Monday, 10 February 2014

इतनी जल्दी... बाप रे बाप ! - Political Stunt

by on 07:55
कोई इसे नौटंकी कह रहा है, तो कोई शहीद बनने की कवायद. कोई जिम्मेवारी से भागने की कोशिश करार दे रहा है, तो कोई आने वाले लोकसभा चुनाव से सम्बंधित महत्वाकांक्षा. यही नहीं, इस सूची में अराजक, तानाशाह, अनुभवहीन, माओवादी जैसे उपनामों की भरमार भी है. जी हैं, बात उन्हीं की हो रही है, जिनकी बात कइयों को न चाहते हुए भी करनी पड़ रही है और सुननी भी पड़ रही है. दिल्ली के ट्रैफिक में आपको हमारी ही तरह कई गाड़ियों के पिछले शीशे पर एक पोस्टर जरूर दिख जायेगा, जिसमें लिखा है- "मुझे दोष मत दो, मैंने 'आप' को वोट नहीं दिया. जबकि फेसबुक इत्यादि शोसल मीडिया समूहों पर इसके बारे में आपको कश्मीर विवाद, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कई दूसरे तरह के तीखे तमगे दिख सकते हैं. इस बात में कोई शक नहीं है कि अब आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के समर्थकों को उनका बचाव करना मुश्किल होता जा रहा है. भले ही वह स्वराज और जनलोकपाल की लोकलुभावन बातें कर रहे हों, परन्तु हकीकत यही है कि उनको अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए आखिरी राजनीतिक दावं, मतलब इस्तीफे की धमकी तक देनी पड़ रही है. 'इस्तीफे के दावं' के बारें में राजनीतिज्ञ एवं इस पर नजर रखने वाले अच्छे से समझते हैं कि इसका प्रयोग आखिरी समय में ही किया जाता है, क्योंकि इसके बाद आपके पास कुछ ख़ास विकल्प नहीं बचता है. दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली कहते हैं कि कोई भी क़ानून से बड़ा नहीं है. मुख्यमंत्री अपनी ज़िम्मेदारियों से भागना चाहते हैं और इसके लिए बहाना ढूंढ रहे हैं.

यह चालाक कोशिश है. सवाल उठता है कि चालाक और धूर्त जैसे शब्द किसी मुख्यमंत्री के लिए क्यों प्रयोग किये जा रहे हैं, वह भी तब जब केजरीवाल आम आदमी के नुमाइंदे कहे जा रहे हैं और अभी उनके चुनाव को ज्यादे दिन हुए भी नहीं हैं. इस सन्दर्भ में भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहे डॉ. हर्षवर्धन की टिप्पणी गौर करने लायक है. हर्षवर्द्धन ने ट्वीट में लिखा, अरविंद केजरीवाल जी आपने जन लोकपाल पर हर जगह इतना होहल्ला किया है लेकिन विधायकों को इसकी एक प्रति तक नहीं भेजी है. यह नाटक बंद करिए. भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि आप की सरकार की बुनियाद झूठ पर आधारित है. यह सरकार संविधान को बदनाम करने और लोगों को गुमराह करने के अलावा कुछ नहीं कर रही है. हालाँकि कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि विरोधी तो विरोध करेंगे ही, लेकिन इस तर्क के आधार पर उस विरोध को खारिज तो नहीं किया जा सकता, जिसमें केजरीवाल को 'घोषणा-मुख्यमंत्री' कहा जाने लगा है. इन सभी विरोधों को एक पल के लिए छोड़ भी दिया जाय तो केजरीवाल की जल्दबाजी पर शंशय तो पैदा होता ही है. तथ्यों को खंगालने पर यह साफ झलकता है कि एक महीने, दो महीनों में यह सरकार जिस प्रकार धड़ाधड़ घोषणाएं करती जा रही है, उन सभी कवायदों का जमीन पर उतरना आश्चर्यजनक रूप से संदिग्ध हो गया है. मसलन पानी जिनको मिलना चाहिए, उसे देने के लिए न कोई प्रयास हुआ न होता दिख रहा है. जिनको मिला, शायद उनको मुफ्त पानी की जरूरत ही नहीं थी. बिजली की बात करें तो यह मामला उच्चतम नयायालय तक पहुँच गया है और हर मुद्दे पर रोज सभी की छीछालेदर हो रही है, एक दूसरे को धमकियां दी जा रही हैं. बिजली कम्पनियां, बिजली काटने की बात कर रही हैं, तो केजरीवाल अनिल अम्बानी को दिल्ली में न घुसने देने की बात कह रहे हैं. किसी भी हद तक जाने की बात कही जा रही है, अराजक होने की बात कही जा रही है. यहाँ, वहाँ, जहाँ तहां कहीं भी धरने पर बैठ जाया जा रहा है. आखिर यह छीछालेदर और लोकतंत्र के नाम पर मजाक नहीं तो और क्या है. और भी कई तरह की घोषणाएं जल्दी जल्दी की जा रही हैं, मानो वह कल लागू भी हो जाएँगी. क्या केजरीवाल सचमुच इतने मुर्ख हैं, या वह सच में ही जनता को मुर्ख समझ रहे हैं, जो इतना नहीं समझते कि क़ानून बनना, आदेश पारित होना एक बात है और उसका जमीन पर उतरना बिलकुल अलग बात. क्या वह कुर्सी पर सिर्फ आदेश देने और हस्ताक्षर करने भर के लिए बैठे हैं, अथवा वह कानून जमीन पर कैसे उतरे, कैसे अपनी बिसंगतियाँ दूर करे, इसके लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए वह मुख्यमंत्री बने हैं. क्या जनलोकपाल बना देने से प्रशासन सुधर जायेगा. क्या मजाक है, बिना किसी अध्ययन के हम कोई भी व्यवस्था बनाने निकल पड़ें, तो इसे कागज की नाव के अतिरिक्त कोई दूसरी संज्ञा भला क्या दी जा सकती है. केजरीवाल जी, देश में कुछ सक्षम प्रशासक भी हैं, जिनसे आप शिक्षा ले सकते हैं. कुछ नाम आपको हम बता देते हैं, जो बिना किसी 'परमाणु बम वाले कानून' के ही एक अच्छी व्यवस्था देने की सार्थक कोशिश कर चुके हैं, लेकिन समस्या यह भी है आपके साथ की आप उन सभी नामों पर किसी न किसी बहाने कुछ और आरोप लगा देंगे. खैर, आपके स्वीकार करने या न करने से उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, हाँ ! आप उनसे कुछ सीखकर अपनी कथित 'साफ़-नीयत' को शायद वास्तविक भी बना सकें.

किरण बेदी, शिवराज सिंह चौहान, प्रणब मुखर्जी, नरेंद्र मोदी, रमन सिंह सहित ऐसे कई नाम हैं जो आपको काफी कुछ प्रशासनिक दक्षता की शिक्षा दे सकते हैं, या आप स्वयं भी ले सकते हैं. फिर आप जल्दबाजी में हस्ताक्षर पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, बल्कि अपने एक हस्ताक्षर को जमीन पर उतारेंगे भी. तब आप जनलोकपाल या किसी और क़ानून के लिए जल्दबाजी में इस्तीफा देने की बात नहीं करेंगे, बल्कि इंतजार करेंगे और खुद भी अध्ययन करेंगे और आम राय भी बनाएंगे. यह सच है केजरीवाल जी कि आपके जनलोकपाल के बारे में देश को पता नहीं है, आप अपना व्यक्तिगत अजेंडा दिल्ली पर मत थोपिए. बेशक, वह बहुत अच्छा हो सकता है, और शायद हो भी, लेकिन इसके लिए इतनी जल्दबाजी करना आपको संदिग्ध कर जाता है. यदि आप की सोच इतनी ही खरी है तो थोड़ा रुकिए भी, खुद को परखिये भी और खुद की स्वीकार्यता को भी तौलिये. शायद आपको यह भ्रम हो गया हो कि जनलोकपाल की वजह से जनता ने आपको दिल्ली की गद्दी पर बैठा दिया है, लेकिन यह जनता तो उस वृद्ध अन्ना हजारे के १३ दिन भूखे रहने को याद करके आपको वोट दिया था. हाँ, आपने भी परदे के पीछे संघर्ष जरूर किया था. लेकिन केजरी जी, इसका मतलब यह नहीं है कि आपकी जायज-नाजायज सभी मांगे जनता मान ही लेगी. ध्यान रहे आपको, माता-पिता बच्चे के जिद्द करने, उसके रोने पर उसकी कई मांगे पूरी कर देते हैं, परन्तु वही बच्चा जब शादी के बाद सचमुच जिद्दी हो जाता है तब फिर माता-पिता थप्पड़ लगा कर घर से निकालने में देर नहीं करते हैं. और अब आप यह तो मानेंगे ही कि राजनीति में 'आम आदमी पार्टी' से आपकी शादी हो चुकी है. हम आपको बस इतना ही कहेंगे कि थोड़ा इन्तेजार कीजिये, इतनी जल्दी भी ठीक नहीं. आखिर वह कहावत तो सुनी ही होगी आपने कि 'इन्तेजार का फल मीठा होता है'.

Saturday, 8 February 2014

राजनीति, संवैधानिकता एवं जनलोकपाल बिल - Janlokpal Bill

by on 03:05
देश की राजनीति पिछले ४ सालों से जनलोकपाल बिल से मुक्त नहीं हो पा रही है. पहले जहाँ आन्दोलनों, धरनों और प्रदर्शनों को इसके शुरूआती चरण के रूप में देखा गया, वहीं अब यह लड़ाई सरकार से होती हुई संवैधानिकता और अराजकता के प्रश्न पर आकर टिक गयी है. हर बार मोहरे पर होता है, कथित जनलोकपाल बिल. ऐसा नहीं है कि इसकी भनक तत्कालीन राजनैतिक तंत्र को नहीं रही होगी, और शायद इसीलिए इस मुद्दे को जल्द से जल्द ख़त्म करने के लिए परस्पर विरोधी राजनैतिक पार्टियां मिल गयीं और इस जनलोकपाल बिल के अगुआ रहे अन्ना हजारे को येन केन प्रकारेण साध लिया गया. आनन फानन में लोकसभा, राज्यसभा से यह बिल ध्वनिमत से पारित हुआ और लोगों ने समझा कि यह मुद्दा तो केजरीवाल से छिन गया. काफी हद तक यह सच भी है. अब केजरीवाल और उनके मित्र बिजली-पानी के मुद्दे पर आखिर कब तक लड़ते रहेंगे. हाँ, यदि जनलोकपाल का मुद्दा वह दुबारा जीवित करने में सफल रहे तो इसे पहले राज्य, उप-राज्यपाल, गृह-मंत्रालय से होते हुए संसद के मार्ग से देशव्यापी बनाने का मौका जरूर हाथ लग सकता है. अब बात बिलकुल साफ़ हो जाती है, जिसमें पुराना तंत्र इस मुद्दे को समाप्त करना चाहता है, और नयी उभरी ताकत इस मुद्दे को जीवित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार दिखती है.

जरा सोचिये, यह मुद्दा यदि केजरीवाल अपनी योजना के अनुसार धूम-धाम से किसी पार्क/ स्टेडियम में ले जाकर, विधानसभा का सत्र बुलाकर पास करा ले जाते हैं, तो उनकी लोकप्रियता का ग्राफ कहाँ से कहाँ तक पहुँच जाएगा और पुराने राजनैतिक तंत्र, जिसको वह भ्रष्टाचारी कह कहकर कठघरे में एक हद तक खड़ा कर चुके हैं, उसकी ब्रांडिंग का ग्राफ कितना नीचे आ जायेगा. राजनीति को समझने वाले घाघ राजनीतिज्ञ अब तक केजरीवाल को समझ चुके होंगे कि उनकी राजनैतिक जमीन क्या है, अथवा आम आदमी पार्टी अपना राजनैतिक अस्तित्व कहाँ ढूंढ रही है. बिलकुल साफ़ है, पुराना तंत्र ख़त्म करके या उसको करारी चोट पहुंचाकर ही आम आदमी आगे बढ़ सकती है. अपना इरादा वह जाहिर कर चुके हैं. यह बात सही है अथवा गलत यह एक बहस का मुद्दा जरूर हो सकता है. पुराना तंत्र इस बात की कवायद में लगा है कि नयी उभरती ताकत को समझौता करने के नाम पर सीमित कर दिया जाय और अपने अंदर समेट लिया जाय, लेकिन केजरीवाल और उनके तेज-तर्रार साथियों का विश्वास या आभाष दिल्ली की जीत के बाद और भी पक्का हो गया होगा कि वह पुराने तंत्र को समाप्त करके या सीमित करके अपना वर्चस्व स्थापित कर सकते हैं. वोटों के परिणाम के बारे में आंकलन तो खैर अभी नहीं किया जा सकता, लेकिन राजनैतिक तंत्र के खिलाफ जो जनता में आग लगी हुई है, उसको केजरीवाल और उनकी टीम ने बहुत पहले ही भांप लिया था और उस गुस्से से अपनी खिचड़ी पकाने लायक सामर्थ्य भी उन्होंने जुटा लिया है, या उनको ऐसा विश्वास है. अब जरा सोचिये, केजरीवाल कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों को समाप्त करके, तोड़ करके अपना उभार करने का सपना देख रहे हैं, और न सिर्फ देख रहे हैं, बल्कि जनलोकपाल बिल को आधार बनाकर अपनी चालें भी चल रहे हैं. अब सामने से लड़ाई आर-पार की दिख रही है, और यह लोकसभा के परिणामों तक सम्भवतः दिखेगी भी. हाँ, लोकसभा के परिणामों के बाद सभी दल अपना सामर्थ्य, जनता का समर्थन और उसकी आशा को समझ चुके होंगे, और तब फैसला होगा कौन रहेगा, कौन धूमिल होगा या कौन किस से मिलकर रहेगा. तब तक यह शह और मात का खेल चलता रहेगा. जहाँ तक बात जनलोकपाल की वैधानिकता का है तो इस बात पर भी खेल ही चल रहा है. पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मीडिया को एक खत दिया था, जिसमें लिखा गया था कि जस्टिस मुकुल मुद्गल, पीवी कपूर, केएन भट्ट और पिनाकी मिश्रा की राय लेने के बाद ही उन्होंने जनलोकपाल बिल को विधानसभा में पेश करने की तैयारी की थी. केजरीवाल ने दलील दी थी कि इनसे राय के बाद ही जनलोकपाल बिल का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन अब इन चार नामों में से दो - वरिष्ठ वकील केएन भट्ट और पिनाकी मिश्रा ने कहा है कि उन्होंने न तो बिल देखा है और न ही इस तरह की कोई राय दी है.

इससे केजरीवाल जरूर थोड़े बैकफूट पर आ गए हैं. थोडा उनपर दबाव इसलिए भी पड़ा है क्योंकि दिल्ली के उपराज्यपाल के पूछे जाने पर भारत के सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि जनलोकपाल बिल को बिना गृह मंत्रालय की मंजूरी के पास नहीं किया जा सकता है और बताया था कि यह तरीका असंवैधानिक होगा. लेकिन एक के बाद एक इसकी काट निकाली जायेगी, क्योंकि राजनीति में कुछ भी असम्भव नहीं होता है. और जब प्रश्न राजनैतिक अस्तित्व का हो तब तो हर तरह का रास्ता हर पक्ष निकालेगा. क्योंकि बदलाव चाहे कुछ आया हो अथवा नहीं आया हो, एक बदलाव तो आया ही है और वह है वर्त्तमान राजनैतिक तंत्र के मन में डर. अब तक तो उनको लगता था कि वह इस बार नहीं जीते, तो ५ साल बाद भी जोर-आजमाइश कर सकते हैं. लेकिन अब उन्हें यह डर है कि वह जिस प्रकार राजनीति करते आये हैं, वह राजनीति ही कहीं न बदल जाय. फिर नयी राजनीति में वह भला कहाँ फिट बैठेंगे. ऐसा नहीं है कि इस सवाल से सिर्फ पुराना तंत्र ही जूझ रहा है, बल्कि नए तंत्र की तो और भी समायाएं हैं. एक तो उन्हें खुद को साबित करने की जद्दोजहद है, दूसरे उन्हें राजनीति के पुराने नियम सिर्फ सीखने हैं, क्योंकि वह जब पुराना जानेंगे तभी तो अपना नया नियम बनाएंगे. इसमें बारीकी यह है कि पुराना नियम उन्हें सिर्फ सीखना है, अपनाना नहीं है, क्योंकि यदि वह वही नियम अपनाते हैं, जो पहले से हैं तो पुरानी राजनीति ही क्या बुरी है. मतलब साफ़ है, उन्हें राजनीति करनी तो है, लेकिन राजनीति के तात्कालिक फायदों से खुद को दूर रखना है. और उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनता की आशाएं और उम्मीदें सबसे ज्यादा होने के कारण उनकी बारीकी से शिनाख्त हो रही है और उसमें वह कई छेद नजर आ रहे हैं, जो शायद सामान्य रूप से नजर नहीं आते. संविधान का उल्लंघन, अराजकता, अनुभव की कमी से तो वह जूझ ही रहे हैं, साथ में उनकी एकमात्र पूंजी 'साफ़-नीयत' पर भी उनकी बड़ी महत्वाकांक्षा भारी पड़ती दिख रही है. क्योंकि साफ़ नीयत तो एक बेहद सटीक दैवीय गुण है, और यह अकेले नहीं चलता है, बल्कि धैर्य, सहिष्णुता, त्याग, संतुलन इत्यादि अन्य मानवीय गुणों का पूरक है. ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपनी मर्जी से एक सदगुण के प्रशंसक और फालोवर होने का दावा करें, और दूसरे मानवीय गुणों से आप कन्नी काट लें. यहीं तो संदिग्ध हो जाते हैं 'आप'. खैर, प्रयासों में काफी दम होता है और पुराने और नए दोनों तंत्रों के लिए यह सीखने का उचित अवसर है. पुराना अपनी गलती सुधारे, अन्यथा वह मिट जायेगा और नया अति-आत्मविश्वास से बचकर साफ़ नीयत से ही संतुलन बनाये अन्यथा उसकी भ्रूण-हत्या हो जायेगी. और इससे बड़ी बात यह है कि दोनों तंत्र एक दूसरे के प्रति सहिष्णु हों. आखिर यही तो है 'साफ़ नीयत'.

नए और पुराने राजनैतिक तंत्र को सामर्थ्य, महत्वाकांक्षा, संतुलन और कथित 'साफ़-नीयत' के पैमाने पर तौल रहे हैं मिथिलेश


मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Janlokpal Bill, Anna Movement article by Mithilesh.

Friday, 7 February 2014

सवालों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, वही पुराना राग - Rashtriya Swayamsewak Sangh

by on 06:07
यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि चुनावी राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को सर्वाधिक सहयोग आरएसएस, यानि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से ही मिलता है. यह सहयोग कार्यकर्ताओं से लेकर योजना बनाने और योजना कार्यान्वित करने में आने वाली प्रत्येक कठिनाई से निपटने और उससे भी आगे कथित तौर पर देश/ राज्य की नीतियों में हस्तक्षेप तक होता है. यही कारण है कि एक सांस्कृतिक संगठन होने के बावजूद कांग्रेस, सपा, राजद और दूसरे राजनैतिक दल आरएसएस पर निशाना साधने में कोताही नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि भारतीय जनता पार्टी की रीढ़ की हड्डी यदि कोई है, तो वह है आरएसएस. चाहे जैसे भी यदि आरएसएस पर निशाना लग जाए, तो भारतीय जनता पार्टी को पिछले पैरों पर खड़ा करने में बेहद आसानी रहेगी. लेकिन इस आरएसएस की चर्चा करते समय एक बेहद दिलचस्प बात सामने आती है, वह है इससे कांग्रेसी विचारधारा का लगातार डरना. आजादी के पहले भी कांग्रेस के सबसे बड़े नेता और देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आरएसएस के प्रति दुराग्रह कोई छिपा हुआ विषय नहीं है. महात्मा गांधी की १९४८ में जिस प्रकार हत्या हुई और बिना किसी ख़ास सबूत के जिस प्रकार आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया गया था, उस पर आज भी सवाल उठते रहे हैं.

हालाँकि बाद में सबूत के अभाव में कांग्रेस ही की सरकार को मजबूरन अपने प्रतिबन्ध को हटाना पड़ा था. कहते हैं, इस प्रतिबन्ध से पहले आरएसएस पूर्ण रूप से सांस्कृतिक संगठन रहा था, परन्तु आरएसएस के प्रचारकों ने इसके बाद १९५१ में जनसंघ की स्थापना करके राजनीति में अपनी पैठ बनाने की शुरुआत कर दी थी. यह तो निश्चित बात है कि आरएसएस शुरू से ही अपने अलग तेवर में शक्तिशाली दिखने लगा था, जिसकी विचारधारा कांग्रेस से बिलकुल अलहदा थी. हालाँकि आरएसएस को राजनीतिक परिणाम प्राप्त करने में लगभग पचास साल लग गए और उनकी राजनैतिक स्वीकार्यता तब हुई जब अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बने. इसके पहले इसका राजनैतिक प्रभाव छिटपुट ही था. इसमें यह उद्धृत करना आवश्यक है कि आपातकाल में आरएसएस पर एक बार फिर इंदिरा गांधी ने प्रतिबन्ध लगाया, लेकिन तब तक आरएसएस राजनीति सिख चुका था और तब के तत्कालीन लोकनायक जयप्रकाश नारायण को भी अलग विचारधारा के होने के बावजूद आरएसएस को साथ लेने को मजबूर होना पड़ा और आरएसएस के सहयोग और उसके समर्पित कार्यकर्ताओं के संघर्ष से ही इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर नेता को झुकाया जा सका. इस बीच चंद्रशेखर और अन्य जनता पार्टी के नेताओं का आरएसएस विरोध कभी कम नहीं हुआ, लेकिन इसके विपरीत आरएसएस की ताकत लगातार बढ़ती ही रही. जनता पार्टी में जनसंघ के विलय के समय की एक बेतुकी शर्त बड़ी प्रसिद्द है, जिसमें जनता पार्टी के नेताओं ने संघ के स्वयंसेवकों को जनता पार्टी का सदस्य न होने की शर्त रख दी थी.

इस बीच आरएसएस पर लगातार उन्मादी और साम्प्रदायिक विचारधारा का प्रसार करने के आरोप लगते रहे और राजनीतिक रूप से परिपक्व हो गया आरएसएस और जनसंघ के बाद उसकी अगली कड़ी भाजपा मजबूत होती चली गयी. आरएसएस और भाजपा की मजबूती का वर्त्तमान में अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि कांग्रेस अकेले उसका मुकाबला करने में अब सक्षम नहीं है और उसे कई-कई क्षेत्रीय दलों के सहयोग की जरूरत पड़ रही है. इस बात को कई विचारक अतिश्योक्ति मान सकते हैं, लेकिन यह तथ्य है कि वर्त्तमान की राजनीति आरएसएस/ भाजपा बनाम अन्य की है. २०१४ के आम चुनाव में भाजपा जहाँ अपने दम पर २७२ का आंकड़ा छूने का दम भर रही है, वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस दूसरों के कंधे पर बन्दूक रखकर गोली चलाती साफ़ दिखती है. जहाँ तक असीमानंद के कथित साक्षात्कार की बात है, तो इसका कहीं कोई आधार दिखता नहीं है, बजाय राजनीति के, क्योंकि खुद कांग्रेस की सरकार केंद्र में है और केंद्र से जुडी जांच एजेंसी एनआईए संघ से जुड़े पदाधिकारियों को क्लीन-चिट दे चुकी है. वैसे भी राजनीति में सवालों का उठना कोई नयी बात नहीं है, और जब बात आरएसएस जैसे ताकतवर संगठन की हो तब तो सवालों की बौछार होगी ही. लेकिन इन सवालों में दम कितना है, यह तो सवाल उठाने वालों को बताना ही चाहिए, विशेषकर तब जब उसके हाथ में सत्ता और ताकत दोनों की चाभी हो. आखिर कांग्रेस और आरएसएस दोनों के साथ-साथ जनता भी तो परिपक्व हुई है. दोनों जनता को इतने हल्के में न लें, अन्यथा पटखनी देने में जनता को सबसे ज्यादा महारत हासिल है. यही तो हमारे लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है कि प्रत्येक वाद-विवाद के फैसला जनता के हाथ में होता है और जनता इन विवादों पर फैसला सुनाने के लिए बिलकुल उपयुक्त जज है. क्या कहते हैं, 'आप'.

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Rashtriya Swayamsewak Sangh Articles

Thursday, 6 February 2014

केजरीवाल का मास्टरस्ट्रोक - Arvind Kejriwal

by on 06:20
arvind_kejriwal_in_thoughtअरविन्द केजरीवाल जिस प्रकार आंदोलन से निकलकर मुख्यमंत्री बने थे, उसने कइयों के मन में उम्मीद की लहर भर दी थी. लेकिन इसी के साथ जिस प्रकार से उन्होंने लोकप्रियता की राजनीति की खातिर एक के बाद एक फैसले करने शुरू कर दिए, उसने उनके समर्थकों में जल्द ही निराशा भी पैदा कर दी. हालाँकि उन्होंने जल्दी-जल्दी कई कागजी फैसले भी लिए, जो शायद उतने असरदार साबित नहीं हुए, जितना उन्हें होना चाहिए था. मसलन, पानी को २० किलोलीटर तक मुफ्त करना केजरीवाल की चतुराई के बाद भी प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा फैसला था. लेकिन चूँकि केजरीवाल तब तक परिपक्व राजनीतिज्ञ नहीं बने थे, तो यह मुद्दा और फैसल कुछ हद तक नकारात्मकता की भेंट चढ़ गया. बिजली का फैसला, सब्सिडी के बावजूद और कुछ सीमाओं के बाद भी एक बड़ा फैसला कहा जा सकता है, जिससे लोगों को सीधे तौर पर फौरी राहत मिली. लेकिन यहाँ पर भी राजनैतिक अपरिपक्वता ने उन्हें वह लाभ नहीं उठाने दिया, जो घाघ राजनीतिज्ञ उठा पाते.

यह दो बड़े दांव यूँही निकल गए. यह बात तो दावे के साथ कही जा सकती है कि यदि केजरीवाल ने यही दोनों फैसले पुरे होमवर्क के साथ लिए होते, किसी कांग्रेसी या भाजपाई की तरह, तो इसका असर कुछ और ही होता. इन दोनों बड़े फैसलों से फायदा नहीं मिलते देख केजरीवाल झल्लाते गए और असफलता की राह पर बढ़ते दिखने लगे. फिर जनता दरबार, बिना किसी होमवर्क के बुरी तरह असफल हो गया और केजरीवाल को पिछले पैरों पर खड़ा होने को मजबूर होना पड़ा. असफलता से खिसियाये केजरीवाल और उनके मंत्रियों पर सबसे बड़ा सवाल तब उठा जब खेड़की एक्सटेंसन में उनके मंत्री सोमनाथ भारती कानून के उल्लंघन, बदजुबानी, फर्जीवाड़े, मीडिया से बदतमीजी जैसे कई आरोपों में सीधे-सीधे घिर गए. अनुभव, यहीं तो काम आता है, जो केजरीवाल और उनकी टीम के पास बिलकुल भी नहीं था. उनके बचाव में केजरीवाल ने खुद की प्रतिष्ठा और पूरी पार्टी की साख को दाव पर लगा दिया और वह तो भला हो पूर्व सेफोलॉजिस्ट योगेन्द्र यादव की समझ का, जिन्होंने उप-राज्यपाल से मिलकर और उनके हाथ-पावं पड़कर एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कराकर दो पुलिस वालों को छुट्टी पर भिजवाने की बात मना ली. अन्यथा आम आदमी पार्टी की मट्टी पलीत होने की शुरुआत केजरीवाल ने अराजकता की तरफ बढ़कर खुद ही कर दी थी. खैर, झटका लगा उन्हें इन वाकयों से और वह संभल-संभल कर चलने लगे और अपनी अकड़ को ढीली करते हुए बगैर ना-नुकर किये २६ जनवरी की परेड में चुपचाप नियमों के अनुसार बैठे और कोई हंगामा नहीं किया, क्योंकि वह समझ चुके थे, एक-दो गलतियां उनको अर्श से फर्श पर पहुंचाने को काफी होती. 'आप' की ऐसी दुर्गति देखकर उनको बड़े और घाघ समर्थकों के कान खड़े हो गए, और उन्होंने कुछ केजरीवाल को भी समझाया और खुद केजरीवाल के समर्थन में खुलकर आये भी. दिल्ली पुलिस के बढे हुए उत्साह को कुछ विशेष और बड़े मीडिया समूहों ने एक के बाद एक स्टिंग कर पस्त कर दिया, तो दूसरी तरफ केजरीवाल और उनकी टीम ने भी सावधानी से कदम बढ़ाने का फैसला किया. बड़बोले मंत्रियों और विधायकों को बोलने से रोका गया तो शोएब इकबाल और रामबीर शौक़ीन जैसे आजाद विधायकों से समझौते की राह (वही पुरानी राजनीति का रास्ता) भी निकाली गयी.

भारतीय जनता पार्टी के हमले को कुंद करने के लिए केजरीवाल ने अपना मास्टरस्ट्रोक भी चल दिया, और वह था शीला दीक्षित पर कारर्वाई की शुरुआत करने का. अब पुराने राजनीतिक नियम तो यही कहते हैं कि केजरीवाल कारर्वाई शुरू करके विपक्ष को रोकेंगे, वहीं कारर्वाई और जांच का लगातार एक्सटेंसन करके कांग्रेस को भी संतुष्ट करेंगे. क्योंकि यदि उनको राजनीति करनी है, तो उसके नियम तो यही कहते हैं कि शीला पर कारर्वाई का दिखावा जरूर हो, लेकिन या तो इसकी जांच आगे बढ़ती रहे अथवा उनको क्लीनचिट मिल जाए. क्योंकि शीला के इतनी जल्दी जेल जाने का मतलब कांग्रेस के लिए बेहद खतरनाक होगा. और कांग्रेस अंदरखाने से अपने एक या दो विधायकों को निर्देश दे सकती है कि वह पार्टी से बगावत करके सरकार गिरा दें. आखिर राजनीति की सबसे पुरानी प्रोफ़ेसर वही तो है. खैर, केजरीवाल की मंशा क्या है और वह अपनी मंशा को राजनीति के साथ कैसे मिला पाते हैं, इसे देखने में अभी वक्त लग सकता है, लेकिन शीला के खिलाफ जांच शुरू करके वह अपना सबसे मजबूत दांव तो चल ही चुके हैं. दिलचस्प होगा, इस नए महत्वकांक्षी लोगों के समूह का राजनीतिक नजरिये से आंकलन करना. आप भी अपनी कमर कस लीजिये, बहुत कुछ देखना और सीखना जो है जनता को. क्योंकि जब तक जनता राजनीति नहीं सीखेगी, समझेगी तब तक यह नेता उसे बेवक़ूफ़ बनाते ही रहेंगे. केजरीवाल की शायद यही एक अच्छाई खुल कर सामने आयी है कि जनता को उनसे काफी कुछ सीधे-सीधे सिखने को मिल रहा है. और यही सीखकर वह २०१४ में सिखाने का दावा भी करेगी.

Sunday, 2 February 2014

जहरीली राजनीति - Politics

by on 06:28
वैसे तो राजनीति का व्यवहारिक चरित्र भी यही है, परन्तु पिछले कुछ दिनों से शाब्दिक अर्थों में भी राजनीति को जहरीला बताने की होड़ शुरू हो गयी है. इसकी शुरुआत यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी ने एक चुनावी रैली में करते हुए कहा कि कुछ लोग जहर की खेती कर रहे हैं. अब तेज-तर्रार राजनीतिज्ञ और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को इसका जवाब देना ही था और उन्होंने अपने चिर-परिचित लच्छेदार भाषा में इसका जवाब दिया भी. बातों के तार को एक दूसरे से जोड़ते हुए उन्होंने जयपुर के कांग्रेसी चिंतन के चर्चित राहुल बोल का हवाला दिया, जिसमें राहुल गांधी के अनुसार उनकी माँ ने सत्ता को जहर बताया था. नरेंद्र मोदी के अनुसार यदि सत्ता जहर है तो सर्वाधिक जहरीली तो कांग्रेस हुई. खैर, बातों का क्या है, बातें तो होती ही रहती हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव के नजदीक आते आते इस बात पर चर्चा जरूरी हो जाती है कि आखिर जहरीला है कौन? क्या सिर्फ एक दुसरे को जहरीला कह देने से खुद अपना जहर छुप जायेगा? क्या देश की जनता को इतनी आसानी से विकास के मुद्दे से हटाकर दंगों के जहर में उलझा देंगी राजनैतिक पार्टियां? सवाल यह भी है कि एक अरब से ज्यादा आबादी का युवा देश क्या रोजी-रोजगार से हटकर जहरीली राजनीति के साये में ही रहने को मजबूर होगा? पुलिस, प्रशासन, सड़कें, महिला-सुरक्षा, सीमा-सुरक्षा, आर्थिक असुरक्षा और ऐसे ही दुसरे अन्य मुद्दों को जहर की राजनीति पर बलि चढ़ाया जायेगा. वगैर इन प्रश्नो का जवाब पाये बेहद मुश्किल होगी जनता के लिए.

जनता पशोपेश में रहेगी लोकसभा चुनाव को लेकर, क्योंकि लगभग सभी एक दुसरे से वैसे ही अलग नजर नहीं आ रहे थे, और अब तो ईमानदार और ईमानदारी का ढोंग पीटने वाली एक नयी पार्टी पर भी नस्लवाद, महिलाओं का अपमान, अमानवीय होने का आरोप, अराजक और जहरीला होने का आरोप खुद उसी पार्टी के संस्थापक सदस्य और विधायक लगा रहे हैं. दूसरों की तो फिर बात ही क्या की जाय. अब कुछ लोग नेताओं को समाज से बाहर का मानते हैं, तो उनका कुछ भी नहीं हो सकता है. लेकिन यह बात सत्य है कि समाज से ही यह नेता निकलते हैं. तो क्या यह मान लिया जाय कि राजनीति के साथ-साथ हमारा समाज भी जहरीला होता जा रहा है. नहीं, नहीं... ... यह बात तो सर्वाधिक मिथ्या प्रतीत होती. आखिर 'वसुधैव कुटुंबकम' की बात शुरू करने और लगातार मानने वाला समाज जहरीला कैसे हो सकता है भला? तो क्या यह मान लिया जाय कि चुनाव के समय में जहर की बात सिर्फ इसलिए कही जाती है क्योंकि इस निश्चित समय के लिए जनता की आँखों पर पट्टी लगाई जा सके.

यह ठीक है कि हमारे देश में एक बड़ा वर्ग अभी भी सामजिक समरसता का पक्षधर है, परन्तु उन कुछ लोगों का क्या करें, जो अपने निहित स्वार्थों के कारण विशेष परिस्थितियों में जहर का फैलाव करते रहते हैं. जहर का फैलाव करने के आरोप से कांग्रेस तो बच ही नहीं सकती है क्योंकि यह बात पूर्णतः सत्य है कि देश में ६० साल से भी अधिक समय खुद कांग्रेस गद्दी पर रही है और देश में हजारों की संख्या में दंगे और ८४ का बड़ा नरसंहार उसी की देख-रेख में हुए हैं. इन आरोपों से भाजपा भी नहीं बच सकती है क्योंकि बाबरी मस्जिद का विध्वंश और गुजरात दंगे उसके दामन पर बड़ा दाग रहे हैं. इन बातों से दुसरे क्षेत्रीय दल और ईमानदार पार्टी भी कैसे बच सकती है क्योंकि नस्लवाद, महिला-सुरक्षा और संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर उस पर कई गम्भीर प्रश्न खड़े हुए हैं. अब जनता इन सभी विचारधाराओं को आइना दिखाने को पूर्ण रूप से तत्पर है. बस इन्तेजार है तो लोकसभा चुनाव की तिथियों का. आखिर जहर और जहरीला होने का असली प्रमाण-पत्र तो जनता ही देगी.

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Politics article by mithilesh in hindi

Monday, 20 January 2014

Arivind Kejriwal as a Politician

by on 10:00
Arivind Kejriwal as a Politician

 


अब केजरीवाल सरकार कैसे चलायें जब कोई सहयोग करने को ही तैयार न हो. इस स्थिति का आभाष केजरीवाल को भी हो चुका है. जरा सोचिये, सोमनाथ भारती यदि पुलिस के एसीपी रैंक के अधिकारी के हाथों बेइज्जत नहीं होते तो क्या तब भी यह धरना प्रदर्शन होता? बड़ा सीधा प्रश्न है. अब इस स्थिति में केजरीवाल के पास दो ही रास्ते थे. एक खुद को भी इस माहौल के अनुसार ढाल लें और फिर धीरे-धीरे वह परिवर्तन लेकर आयें, परन्तु यदि उन्हें तालमेल ही करना होता तो क्यों वह अपनी आईआरएस की नौकरी छोड़ते, क्यों ...



Arivind Kejriwal as a Politician, news in Hindi.

Sunday, 19 January 2014

मोदी मन्त्र : योजना या लफ्फाजी - Modi mantra

by on 06:33
modi-mantra  नरेंद्र मोदी ने आखिरकार अपने वादों का पिटारा खोलकर एक कदम आगे बढ़ा दिया है. जिस प्रकार दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में राहुल गांधी ने जोरदार भाषण दिया, उसने भाजपाइयों के कान खड़े कर दिए थे. इसके साथ तालकटोरा स्टेडियम में ही राहुल गांधी को चुनाव प्रचार कमान देकर उन्हें कांग्रेस ने एक कदम आगे भी कर दिया था और प्रधानमंत्री घोषित नहीं करके उन्होंने राहुल गांधी को सुरक्षित भी कर लिया है. अभी तक चुनाव प्रचार में आगे चल रहे नरेंद्र मोदी भी राहुल गांधी के इस बदले रूप से सचेत हो गए और मात्र दो दिन बाद उन्होंने भारत के विकास के लिए रोडमैप पेश कर दिया. इस रोडमैप में उन्होंने बेहद बड़ी-बड़ी बातें रखीं, उससे भी आगे जाकर उन्होंने अमेरिका और जापान जैसे देशों के विकास जैसी तुलनात्मक योजनाओं का खुलासा रखकर आज के नए युवा की मानसिकता को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. नरेंद्र मोदी यूँही भारत की दूसरी सबसे बड़ी और संघ-सिंचित भाजपा के शीर्ष पर नहीं पहुँच गए हैं. जो बात उनके भीतर है, उसमें सबसे ख़ास बात है कि वह सही मौके पर सही बात करते हैं. कई मामलों में उनकी वाणी वैद्य की तरह दिखती है, जो जनता की नब्ज पकड़ने में माहिर है.

परन्तु नरेंद्र मोदी के भाषण में जो बड़ी बातें कही गयी हैं, बात इससे आगे तक जाती है. हालांकि नरेंद्र मोदी एक जांचे और परखे नेता हैं और उनका सार्वजनिक जीवन भी गुजरात दंगों को छोड़कर बेदाग़ रहा है. परन्तु जब बात केंद्र की आती है तब मसला कुछ और हो जाता है. भारतीय शासन प्रणाली में जब राज्य कोई गलत कदम उठाता है तब उसके ऊपर केंद्र का अंकुश रहता है परन्तु केंद्र के मामले में ऐसा नहीं होता है. केंद्र में यदि कोई सरकार रहती है तब वह सीधे-सीधे पूरे देश के लिए जिम्मेवार होती है. और यहीं सवाल उठता है नरेंद्र मोदी के वादों पर. उन्होंने अपने भाषण में रक्षा नीति, विदेश नीति, अर्थ नीति से जुड़े मुद्दों पर कोई ख़ास राय नहीं रखी. नरेंद्र मोदी के शासन, प्रशासन पर तो उनके विरोधी भी कुछ ख़ास प्रश्न नहीं करते हैं, प्रश्न तो उनके रवैये को लेकर है. प्रश्न विकास से ज्यादा इस बात को लेकर है कि कश्मीर समस्या के बारे में उनका रवैया क्या होगा. प्रश्न यह भी है कि जिस प्रकार अमेरिका ने मोदी को वीजा देने से मना कर रखा है, उससे कहीं वह नाराज होकर अमेरिका के साथ सम्बन्धों को बिगाड़ेंगे तो नहीं. कहीं वह तानाशाह बनकर देश के ताने-बाने को ख़राब तो नहीं करेंगे. बेहतर होता यदि नरेंद्र मोदी बुलेट-ट्रेन, एम्स और बेहतर प्रबंधन संस्थानों के साथ इन मुद्दों पर भी आम जनता का दिल जीतने की कोशिश करते. नरेंद्र मोदी के इस भाषण में देश की ग्रामीण जनता का भी कोई खास जिक्र नहीं दिखा और इस बात पर आश्चर्य इसलिए भी होता है कि कहीं मोदी ने बिना योजना के दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल की तरह सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें तो नहीं की.

जिस प्रकार दिल्ली अरविन्द केजरीवाल के शासन में अराजकता की ओर बढ़ रहा है, कहीं देश मोदी के नेतृत्व में वैसा तो नहीं हो जायेगा. इन सभी प्रश्नों का जवाब नरेंद्र मोदी को जरूर ही देना चाहिए. यह बात कहने में किसी पत्रकार को लाग-लपेट नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी के प्रति देश भर में एक भारी आकर्षण है, परन्तु क्या सिर्फ आकर्षण और बड़ी-बड़ी बातों से काम चल जायेगा. लोकतंत्र में कई लोग जिन प्रश्नों को उठा रहे हैं, मोदी उन पर भी सहृदयता से जवाब दें. भाजपा के सर्वोच्च नेता बन चुके मोदी को अपने बुजुर्ग और संरक्षण लाल कृष्ण आडवाणी की सीख पर भी ध्यान देना चाहिए, जिसमें वह उन्हें अति आत्म विश्वास से बचने की सलाह देते हैं. हमें यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि कांग्रेस महा भ्रष्टाचारी पार्टी है, परन्तु यह बात विचारणीय है कि वह इतनी गलत होने के बावजूद भी ६० साल तक शासन में कैसे रही. इस प्रश्न का उत्तर यही है कि सबको साथ लेकर चलने की कला राजनीति के लिए बेहद आवश्यक है. नरेंद्र मोदी वर्त्तमान नेताओं में निश्चित रूप से काफी योग्य दिखते हैं, परन्तु वह समस्त भारत को साथ लेकर कैसे चलेंगे, इस बाबत भी उनको अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए. यही लोकतंत्र है. अपनी बात भी रखिये, और दूसरों की बातों का सहृदयता से जवाब भी दीजिये. सुन रहे हैं न प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, मोदी जी.

Friday, 17 January 2014

राहुल गांधी नए सोच वाले हो गए हैं! - Rahul Gandhi

by on 06:39
देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के पिछले दस साल से नए चेहरे बने राहुल गांधी अब अपनी सोच को और भी नयापन दे रहे हैं. दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में चल रही कांग्रेस पार्टी की बैठक को अपने जोश और सोच से लबरेज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कांग्रेस पार्टी के युवराज ने. इस सन्दर्भ में एक कांग्रेसी नेता की पहले कही गयी एक टिप्पणी को उद्धृत करना उचित रहेगा. उन्होंने भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी पर कड़ा हमला बोलते हुए कहा था कि उन्होंने अपने आपको काफी पहले ओवरसेल कर दिया है. इस कड़ी में राहुल गांधी बिलकुल सही समय पर अपनी गति पकड़ रहे हैं. असली नेता वही होता है, जो चुनाव आते आते अपनी पूरी गति पकड़ ले, और मतदान के दिन बटन दबने तक अपनी गति बनाये रखे. हाँ, फिर बेशक वह मतदान के बाद अपनी गाड़ी पर ब्रेक क्यों न लगा दे.

अब जबकि २०१४ की दुंदुम्भी बज चुकी है, तब कांग्रेस पार्टी के १० साल पुराने परन्तु नए सोच वाले चिराग राहुल गांधी अपने तरकश से कई तीर निकाल रहे हैं. एक तरफ तो अपने भाषणों में वह परंपरा, कांग्रेस पार्टी की सोच और भारत के इतिहास की कड़ी दुहाई दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर वह विपक्ष की मार्केटिंग रणनीति को जनता के सामने उजागर करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं. मार्केटिंग रणनीति का अधिकाधिक दुरूपयोग करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने गंजे को कंघी बेचने का पुराना मुहावरा भी इस्तेमाल कर डाला. वहीं दिल्ली में नयी नवेली आम आदमी पार्टी पर उन्होंने गंजों का हेयर कट करने को लेकर सधा हुआ व्यंग्य भी किया. खैर, यह राहुल गांधी का अधिकार है कि वह अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित करें, उन्हें चार्ज करें, परन्तु क्या यह बेहतर नहीं होता कि वह अपनी सरकार पर पिछले पांच साल तक बेहतर और भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का दबाव बनाये रखते.

जिस प्रकार राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं की बैठक में प्रधानमंत्री से देश की महिलाओं के लिए ९ की जगह १२ सिलेंडर की मांग की, तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि सिलेंडर पर सब्सिडी समाप्त करने के निर्णय पर वह सरकार पर अपना दबाव बनाते. जहाँ तक बात मार्केटिंग की है, तो राहुल गांधी की मार्केटिंग भी कुछ कम नहीं है. परन्तु जब देश घोटालों, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और सीमा-सुरक्षा के मुद्दों से बुरी तरह जूझ रहा हो तब कोई भी मार्केटिंग नकारात्मक हो जाती है. राहुल गांधी को यह बात खुले तौर पर पता होनी चाहिए कि मार्केटिंग में साख की अहम् भूमिका होती है. यदि किसी संगठन की साख पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाए तो मार्केटिंग उसके लिए नकारात्मक भूमिका निभाती है. बेहतर होगा राहुल गांधी के लिए कि २०१४ के चुनाव में उनकी पार्टी का जो होगा, वह उनके पिछले पांच साल के कामों का ही परिणाम होगा. परन्तु उनकी पार्टी को देश की जरूरत है अभी, और जिस सोच, धर्म-निरपेक्षता की बात वह कर रहे हैं, उसकी भी जरूरत है देश को. परन्तु यह सिर्फ लफ्फाजी से नहीं होगा. अब कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को पारदर्शिता अपनानी ही होगी, क्योंकि अब सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि भारतीय जनता उनसे जवाब मांग रही है. और लोकतंत्र में जनता भगवान होती है. सुन रहे हैं न राहुल बाबा.

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Rahul Gandhi leadership for congress

Saturday, 14 September 2013

Comment on BJP's Advani (For PM Candidate Fight)

by on 01:50
आडवानी जी के प्रतिष्ठा / जिद्द के बारे में काफी कुछ कहा जा रहा है. परन्तु कोई हमारी प्राचीन हिन्दू संस्कृति की व्याख्या सटीक रूप से इस मुद्दे पर करेगा... जो साफ़ कहती है कि

  1. "परिवर्तन संसार का नियम है." - (वह ख़राब हो या अच्छा हो , पर होगा जरूर)

  2. "जीवन के चौथेपन" का क्या अभिप्राय है आज के सन्दर्भ में? यह कोई जंगल जाने के बारे में निश्चित ही नहीं है, बल्कि सक्रियता को सावधानी से कम करने के बारे में है, और अगली पीढ़ी के हाथ में निर्णय देने के बारे में है.


(इस बारे में कोई मुलायम सिंह से जरूर सिख ले, अन्य मामलों में वह चाहे जितने ख़राब हो, पर सही समय पर उसने अगली पीढ़ी को नेतृत्व दिया है)
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और एक महत्वपूर्ण बात और, आडवानी जी के बारे में बड़े जोर शोर से यह प्रचारित है कि "बीजेपी को उन्होंने अपने खून पसीने से खड़ा किया" -- मै इस पर कोई आक्षेप नहीं करूँगा, परन्तु इसकी तुलना भारत की आजादी की लड़ाई से जरूर करूँगा, जिसके बारे में कहा जाता है कि "महात्मा गाँधी ने देश को आजादी दिला दी" ...
...
और देशवासी तब, और संघ से लेकर बीजेपी के कार्यकर्त्ता अब क्या कर रहे थे? ... यह क्रेडिट को हाई-जैक करने का गन्दा प्रयास हाई ... अरे इस मातृभूमि को कोई क्या देगा, राम और कृष्णा जैसे महापुरुष अभी तक इस बात का दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने भारतवर्ष को बहूत कुछ दिया. ... यह तो अत्यधिक बुरी मानसिकता हाई, व्यवसाय से भी बुरी !!
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इस पर सटीक टिप्पणियों का स्वागत है.

Comment on BJP's Advani (For PM Candidate Fight)

Monday, 9 September 2013

Sunday, 25 August 2013

Wednesday, 17 July 2013

Why people love RSS, Rashtriya Swayamsewak Sangh

by on 04:16
आज मेरे मन में एक विचार आ रहा था, जो कि चर्चा का विषय भी बना हुआ है कि आर.एस.एस (RSS) अथवा नरेन्द्र मोदी को लोग चाहते क्यों है? (इस बात पर विवाद नहीं होना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस पार्टी का डर इसकी लगातार पुष्टि करता है) .... क्यों लोग प्यार करते हैं इस संगठन को ?
क्या सिर्फ हिन्दूवादी होने के कारण ? ... यदि ऐसा है तो, हिंदुत्व ही के नाम पर हजारो दुसरे संगठन मृतप्राय क्यों है >> (हिन्दू सेना, अखिल भारत हिन्दू महासभा, हिन्दू पीठ इत्यादि...)
मेरा नजरिया थोडा अलग है. मै समझता हूँ यदि यदि "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" अपना नाम बदलकर "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" भी रख ले तो उसका जनाधार आधे से कम हो जायेगा. ... महत्व उसके राष्ट्रीय कार्यों, सोच और व्यक्त राष्ट्रीय विचारों का है... यही हाल नरेन्द्र मोदी का भी है. तो लोग उसको पसंद करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें विश्वास है कि यह व्यक्ति बिना दबाव में आये राष्ट्र की तमाम समस्याओं को जादू से भले हल न कर दे, पर उम्मीद जगाकर एक सार्थक रास्ता जरूर दिखायेगा. ...
आप लोगों का क्या विचार है. आरएसएस या मोदी सिर्फ हिंदुत्व के विचारों से जीवित हैं ? अथवा उन्होंने इसे राष्ट्रीयता के साथ मजबूती से "मन, वचन और कर्म" से लगातार जोड़ा भी है ?
जरूर विचार दें ...

view on rashtriya swayamsewak sangh - hinduism on nationalism

Why people love RSS, Rashtriya Swayamsewak Sangh

Saturday, 9 March 2013

माननीय विनोद जी बब्बर के द्वारा बताई गयी तीन बातें … - Bauddhik vilasita and Lok katha in Hindi

by on 15:31
आदरणीय विनोद बब्बर जी द्वारा मुझे बताई गयी तीन मुख्य बातें / कहानियाँ:

१. बौद्धिक विलासिता / बौद्धिक व्यभिचार एक तरह का पाप है: इसकी सीधी परिभाषा उन्होंने यही बताई कि यदि हम अपने द्वारा बनाये गए आदर्श को स्वयं ही पालन नहीं कर पाते हैं और उसे सिर्फ दूसरों से पालन करने की अपेक्षा करते हुए उसके पक्ष में तमाम तर्क देते हैं, तो यह बौद्धिक विलासिता की श्रेणी में आता है. इसके साथ यदि कोई बात सैद्धांतिक रूप से चाहे कितनी भी उत्तम क्यों न हो, पर यदि वह व्यावहारिकता की कसौटी पर बार-बार और लगातार खरी नहीं उतर पाती है तो उस सिद्धांत को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करने वाला भी बौद्धिक व्यभिचारी की संज्ञा ही पायेगा.

लोक-कथाएँ कई बार बड़े-बड़े ग्रंथो के सिद्धांतों पर भी भारी पड़ती हैं क्योंकि वह कठिन से कठिन बातों को बड़ी ही सरल और मनोरंजक भाषा में समझाने की क्षमता रखती हैं. इसी सन्दर्भ में उन्होंने मुझे कहानी सुनायी जो इस प्रकार है-

2. किसी गावं में दो मित्र रहा करते थे. बचपन से उन दोनों में सगे भाई से भी ज्यादा स्नेह था. समय के साथ उन दोनों की शादियाँ हुई, बच्चे हुए, पर उन दोनों के स्नेह में कोई अंतर न आया. एक बार दोनों मित्रों ने तीर्थ-स्थान की यात्रा करने की सोची और हरिद्वार के लिए निकल पड़े. रास्ते भर उनमे से एक मित्र दुसरे को लगातार टोकता रहा, उसे बात बात पर समझाने का प्रयास करता रहा. इस से दोनों के बीच में बहस भी हो गयी, बात बढ़ते बढ़ते एक मित्र ने दुसरे को थप्पड़ जड़ दिया, दुसरे मित्र को इस घटना से बहूत पीड़ा हुई और उसने गंगा के किनारे रेत पर तत्काल लिख दिया- “आज मेरे साथ दुनिया का सबसे बड़ा छल हुआ, जिस मित्र को अपने भाई से भी ज्यादा मानता था उसी ने आज घर से इतनी दूर मेरे ऊपर हाथ उठाया”. यात्रा के दौरान दोनों मित्रों के बीच बातचीत बंद रही. खैर, दोनों मित्र स्नान करने पहुंचे. घाट पर पहला मित्र (जिसने मारा था), किनारे पर ही स्नान कर रहा था, जबकि दूसरा मित्र (जिसने मार खाई थी), वह थोडा आगे निकल गया नहाने के लिए. संयोग बस आगे कीचड़ रुपी दलदल था और दूसरा मित्र डूबने लगा, पहले मित्र ने आव देखा न ताव और दुसरे मित्र को तमाम प्रयास से किनारे पर खींचने में सफल रहा. इस घटना के बाद दुसरे मित्र ने पास पड़े पत्थर पर खुरच-खुरच कर लिखा- “आज मेरे साथ मेरे जीवन की सबसे अच्छी बात हुई, कि जिस मित्र को मै बुरा-भला कहता रहा, आज उसी ने मेरी जान बचाई.” … एक तीसरा व्यक्ति जो काफी समय से दोनों के साथ था, उसने दुसरे मित्र से पूछा कि- जब तुमको तुम्हारे मित्र ने मारा तो तुमने इस घटना को रेत पर लिख कर व्यक्त किया, जबकि उसने जब तुम्हे बचाया तो तुमने उसे पत्थर पर लिखा, क्यों? … दुसरे मित्र का बहुत सरल जवाब था- “कोई तुम्हारे साथ बुरा करे तो, उसे रेत पर लिखो और भूल जाओ, पर तुम्हारे साथ यदि कोई अच्छा करे तो उसे पत्थर पर लिखो ताकि इतिहास भी उसे मिटा न सके”. यह कहानी सुनते हुए बब्बर जी ने कहा कि- “इसी प्रकार का व्यवहार किसी भी रिश्ते की नींव साबित होती है.” दूसरों के बुराई को भूलने की कोशिश जबकि दूसरों को अच्छाई को स्थाई रूप से याद रखने का प्रयास.

३. इसी सन्दर्भ में एक दूसरी कहानी उन्होंने सुनायी- “एक व्यक्ति अपने जीवन से काफी दुखी था, उसने भगवान् की दिलो-जान से पूजा की और भगवान के प्रकट होने पर उसने “जीवन में सुखी रहने का वरदान माँगा”. भगवान ने उसे दो थैले (बैग) दिए और उस से कहा कि वह एक थैला अपने आगे लटका ले और उसे जो भी अपने स्वयं के अन्दर कमी दिखे, उस कमी को आगे के थैले में डालता रहे और उसे बार बार खोलकर देखता रहे. वहीँ भगवान ने दुसरे थैले को पीठ पर लटकाने का आदेश देते हुए कहा कि इस थैले में तुम दूसरों की बुराइयां डालते रहना और इसे खोल कर देखने की जरूरत भी नहीं है. … काफी समय बाद वह आदमी और भी दुखी हो गया, भगवान ने प्रकट होकर देखा तो दो थैले उस व्यक्ति के आगे और पीछे लगे हुए थे, और आगे वाला थैला काफी भारी लग रहा था. भगवान ने उस व्यक्ति से पूछा- आगे वाले थैले में तुमने क्या रखा है तो व्यक्ति ने जवाब दिया- “आगे वाले में मै दूसरों की बुराइयां डालता रहता हूँ. तो भगवान ने फिर उससे पूछा तो फिर आगे वाले थैले को तुम बार बार देखते भी होगे. व्यक्ति ने कहा कि – हाँ. फिर पीछे वाले थैले की तरफ भगवान ने इशारा करते हुए पूछा कि- यह इतना हल्का क्यों है, तो व्यक्ति ने कहा कि मेरे अन्दर बुराइयां कहाँ हैं?, जो एक- दो थी, वह मैंने दाल दी है और उनकी तरफ मै देखता भी नहीं…. तो भगवान ने उसे पुनः बताते हुए कहा कि- “फिर तो तुम कभी सुखी हो ही नहीं सकते क्योंकि- जो व्यक्ति अपनी कमी नहीं देखता है और सिर्फ दूसरों की कमियाँ देखते रहता है, वह न सिर्फ दूसरों की कमियाँ देखता है, बल्कि बार बार देखने से वह सारी कमियाँ उसके स्वयं के अन्दर प्रवेश कर जाती है, जबकि वह अपनी कमियों को कई बार तो देखना भी नहीं चाहता, और यदि एक-दो की तरफ कोई ध्यान दिलाता है तो वह पीछे वाले थैले में डालकर भूल जाता है.” … भगवान ने उस इंसान को पुनः समझाते हुए कहा कि अपनी कमियों को देखो और बार बार देखो ताकि तुम उन्हें सुधार सको जबकि दूसरों की कमियों को मत देखो और देखो भी तो उसे पीछे वाले थैले में डालकर भूल जाओ., यही सुखी होने का मंत्र है. कबीर दास ने भी कहा है -

“बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलया कोय.

जो दिल खोज आपना, मुझसा बुरा न कोय.”
Bauddhik vilasita and Lok katha in Hindi

Thursday, 7 March 2013

बहुत पुरानी कथा है, किसी गांव में दो भाई रहते थे... - Short story on family, brotherhood, relations, caring

by on 15:37
बडे की शादी हो गई थी । उसके दो बच्चे भी थे । लेकिन छोटा भाई अभी कुंवारा था । दोनों साझा खेती करते थे ।
एक बार उनके खेत में गेहूं की फसल पककर तैयार हो गई ।
दोनों ने मिलकर फसल काटी और गेहूं तैयार किया ।
इसके बाद दोनों ने आधा-आधा गेहूं बांट लिया । अब उन्हें ढोकर घर ले जाना बचा था । रात हो गई थी, इसलिए यह काम अगले दिन ही हो पाता । रात में दोनों को फसल की रखवाली के लिए खलिहान पर ही रुकना था । दोनों को भूख भी लगी थी ।

दोनों ने बारी-बारी से खाने की सोची । पहले बड़ा भाई खाना खाने घर चला गया ।
छोटा भाई खलिहान पर ही रुक गया । वह सोचने लगा- भैया की शादी हो गई है, उनका परिवार है, इसलिए उन्हें ज्यादा अनाज की जरूरत होगी ।

यह सोचकर उसने अपने ढेर से कई टोकरी गेहूं निकालकर बड़े भाई वाले ढेर में मिला दिया ।
बड़ा भाई थोड़ी देर में खाना खाकर लौटा । उसके बाद छोटा भाई खाना खाने घरचला गया ।
बड़ा भाई सोचने लगा – मेरा तो परिवार है, बच्चे हैं, वे मेरा ध्यान रख सकते हैं

लेकिन मेरा छोटा भाई तो एकदम अकेला है, इसे देखने वाला कोई नहीं है ।

इसे मुझसे ज्यादा गेहूं की जरूरत है
। उसने अपने ढेर से उठाकर कई टोकरी गेहूं छोटे भाई वाले गेहूं के ढेर में मिला दिया!

इस तरह दोनों के गेहूं की कुल मात्रा में कोई कमी नहीं आई। हां, दोनों के आपसी प्रेम और भाईचारे में थोड़ी और वृद्धि जरूर हो गई ।
Short story on family, brotherhood, relations, caring in Hindi.

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