Monday, 20 January 2014

Arivind Kejriwal as a Politician

by on 10:00
Arivind Kejriwal as a Politician

 


अब केजरीवाल सरकार कैसे चलायें जब कोई सहयोग करने को ही तैयार न हो. इस स्थिति का आभाष केजरीवाल को भी हो चुका है. जरा सोचिये, सोमनाथ भारती यदि पुलिस के एसीपी रैंक के अधिकारी के हाथों बेइज्जत नहीं होते तो क्या तब भी यह धरना प्रदर्शन होता? बड़ा सीधा प्रश्न है. अब इस स्थिति में केजरीवाल के पास दो ही रास्ते थे. एक खुद को भी इस माहौल के अनुसार ढाल लें और फिर धीरे-धीरे वह परिवर्तन लेकर आयें, परन्तु यदि उन्हें तालमेल ही करना होता तो क्यों वह अपनी आईआरएस की नौकरी छोड़ते, क्यों ...



Arivind Kejriwal as a Politician, news in Hindi.

Sunday, 19 January 2014

मोदी मन्त्र : योजना या लफ्फाजी - Modi mantra

by on 06:33
modi-mantra  नरेंद्र मोदी ने आखिरकार अपने वादों का पिटारा खोलकर एक कदम आगे बढ़ा दिया है. जिस प्रकार दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में राहुल गांधी ने जोरदार भाषण दिया, उसने भाजपाइयों के कान खड़े कर दिए थे. इसके साथ तालकटोरा स्टेडियम में ही राहुल गांधी को चुनाव प्रचार कमान देकर उन्हें कांग्रेस ने एक कदम आगे भी कर दिया था और प्रधानमंत्री घोषित नहीं करके उन्होंने राहुल गांधी को सुरक्षित भी कर लिया है. अभी तक चुनाव प्रचार में आगे चल रहे नरेंद्र मोदी भी राहुल गांधी के इस बदले रूप से सचेत हो गए और मात्र दो दिन बाद उन्होंने भारत के विकास के लिए रोडमैप पेश कर दिया. इस रोडमैप में उन्होंने बेहद बड़ी-बड़ी बातें रखीं, उससे भी आगे जाकर उन्होंने अमेरिका और जापान जैसे देशों के विकास जैसी तुलनात्मक योजनाओं का खुलासा रखकर आज के नए युवा की मानसिकता को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. नरेंद्र मोदी यूँही भारत की दूसरी सबसे बड़ी और संघ-सिंचित भाजपा के शीर्ष पर नहीं पहुँच गए हैं. जो बात उनके भीतर है, उसमें सबसे ख़ास बात है कि वह सही मौके पर सही बात करते हैं. कई मामलों में उनकी वाणी वैद्य की तरह दिखती है, जो जनता की नब्ज पकड़ने में माहिर है.

परन्तु नरेंद्र मोदी के भाषण में जो बड़ी बातें कही गयी हैं, बात इससे आगे तक जाती है. हालांकि नरेंद्र मोदी एक जांचे और परखे नेता हैं और उनका सार्वजनिक जीवन भी गुजरात दंगों को छोड़कर बेदाग़ रहा है. परन्तु जब बात केंद्र की आती है तब मसला कुछ और हो जाता है. भारतीय शासन प्रणाली में जब राज्य कोई गलत कदम उठाता है तब उसके ऊपर केंद्र का अंकुश रहता है परन्तु केंद्र के मामले में ऐसा नहीं होता है. केंद्र में यदि कोई सरकार रहती है तब वह सीधे-सीधे पूरे देश के लिए जिम्मेवार होती है. और यहीं सवाल उठता है नरेंद्र मोदी के वादों पर. उन्होंने अपने भाषण में रक्षा नीति, विदेश नीति, अर्थ नीति से जुड़े मुद्दों पर कोई ख़ास राय नहीं रखी. नरेंद्र मोदी के शासन, प्रशासन पर तो उनके विरोधी भी कुछ ख़ास प्रश्न नहीं करते हैं, प्रश्न तो उनके रवैये को लेकर है. प्रश्न विकास से ज्यादा इस बात को लेकर है कि कश्मीर समस्या के बारे में उनका रवैया क्या होगा. प्रश्न यह भी है कि जिस प्रकार अमेरिका ने मोदी को वीजा देने से मना कर रखा है, उससे कहीं वह नाराज होकर अमेरिका के साथ सम्बन्धों को बिगाड़ेंगे तो नहीं. कहीं वह तानाशाह बनकर देश के ताने-बाने को ख़राब तो नहीं करेंगे. बेहतर होता यदि नरेंद्र मोदी बुलेट-ट्रेन, एम्स और बेहतर प्रबंधन संस्थानों के साथ इन मुद्दों पर भी आम जनता का दिल जीतने की कोशिश करते. नरेंद्र मोदी के इस भाषण में देश की ग्रामीण जनता का भी कोई खास जिक्र नहीं दिखा और इस बात पर आश्चर्य इसलिए भी होता है कि कहीं मोदी ने बिना योजना के दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल की तरह सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें तो नहीं की.

जिस प्रकार दिल्ली अरविन्द केजरीवाल के शासन में अराजकता की ओर बढ़ रहा है, कहीं देश मोदी के नेतृत्व में वैसा तो नहीं हो जायेगा. इन सभी प्रश्नों का जवाब नरेंद्र मोदी को जरूर ही देना चाहिए. यह बात कहने में किसी पत्रकार को लाग-लपेट नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी के प्रति देश भर में एक भारी आकर्षण है, परन्तु क्या सिर्फ आकर्षण और बड़ी-बड़ी बातों से काम चल जायेगा. लोकतंत्र में कई लोग जिन प्रश्नों को उठा रहे हैं, मोदी उन पर भी सहृदयता से जवाब दें. भाजपा के सर्वोच्च नेता बन चुके मोदी को अपने बुजुर्ग और संरक्षण लाल कृष्ण आडवाणी की सीख पर भी ध्यान देना चाहिए, जिसमें वह उन्हें अति आत्म विश्वास से बचने की सलाह देते हैं. हमें यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि कांग्रेस महा भ्रष्टाचारी पार्टी है, परन्तु यह बात विचारणीय है कि वह इतनी गलत होने के बावजूद भी ६० साल तक शासन में कैसे रही. इस प्रश्न का उत्तर यही है कि सबको साथ लेकर चलने की कला राजनीति के लिए बेहद आवश्यक है. नरेंद्र मोदी वर्त्तमान नेताओं में निश्चित रूप से काफी योग्य दिखते हैं, परन्तु वह समस्त भारत को साथ लेकर कैसे चलेंगे, इस बाबत भी उनको अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए. यही लोकतंत्र है. अपनी बात भी रखिये, और दूसरों की बातों का सहृदयता से जवाब भी दीजिये. सुन रहे हैं न प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, मोदी जी.

Friday, 17 January 2014

राहुल गांधी नए सोच वाले हो गए हैं! - Rahul Gandhi

by on 06:39
देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के पिछले दस साल से नए चेहरे बने राहुल गांधी अब अपनी सोच को और भी नयापन दे रहे हैं. दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में चल रही कांग्रेस पार्टी की बैठक को अपने जोश और सोच से लबरेज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कांग्रेस पार्टी के युवराज ने. इस सन्दर्भ में एक कांग्रेसी नेता की पहले कही गयी एक टिप्पणी को उद्धृत करना उचित रहेगा. उन्होंने भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी पर कड़ा हमला बोलते हुए कहा था कि उन्होंने अपने आपको काफी पहले ओवरसेल कर दिया है. इस कड़ी में राहुल गांधी बिलकुल सही समय पर अपनी गति पकड़ रहे हैं. असली नेता वही होता है, जो चुनाव आते आते अपनी पूरी गति पकड़ ले, और मतदान के दिन बटन दबने तक अपनी गति बनाये रखे. हाँ, फिर बेशक वह मतदान के बाद अपनी गाड़ी पर ब्रेक क्यों न लगा दे.

अब जबकि २०१४ की दुंदुम्भी बज चुकी है, तब कांग्रेस पार्टी के १० साल पुराने परन्तु नए सोच वाले चिराग राहुल गांधी अपने तरकश से कई तीर निकाल रहे हैं. एक तरफ तो अपने भाषणों में वह परंपरा, कांग्रेस पार्टी की सोच और भारत के इतिहास की कड़ी दुहाई दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर वह विपक्ष की मार्केटिंग रणनीति को जनता के सामने उजागर करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं. मार्केटिंग रणनीति का अधिकाधिक दुरूपयोग करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने गंजे को कंघी बेचने का पुराना मुहावरा भी इस्तेमाल कर डाला. वहीं दिल्ली में नयी नवेली आम आदमी पार्टी पर उन्होंने गंजों का हेयर कट करने को लेकर सधा हुआ व्यंग्य भी किया. खैर, यह राहुल गांधी का अधिकार है कि वह अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित करें, उन्हें चार्ज करें, परन्तु क्या यह बेहतर नहीं होता कि वह अपनी सरकार पर पिछले पांच साल तक बेहतर और भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का दबाव बनाये रखते.

जिस प्रकार राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं की बैठक में प्रधानमंत्री से देश की महिलाओं के लिए ९ की जगह १२ सिलेंडर की मांग की, तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि सिलेंडर पर सब्सिडी समाप्त करने के निर्णय पर वह सरकार पर अपना दबाव बनाते. जहाँ तक बात मार्केटिंग की है, तो राहुल गांधी की मार्केटिंग भी कुछ कम नहीं है. परन्तु जब देश घोटालों, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और सीमा-सुरक्षा के मुद्दों से बुरी तरह जूझ रहा हो तब कोई भी मार्केटिंग नकारात्मक हो जाती है. राहुल गांधी को यह बात खुले तौर पर पता होनी चाहिए कि मार्केटिंग में साख की अहम् भूमिका होती है. यदि किसी संगठन की साख पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाए तो मार्केटिंग उसके लिए नकारात्मक भूमिका निभाती है. बेहतर होगा राहुल गांधी के लिए कि २०१४ के चुनाव में उनकी पार्टी का जो होगा, वह उनके पिछले पांच साल के कामों का ही परिणाम होगा. परन्तु उनकी पार्टी को देश की जरूरत है अभी, और जिस सोच, धर्म-निरपेक्षता की बात वह कर रहे हैं, उसकी भी जरूरत है देश को. परन्तु यह सिर्फ लफ्फाजी से नहीं होगा. अब कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को पारदर्शिता अपनानी ही होगी, क्योंकि अब सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि भारतीय जनता उनसे जवाब मांग रही है. और लोकतंत्र में जनता भगवान होती है. सुन रहे हैं न राहुल बाबा.

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Rahul Gandhi leadership for congress

Saturday, 14 September 2013

Comment on BJP's Advani (For PM Candidate Fight)

by on 01:50
आडवानी जी के प्रतिष्ठा / जिद्द के बारे में काफी कुछ कहा जा रहा है. परन्तु कोई हमारी प्राचीन हिन्दू संस्कृति की व्याख्या सटीक रूप से इस मुद्दे पर करेगा... जो साफ़ कहती है कि

  1. "परिवर्तन संसार का नियम है." - (वह ख़राब हो या अच्छा हो , पर होगा जरूर)

  2. "जीवन के चौथेपन" का क्या अभिप्राय है आज के सन्दर्भ में? यह कोई जंगल जाने के बारे में निश्चित ही नहीं है, बल्कि सक्रियता को सावधानी से कम करने के बारे में है, और अगली पीढ़ी के हाथ में निर्णय देने के बारे में है.


(इस बारे में कोई मुलायम सिंह से जरूर सिख ले, अन्य मामलों में वह चाहे जितने ख़राब हो, पर सही समय पर उसने अगली पीढ़ी को नेतृत्व दिया है)
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और एक महत्वपूर्ण बात और, आडवानी जी के बारे में बड़े जोर शोर से यह प्रचारित है कि "बीजेपी को उन्होंने अपने खून पसीने से खड़ा किया" -- मै इस पर कोई आक्षेप नहीं करूँगा, परन्तु इसकी तुलना भारत की आजादी की लड़ाई से जरूर करूँगा, जिसके बारे में कहा जाता है कि "महात्मा गाँधी ने देश को आजादी दिला दी" ...
...
और देशवासी तब, और संघ से लेकर बीजेपी के कार्यकर्त्ता अब क्या कर रहे थे? ... यह क्रेडिट को हाई-जैक करने का गन्दा प्रयास हाई ... अरे इस मातृभूमि को कोई क्या देगा, राम और कृष्णा जैसे महापुरुष अभी तक इस बात का दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने भारतवर्ष को बहूत कुछ दिया. ... यह तो अत्यधिक बुरी मानसिकता हाई, व्यवसाय से भी बुरी !!
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इस पर सटीक टिप्पणियों का स्वागत है.

Comment on BJP's Advani (For PM Candidate Fight)

Monday, 9 September 2013

Sunday, 25 August 2013

Wednesday, 17 July 2013

Why people love RSS, Rashtriya Swayamsewak Sangh

by on 04:16
आज मेरे मन में एक विचार आ रहा था, जो कि चर्चा का विषय भी बना हुआ है कि आर.एस.एस (RSS) अथवा नरेन्द्र मोदी को लोग चाहते क्यों है? (इस बात पर विवाद नहीं होना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस पार्टी का डर इसकी लगातार पुष्टि करता है) .... क्यों लोग प्यार करते हैं इस संगठन को ?
क्या सिर्फ हिन्दूवादी होने के कारण ? ... यदि ऐसा है तो, हिंदुत्व ही के नाम पर हजारो दुसरे संगठन मृतप्राय क्यों है >> (हिन्दू सेना, अखिल भारत हिन्दू महासभा, हिन्दू पीठ इत्यादि...)
मेरा नजरिया थोडा अलग है. मै समझता हूँ यदि यदि "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" अपना नाम बदलकर "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" भी रख ले तो उसका जनाधार आधे से कम हो जायेगा. ... महत्व उसके राष्ट्रीय कार्यों, सोच और व्यक्त राष्ट्रीय विचारों का है... यही हाल नरेन्द्र मोदी का भी है. तो लोग उसको पसंद करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें विश्वास है कि यह व्यक्ति बिना दबाव में आये राष्ट्र की तमाम समस्याओं को जादू से भले हल न कर दे, पर उम्मीद जगाकर एक सार्थक रास्ता जरूर दिखायेगा. ...
आप लोगों का क्या विचार है. आरएसएस या मोदी सिर्फ हिंदुत्व के विचारों से जीवित हैं ? अथवा उन्होंने इसे राष्ट्रीयता के साथ मजबूती से "मन, वचन और कर्म" से लगातार जोड़ा भी है ?
जरूर विचार दें ...

view on rashtriya swayamsewak sangh - hinduism on nationalism

Why people love RSS, Rashtriya Swayamsewak Sangh

Saturday, 9 March 2013

माननीय विनोद जी बब्बर के द्वारा बताई गयी तीन बातें … - Bauddhik vilasita and Lok katha in Hindi

by on 15:31
आदरणीय विनोद बब्बर जी द्वारा मुझे बताई गयी तीन मुख्य बातें / कहानियाँ:

१. बौद्धिक विलासिता / बौद्धिक व्यभिचार एक तरह का पाप है: इसकी सीधी परिभाषा उन्होंने यही बताई कि यदि हम अपने द्वारा बनाये गए आदर्श को स्वयं ही पालन नहीं कर पाते हैं और उसे सिर्फ दूसरों से पालन करने की अपेक्षा करते हुए उसके पक्ष में तमाम तर्क देते हैं, तो यह बौद्धिक विलासिता की श्रेणी में आता है. इसके साथ यदि कोई बात सैद्धांतिक रूप से चाहे कितनी भी उत्तम क्यों न हो, पर यदि वह व्यावहारिकता की कसौटी पर बार-बार और लगातार खरी नहीं उतर पाती है तो उस सिद्धांत को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करने वाला भी बौद्धिक व्यभिचारी की संज्ञा ही पायेगा.

लोक-कथाएँ कई बार बड़े-बड़े ग्रंथो के सिद्धांतों पर भी भारी पड़ती हैं क्योंकि वह कठिन से कठिन बातों को बड़ी ही सरल और मनोरंजक भाषा में समझाने की क्षमता रखती हैं. इसी सन्दर्भ में उन्होंने मुझे कहानी सुनायी जो इस प्रकार है-

2. किसी गावं में दो मित्र रहा करते थे. बचपन से उन दोनों में सगे भाई से भी ज्यादा स्नेह था. समय के साथ उन दोनों की शादियाँ हुई, बच्चे हुए, पर उन दोनों के स्नेह में कोई अंतर न आया. एक बार दोनों मित्रों ने तीर्थ-स्थान की यात्रा करने की सोची और हरिद्वार के लिए निकल पड़े. रास्ते भर उनमे से एक मित्र दुसरे को लगातार टोकता रहा, उसे बात बात पर समझाने का प्रयास करता रहा. इस से दोनों के बीच में बहस भी हो गयी, बात बढ़ते बढ़ते एक मित्र ने दुसरे को थप्पड़ जड़ दिया, दुसरे मित्र को इस घटना से बहूत पीड़ा हुई और उसने गंगा के किनारे रेत पर तत्काल लिख दिया- “आज मेरे साथ दुनिया का सबसे बड़ा छल हुआ, जिस मित्र को अपने भाई से भी ज्यादा मानता था उसी ने आज घर से इतनी दूर मेरे ऊपर हाथ उठाया”. यात्रा के दौरान दोनों मित्रों के बीच बातचीत बंद रही. खैर, दोनों मित्र स्नान करने पहुंचे. घाट पर पहला मित्र (जिसने मारा था), किनारे पर ही स्नान कर रहा था, जबकि दूसरा मित्र (जिसने मार खाई थी), वह थोडा आगे निकल गया नहाने के लिए. संयोग बस आगे कीचड़ रुपी दलदल था और दूसरा मित्र डूबने लगा, पहले मित्र ने आव देखा न ताव और दुसरे मित्र को तमाम प्रयास से किनारे पर खींचने में सफल रहा. इस घटना के बाद दुसरे मित्र ने पास पड़े पत्थर पर खुरच-खुरच कर लिखा- “आज मेरे साथ मेरे जीवन की सबसे अच्छी बात हुई, कि जिस मित्र को मै बुरा-भला कहता रहा, आज उसी ने मेरी जान बचाई.” … एक तीसरा व्यक्ति जो काफी समय से दोनों के साथ था, उसने दुसरे मित्र से पूछा कि- जब तुमको तुम्हारे मित्र ने मारा तो तुमने इस घटना को रेत पर लिख कर व्यक्त किया, जबकि उसने जब तुम्हे बचाया तो तुमने उसे पत्थर पर लिखा, क्यों? … दुसरे मित्र का बहुत सरल जवाब था- “कोई तुम्हारे साथ बुरा करे तो, उसे रेत पर लिखो और भूल जाओ, पर तुम्हारे साथ यदि कोई अच्छा करे तो उसे पत्थर पर लिखो ताकि इतिहास भी उसे मिटा न सके”. यह कहानी सुनते हुए बब्बर जी ने कहा कि- “इसी प्रकार का व्यवहार किसी भी रिश्ते की नींव साबित होती है.” दूसरों के बुराई को भूलने की कोशिश जबकि दूसरों को अच्छाई को स्थाई रूप से याद रखने का प्रयास.

३. इसी सन्दर्भ में एक दूसरी कहानी उन्होंने सुनायी- “एक व्यक्ति अपने जीवन से काफी दुखी था, उसने भगवान् की दिलो-जान से पूजा की और भगवान के प्रकट होने पर उसने “जीवन में सुखी रहने का वरदान माँगा”. भगवान ने उसे दो थैले (बैग) दिए और उस से कहा कि वह एक थैला अपने आगे लटका ले और उसे जो भी अपने स्वयं के अन्दर कमी दिखे, उस कमी को आगे के थैले में डालता रहे और उसे बार बार खोलकर देखता रहे. वहीँ भगवान ने दुसरे थैले को पीठ पर लटकाने का आदेश देते हुए कहा कि इस थैले में तुम दूसरों की बुराइयां डालते रहना और इसे खोल कर देखने की जरूरत भी नहीं है. … काफी समय बाद वह आदमी और भी दुखी हो गया, भगवान ने प्रकट होकर देखा तो दो थैले उस व्यक्ति के आगे और पीछे लगे हुए थे, और आगे वाला थैला काफी भारी लग रहा था. भगवान ने उस व्यक्ति से पूछा- आगे वाले थैले में तुमने क्या रखा है तो व्यक्ति ने जवाब दिया- “आगे वाले में मै दूसरों की बुराइयां डालता रहता हूँ. तो भगवान ने फिर उससे पूछा तो फिर आगे वाले थैले को तुम बार बार देखते भी होगे. व्यक्ति ने कहा कि – हाँ. फिर पीछे वाले थैले की तरफ भगवान ने इशारा करते हुए पूछा कि- यह इतना हल्का क्यों है, तो व्यक्ति ने कहा कि मेरे अन्दर बुराइयां कहाँ हैं?, जो एक- दो थी, वह मैंने दाल दी है और उनकी तरफ मै देखता भी नहीं…. तो भगवान ने उसे पुनः बताते हुए कहा कि- “फिर तो तुम कभी सुखी हो ही नहीं सकते क्योंकि- जो व्यक्ति अपनी कमी नहीं देखता है और सिर्फ दूसरों की कमियाँ देखते रहता है, वह न सिर्फ दूसरों की कमियाँ देखता है, बल्कि बार बार देखने से वह सारी कमियाँ उसके स्वयं के अन्दर प्रवेश कर जाती है, जबकि वह अपनी कमियों को कई बार तो देखना भी नहीं चाहता, और यदि एक-दो की तरफ कोई ध्यान दिलाता है तो वह पीछे वाले थैले में डालकर भूल जाता है.” … भगवान ने उस इंसान को पुनः समझाते हुए कहा कि अपनी कमियों को देखो और बार बार देखो ताकि तुम उन्हें सुधार सको जबकि दूसरों की कमियों को मत देखो और देखो भी तो उसे पीछे वाले थैले में डालकर भूल जाओ., यही सुखी होने का मंत्र है. कबीर दास ने भी कहा है -

“बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलया कोय.

जो दिल खोज आपना, मुझसा बुरा न कोय.”
Bauddhik vilasita and Lok katha in Hindi

Thursday, 7 March 2013

बहुत पुरानी कथा है, किसी गांव में दो भाई रहते थे... - Short story on family, brotherhood, relations, caring

by on 15:37
बडे की शादी हो गई थी । उसके दो बच्चे भी थे । लेकिन छोटा भाई अभी कुंवारा था । दोनों साझा खेती करते थे ।
एक बार उनके खेत में गेहूं की फसल पककर तैयार हो गई ।
दोनों ने मिलकर फसल काटी और गेहूं तैयार किया ।
इसके बाद दोनों ने आधा-आधा गेहूं बांट लिया । अब उन्हें ढोकर घर ले जाना बचा था । रात हो गई थी, इसलिए यह काम अगले दिन ही हो पाता । रात में दोनों को फसल की रखवाली के लिए खलिहान पर ही रुकना था । दोनों को भूख भी लगी थी ।

दोनों ने बारी-बारी से खाने की सोची । पहले बड़ा भाई खाना खाने घर चला गया ।
छोटा भाई खलिहान पर ही रुक गया । वह सोचने लगा- भैया की शादी हो गई है, उनका परिवार है, इसलिए उन्हें ज्यादा अनाज की जरूरत होगी ।

यह सोचकर उसने अपने ढेर से कई टोकरी गेहूं निकालकर बड़े भाई वाले ढेर में मिला दिया ।
बड़ा भाई थोड़ी देर में खाना खाकर लौटा । उसके बाद छोटा भाई खाना खाने घरचला गया ।
बड़ा भाई सोचने लगा – मेरा तो परिवार है, बच्चे हैं, वे मेरा ध्यान रख सकते हैं

लेकिन मेरा छोटा भाई तो एकदम अकेला है, इसे देखने वाला कोई नहीं है ।

इसे मुझसे ज्यादा गेहूं की जरूरत है
। उसने अपने ढेर से उठाकर कई टोकरी गेहूं छोटे भाई वाले गेहूं के ढेर में मिला दिया!

इस तरह दोनों के गेहूं की कुल मात्रा में कोई कमी नहीं आई। हां, दोनों के आपसी प्रेम और भाईचारे में थोड़ी और वृद्धि जरूर हो गई ।
Short story on family, brotherhood, relations, caring in Hindi.

Thursday, 28 February 2013

ये 8 बातें किसी के दिल में आपकी इज्जत बढ़ा सकती हैं ! Give Respect and Take Respect

by on 15:43

1- सलाम करना।
2- किसी को जगह देना।
3- असल नाम से पुकारना।
4- बिना वजह बहस ना करना।
5- फिजूल ना बोलना।
6- अपनी बात पर अड़े मत रहना।
7- दूसरे की बात भी ध्यान से सुनना।
8- अपनी गलती मानना।


Give Respect and Take Respect in Hindi.

Sunday, 24 February 2013

पुनर्विचार - I swear for rethink

by on 15:46
मै एक बार गहरे से अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करूँगा, कहीं मै जो अच्छा समझकर कर रहा हूँ, गलत तो नहीं हो रहा है., लगता है, एक बार फिर सोचने की जरूरत है मुझे…

मै तुम्हे भरोसा दिलाता हूँ कि एक बार फिर सभी पक्षों को ध्यान में रखकर ह्रदय से विचार करूँगा कि मुझे क्या और कैसे करना चाहिए, इन परिस्थितियों में.

rethinking
I swear for rethink

Friday, 22 February 2013

ठंढे बस्ते में …

by on 15:50
यदि यह मुद्दा ज्यादा विवादित हो रहा हो तो क्यों न इसको ठंढे बस्ते में डाल दें ?? …

यार, किसी के पास समय होगा नहीं, जिसके पास समय होगा, उसकी कोई सुनेगा ही नहीं, मानने की तो बात ही दूर है,..

जबरदस्ती तो प्यार किया नहीं जा सकता !!

Thursday, 21 February 2013

Monday, 18 February 2013

न्याय, सभ्य समाज की पहली शर्त है ... - First Duty of Society is Justice

by on 16:09
किसी भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने और बचाए रखने के लिए न्याय सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है.  जिस भी समाज की न्याय-प्रणाली जितनी सुदृढ़ रहेगी, उस समाज की समृद्धि की उतनी अधिक संभावना रहेगी.

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थोडा विस्तृत और साधारण रूप से कहें तो – “कोई भी व्यवस्था हो, उसमे कमियाँ होती ही हैं, समस्याएं आती ही हैं, और न्याय-प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि उस समस्या का कारण क्या है और उस समस्या द्वारा हुई क्षति की क्षतिपूर्ति कैसे सुनिश्चित हो, ताकि भविष्य में भी उस तरह की समस्या उत्पन्न होने का खतरा न हो अथवा कम से कम खतरा हो.

इसके विपरीत, यदि न्याय-व्यवस्था नहीं होती है तो पूरी व्यवस्था को टूटने में क्षण भर भी नहीं लगता, बल्कि मै तो कहूँगा कि सिर्फ एक व्यवस्था नहीं टूटती है, बल्कि समाज की अन्य व्यवस्था को तोड़ने की नजीर भी बन जाती है. यह चाहे एक छोटे से परिवार की बात हो, अथवा बड़े संयुक्त परिवार की, या किसी संगठन की बात हो अथवा हम राष्ट्र की ही बात क्यों न कर लें.

तो यदि हम किसी व्यवस्था को बचाने की सोचते है, तो न्याय की एक समुचित प्रणाली हर स्तर पर विकसित करनी चाहिए, यह चाहे एक अनुभवी व्यक्ति के द्वारा हो अथवा अच्छे लोगो का एक न्यायिक समूह क्यों न हो.  कोशिश हमें यह भी करनी चाहिए कि- “न्याय को हर समय / परिस्थिति के अनुसार तौलें.” इसकी व्याख्या एक ही वस्तु के लिए भिन्न- भिन्न समय में अलग हो सकती है, अथवा एक ही अधिकार / कर्त्तव्य के लिए भिन्न- भिन्न मनुष्यों के लिए भी अलग हो सकती है.  बराबरी और न्याय में कई बार फर्क होता है, हमें प्राकृतिक न्याय पर ज्यादा भरोसा करना चाहिए जो परिस्थिति और व्यावहारिक दृष्टि से तर्कसंगत भी हो.



किसी ने सच ही कहा है- “जस्टिस इज गॉड”
First Duty of Society is Justice in Hindi.

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