप के आगे कुछ भी बोल नहीं सकते. चूँकि यह सतयुग या त्रेतायुग तो है नहीं, इसलिए कई लड़के इस तालमेल की कमी से बागी हो जाते हैं और बुजुर्गों से तनाव पाल बैठते हैं जो कई बार अत्याचार में भी परिणित हो जाता है. इसके साथ यदि अनुभवी और ज्ञानी बुजुर्ग तालमेल और परिवर्तन के सिद्धांत पर ध्यान दें तो समस्या सुलझती
नजर आ जाएगी. गीता के सिद्धांत में भी परिवर्तन की महत्ता को स्पष्टतः रेखांकित किया गया है कि पेड़ की पुरानी पत्तियां गिरेंगी, तो नई पत्तियां आएँगी. ठीक वैसे ही, वरिष्ठ अपनी जगह खाली करेंगे तो युवा जिम्मेवारी निभाने को तत्पर होंगे, अन्यथा अगली पीढ़ी का नेतृत्वविहीन अथवा असंवेदनशील होना तय है. परिवार के साथ साथ राजनीति और जीवन के दुसरे क्षेत्रों में भी यह परिवर्तन का सिद्धांत लागू होता ही है. मोदी सरकार पर वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी का आरोप लगाने वालों से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि यदि नवगठित 'आयुष मंत्रालय' के मंत्री मुरली मनोहर जोशी होते, तो क्या मोदी उसी अंदाज में उनको निर्देश दे सकते थे, जिस प्रकार उन्होंने श्रीपद नाइक को निर्देशित किया और 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' के अवसर पर पूरे विश्व में एक विशाल कार्यक्रम का आयोजन हुआ. यदि शहरी विकास मंत्रालय के मंत्री वेंकैया नायडू की जगह लाल कृष्ण आडवाणी होते तो क्या 'स्मार्ट सिटी' पर प्रधानमंत्री की योजना परवान चढ़ पाती. सवाल यहाँ सिर्फ वरिष्ठता का ही नहीं है, बल्कि ताकत के संतुलन का भी है. जो राजनेता या बुजुर्ग अपने उभार के दिनों में ताकत के शीर्ष पर हों, वह भला अपने जूनियर के अंडर में संतुलित ढंग से कार्य किस प्रकार कर सकता है. इसी कड़ी में सन्यास के तहत आधुनिक युग में वन या वृद्धाश्रम भेजने की बात भी समाज के साथ घोर अन्याय ही है, किन्तु अति सक्रियता और सत्ता का मोह छोड़ देने की उम्मीद बुजुर्गों से की ही जानी चाहिए. इस कसौटी पर यदि नरेंद्र मोदी ने 75 से ज्यादे उम्र के राजनेताओं को मंत्रिपद नहीं दिया है तो उनकी आलोचना भला कहाँ से उचित है, क्योंकि उन्हें सिर्फ अगले चार पांच साल ही नहीं, बल्कि इससे ज्यादे समय की प्लानिंग करनी है. उनके द्वारा घोषित प्रोग्राम इस ओर इशारा भी करते हैं. आखिर, मेक इन इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट कुछ सालों में तो परवान चढ़ने वाले हैं नहीं, ऐसे में लम्बी दौड़ के कई राजनीतिक घोड़ों की आवश्यकता देश को है. ऐसा भी नहीं है कि मंत्री नहीं बने तो शत्रुघ्न सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी या यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं का कैरियर समाप्त हो गया. यदि वह सक्रीय ही रहना चाहते हैं तो बजाय अपनी खुन्नस निकालने वाले बयान देने के वह किसी सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व कर सकते हैं, कोई राजनीतिक अकादमी खोल सकते हैं, कोई पुस्तक लिखकर देश के सामने मौजूद समस्याओं का हल प्रस्तुत कर सकते हैं अथवा सरकार को सकारात्मक सलाह ही दे सकते हैं. इसके कई उदाहरण भी सामने ही पड़े हैं, जैसे भाजपा से ही निष्काषित नेता के.एन.गोविंदाचार्य विभिन्न सामाजिक आंदोलनों में अपनी सक्रियता रखते ही हैं. सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता मंत्री नहीं बने हैं तो क्या उनके पोल खोल वाले प्रोग्राम बंद हो गए हैं. अब कोई बुजुर्ग मुख्य धारा की सत्ता पर अपना हक़ कब्र में लटकने तक जताता रहे तो उसे निश्चित रूप से सन्यास धर्म को याद दिलाना आवश्यक हो जाता है. यही प्रकृति का नियम है और इसका सामना सिर्फ भाजपा के वरिष्ठ नेता ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी भी इसी समस्या से ग्रस्त रहेगी, इसलिए जरूरी है कि वर्तमान पीढ़ी की सोच कम से कम सन्यास धर्म की महत्ता को समझकर बदलाव की प्रक्रिया को आत्मसात करे. इसके अभाव में वर्तमान में असंतुलन होगा तो भविष्य को कुंठित होने से बचाया नहीं जा सकता है.



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