Monday, 11 August 2014

Nitish Kumar Loves Lalu Prasad yadav

by on 09:40
Nitish Kumar Loves Lalu Prasad yadav

 

Nitish Kumar, JDU, Lalu Prasad yadav, RJD, BJP, I hate Modi Politics

 

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Saturday, 9 August 2014

Thursday, 7 August 2014

वृद्धों की दशा: संस्कारविहीनता एवं पीढ़ियों का अंतर - Senior Citizens and Youth

by on 17:45
सदियों से जिस धरा पर मनुस्मृति का यह नीति वाक्य बार-बार दोहराया जाता –
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।

अर्थात् नित्य गुरुजनों का अभिवादन और वृद्धों की सेवा करने से आयु, विद्या, यश एवं बल की प्राप्ति होती है। उसी भारत भूमि पर हाल ही में बुजुर्गों के सथ दुर्व्यवहार की कुछ घटनाएं चिंतन को विवश करती हैं। जैसे सम्पत्ति के लालच में गाजियाबाद के एक पुत्र द्वारा अपने पिता और अपने भतीजे का बेरहमी से क़त्ल किया। पंजाब में बेटे ने माँ को पीट-पीट कर मार डाला। जयपुर में ताला लगे घर के बाहर एक बुजुर्ग दम्पत्ती कई दिनों तक सड़क पर पड़े रहे। यूं तो बुजुर्गों के प्रति तमाम अपराध हमारे समाज की कुत्सित पहचान बन चुके हैं, लेकिन प्रतिदिन अख़बारों में स्थान पा रही घटनाएं सामाजिक ताने-बाने की नींव पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं। प्रश्न खड़ा होना भी चाहिए, क्योंकि एक तरफ इतिहास में भारत के विश्व गुरु होने के बारे में तमाम तथ्य प्रमाणित हैं, तो दूसरी तरफ भविष्य की सुपर-पॉवर बनने की तरफ अगली पीढ़ी कुलांचे भर रही है। ऐसे में उन कारणों पर विचार किया जाना सामयिक होगा, जिसने हमारे समरस, "वसुधैव कुटुंबकम" की सोच वाले समाज की जड़ें तक हिला दी हैं। आखिर कौन सोच सकता है कि समस्त संसार को अपना परिवार मानने की परिकल्पना देने वाले भारतवर्ष में पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गयी है। आखिर एक अपंग समाज बनाकर हम सुपर-पॉवर एवं खुशहाली का भ्रम कैसे पाल सकते हैं। बुजुर्गों के कल्याण एवं आधिकारिता के लिए काम करने वाले एक संगठन के ताजा सर्वे के अनुसार 52 फीसदी बुजुर्गों को परिवार में सम्मानजनक माहौल नहीं मिलता है। 57 फीसदी बुजुर्ग सम्पत्ति के लिए प्रताड़ित किये जाते हैं । अब यह बात अपने आप में अजीब है कि जिन बुजुर्गों के इस संसार के जाने अर्थात उनकी मृत्यु के बाद भी हम पितृपक्ष में पिंडदान करते हैं पर उनके जीवित रहते उन्हें उचित सम्मान तक क्यों नहीं देते? आखिर यह हमारे चरित्र का दोहरापन नहीं तो और क्या है? यह समय की मांग है कि बदलती परिस्थितियों में व्यवस्था को मानवीय दृष्टिकोण के लिए हम तैयार करें। एक सुर में युवाओं को दोषी करार देना कोई समाधान नहीं होगा बल्कि समस्या को और पेचिदा बनाने का कार्य करेगा।
निश्चित रूप से शिक्षा से नैतिक मूल्यों की विदाई संस्कार विहीनता के लिए दोषी है। परंतु इसके अनेक अन्य पक्ष भी हैं जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। एक नजर से देखने पर यह सभी समस्याएं हमारे अर्थतंत्र से जुड़ीं दिखती हैं। अधिकांश पारिवारिक विवाद धन की लिप्सा के कारण होते हैं जो बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा और अपराध दोनों के कारक हैं। स्वतंत्रता से पूर्व हमारा समाज कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से संचालित था। परिवार के सभी सदस्य एक जगह पर रहकर शारीरिक श्रम से धनोपार्जन करते थे। चूँकि एक-दूसरे की आवश्यकता थी इसलिए एक दूसरे के प्रति सहयोग का भाव भी था। ऐसे में स्वार्थ कम एवं सहिष्णुता का भाव अधिक रहता था। कालान्तर में कृषि अर्थव्यवस्था की अवनति से संतुलन बिगड़ता चला गया। यह ठीक है कि दूसरे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े, लेकिन परिवारों का विखंडन हुआ। सभी पहले शरीर से तो फिर मन से एक-दसरे से दूर होते चले गए। परिणाम सामने है- माता-पिता दो-तीन पुत्रों होते हुए भी अकेले हैं। सभी अलग-अलग स्थानों पर धनोपार्जन में लगे हैं, अतः रिश्ते नाम मात्र के रह गए हैं। अनेक बार दिलों का अंतर पहले रार तो फिर दरार का काम करता है। आज जो हत्यारी मानसिकता दिखाई दे रही है उसका एक कारण यह भी है।
दूसरा कारण जो अनुभव किया जा रहा है वह भी आजादी के बाद की परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। इस दौर में विस्थापन बढ़ा। अपने पारम्परिक व्यवसाय और क्षेत्र छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में जाने से पुरानी पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी से कट गई या यूं कहें कि श्रेष्ठता ग्रंथि के कारण वह अपने बच्चों से तालमेल बिठाने से असमर्थ हो गए। ये वे लोग थे जिन्होंने जीवन में विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करके सफलता प्राप्त की। ऐसा अनुभव किया जाता है कि वह पीढ़ी कठोर और अनेक बार आत्मकेंद्रित बन गई। सर्वेक्षणों में यह तथ्य सामने आता है कि अनेक बार बुजुर्गों की कठोरता और युवाओं के जीवन में उनका अत्याधिक हस्तक्षेप उन्हें अपनी ही संतान से दूर करने का कारण बनता है। हालाँकि लगभग सभी बुद्धिजीवी तर्क देते हैं कि ‘कोई बुजुर्ग अपने बच्चों का भला ही चाहता है।’ लेकिन जिस तेजी से दुनिया बदल रही है, जीवनशैली में परिवर्तन हो रहे हैं ऐसे में अपने जमाने की परिस्थितियों जैसे आचरण की आज की पीढ़ी से अपेक्षा करना अथवा उनपर जबरदस्ती अपनी राय थोपना मतभेद से मनभेद, तत्पश्चात खुले विरोध का बड़ा कारण बन जाता है। कई बुजुर्ग ऐसे भी देखे गए हैं जो अपने बच्चों के बच्चे जवान हो जाने के बाद भी उनके दैनिक व्यवहार में बेतरतीब दखल देते हैं। उनका व्यवहार ऐसा होता है मानो उनके 40 साल के लड़के को बुद्धि ही नही है। बेशक यह तर्क थोड़ा अजीब हो लेकिन सच्चाई है कि आज का समाज बेहद तेजी से वैश्वीकरण की तरफ बढ़ा है। ऐसे में यदि पति-पत्नी साथ में कहीं घूमने जाते हैं, कुछ अपनी मर्जी से खाना चाहते हैं, अपने बच्चों की परवरिश अपने ढंग से करना चाहते हैं, तो हमारे वरिष्ठों को इसके प्रति सहिष्णु होने की आवश्यकता है। इसके सही-गलत होने के साथ इसकी व्यवहारिकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

सिर्फ अपने को बुद्धिमान समझना और दूसरों को कमतर आंकना, क्योंकि हमारी उम्र अधिक है, अनुभव अधिक है, आज के परिप्रेक्ष्य में थोड़ा अटपटा जान पड़ता है। आज जब छोटी उम्र के बच्चे विज्ञान, अनुसंधान, टेलीविजन, खेलकूद इत्यादि में झंडे गाड़ रहे हैं, तो हमें उनकी योग्यता का सम्मान करना चाहिए और उनसे तालमेल बिठाना चाहिए, न कि बालिग़ हो जाने के बाद भी उसके जीवन की दिशा निश्चित या नियंत्रित करने का प्रयास करते रहना चाहिए। महाभारत काल में दो ऐसे पिताओं का उदाहरण मिलता है, जिन्होंने अपने पुत्र के लिए सम्पूर्ण जीवन और सब कुछ दाव पर लगा दिया था। एक दुर्याेधन के पिता धृतराष्ट्र और दूसरे अश्वत्थामा के पिता द्रोणाचार्य ने ने अपने पुत्रों के लिए क्या-क्या नहीं किया। पर परिणाम क्या हुआ हम जानते हैं। वहीं दूसरी तरफ पांडव पिता के न होने पर भी निर्णय लेकर सक्षम बनते चले गए। रामायण काल में भी राजा दशरथ की परिधि से बाहर जाकर ही राजकुमार राम, मर्यादा पुरुषोत्तम राम से भगवान श्रीराम बन सके। ऐसे में ‘सिर्फ हम ही अपने बच्चों का भला सोच सकते हैं’ जैसे तर्क थोड़ी अतिवादिता हैं और इससे हमें बचने का प्रयास करना चाहिए। हाँ, बच्चों की योग्यता पर ध्यान देना माता पिता का कर्त्तव्य है, किन्तु बालिग़ हो जाने के उपरान्त उसे निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने से स्वयं निर्णय लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यदि उसका गलत निर्णय हो तो उसे तर्कसंगत ढ़ंग से मार्गदर्शन दिया जा सकता है। ऐसे में वह और सावधान होगा। जबकि सही निर्णय उसका उत्साह बढ़ाएंगे.
इसका अर्थ यह भी नहीं कि दोषी बड़े ही हैं। जब हम युवा-पक्ष की तरफ दृष्टि डालते हैं तो यहां भी असंतुलित तस्वीर ही नजर आती है। आज प्रतियोगिता के कड़े दौर में दो तरह के युवा मुख्य रूप से उभर रहे हैं। एक वर्ग वह है जो इस वैश्वीकरण के दौर में उचित प्रशिक्षण, समर्पण व सजगता से सफलता के शिखर छू रहा है। वहीं एक वर्ग वह है जो सफल नहीं हो पा रहा है। प्रतियोगी परिवेश में कहीं न टिक पाने वाले युवा कुंठा और विकृत मानसिकता के शिकार होते जा रहे हैं। ऐसे में जो युवक अपनी योग्यता, क्षमता का विस्तार नहीं कर पाते और अपनी महत्वांकाक्षा पर नियंत्रण भी नहीं रखना जानते, उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए धन की भी आवश्यकता है, अतः माँ-बाप के रूप में उसे आसान शिकार मिल जाते हैं। ये अपनी असीमित इच्छाओं के लिए अपने बुजुर्गों के प्रति आक्रामक हो जाते हैं। इन कुंठित और सामाजिक अपराधी युवकों को कठोर दंड तो मिलना ही चाहिए, साथ ही साथ इनकी स्थिति बेहतर कैसे हो इसपर भी सम्पूर्ण समाज सहानुभूति से विचार करे. क्योंकि गलाकाट प्रतियोगिता आखिर कब लाभदायी होती है।
अब उन युवकों की बात भी कर ली जाय, जो कथित रूप से सफल होने की श्रेणी में आते हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं, शिक्षित हैं। यह जानकर बड़ा दुखद आश्चर्य होगा कि ये सभ्य और शिक्षित लोग ही ओल्ड-एज-होम कॉन्सेप्ट को बढ़ावा दे रहे हैं। वे यह समझने को तैयार नहीं कि यह पश्चिमी व्यवस्था हमारे बुजुर्गों के लिए बंदीगृह के समान है। यह सामाजिक विकृति है। पश्चिम का समाज भावनाओं पर आधारित नहीं है। जन्म से मृत्यु तक नाममात्र की भावनात्मक औपचारिकता होती है। जैसे मदर डे- एक दिन माँ के लिए,फादर डे- एक दिन पिता के लिए। इसके विपरीत हमारे समाज की नींव भावनाओं पर आधारित है। हमारे लिए हर दिन माँ-बाप, रिश्ते नातों का है। ओल्ड-एज होम का समर्थन करने वालों को विचार करना चाहिए कि वह अपने बुजुर्गों के लिए जो व्यवस्था चाह रहे हैं, क्या वही सब उन्हें स्वयं अपनेे लिए भी मान्य होगा। शायद कदापि नहीं! तो फिर यह दोहरापन क्यों? यह प्रमाणित तथ्य है कि बच्चे अधिकांशतः वही सीखते हैं, जो अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। यदि इन प्रश्नों पर युवा पीढ़ी विचार करना प्रारम्भ कर दे तो समाधान भी वह स्वयं ही ढूंढ लेगी। बस हमारे बुजुर्गों को इस प्रक्रिया में युवाओं का साथ देना होगा। उनका उत्साहवर्धन करना होगा। उनको सजग करते रहना होगा। बजाय इसके कि उनके निर्णय लेने की क्षमता को कम किया जाए। बदलाव समाज की सच्चाई हैं, लेकिन यह सच है कि पिछली सदी में समाज जितनी तेजी से बदला है, उतना परिवर्तन कई सदियों में नहीं हुआ होगा। तेजी से बदली तकनीक ओर वैश्वीकरण के दौर में बुजुर्ग और युवा दोनों को आपसी सौहार्द और तालमेल से पारिवारिक व्यवस्था को संतुलित करने का प्रयास करना चाहिए। आखिर तभी हम परिवार की श्रेष्ठ परम्परा को जीवांत कर अपने परिवेश और समाज को बेहतर बना सकेंगे।

– मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Article on Senior Citizens and Youth and family structure in Indian perspective

Tuesday, 5 August 2014

Saturday, 26 July 2014

Thursday, 17 July 2014

सड़क हादसा - Road Accidents

by on 21:05
poem-on-pen-by-mithileshसड़क के किनारे
बैठा मैं
देख रहा था बरसात की फुहारें
लोग भाग रहे थे
मानो भीग कर पछता रहे थे
रुकने का नाम नहीं था
शायद, जल्दी कोई काम वहीँ था
…एक व्यक्ति तेजी से दौड़ा,
सड़क के उस पार जा रहा था
जल्दबाजी में उसकी जेब से पेन गिरी
गिरी क्या, सड़क पर मरी!
गाड़ियाँ दौड़ती रहीं,
पेन पहियों से दबकर उछलती रही
मैं देखता रहा
बरसात का मजा जाता रहा
कितना निर्दयी था वह पथिक
छोड़ गया बीच राह उसे
कुचल जाने के लिए, दबने के लिए
मरने के लिए
आह निकली उस निर्जीव के लिए
सोचता रहा, बस सोचता रहा…
सड़क हादसों में जाने वाले के लिए।

– मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Road Accidents are dangerous in all means. A heart touching poem by mithilesh.

Thursday, 26 June 2014

Tuesday, 13 May 2014

मोदी को रोकने की बात ही क्यों - Negative Politics

by on 17:27
कई बार मन में प्रश्न उठता है कि राजनीति क्या नकारात्मकता का ही नाम है या इसके द्वारा कुछ सकारात्मक परिणाम भी प्राप्त किये जा सकते हैं. कुछ नेता राजनीति को समाज-सुधार और बढ़िया प्रशासन का ही एक घटक मानते हैं. लेकिन आश्चर्य तब होता है जब यही नेता बजाय एक बड़ी लाइन खींचने के, एक-दुसरे पर छींटाकसी करने को अपना राजनैतिक आधार मानने लगते हैं. ताजा मामला राजनीति के केंद्र-बिंदु बने नरेंद्र मोदी का है. उनके तमाम विरोधी अपने राजनैतिक हमलों में उनकी साम्प्रदायिक छवि को उभारते रहे हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. आपत्ति तो तब होती है, जब इसी नकारात्मकता को आधार बनाकर वोट मांगे जाते हैं. आखिर इसे आम जनता को मुर्ख बनाने का प्रयास नहीं माना जाये तो और क्या माना जाए, क्योंकि राजनीति में आये हुए तमाम नेता आखिर राजनीति में इसलिए ही तो आते हैं, क्योंकि वह जनता की बेहतरी के लिए कार्य कर सकें. और कोई भी कार्य उनकी अपनी क्षमता से ही होगा, न कि मोदी या दूसरों की बुराई करके. आज कल यह चलन हो गया है कि मोदी की बुराई करो, और वोट मांग लो. नेताओं की मानसिकता कुछ यूं हो गयी है कि चुनाव जीतने का एक ही मंत्र है, और वह है 'मोदी-विरोध'.

हमें मोदी या किसी और से कोई लगाव नहीं है, उन्होंने जो गलत किया है, उसके लिए अदालतें, जनता और ईश्वर हैं, लेकिन हमें इस बात पर भी आपत्ति है कि मोदी का नाम बार-बार लेकर आम जनता को मायावती, प्रकाश करात, मुलायम सिंह या दुसरे नेता जनता को मुर्ख बनाएं. हाँ, लोकतंत्र में उनको हक़ है वोट मांगने का, लेकिन अपनी अच्छी योजनाओं के बल पर. वह अपना प्रशासनिक खाका लेकर जनता के पास जाएं, और उससे वोट मांगे. जहाँ तक बात तीसरे मोर्चे के नेताओं की है, तो उसकी कहानी तो इंदिरा गांधी के ज़माने से स्पष्ट है. जिस प्रकार मोरारजी देसाई की सरकार के खिलाफ प्रधानमंत्री पद के लिए ही चौधरी चरण सिंह ने जनता पार्टी में बगावत कर दी थी, उसकी अगली कड़ी विश्व्नाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की महत्वाकांक्षा के रूप में सामने आयी. इससे आगे बढ़ें तो, एच. डी. देवेगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल की महत्वाकांक्षा पूरा देश देख ही चूका है. वर्त्तमान हालात में भी, तीसरे मोर्चे में जितने दल हैं, उतने ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार. अब 'एक अनार, और सौ बीमार' वाली स्थिति से भला कब, किसका कल्याण हुआ है. और जो भी दल तीसरे मोर्चे के गठन का उपक्रम कर रहे हैं, उनमें से अधिकांशतः कांग्रेस के भागीदार रह चुके हैं, और कई तो अब भी कांग्रेसी भ्रष्टाचार में शामिल हैं. मसलन, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और मायावती की ही बहुजन समाजवादी पार्टी.

बेहतर होगा, यह सभी नेता हिटलरशाही, परिवारवाद, भ्रष्टाचार से मुक्त होकर पहले अपने ही दल में लोकतंत्र की स्थापना करें, अन्यथा देश इन पर कैसे भरोसा करेगा. उदाहरण के लिए, मुलायम सिंह की सपा में ही, वह खुद, उनके भाई, उनके बेटे, भतीजे, बहु और पता नहीं कौन-कौन कब्ज़ा जमाये हुए हैं. अब वह भला देश को परिवारवाद से मुक्त कराने की बात किस मुंह से करते हैं. मायावती की पार्टी में भी उनके सामने उनके नेता बैठ तक नहीं सकते हैं. कथित तौर पर वह सभी को अपने पावं छूने तक के लिए मजबूर करती रही हैं. माक्सवादी पार्टी के प्रकाश करात और उनके सहयोगियों द्वारा पश्चिम बंगाल में उद्योग कितना चौपट हो चूका है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है. अब यह नेता किस तीसरे मोर्चे की बात कर रहे हैं, यह वही जानें. मोदी को यदि रोकना ही उनका मकसद है तो वह खुलकर कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन कर सकते हैं. अन्यथा जनता पुराने अनुभव देखकर सजग हो जायेगी और चुनाव में सिर्फ मोदी-विरोध के नाम पर वोट बटोरना मुश्किल हो जायेगा. अब तो आम चुनाव संपन्न हो चुके हैं, और सभी नेता परिणाम की प्रतीक्षा में रत हैं. १६ मई को उन नेताओं को करारा झटका लगेगा, जिन्होंने सिर्फ मोदी विरोध की राजनीति की है. आखिर लोकतंत्र की ख़ूबसूरती भी तो यही है कि समय-समय पर सभी को सबक मिलता रहे.

– मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Negative politics by Indian leaders.

Sunday, 9 March 2014

Wednesday, 19 February 2014

उम्मीदवारों को भी देखिये - Assembly Election

by on 16:52
भारतीय जनता पार्टी का चुनावी अभियान वैसे तो बड़ी रफ़्तार से चल रहा है, लेकिन उनकी कुछेक बातों को लेकर मतदाताओं के मन में संदेह आने लगा है. भाजपा वैसे तो सादगी और शुचिता की बातें करते आघाती नहीं है, लेकिन हाल ही में जिस प्रकार ४०० करोड़ की भारी-भरकम राशि के ब्रांड-बिल्डिंग पर खर्च करने की बात कही जा रही है, उसने इसके समर्थकों के कान खड़े कर दिए हैं. विरोधी पार्टियां तो इस पर प्रश्न दाग ही रही हैं, लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या चुनाव जीतने के बाद मोदी और उनकी टीम इस पैसे को व्याज समेत वसूलेंगी भी. यह बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की जननी राजनीति ही है और इसके साथ इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिस प्रकार राजनैतिक दल चंदे का लेन-देन करते रहे हैं, उसमें भ्रष्टाचार का बहुत अहम रोल होता है. कई बार तो चंदे की रकम आम जनता द्वारा स्वेच्छापूर्वक सीमित होती है, जबकि कई बार यह बड़े घरानों द्वारा किसी पार्टी की नीतियों को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभाती है. ऐसे में चंदों पर और किसी पार्टी द्वारा किये जा रहे खर्च पर मतदाताओं का प्रश्न पूछना लाजमी हो जाता है. भाजपा के ही सन्दर्भ में एक और नीतिगत बात सामने आ रही है, जिसने मतदाताओं और मोदी के समर्थकों को निराश करना शुरू कर दिया है. भाजपा के बड़े नेता और यहाँ तक कि राजनाथ सिंह अपनी जनसभाओं में बार-बार कह रहे हैं कि इस बार मतदाता, स्थानीय उम्मीदवारों को न देखें, बल्कि वह मोदी के नाम पर अपना वोट दें.

प्रश्न यही खड़ा हो जाता है कि आखिर उम्मीदवारों को अनदेखा करने की अपील भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा क्यों की जा रही है. मतदाता संशय कर रहा है कि क्या भाजपा के उम्मीदवार ईमानदार नहीं होंगे? क्या मोदी के नाम पर ऐरे-गैरे उम्मीदवारों को टिकट दे दिया जायेगा? यदि सचमुच ऐसा होगा तो भारत की बहुसंख्यक जनता पर से मोदी का प्रभाव कम होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. बेहतर होता, यदि मोदी को चमत्कारी मानने के साथ-साथ लोकतंत्र के मनमाफिक उम्मीदवारों को टिकट भी दिया जाता. और साथ में अपने बेहतरीन प्रचार के साथ जनता को यह भी सन्देश देने की कोशिश की जाती कि उनका प्रचार अथाह और गलत काले धन पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसके कार्यकर्त्ता और स्वयंसेवक उसके मूल में हैं. उसे किसी बनावटी और दिखावटी कैम्पेन की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जनता तक सन्देश पहुँचाने में उसके नेता और सहयोगी ही पर्याप्त हैं. अच्छे उम्मीदवारों की क्या अहमियत होती है, यह भारतीय जनता पार्टी और मोदी को दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनावों से सीख लेना चाहिए था. जिस प्रकार चुनाव के कुछ ही दिनों पहले विजय गोयल को हटाकर डॉ. हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था, उसी का कहीं न कहीं परिणाम था कि दिल्ली में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. विश्लेषक इस बात को दावे के साथ कह रहे हैं कि भाजपा का केंद्र में सरकार बनना अथवा नहीं बनना इस बात पर निर्भर करेगा कि वह लोकसभा में अपने उम्मीदवारों को ईमानदारी की कसौटी पर कैसे कसती है, बजाय यह कहने के कि सिर्फ मोदी के नाम पर मतदाता अपनी आँखें बंद कर लें.

Monday, 17 February 2014

सस्ते सामानों का चुनावी बजट - Probably last Budget by Chidambaram

by on 14:25
chidambaram-budget-february-2014   वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने आखिरकार वही किया जो उम्मीद पहले से ही थी. कहने को तो उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें हॉवर्ड से हार्ड-वर्क करना सीखा है, लेकिन बजट में वह आवश्यकता से अधिक मुलायम दिखे. खैर, उनके इस मुलायम लेखा-जोखा का मतलब आम-ख़ास सभी को समझ आ ही गया होगा. इसके तकनीकि पक्षों के बारे में हमारी समझ भी सामान्य ही है, लेकिन इसके सामाजिक पक्षों और प्रभावों के साथ बदले राजनैतिक यथार्थ के बारे में प्रश्न जरूर उठते हैं. पिछले कुछ दशकों से यह बहुत आम बात हो गयी है कि चुनाव के बाद साढ़े चार साल तक सरकारें मनमाने ढंग से भ्रष्टाचार करती हैं या करने देती हैं, और अगला चुनाव आने के कुछ महीने पहले भी मनमाने ढंग से ही उदार हो जाती हैं.

हालाँकि इस सन्दर्भ में दिल्ली की हाल ही में बनी और इस्तीफा दे चुकी सरकार का उद्धरण देना काफी उपयुक्त रहेगा. दो महीने में ही बिजली और पानी केजरीवाल सरकार द्वारा सस्ती किये जाने के विरोध में यही कांग्रेसी मंत्री (और भाजपाई भी) उनको बिना किसी 'अर्थनीति' के अराजक कहने पर तुल गए थे. उनका तर्क था कि महज कुछ सौ करोड़ की सब्सिडी देने से खजाने पर काफी ज्यादा बोझ पड़ेगा. अब एक लोक-लुभावन अंतरिम चुनावी बजट पेश कर चुके पी.चिदंबरम से पूछा जाना चाहिए कि जिस प्रकार से उन्होंने गाड़ियों, मोबाइल इत्यादि पर एक्साइज ड्यूटी कम करने की घोषणा की है, उससे खजाने पर बोझ नहीं पड़ेगा क्या? हावर्ड से अपनी पढाई का बखान करने वाले पी.चिदंबरम को खुलकर जवाब देना चाहिए कि सेना से सम्बंधित 'एक रैंक, एक पेंशन' को छोड़कर बजट में उनका कौन सा कदम बुद्धिमतापूर्ण है. सच पूछा जाये तो, इस पूरे बजट को एक बेवकूफाना बजट कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी. इस बजट से किसी वर्ग को न कोई खास फायदा होगा, और न ही इस बजट से कांग्रेस का कोई राजनैतिक उद्देश्य ही पूरा होगा. कांग्रेस की हालिया राजनैतिक सोच पर तरस आता है.

जिस प्रकार से बड़ी संख्या में युवाओं की राजनीति में दिलचस्पी बढ़ी है, उसने न सिर्फ उन्हीं युवाओं में बल्कि उनकी वालंटियर की तरह सक्रियता ने देश की बड़ी आबादी को राजनैतिक रूप से प्रभावित किया है. और इसका अर्थ यह है कि चुनावी लॉलीपॉप अब बीते दिनों की राजनीति बन चुकी है. यदि ऐसा नहीं होता तो दिल्ली की पूर्व सरकार ने जिस तेजी से दिल्ली की जनता को कई-कई लॉलीपॉप दिया, उसके बावजूद उसकी आलोचना नहीं होती. और यदि लॉलीपॉप से ही काम चल जाता तो उस सरकार को इस्तीफा देकर भागना नहीं पड़ता. कांग्रेस सरकार के पास अपने वोटरों को वास्तविक रूप से प्रभावित करने का मौका था और वह यह कर सकते थे कुछ विशेष फैसले लेकर. मसलन महंगाई से निपटने की बजाय उनका जोर कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के दाम कुछेक रूपये कम करने पर लगा रहा. कुछ टी.वी चैनलों को छोड़कर कहीं भी इस बजट को लेकर उत्साह नहीं दिख रहा है, यह इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस चुनावी साल में भी जनता की नब्ज पकड़ने से काफी दूर रह गयी है. यथार्थ तो यह है कि कांग्रेस के दुर्भाग्य ने उसे हर मोर्चे पर इतना पछाड़ दिया है कि खुद उसके मंत्रियों को रिकवर करना मुश्किल दिख रहा है. मुद्दों में जहाँ आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कब्ज़ा कर रखा है, वहीं भाजपा ने सुशासन और बेहतर अर्थनीति व विकास का खाका पेश किया है. ले-देकर एक साम्प्रदायिकता का मुद्दा उसके पास जरूर था, लेकिन राहुल गांधी के एक साक्षात्कार ने ८४ के दंगों को इतना उभार दिया कि अब यह भी मुद्दा उसके हाथ से फिसल गया है. प्रचार और प्रजेंटेशन में वह पहले से ही पीछे थे. ऐसी स्थिति में यह अंतरिम बजट उनके लिए एक उम्मीद की किरण था. लेकिन इसमें किसी दूरगामी मुद्दे का जिक्र नहीं करके सिर्फ जनता को मुर्ख बनाने का प्रयास दीखता है. और जैसा कि हमने पहले कहा कि जनता राजनैतिक रूप से पहले से काफी परिपक्व हो चुकी है. जो राजनीतिज्ञ या दल अपने आपको नए नियमों से अपडेट नहीं करेगा, वह रेस से बाहर हो जायेगा. केजरीवाल और मोदी का व्यापक और चमत्कारिक उभार इस बात का पुख्ता प्रमाण है.

 

last Budget by Chidambaram, article in hindi

Friday, 14 February 2014

हक़ तो उनको भी है - Political Right

by on 05:36
arvind_kejriwal_in_thoughtहक़ तो उनको भी है बेहद मुश्किल होता है जमी जमाई व्यवस्था में अपनी जगह बना पाना. अब जबकि आम आदमी पार्टी पर से आंदोलन और व्यवस्था-सुधार का खुमार काफी हद तक उतर चुका है और राजनीति की खुमारी छाने लगी है तब इस समस्त प्रकरण को थोडा उदार होकर देखा जाना आवश्यक हो गया है. हालाँकि इस वाक्य से केजरीवाल और उसकी टीम जरूर सहमत नहीं होगी, लेकिन यह बात दावे से कही जा सकती है कि उनकी असहमति भी राजनैतिक ही होगी. देश-सेवा और व्यवस्था-सुधार का दावा आखिर कौन नहीं करता है. भाजपा तो इसकी पुरानी ठेकेदार है ही, कांग्रेस जो शायद सर्वाधिक भ्रष्टाचारी रही है, वह भी देश सेवा और व्यवस्था सुधार का रोज दावा करती है.

इसलिए आप समर्थक भी यदि दलीय व्यवस्था में देशभक्त होने का दावा करते हैं तो उनको मान्यता मिलनी चाहिए, न कि उनको अराजक अथवा अनुभवहीन कहकर खारिज करते रहना चाहिए. एक वर्ग का ही सही, हक़ तो उनको भी है राजनीति करने का. हक़ उनको है पुरानी व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करने का. राजनीतिज्ञों और पूंजीपतियों के बीच भ्रष्टाचारी तालमेल पर प्रश्न खड़ा करने की स्वतंत्रता पर प्रतिप्रश्न क्यों होना चाहिए. इस सन्दर्भ में अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की चर्चा भी जरूरी हो जाती है. राजनीति के दावं-पेंच में नौसीखिए रहे आप के विधायकों को विधानसभा में पहले दिन से जिस प्रकार कांग्रेस और भाजपा के विधायक नीचा दिखा रहे थे, वह गौर करने का विषय है. चाहे आप विधायकों द्वारा ताली बजाना और टेबल थपथपाने का शुरूआती मसला हो, या अरविन्द केजरीवाल को असंवैधानिक कहने के सिलसिले का आखिरी जुमला हो, कांग्रेस और भाजपा के नेता इस नयी टीम कहें या उन्हीं के नए राजनैतिक भाई-बंधुओं को स्वीकार करने को क्षण भर को भी तैयार नहीं दिखे. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार किसी पिता का जायज पुत्र, उसकी नाजायज औलाद से दूरी बनाये रखता है. ये उदाहरण कुछ ज्यादा ही सटीक बैठ गया. लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पुराना राजनैतिक वर्ग इस नए राजनैतिक वर्ग को अभी भी नाजायज औलाद ही मानता है.

लेकिन लोकतंत्र में नियम तो यही कहते हैं कि नाजायज हो या जायज, उनका हक़ बराबर है. हाँ एक दुसरे को मान्यता देने से बाप को कष्ट नहीं होता है. यदि जनता को राजनैतिक दलों का बाप मान लिया जाय तो नयी और पुरानी दोनों व्यवस्थाएं उसी की संतानें हैं. और अब जब जनता चाहती है कि नई व्यवस्था को मान्यता मिले, तो इसमें पुरानी व्यवस्था को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए. वैसे भी, पुरानी व्यवस्था से जनता कुछ ज्यादा ही त्रस्त है. केजरीवाल के दिल्ली मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से उनकी अक्षमता का सन्देश निश्चित रूप से गया है, लेकिन उनके पास राजनैतिक रूप से बेहद कम विकल्प बचे थे. एक तो उनके लोक-लुभावन वादों पर से परदा उठने लगा था, दूसरा लोकसभा के लिए उनके नेतृत्व और जुझारूपन की कमी उनकी पार्टी साफ़ महसूस करने लगी थी. लेकिन इस्तीफा देने का इससे भी बड़ा कारण यह था कि भाजपा और कांग्रेस के धुरंधर और घाघ नेता उनको असंवैधानिक साबित करने में सफल होने लगे थे. अब यदि वह कुछ नहीं करते तो भी मुश्किल और कुछ करते तो असंवैधानिक. अब थोड़ा बहुत वह एक्सपोज तो जरूर हुए, लेकिन काफी कुछ राजनीति वह सीख गए. कम से कम इतना तो वह जरूर सीख गए होंगे कि अति उत्साह में खुद को अराजक नहीं कहेंगे. लेकिन वह जो प्रश्न उठा रहे हैं, उस पर स्थापित दलों को जवाब निश्चित रूप से देना पड़ेगा. नाजायज, नाजायज कह देने से उसका कानूनी आधार ख़त्म नहीं हो जायेगा. आखिर संविधान भी तो यही कहता है कि "हक़ तो सभी को है".

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Political Right article by Mithilesh.

Thursday, 13 February 2014

जिम्मेवार को सामने लाओ... - Telangana State

by on 05:51
संसद में होता तो बहुत कुछ रहा है, लेकिन तेलंगाना मुद्दे को लेकर संसद में जिस प्रकार का कृत्य हुआ, उसके जिम्मेवार को खोजा जाना जरूरी है. जनता जानना चाहती है कि क्या वही दो सांसद इस शर्मनाक हरकत के लिए पूर्ण जिम्मेवार हैं, अथवा इन सबके पीछे वोटबैंक की घटिया राजनीति और देश की बड़ी पार्टियां भी जिम्मेवार हैं. जिस प्रकार लोकतंत्र के मंदिर में, लोकतंत्र ही के देवता कहे जाने वाले सांसद, अपने व्यवहार से राक्षस नजर आये , उसने समूचे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है. दोष सिर्फ कांग्रेस और तेलगुदेशम के दो सांसदों को नहीं दिया जा सकता क्योंकि जिस प्रकार इस मुद्दे को कांग्रेस पार्टी पिछले कई महीनों से गरम कर रही थी, उसके सन्दर्भ में इस कृत्य पर आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए. आखिर कोई सरकार राज्यों के बंटवारे पर इतनी ज्यादा असंवेदनशील कैसे हो सकती है. राज्यों का बंटवारा भावनात्मक मुद्दा होता है, लोग इसे अपना जातीय मसला बना लेते हैं, और यही कारण है कि इस संघर्ष में हजारों लोगों की बलि हो चुकी है.

अब जब, दूसरे सांसदों की आँखों में काली-मिर्च का स्प्रे गया है, तब शायद उन्हें इस बात का अहसास हो कि उनकी राजनीति का स्प्रे जनता के जीवन में कितना जहरीला असर करता है. इस मुद्दे को बेहद शांत तरीके से और अंदरूनी तरीके से भी निपटाया जा सकता था, बजाय कि इस मुद्दे को चाकू की नोंक पर रखा गया. कई पत्रकारों को इस मुद्दे के जहरीले होने का आभाष तभी हो गया था जब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने इस मुद्दे पर आंध्र के सांसदों को दरकिनार करते हुए अपनी एकतरफा सिफारिश कर दी थी. दरअसल, इस मुद्दे के राजनीतिकरण को समझने के लिए हमें आंध्र की राजनीति पर दृष्टिपात करना होगा. कांग्रेस के बड़े छत्रप समझे जाने वाले आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस.राजशेखर रेड्डी की असामयिक मौत से कहानी की शुरुआत हुई. स्वाभाविक रूप से, खानदानी राजनीति का गढ़ रही कांग्रेस में स्व. रेड्डी के पुत्र जगन मोहन रेड्डी ने कुर्सी पर अपना दावा ठोंक दिया और जब कांग्रेसी आलाकमान ने उसको कुर्सी न देकर किरण कुमार रेड्डी को मुख्यमंत्री बना दिया तब जगन ने बगावत कर दी और कांग्रेस ने सीबीआई के माध्यम से उसे १६ महीनों तक जेल में रखा. आंध्र में हुए विधानसभा उपचुनावों में जहाँ कांग्रेस मुंह के बल गिर गयी, वहीँ जगन मोहन १४ सीटें जीतकर एक बड़ी ताकत बन गए. अब जगन को डाउन करने के लिए, कांग्रेस ने असमय तेलंगाना मुद्दे को हवा दी, और उसी के फलस्वरूप संसद में भारतीय लोकतंत्र की सबसे शर्मनाक घटना दर्ज हो गयी.

अब कांग्रेस इस मुद्दे को जला-जलाकर बेशक तेलंगाना में अपना आधार खड़ा कर ले, लेकिन जनता का और लोकतंत्र का जिस प्रकार अपमान और नुक्सान हुआ, उसकी भरपाई शायद कभी नहीं की जा सके. इसलिए, इस अपराध और राष्ट्रद्रोह जैसे कृत्य के असली जिम्मेवार न सिर्फ वह दो सांसद हैं, बल्कि वह भी हैं, जो राजनीति के पीछे छिपकर देश में जहर फैलाने का कार्य करते रहे हैं. इस मुद्दे पर उस राजनीति को जवाब देना चाहिए, जो जनता के हितों का रखवाला होने का दम भरती रही है. अन्यथा लोकतंत्र उसे कभी माफ़ नहीं करेगा, और ऐसी राजनीति को उसका पाप ले डूबेगा. यहाँ प्रश्न किसी एक राजनैतिक पार्टी का नहीं है, बल्कि गलत व्यवस्था का है. आखिर लोकतंत्र के हिस्से में तेलंगाना, मुजफ्फरनगर, गुजरात, सिक्ख दंगे शर्म ही तो हैं. या कुछ और, 'आप' भी तो सोचिये...!

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Telangana State article by Mithilesh

Tuesday, 11 February 2014

आखिर बेदाग़ क्यों हैं धोनी? Match Fixing

by on 05:53
यह भला कैसे सम्भव है कि किसी संस्था के कई सदस्य फिक्सिंग जैसे गम्भीर अपराध में शामिल रहे हों और उसी संस्था का सबसे महत्वपूर्ण और तेज-तर्रार खिलाड़ी एवं कैप्टन इन बातों से अनजान रहा हो. वैसे क्रिकेट में जिस प्रकार पैसे की आवाजाही एक विशेष रफ़्तार से शुरू हो चुकी है, उसने इस खेल को दागदार बनाने के तमाम रास्ते खोल दिए हैं. हालाँकि इस क्रिकेट की प्रशासनिक संस्था की एक बेहद ख़ास बात रही है, वह यह है कि चाहे बीसीसीआई के कोई भी अध्यक्ष, किसी भी दरमयान रहे हों, वह सीमा से काफी आगे तक ताकतवर रहे हैं. बात चाहे जगमोहन डालमिया की रही हो, या राजनेता शरद पवार हों अथवा निवर्त्तमान एन. श्रीनिवासन ही क्यों न हों, इन लोगों के पास बेइंतिहा ताकत रही है. कोई भी आरोप लगा ले, कोई कुछ भी कह ले, इन लोगों पर कुछ भी फर्क नहीं पड़ता है. यहाँ तक कि २०१३ में भी, जिसमें अनेकों हस्तियां जेल की हवा खा चुकी हैं, वह भी एन.

श्रीनिवासन का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकी. आसाराम, तेजपाल, लालू प्रसाद, संजय दत्त सहित अनेकों लोगों पर २०१३ का प्रकोप तो पड़ा, लेकिन बीसीसीआई के अध्यक्ष पर गम्भीर आरोप लगने के बावजूद, उनके दामाद के सीधे-सीधे फिक्सिंग में शामिल होने की पुष्टि होने के बावजूद उनका कुछ भी नहीं बिगड़ सका. नियम बदल कर वह महज कुछेक दिनों के लिए प्रक्रियाओं से दूर भर रहे, लेकिन इसके बावजूद वह अध्यक्ष बने रहे. बड़े कार्पोरेट के तौर पर पहचाने जाने वाले एन. श्रीनिवासन अब आईसीसी के भी अध्यक्ष बन चुके हैं, और उनके रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बड़े-बड़े राजनेता भी उनके सामने अपना मुंह बंद रखने में ही भलाई समझते हैं. मसलन, अरुण जेटली, राजीव शुक्ल, अनुराग ठाकुर और अन्य दूसरे. हालाँकि इस बात पर विवाद हो सकता है, लेकिन क्रिकेट के पैसे को राष्ट्र का पैसा क्यों नहीं माना जाना चाहिए. आखिर इस बात का क्या तुक है कि राष्ट्र के नाम पर लोकप्रिय हो रहे खेल और खिलाड़ियों पर कुछेक लोगों का एकाधिकार हो जाए. और न सिर्फ एकाधिकार हो जाए, बल्कि आईपीएल जैसे नए-नए तरीके निकालकर भविष्य की सम्पदा पर भी नियंत्रण कर लिया जाए. जरा सोचिये तो, एक बेहद भारी भरकम रकम, भारतीयों की जेब से निकल कर कुछ लोगों की जेब में जमा हो जाती है.

छोटे-मोटे कई खिलाड़ियों पर तो फिक्सिंग के आरोप लगते ही रहे हैं, लेकिन न्यायमूर्ति मुदगल की जांच रिपोर्ट के माध्यम से अब फंसे हैं देश के लोकप्रिय भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी. उन पर सीधे-सीधे आरोप लगाते हुए कहा गया है कि धोनी चेन्नई सुपर किंग्स के गुरुनाथ मयप्पन को बचाने में शामिल रहे हैं. यह बात कितनी सच है अथवा झूठ है, यह तो जांच का विषय हो सकती है, लेकिन पैसे के इस खेल में किसी का चरित्र पतन होना बिलकुल भी नयी बात नहीं है. धोनी को इस बात की छूट नहीं दी जा सकती है क्योंकि वह भारत को विश्व-कप दिलाने वाले कप्तान हैं. बल्कि इसके लिए तो उनकी और भी कड़ाई से जांच की जानी चाहिए और दोषी साबित होने पर उनके ऊपर यथा योग्य प्रतिबन्ध लगना चाहिए. इसके साथ साथ इस बात की मांग भी जोरों से उठनी चाहिए कि क्रिकेट को भी खेल मंत्रालय के अंतर्गत लाया जाए और क्रिकेट की ताकत और पैसे के ऊपर राष्ट्र का सीधा नियंत्रण हो, न कि कुछेक लोगों का. इसी में क्रिकेट की भी भलाई है और राष्ट्र की भी.

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