Thursday, 18 September 2014

Hindi Diwas, Pakhwara and China Relations with India

by on 08:08
Hindi Diwas, Pakhwara and China Relations with India

 



हिंदी पखवाड़ा चल रहा है. .... और मुझे आश्चर्य हो रहा है कि 'स्वभाषा, स्वरोजगार' की बात करने वाले महान जन चुप क्यों हैं? क्या उनको सच समझ नहीं आ रहा है या... कुछ और !
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मेरी फ्रेंड लिस्ट में भी 500 से ज्यादा शुद्ध साहित्यकार जुड़े हैं, जिनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. क्या वह सभी बुद्धिजीवी चीन के साथ इस तरह के सम्बन्ध से सहमत हैं? क्या वह नहीं जानते कि चीनी सामान हमारे लघु और कुटीर उद्योगों के साथ बड़ी देशी कंपनियों की क्या गत करेंगे?
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तो फिर चुप क्यों हैं प्रबुद्ध जन? क्या वह भी किसी ख़ास मैजिक में बंध गए हैं?






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Hindi Diwas, Pakhwara and China Relations with India in Hindi.

Wednesday, 17 September 2014

Hindi Chini Bhai Bhai

by on 08:32
Hindi Chini Bhai Bhai

कितना बढ़िया नारा है, "हिंदी-चीनी, भाई-भाई"... !
पर भीतर कहीं कुछ जलता है इस नारे के सुनकर :-
‪#‎china‬ ‪#‎foreignpolicy‬ ‪#‎achchhedin‬ ‪#‎ahmedabad‬

 

Hindi Chini Bhai Bhai

Keyword: Hindi, Chini, Bhai Bhai, china, India, Bharat

Saturday, 13 September 2014

अर्थोपार्जन की भाषा बने हिंदी – Hindi

by on 17:02
Hindi is our mother language    हिंदी पखवाड़े के समापन के अवसर तक काफी विद्वानों ने विभिन्न मंचों पर अपने विचार व्यक्त किये हैं. स्वभाषा की बात हुई, साथ में स्वरोजगार की बात हुई, स्वशासन, स्वतंत्रता इत्यादि तमाम बातें भाषा से ही तो शुरू होती हैं. इस क्रम में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि देवनागरी लिपि विश्व भर की दूसरी लिपियों में सर्वाधिक वैज्ञानिक है. इसके साथ ही हिंदी भाषा, चीनी मंडारिन और अंग्रेजी के बाद विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा भी है. इसमें अंग्रेजी और हिंदी बोलने वालों की संख्या ५० करोड़ के आस पास ही है. सूचना प्रोद्योगिकी, वेबसाइट बिजनेस से जुड़ा हुआ हूँ, इसलिए ऑनलाइन बिजनेस से जुड़े हुए आंकड़ों पर जब नजर डालता हूँ तो देख कर ख़ुशी होती है कि लगभग सभी बड़े व्यापारिक घराने अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी अपनी वेबसाइट के माध्यम से उपस्थित रहने की सफल कोशिश कर रहे हैं. हालाँकि हिंदी कंप्यूटर इत्यादि माध्यमों के लिए उतनी सरल अभी भी नहीं बन पायी है, इसके बावजूद मेरे पास वेबसाइट जब वेबसाइट बनने के लिए आती है तो ३ में से १ कस्टमर वेबसाइट को हिंदी में भी रखने का आग्रह करता है. कुछ नहीं तो ऑनलाइन ट्रांसलेटर ही लगाने को कहता है, जिससे बिना कोई अतिरिक्त मेहनत किये, उसके अंग्रेजी कंटेंट ही हिंदी में देखे जा सकें. यह प्रयास 70 फीसदी से ज्यादा शुद्ध होता है. सरकारी स्तर पर भी लगभग सभी वेबसाइट हिंदी में भी उपलब्ध हैं. फेसबुक की दुनिया से हम सब जुड़े ही हैं. भारत में तो मुझे लगता है, देवनागरी में फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की संख्या अंग्रेजी से दोगुनी हो गयी है. हिंदी की सहयोगी अन्य भाषाओँ को मिला दिया जाय, तो यह संख्या फेसबुक की तीन चौथाई हो जाएगी.

लेकिन, ऑनलाइन बिजनेस से जुड़े होने के कारण इससे जुडी समस्याओं पर फोकस करना चाहूंगा. जब तक कोई भाषा, कोई संस्कृति, शिक्षा सीधे तौर से ‘अर्थोपार्जन’ से नही जुड़ पाती है, उसकी स्वाभाविक प्रगति संदिग्ध हो जाती है. हिंदी इस मामले में आज़ादी के बाद से ही दुर्भाग्यशाली रही है. उदाहरण के तौर पर ब्लॉगर्स की बात करूँगा. अपने ब्लॉग लिखकर कई अंग्रेजी के लेखक बढ़िया पैसे कमा रहे हैं, वहीं हिंदी लेख से युक्त ब्लॉग शुरू से दिक्कत में फंस जाता है, जबकि उनके पाठक भी पर्याप्त हो रहे हैं, इसके बावजूद यह हाल होता है कि हिंदी ब्लॉग/ वेबसाइट के लिए गूगल एडसेंस या दुसरे प्लेटफॉर्म एप्रूवल ही नहीं देते हैं. इसी तरह देशी, विदेशी जितने भी उत्पाद बन रहे हैं, उन सभी के मैनुअल हिंदी में हों तो हिंदी के जानकारों को न सिर्फ काम मिलेगा, बल्कि उस उत्पाद की समझ भी भारतीय खरीददारों को ठीक तरह से हो पायेगी. हेल्थ इन्सुरेंस, मोटर इन्सुरेंस या लाइफ इन्सुरेंस के अधिकांश मैनुअल, फॉर्म्स- प्रपत्र हिंदी में क्यों नहीं आते हैं, यह बात कई बार सोचने पर भी मुझे समझ नहीं आती है. यहाँ यह बताना मैं आवश्यक समझता हूँ कि देश में अंग्रेजी बोलने और समझने के बावजूद लोग हिंदी में ही सुविधा महसूस करते हैं. जैसे मैंने उपरोक्त प्रपत्रों की चर्चा की, जो अंग्रेजी में रहने पर हम उसकी हेडिंग या एक पैरा ही पढ़ पाते हैं, जबकि वह हिंदी में रहने पर उतने ही समय में हम पूरा पेज पढ़ जाएँ. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि फॉर्म भरने वालों में से 90 फीसदी लोग उसके बारीक प्रावधानों को पढ़ ही नहीं पाते हैं, न समझ पाते हैं, और इसका सबसे बड़ा कारण इन सबका हिंदी में नहीं होना है. प्रशासनिक दफ्तरों, अदालतों इत्यादि की कार्यवाही पर हिंदी के विषय में चर्चा न ही करना उचित है, क्योंकि इसे न कोई सुनने वाला है, न समझने वाला. अभी हाल ही में एक चर्चा बड़ी तेजी से फैली थी कि अदालती आदेश हिंदी में ही लिखे जाएँ, क्योंकि फैसले से सम्बंधित व्यक्ति उसे समझने के लिए वकील या दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं.

ऐसा नहीं है कि इन सब बातों से हम परिचित नहीं हैं. लेकिन यह बात बार-बार दोहराना पड़ेगा हमें, ताकि नीति-नियंत्रकों के कानों में यह बात हथौड़े की तरह लगे. पंहुचती तो वह पहले भी रही है. हालाँकि हिंदी मनाने और उसको प्रोत्साहित करने के तमाम सरकारी, गैर-सरकारी प्रयास हो रहे हैं. और इन सब प्रयासों का सकारात्मक असर भी दिख रहा है. सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि हिंदी, गैर-हिंदी भाषाओँ का मुद्दा समय के साथ राष्ट्रहित की खातिर सकारात्मक हो गया है. अब लगभग सभी लोग हिंदी की प्रगति की खातिर कमर कस रहे हैं. अनेक गैरहिंदी भाषाई साहित्यकारों द्वारा साहित्य रचनाएं हो रही हैं. लेकिन सरकार को उपरोक्त वर्णित मामलों में सख्ती से नियमन करना होगा, जिससे उत्पाद, अर्थोपार्जन में हिंदी की सहभागिता तेजी से बढे. और तभी हम हिंदी के पक्ष में सार्थक पहल होते देखेंगे और शायद तब हमें हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा मनाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. आखिर सार्थकता यही तो है हिंदी पखवाड़े की. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी क्या खूब कहा है -
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति का मूल”
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल”

- मिथिलेश, उत्तम नगर, नयी दिल्ली.

Article on Hindi Bhasha by mithilesh

Friday, 12 September 2014

Sanyukt Parivar par charcha in Hindi

by on 08:39
Sanyukt Parivar par charcha in Hindi

 


जिस तरह पेड़ से पत्ता आज़ाद होकर कुछ देर हवा में उड़ता है, लेकिन अंततः वह निर्जीव हो जाता है, ठीक उसी प्रकार मानव अपने परिवार, या यूं कहें कि संयुक्त परिवार से अलग होकर लगभग मृत हो जाता है. ‪#‎family‬ ‪#‎UnitedFamily‬ ‪#‎CombinedFamily‬ ‪#‎human‬‪#‎culture‬





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  • Dinesh Goel किन्तु ये आजकल का चलन है, आजकल के बच्चे संयुक्त परिवारों की ज़िम्मेदारी से भागते हैं, और विकासवाद के राह पर चलते हुए सभी विदेशी कंपनियों माय ये सिखाया जाता है की तुम्हारा परिवार सिर्फ तुम्हारी बीवी और बच्चे हैं बाकी सब तुम्हारे ऊपर बोझ है या तुम्हारी तरक्की मे रुकावटें हैं, शायद इसीलिए आजकल बच्चे शादी करके माँ बाप से भी अलग हो जाते हैं और कहते हैं की अब हम बडे हो गए हैं















  • Mithilesh Kumar Singh जी, ठीक कहा आपने! लेकिन इसके जिम्मेवार क्या हम नहीं हैं. आखिर, बच्चे हमसे काट क्यों रहे हैं, इस प्रश्न पर विचार करना जरूरी है. यदि आप के पास समय हो तो इस विषय में मेरा प्रकाशित लेख अवश्य पढ़ें और अपनी बहुमूल्य राय से हमें पुनः अवगत कराएं... http://website.mithilesh2020.com/senior-citizens-india.../


















    What is the situation of Senior citizens in India is...


    WEBSITE.MITHILESH2020.COM



























  • Chander Prabha Sood परिवार एक वटवृक्ष की तरह होता है। जो शाखा अलग होगी उसकी स्थिति को सभी जानते हैं। एकल परिवार में बच्चों की सुरक्षा की समस्या अहम है। आज युवा पीढ़ी समझदार है वह परिवार की संयुक्तता को समझने लगी है। घर-परिवार में सामंजस्य बना रहे इसके लिए केवल बच्चों को या केवल बड़ों को ही नहीं बल्कि सभी का साँझा प्रयास आवश्यक है।

















  • Mithilesh Kumar Singh आपका कथन सौ फीसदी उपयुक्त है Chander Sood Ji. वस्तुतः जो हमारा सामजिक ढांचा अब तक मौजूद था, विभिन्न कारणों से वह कहीं न कहीं छिन्न भिन्न हो चूका है, जबकि नया ढांचा बनने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती है. जरूरत है समाजशास्त्रियों को इस विषय पर गंभीर चिंतन करने एवं समाज को सैद्धांतिक दिशा देने की. सिद्धांत के बाद उसके व्यवहारिक रूप पर कार्य शुरू हो सकेगा... आपके सार्थक विचार के लिए आपका बहुत आभार.















  • Manoj Kamboj संयुक्त परिवार यानी एक छत के नीचे, एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी. जहां सारे निर्णय मिल कर लिये जाते हों. परिवार का हर सदस्य एक-दूसरे के साथ तन्मयता से रहता हो! पिछले कुछ सालों में सोच के साथ-साथ लोगों के रहन-सहन व तौर-तरीके भी बदले हैं. पिछले कुछ वर्षो की बात करें, तो नौकरी के लिए युवाओं का पलायन एवं स्वतंत्रता के लिये संयुक्त परिवार तेजी से एकल परिवार में तब्दील हुए हैं। जिस पर चिंतन मनन करने की आवश्यकता हैं।














Sanyukt Parivar par charcha in Hindi

Keyword: parivar, sanyukt parivar, united family, joint family

Friday, 5 September 2014

Indian Prime Minister Speech on Shikshak Diwas

by on 08:57
Indian Prime Minister Speech on Shikshak Diwas

 

कई लोग कह रहे हैं कि आज 'शिक्षक-दिवस' था, बाल दिवस नहीं. प्रधानमंत्री जी के सन्दर्भ में...
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अरे भाई, घर में किसी बड़े को समझाना होता है तो तेज आवाज में बच्चों को समझा दिया जाता है.... उम्मीद है, आवाज अध्यापकों तक पहुँच गयी होगी. अध्यापक द्वारा भी विद्यार्थियों के माध्यम से उन्हें फंसाने की काफी कोशिशें हुई... पढ़ें सारी उनकी बातें, सब शिक्षको के लिए ही तो है. http://goo.gl/xPz5NG

Indian Prime Minister Speech on Shikshak Diwas

Monday, 1 September 2014

जैकेट पहन चले नेताजी - Leaders

by on 10:12
leader-cartoonजैकेट पहन चले नेताजी,
छुपा लिए सब पाप
उस श्रेणी में न रखियो हमें
उतार दियो मैंने ‘आप’

उतार दियो मैंने ‘आप’,
पड़ी यह जैकेट भारी
देह, ह्रदय पर बोझ पड़ा
हुआ मैं दुखियारी.

मिथिलेश हुए कन्फ्यूज,
कुछ समझ न आया
छोड़छाड़ कर धन्य हुए,
जैकेट की मोहमाया.

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली

Poem by mithilesh on Indian Leaders and their leadership

Saturday, 30 August 2014

साथ साथ हमें चलना होगा - Art of Life

by on 17:15
Aaryansh-son-of-mithileshचलना होगा,
साथ साथ हमें चलना होगा
स्व-अहम को छलना होगा
रूठों के पाँव में पड़ना होगा
ऊँच-नीच, भेद-भाव,
जात-पात को तजना होगा

जगना होगा
सुबह सुबह हमें जगना होगा
सूरज का स्वागत करना होगा
मन की, तन की, जीवन की
प्रकृति समझना होगा
अंधियारा होने से पहले
अपनों के साथ में होना होगा

 
जीवन की अंधी दौड़ है क्या
परख उसे सजगना होगा
बूढी आँखों के अनुभव को
हमें पास बैठ कर लेना होगा
विकृत होने से बचना होगा
‘रहे पास में तेरे धर्म सदा’
इस हेतु ‘ससंगत’ करना होगा.
- मिथिलेश
(पुत्र ‘आर्यांश’ के तीसरे जन्मदिवस की सुबह पर आशीष स्वरुप दो पंक्तियाँ)
३१-०८-२०१४, उत्तम नगर, नई दिल्ली

Mithilesh wrote a poem on Art of Life.  The occassion is birthday of my son ‘Aaryansh’.

Thursday, 28 August 2014

मेजर ध्यानचंद को ‘भारत-रत्न’ मिलने से भारतीयों को सर्वाधिक ख़ुशी होगी - Bharat Ratna Award

by on 17:36
आत्मगौरव तब जगाया उस शख्स ने,

ज़िन्दगी जब मौत के पहलू में थी.
कहने को कहती रहे कुछ भी ये दुनिया,
हर जीत उसकी ‘स्वर्ग’ से कुछ कम न थी…

दुनिया का तानाशाह उसका ‘फैन’ था
पहचान उसकी थी यही वह ‘सैन्य’ था
जो ले ‘छड़ी’ मैदान में वह आता था,
उल्टी तरफ का हर कोई छक जाता था

रुकता न था, थकता न था माँ भारती का लाल वह
मैदान में बन जाता था प्रतिपक्ष का फिर काल वह
‘जज्बे’ का सौदा करने की कोशिश हुई
मेजर डिगा नहीं, वह न था छुई-मुई

अनदेखा कर सरकारों ने बड़ी भूल की
कई पीढ़ियां, इस हेतु ना प्रेरित हुईं
है मौका अबकी बार और दस्तूर है
दो ‘भारत-रत्न’ उसको वतन का जो नूर है.

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

In the support of Major Dhyanchand for Bharat Ratna Award, hindi poem by mithilesh.

Wednesday, 27 August 2014

Transfer and Resignation from the Post of Governor

by on 09:17
Transfer and Resignation from the Post of Governor

 

नेता लोग पहले अधिकारीयों को डराने के लिए ट्रांसफर का बड़ा सहारा लेते थे. एक समय तो यह बड़े उद्योग के रूप में कुख्यात हो गया था. ... अब राज्यपालों पर इस की आजमाइश हो रही है.

Transfer and Resignation from the Post of Governor

Mahamahim, Rajyapal, Governor, Modi Sarakar, Transfer

Shiela Dixit Resignation from the Post of Governor

by on 09:10
Shiela Dixit Resignation from the Post of Governor

 

बताया जाता है कि मोदी सरकार इसके बाद शीला दीक्षित को मिजोरम भेजने की तैयारी में थी, लेकिन इससे पहले ही उन्होंने इस्तीफा देना उचित समझा।

Shiela Dixit Resignation from the Post of Governor and the politics behind this.

Keyword: Shiela Dixit, Governor, Rajyapal, Modi Sarakar

 

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