Thursday, 4 December 2014

Rohtak Brave Girls and Public Debate

by on 05:31
Rohtak Brave Girls and Public Debate

 



... रोहतक की दो लड़कियों का चरित्र- हनन खूब किया जा रहा है. गाँव की राजनीति से लेकर, जाट-राजनीति तक पूरा पुरुष-समाज एक होकर उनको गलत साबित करने में लग गया है, जैसे वह लडकियां 'इस्लामिक स्टेट' की सदस्य हों-
"आक थू ... ऐसी मानसिकता पर"
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इन सभी के अनुसार उन लड़कियों को चुपचाप अपना 'रेप' करा लेना चाहिए था, ओह सॉरी, रेप नहीं 'गैंग-रेप' !!






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  • Ranbir S Phaugat कुछ ज्यादा ही आगे का सोच लिया है. आप और हम वहाँ नहीं थे, इसलिये ऐसी टिप्पणी को मैं उचित नहीं मानता.















  • Mithilesh Kumar Singh महोदय, हम यहाँ हैं और देख रहे हैं नारी का बलात्कार किसी प्रकार हो रहा है. और हाँ! लोग सच्चाई की बहुत दुहाई दे रहे हैं... आखिर सच्चाई-प्रिय देश के नागरिक जो हैं. बहुत खूब!















  • Mithilesh Kumar Singh ... सच्चाई की दुहाई देने वालों की असलियत आप और हम सभी जानते हैं. यदि उन सभी के सामने सड़क पर कोई बलात्कार हो तो वह लड़की को बचाएंगे कम और उसे 'छूने' की कोशिश ज्यादा करेंगे. उसे बचाकर किसी कोने में ले जाना चाहेंगे. आप हम क्या सुनना चाहते हैं. आंकड़े उठकर देख लीजिये, रोज देश में, दिल्ली में, हरियाणा में यही होता है. कोई शोर नहीं होता, कोई सच्चाई की बात नहीं होती, कोई आंदोलन नहीं होता. आज इतना शोर क्यों?? क्यों पुरुष घबरा गए हैं ?? क्यों डर गए हैं ??















  • Arun Kumar पुरुष सदा से ही कमजोर था, रहा है और रहेगा ...................उसे फिर से याद दिलाना होगा की जीवन का पहला थपड़ उसे नारी ने ही मारा था ................और अपने जीवन के ऐसे कई थप्पड़ वो............. १०-१२ साल कहा चुका है
    इसलिए उसके अन्दर हीन भाव स्थापित हुआ है...................ये सब उसके हीन भाव ग्रसित होने के लक्षण है















  • Dheeren Singh Janab ye mat bhuliye bina aag dhunaa nahi uthata....















  • Mithilesh Kumar Singh उन लड़कियों को निर्दोष साबित नहीं कर रहा हूँ मैं, लेकिन उनको माध्यम बनाकर पूरी औरत जात को गलत साबित करना का पिछले तीन-चार दिन से बेहद घिनौना प्रयास हो रहा है. यह प्रयास उसकी मुखरता को कुचल देने का है और टीवी चैनल से लेकर सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की एकतरफा टिप्पणियां चल रही हैं, वह निश्चय ही शर्मनाक है. कोई इस बात के लिए आवाज नहीं उठा रहा है कि यदि किसी भी लड़की के आत्मसम्मान पर कोई लड़का, युवक, पुरुष आँख उठा कर देखता है, तो उसकी उसी रूप में नारी जवाब दे सकती है.















  • Manoj Kamboj भाई साहब कहानी कुछ अोर ही हैं















  • Mithilesh Kumar Singh काम्बोज जी, इस मैटर को इतना हाईलाइट होना ही नहीं चाहिए था. पर न्यूज चैनलों की फितरत कौन बदले... अब यह मुद्दा कहीं से कहीं पहुँच गया है. अब इस चर्चा को अतिवादियों ने लड़कियों के खिलाफ हथियार बनाना शुरू कर दिया है. आपत्ति इस बात से है. लड़कियों पर कितना अत्याचार हो रहा है, इस बात को कौन नहीं जानता है. कोई चूं नहीं होती है, और इस एक व्यक्तिगत मैटर पर इतना हंगामा क्यों?? इसे कुंठित लोग अपनी आदत और वासना से जोड़कर इसको फैला रहे हैं और खूब मजे ले लेकर लड़कियों की इस वीडियो को, उस वीडियो को शेयर कर रहे हैं. न्यूज चैनलों की क्या कहें, वह तो ग्राम प्रधान से लेकर, पता नहीं किसको-किसको बैठा कर ... !!

















  • Ananadsuman Singh SEHMAT, YEH MANSIKTA UCHIT NAHIN















  • Rohit Yadav I agree with you Mithilesh Ji. I appreciate those girls for blowing the whistle. She herself mentioned in an interview that it was not the first time she has beaten such cheap boys. She claimed that she will continue doing so until people around her st...See More















  • Abhiraj Singh Thakurela Jaanch ke bad hi kuchh kaha ja skta h..aap aise kisi jati ki mansikta par thook ni skte Bhaisahab...Bina jaanch padtal ke natije nahi sunane chahiye aur na hi raay kayam krni chahiye...















  • Abhiraj Singh Thakurela Agar ladke doshi hn to saza jaroor honi chahiye...agar nahi to ldki ko saza honi chahiye...bat sahi aur galat ki h...kisi case ko lkr kisi jati ki mansikta tay ni ki ja skti...















  • Abhiraj Singh Thakurela Aur dusri bat is matter ko aapsi baton se suljha lena chahiye tha...ise itna badha diya ki ldko ke career pe aanch aa gyi...aur career se khilwaad hone se ek yuva galat raah pakad leta h...iske kai examples b hn...Aur dusri bat jat yuva ka dimag kharab ho to museebat duguni ho jati h kyunki wo ghayaal sher se jyada aakramak ho uthta h...















  • Kumar Chandra Bhushan Is episode ke baad girls jab bhi resist karengi to unhe apne pavitra hone ka certificate pahle dena parega,shame on this male dominated society















  • Merapata In मिथलेश जी लड़कियों को छेड़ना, परेशां करना गलत है लेकिन इस केस मैं ऐसा नहीं लगता है. एक बार ट्रेन मैं मेरे सामने एक लडकी ने एक अधेड उम्र के व्यक्ति को उठा कर बैठगई.और उस व्यक्ति को तमाम गन्दी गलिया देती रही. बार बार चप्पल से मारने कि धमकी देती रही.















  • Mithilesh Kumar Singh आपकी बात अपवाद ही है अभी। सवाल है कि पचास अत्याचार या कहें कि पचास हजार अत्याचार हम करते हैं, उनकी ओर से एक आवाज आयी तो तूफ़ान मच गया। हमारी सहिष्णुता की पराकाष्ठा है जी यह... ढोंग की पराकाष्ठा तो हम पहले ही पार कर चुके हैं।















  • Abhiraj Singh Thakurela Dhong koi b kar skta h chahe ldka ho ya ldki...koi patent ni h dhong ka ki ldke hi krenge ya ladkiyan krengi...justified bat honi chahiye...Bharat ke kanoon me likha h ki chahe nirdoshi ko bachane k liye 1000 gunahgaar chhodne pade to wo jaayaj h...Hum...See More

















  • Mithilesh Kumar Singh अभिराज बाबू, आपकी लाइब्रेरी में काफी किताबें हैं. इतिहास पढ़ो और समझो, फिर देखोगे कि ढोंग का ठेका पुरुष समाज ने अकेले उठा रखा है, तब से अब तक. ईमानदारी से तुलना करो... फिर आपको उनका दर्द पता चलेगा. और यही कारण है कि देश में साल भर में .२५००० रेप केसेज द...See More


















    Rape in India is the fourth most common crime against...


    EN.WIKIPEDIA.ORG



























  • Kumar Chandra Bhushan Salute these two brave girls who assaulted the boys may be on the reason of petty fight and not molestation but it will certainly inspire lakhs of girls who are subjected to all kind of atrocities by males on daily basis and every where.










  • Mithilesh Kumar Singh







Rohtak Brave Girls and Public Debate

Tuesday, 2 December 2014

गूगल सर्च, जीमेल एवं गूगल कैलेण्डर :: कुछ अन्य फीचर्स - Google Search, Gmail and Google Calenders!

by on 23:48

  • गूगल सर्च: दुनिया का सबसे बड़ा सर्च इंजिन. इसकी महत्ता का अंदाजा आप इस बात से ही लगा लीजिये कि गूगल भगवान, गूगल देवता इत्यादि उपनाम सब इसी गूगल-सर्च के ही हैं. यदि इंटरनेट आज सूचनाओं का इतना बड़ा श्रोत बना है तो उसमें गूगल का योगदान सर्वाधिक है. हम आप सर्च करते ही हैं, लेकिन सर्च को और भी स्पेसिफिक बनाने के लिए कई लोगों की तरह आप भी 'सर्च टूल' का इस्तेमाल करें. 'सर्च टूल' सर्च बार के ठीक नीचे ही होता है. इस 'सर्च टूल्स' को क्लिक करते ही देश के हिसाब से, समय के हिसाब से ऑप्शन मिल जायेंगे. यदि आप इमेज सर्च कर रहे हैं तो इमेज की साइज, कलर, टाइप इत्यादि ऑप्शन आपकी सर्च को काफी हद तक सुविधाजनक बना सकते हैं. यदि आप बोल कर सर्च करना चाहते हैं तो 'सर्च बटन' के पास में माइक्रोफोन का ऑप्शन आपकी मदद कर सकता है. आपके मोबाइल फोन में यह ऑप्शन तो आपकी बहुत मदद करता है.


[gallery ids="349,350,347"]

  • जीमेल: गूगल की दूसरी सबसे लोकप्रिय सर्विस इसकी मेल सर्विस है. आज के समय में पूरे विश्व की इमेल्स में २३ फीसदी से ज्यादा मार्किट शेयर अकेला जीमेल का है, जबकि इसके सबसे करीब याहू (१० फीसदी) और हॉटमेल (१० फीसदी) ही हैं. आप में से अधिकांश लोग भी इस मेल को जरूर इस्तेमाल करते होंगे. मेल भेजने के अतिरिक्त आप इसकी सेटिंग में जाकर तमाम सुविधाओं का लाभ भी ले सकते हैं, जिसमें सिग्नेचर एड करना, वेकेशन रेस्पोन्डेर एड करना, लेबल्स (फोल्डर) मैनेज करना, इनबॉक्स की प्रायोरिटी मैनेज करना, POP3 अकाउंट से मेल भेजना एवं प्राप्त करना, मेल को फ़िल्टर करना एवं अपनी सभी मेल को या फ़िल्टर्ड मेल को दूसरी मेल पर फॉरवर्ड करना, जीमेल ऑफलाइन इस्तेमाल करना (क्रोम-प्लगइन), विभिन्न प्रकार की थीम/ डिज़ाइन इस्तेमाल कर सकते हैं. यह सभी फीचर अत्यंत ही उपयोगी एवं इस्तेमाल में सरल हैं. इसके अतिरिक्त जीमेल-सेटिंग की 'लैब'-टैब में आपको तमाम सुविधाएं मिलेंगी, जिन्हें सक्रीय करके आप अपने मेल अनुभव को और भी बेहतर कर सकते हैं जैसे- मेल अनडू (मेल भेजने के कुछ सेकण्ड बाद तक आप उसे वापस कर सकते हैं). इसी तरह अनरीड-आइकॉन, मल्टिपल इनबॉक्स जैसी तमाम सुविधाएं आपका मनमोह लेंगी. हालाँकि इन्हें इस्तेमाल करने के लिए, पहले पहल थोड़ी उलझन जरूर होगी, लेकिन आगे आप खुद ही समझते जायेंगे. किसी प्रकार की असुविधा होने की स्थिति में आप मुझे, यानि मिथिलेश को- 9990089080 पर फोन कर सकते हैं.


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  • गूगल कैलेंडर: गूगल की जो दूसरी सबसे प्यारी एवं उपयोगी सर्विस लगती है, वह निश्चित रूप से गूगल कैलेंडर ही है. इसमें आप अपने तमाम कार्य सूचीबद्ध (Schedule) कर सकते हैं, और यह ठीक नियत समय पर, या उसके पहले आपको मेल द्वारा, पॉप अप द्वारा आपको याद दिल देगा कि आपको अमुक काम करना है. यही नहीं, आप इसके माध्यम से किसी भी इवेंट के लिए गेस्ट की मेल भी डाल सकते हैं, जिससे वह इस इवेंट की अपडेट से पल-पल जुड़ा रहेगा. इसे आप एक ईआरपी की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं.


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गूगल की शेष सर्विसेस के बारे में आपसे आगे चर्चा होगी.

Google Search, Gmail and Google Calenders informations, tips in Hindi by Mithilesh

Poem on Fear factor in Hindi by Mithilesh

by on 05:56
Bhay n ho to kshay n ho poem by mithilesh

 

भय न हो,
तो क्षय न हो
डर हो गर,
तो स्वर न हो
नित्य बात यूंही कर
चुनौतियां जाएं मुकर



- मिथिलेश (दो पंक्तियाँ)

‪#‎fear‬ ‪#‎poem‬, ‪#‎kavita‬ ‪#‎problems‬ ‪#‎raise‬

Poem on Fear factor in Hindi by Mithilesh

Deepika Cleavage Issue and Gohar Khan slapped issue

by on 05:53
Deepika Cleavage Issue and Gohar Khan slapped issue

 

जूनियर आर्टिस्ट काम करने वाले अकील ने बताया कि वह उनकी तरफ सेक्शुअली अट्रैक्ट हो जाता है, जो छोटे शॉर्ट स्कर्ट पहनती हैं...
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आमतौर पर हर मामले पर अपनी आवाज बुलंद करने वाले बॉलिवुड सिलेब्स इस मामले पर बिलकुल चुप हैं। इन सिलेब्स ने दीपिका पादुकोण के क्लीवेज विवाद पर भी काफी मुखर होकर अपने रिऐक्शन दिए थे, लेकिन 2 दिन से गौहर के मुद्दे पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। सलमान खान तो बिग बॉस के होस्ट हैं, इसके बावजूद उन्होंने बिग बॉस के पिछले सीजन की विनर गौहर के सपोर्ट में कुछ नहीं कहा। आमिर खान, जो सत्यमेव जयते में महिलाओं के मुद्दों को उठाते हैं, उन्होंने भी इस पर कुछ नहीं बोला।
‪#‎celebs‬ ‪#‎film‬ ‪#‎gauhar‬ ‪#‎sexuality‬ ‪#‎crime‬ ‪#‎slap‬
http://goo.gl/YfGyT3

Deepika Cleavage Issue and Gohar Khan slapped issue

Keyword: Deepika, Gohar khan, Short dresses, Cleavage issue, slapping issue

संस्कृति के तथाकथित 'ठेकेदार' - Indian Culture and The Contractors!

by on 03:47
समाज कल्याण के लिए एक समय जिस परंपरा को लोग सहर्ष स्वीकार करते हैं, वही परंपरा कई बार अपने सड़े-गले रूप में सामने आती है, जिससे सिवाय दर्द और मवाद के कुछ और नहीं निकलता है. भारतवर्ष में इसका सर्वोत्तम उदाहरण इसकी जाति-व्यवस्था है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के जिस वर्गीकरण के माध्यम से हमारे ऋषि-मुनियों एवं प्राचीन समाज शास्त्रियों ने सामाजिक व्यवस्था को सरल बनाने का प्रयास किया था, कालांतर में वह व्यवस्था दूषित होती गयी. न सिर्फ प्राचीन काल, मध्य काल में बल्कि आधुनिक काल में भी इस जाति व्यवस्था ने समाज को जितनी हानि पहुंचाई है, उतनी हानि शायद परमाणु बम या कोई दूसरा आधुनिक हथियार भी नहीं पहुंचा सकता है. एक तरफ देश भर के राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति को साधने के लिए जाति-भेद को टकराव के रास्ते पर ले जाते हैं, तो दूसरी ओर समाज भी देशभक्ति एवं शिक्षा को दरकिनार कर जातिगत टकराव को बढ़ाने का कार्य निरंतर जारी रखे हुए है. अपनी महानता का गुण गाते न थकने वाली विभिन्न जातियों, उपजातियों के पास सिर्फ एक कार्य है, और वह है दूसरी जातियों को नीचा दिखाना और अपने अनुकूल स्थिति होने पर उनके प्रति शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हिंसा करना, उनका शोषण करने की कोशिश करना.

यह भी एक कटु सच है कि भारतीय समाज की ऊँची जातियों ने अब तक अपने से कमजोर जातियों का भरपूर शोषण किया है, और जैसा कि परिवर्तन संसार का नियम है तो धारा अब विपरीत दिशा में बहने को तैयार बैठी है. मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय की अगली पीढ़ी के अधिकांश युवक परले दर्जे के नालायक और कामचोर बन रहे हैं. उनके पूर्वजों ने जो ज़मीन इकट्ठी कर रखी थी, उस पर उनसे खेती होती नहीं है, साथ में आधुनिकता के लिहाज से उनसे अध्ययन भी नहीं होता है, जिससे सरकारी नौकरियों में उनके अवसर सीमित हो गए हैं. बिचारे समाज के ठेकेदार रहे हैं, समाज को दिशा देने और उसकी रक्षा करने का गर्व माथे पर लगाये घुमते हैं, तो उनसे छोटा-मोटा काम भी नहीं होता है, मसलन कोई दूकान, कोई प्राइवेट जॉब या कोई चतुर्थ श्रेणी की नौकरी. इतने पर भी अपनी ढोंगी वाणी, पोथी-पत्रा और हेकड़ी से वह काम चला लेते थे, लेकिन पिछले कुछ दशकों में तो राजनीतिक सत्ता भी उनके हाथ से निकल चुकी है. बड़ी बुरी हालत में हैं बिचारे! अब तो पेंडुलम की भांति बिचारे कभी इधर तो कभी उधर. उदाहरण स्वरुप उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों की हालत देख कर सिवाय दया के कुछ नहीं आता है. लोक-परलोक, आध्यात्म, वेदों के ठेकेदार कभी बसपा में, कभी भाजपा में और कभी अधमरी कांग्रेस में ठोकरें खाते हैं. जिन जातियों को वह अपनी बराबरी में बैठाने से हमेशा संकोच करते रहे थे, अब उसी जाति के नेताओं के चरणों में बैठकर अपना अस्तित्व ढूंढते फिरते हैं. हे ईश्वर! यह तुमने क्या किया? यह तेरा कैसा न्याय है?

राजपूतों की हालत तो इससे भी बुरी है. गाँव के इन बड़े साहबानों के खेत में पहले मजदूरों की लाइन लगी रहती थी, तो अब वह बड़े साहब मजदूरों के घर के चक्कर लगा रहे हैं, उनकी मिन्नतें करते हैं और वह अपनी मर्जी और अपनी शर्तों पर कभी काम करता है, कभी ठेंगा दिखा देता है. एक रोचक बात बताऊँ आपको मेरे गाँव में एक बार किसी मजदूर की अकड़ पर एक राजपूत महोदय बिगड़ गए और क्षत्रिय शान के अनुसार उनकी जुबान गालियां बकने लगीं. अब क्या कहें उन महाशय को, बदले हुए निष्ठुर समय को वह पहचान नहीं पाये, अपने से नीची जाति मानने वालों की बस्ती में थे. बाद में गाँव के लोगों को पता चला कि बिचारे के शरीर पर लाल निशानों के साथ मुंह पर नाखूनों के कई निशान बन गए थे. फिर वह महोदय कभी उस बस्ती की ओर नहीं गए. एक दुसरे राजपूत महाशय तो कई दिनों तक भगवान कृष्ण की जन्मस्थली में पड़े रहे, बड़ी मुश्किल से उनकी ज़मानत हुई.

More-books-click-hereलेकिन, वह रस्सी ही क्या जिसके बल चले जाएँ, बेशक वह जल क्यों न गयी हो. और वह ब्राह्मण, राजपूत ही क्या जो जातिवादी मानसिकता छोड़ दे. हालाँकि नयी, पढ़ी-लिखी पीढ़ी में कुछ सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है और वह जाति-भेद को नकार रहे हैं. लेकिन अभी भी अधिकांश ब्राह्मण नेता वही हैं जो परशुराम-जयंती के बहाने शक्ति-प्रदर्शन करते हैं और बड़े गर्व से कहते फिरते हैं कि क्षत्रियों को यदि किसी ने ठीक किया तो वह परशुराम ही थे. राजपूत नेता भी भला कम क्यों रहे, वह भी कहते हैं हमारे राम, भीष्म की तो बात छोड़ ही दो, जिन्होंने परशुराम को झुकाया, एक बालक यानि लक्ष्मण ने परशुराम की ऐसी-तैसी कर दी. एक और ख़ास बात है इन जली हुई रस्सियों की कि यह आपस में इतना प्रेम करते हैं कि एक-दुसरे की टांग खींचने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. कई जगहों से एक पत्रकार के नाते मुझे परशुराम-जयंती, क्षत्रिय-सम्मलेन का बुलावा आता है, लेकिन वहां आप कभी मत जाइयेगा क्योंकि वहां आपको कोई सम्मलेन नहीं दिखेगा, बल्कि एक ब्राह्मण दुसरे की टांग खींचता दिखेगा, और एक राजपूत दुसरे राजपूत की ऐसी की तैसी करने का अवसर ढूंढता मिलेगा. ऐसी ही एक जगह एक ब्राह्मण महोदय अपनी विद्वता का घोल पिला रहे थे कि भारत की संस्कृति को मुसलमानों, ईसाइयों से ब्राह्मणों ने ही बचाया है तो मेरा सीधा प्रश्न था कि क्या भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के 90 फीसदी से ज्यादा मुसलमान एवं ईसाई नीची जाति के लोग नहीं हैं, जिन्हें आप ब्राह्मणों ने मंदिर में घुसने नहीं दिया, अपने पास बिठाया नहीं और बकवास करते हो संस्कृति-रक्षा की. कश्मीरी-मुसलमानों एवं कश्मीरी-पंडितों की कहानी कौन नहीं जानता. इस सवाल पर वह संस्कृतिरक्षक ब्राह्मण महोदय खी-खी करके रह गए. कई सच्चे ब्राह्मण विद्वान ऑफलाइन इस बात को स्वीकार करते हैं कि ब्राह्मणों ने इस देश का जितना अहित किया, उतना अहित अंग्रेजों एवं मुस्लिम आक्रमणकारी भी नहीं कर पाये.

Buy-Related-Subject-Book-beआज-कल में ही छत्तीसगढ़ के किसी मंत्री का बयान आया कि 'ब्राह्मण ही बचा सकते हैं भारतीय संस्कृति'! क्यों भाई, कोई और संस्कृति की रक्षा करने की कोशिश करेगा, वेदों की ऋचाओं का श्रवण करेगा तो उसके कानों में पिघला शीशा डालोगे आप! छत्तीसगढ़ के मंत्री महोदय, आपने अपने राजनीतिक भाई, बिहार के मुख्यमंत्री सर्वश्री जीतनराम मांझी को नहीं सुना शायद! वह कहते हैं कि बड़ी जातियां उन्हें न सिखाएं, क्योंकि वह उनसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं और उनसे ज्यादा बुद्धि उनके पास है. आधुनिक काल में भी यदि मूषक प्रजाति बड़बोले मांझी को अपना शत्रु मानती है तो माने, लेकिन वह अपना सीना ठोक कर कहते हैं कि वह किसी रिमोट-कंट्रोल से नहीं चलते हैं. वह अपनी मेहनत से सीएम बने हैं, और पीएम भी बनेंगे. यह अलग बात है कि उनके सर पर किसका हाथ है, यह सभी जानते हैं. आप शायद उनके उस राजनीतिक दांव को भी भूल गए, जब वह किसी मंदिर गए और बाहर आकर उन्होंने बयान दे दिया कि मैं दलित हूँ, इसलिए मेरे मंदिर में प्रवेश के बाद मंदिर को गंगाजल से धोया गया. इस बयान के बाद पूरा प्रदेश और उस मंदिर का ब्राह्मण पुजारी सकते में था और उस पुजारी ब्राह्मण को अपनी रक्षा भारी पड़ रही थी और छत्तीसगढ़ के मंत्री महोदय, आप कहते हैं कि ब्राह्मण ही संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं. अरे! पहले अपनी रक्षा तो करना उन्हें सिखाइये. उन्हें सिखाइये कि कामचोरी और भगवान की दलाली छोड़कर कुछ काम धंधा करें, मेहनत करके अपनी एवं अपने परिवार की रक्षा करें. संस्कृति का ठेका आप लोग छोड़िये, यह अपनी रक्षा आप ही कर लेगी. आप चुनाव की तैयारी कीजिये और अपनी सीट बचाइये और हाँ! ऐसे बयान जारी मत किया करिये, नहीं तो अपने मंत्रिपद की रक्षा आपको मुश्किल लगने लगेगी. समय की मांग भी यही है कि राजपूत, दलित, ब्राह्मण, व्यापारी इत्यादि का भेदभाव छोड़कर सच्चाई से सब लोग मेहनत से अपने कार्यों में लगें, तब भारतीय संस्कृति की रक्षा आप ही हो जाएगी. अपने-अपने कुछ महापुरुष गढ़ कर आपस में विद्वेष फ़ैलाने वाले ढोंगी कर्मकांडों से इस देश का और मानवता का सत्यानाश ही होगा, हमेशा की तरह. स्वयं विचार कीजिये.

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Indian Culture and The Contractors, article on casteism by Mithilesh in Hindi. What is Brahman, Kshatriya, Vaishya and Shudra in today's era. Read clearly here from the pen of Mithilesh.

Sunday, 30 November 2014

News Channels in Today's Era

by on 06:02
News Channels in Today's Era

 

ब्रेकिंग:- प्रधानमंत्री ने 'मक्खी' जाति की बुराई करते हुए 'मधुमक्खी' को श्रेष्ठ बताया, उसके डंक मारने को प्रमोट करके हिंसा को बढ़ावा दिया, जिससे साबित होता है कि वह शांति के पक्षधर नहीं हैं.
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सौजन्य से- सबसे तेज, साच को आंच नहीं, ना काहू से दोस्त..., आपको रखे पीछे ... इत्यादि-इत्यादि न्यूज.

News Channels in Today's Era, analysis in hindi.

पडोसी बदले नहीं जा सकते, इसलिए ... You can change friends but not neighbours!

by on 05:17
अमेरिका के महाशक्ति बनने को लेकर पिछली सदी में कई देशों ने ईर्ष्या का रोग पाला है लेकिन इसके साथ यह भी एक कड़वा सच है कि वह सभी देश कहीं न कहीं नेस्तनाबूत होते चले गए, अपनी हस्ती खोते चले गए और अमेरिका जस का तस बना रहा. यही नहीं, उसकी ताकत लगातार बढ़ती ही चली जा रही है. कुछ तो बात है, जो एशियाई देश पकड़ नहीं पा रहे हैं या पकड़ना चाहते ही नहीं हैं. जानना दिलचस्प होगा कि अमेरिका की वैश्विक सक्रियता उसके अपने महाद्वीप से बाहर बहुत ज्यादा रहती है, विशेषकर एशिया, यूरोप और अफ्रीका में. वैश्विक शक्ति बनने के लिए उसने अपने इर्द-गिर्द कुछ इस प्रकार का जाल बुना है, जिसे तोडना तो दूर, एशियाई देश छू भी नहीं पाते हैं. अमेरिका का सिर्फ नाम ही नहीं है 'संयुक्त राज्य अमेरिका' बल्कि इस नाम की संयुक्त सार्थकता उसने अपनी राजनीति में व्यवहारिक रूप से समाहित की है, वह भी आज नहीं, बहुत पहले से. जब कुछ विश्लेषक कहते हैं कि २१वीं सदी एशिया की है, भारत की है या चीन की है तो इस बात पर बड़ी जोर की हंसी आना स्वाभाविक ही है. जी हाँ! यह बात सुनकर किसी अंधभक्त को बड़ी तेज मिर्ची लग सकती है, लेकिन यह सच है कि एशिया, विशेषकर भारतीय उप-महाद्वीप बारूद के ढेर पर खड़ा है और न सिर्फ खड़ा है, उस बारूद को अक्सर ही बाहर-भीतर के लोगों द्वारा चिंगारियां दिखाने की कोशिशें भी जारी हैं. परमाणु शक्ति-संपन्न तीन बड़े राष्ट्र चीन, भारत और पाकिस्तान, जो वैश्विक राजनीति में गलत सही कारणों के साथ चर्चा में भी बने रहते हैं और कुछ हद तक दखल भी रखते हैं, उनके आपसी सम्बन्ध अत्यंत उलझे हुए एवं अस्पष्ट हैं.

जरा याद कीजिये चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के हालिया भारत-दौरे को जब चीनी राष्ट्राध्यक्ष अहमदाबाद में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ झूला झूल रहे थे और चीनी सैनिक भारतीय सीमा में कबड्डी खेलने पर उतारू हो गए. हाल ही में संपन्न हुई १८वीं सार्क शिखर समिट पर गौर कीजिये, जब पूरा विश्व मोदी और शरीफ के हाथ मिलने-मिलाने पर चर्चा कर रहा था, बजाय की इस सम्मलेन की चुनौतियों, योजनाओं पर चर्चा करने के. इस सम्मलेन में भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने पहले के भाषणों की तरह जब लच्छेदार भाषण दिया, दिलों को मिलाने की खूब वकालत की, सार्क देशों की सीमाओं को खोलने की वकालत की तब उस पर टिप्पणी करते हुए मेरे गुरु ने कहा कि पहले जुबां तो खोलें, सीमाएं फिर तो खुलेंगी. उनका मतलब साफ़ था कि भारत को वैश्विक राजनीति की जिम्मेवारियों को समझते हुए बड़ा दिल करना चाहिए था. एक और बात जो बड़ी चर्चा में रही वह नेपाली प्रधानमंत्री का भारत और पाकिस्तान को अपने मतभेद भुलाने का उपदेश देना था. वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर हो रहे शक्तिशाली देश के लिए इससे शुभ लक्षण और क्या हो सकता था भला. कई कार्टूनों में मजाक में यह बात लिखी गयी कि किसी की न सुनने वाले प्रधानमंत्री पर आरोप झूठे हैं, क्योंकि वह काठमांडू की सुनते हैं. खैर, जैसा कि होना था यह सम्मलेन हाथ मिलाने, न मिलाने, पत्रिका पढ़ने की बातों तक सीमित रह गया. इसके बावजूद कि भारत की काबिल विदेश मंत्री यह मानती और कहती हैं कि कूटनीति में कभी फुलस्टॉप नहीं होता. प्रश्न जरूर उठता है कि काबिल विदेश मंत्री की सलाहों की इस तरीके से अनदेखी कैसे हो पा रही है. काठमांडू में हमारा अड़ियल रवैया पूरे विश्व ने देखा. क्या सच में हम इस रास्ते से वैश्विक महाशक्ति का दर्ज पा जायेंगे.

जब सम्मेलनों की चर्चा चल रही है तो ब्रिस्बेन में हुए आर्थिक महाशक्तियों के ग्रुप जी-२० की चर्चा न करना नाइंसाफी होगी. जैसा कि हमेशा होता आया है, बड़े सम्मलेन अपने मूल उद्देश्यों को पूरित करें न करें राजनीतिक उद्देश्य कार्यान्वयन में जरूर लाये जाते हैं. जिस प्रकार काठमांडू में नवाज शरीफ को अलग-थलग करने की कोशिशें हुईं, उसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अलग थलग करने की कोशिश की गयी. लेकिन सार्क सम्मलेन और जी-२० में हुई राजनीति में एक बारीक फर्क पर आप गौर कीजिये. एक तरफ रूस के राष्ट्रपति को ऑस्ट्रेलिया समेत पश्चिमी देशों ने एक सूर में लताड़ा और कनाडा के प्रधानमंत्री हार्पर ने रूसी राष्ट्रपति को यहाँ तक कह दिया कि 'मैं आपसे हाथ मिलाऊंगा, लेकिन आप यूक्रेन से बाहर निकलिए'. निश्चित रूप से इस राजनीति के पीछे अमेरिका का ही होमवर्क था. दूसरी ओर भारत के प्रधानमंत्री को नेपाल जैसे छोटे राष्ट्र ने उपदेश दे दिया कि उन्हें पाकिस्तानी शरीफ से हाथ मिलाना चाहिए. और पूरे वैश्विक मीडिया में शरीफ के प्रति सहानुभूति गयी तो भारतीय पक्ष का नकारात्मक अड़ियल रवैया ही सामने आया. यही नहीं, किसी सार्क देश ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत का साथ भी नहीं दिया. प्रश्न बड़ी बेरहमी से उठाया जा सकता है कि भारत के किस पडोसी के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं? अभी हाल ही में भूटान के राजा जिग्मे खेसर ने बयान दिया था कि भारत में उनका सत्कार ठीक ढंग से नहीं किया गया. वहीं नेपाल में चीन जिस प्रकार से अपनी घुसपैठ बढ़ा रहा है, उसकी काट भारत के पास यथार्थरूप में है नहीं. हाँ! भाषणों में हम चाहे जो कह लें, मुंह ही तो है. श्रीलंका के साथ समुद्री विवाद और चीन से उसकी निकटता हमें लगातार परेशान कर रही है. भारत की या कहें कि मोदी की विदेश-नीति की प्रशंसा करने वाले महानुभावों की बुद्धि पर तरस आता है, क्योंकि वह मैडिसन स्कूवेयर पर बड़ी सभा और मोदी-मोदी के नारों को कूटनीति समझते हैं अथवा वह फिजी के समुद्री तट पर मोदी की इंस्टग्रामी फोटो को दूरगामी नीति का परिणाम मानते हैं या आस्ट्रेलिया में मोदी-एक्सप्रेस चलाने वाली मार्केटिंग को वह देशहित में मानते हैं. माफ़ कीजियेगा, लेकिन यह सारे काम तो बॉलीवुड का हीरो ऋतिक रोशन भी करता है, शाहरुख़ भी नाच गाकर मनोरंजन करता है और भीड़ भी हूटिंग करती है... यो, यो ....!!

More-books-click-hereहमें बड़े ही स्पष्ट रूप से समझना होगा कि अमेरिका के अपने पडोसी देशों के साथ सम्बन्ध बड़े प्रगाढ़ हैं, वह चाहे कनाडा हो, बहामास हो, जमैका, कोस्टा रिका, पनामा, अरूबा या फिर मैक्सिको, बरमूडा ही क्यों न हो. गौर करने वाली बात है कि यदि अमेरिका भी कनाडा के साथ सीमा-विवाद में उलझा होता तो क्या वह वैश्विक ताकत बन पाता. कई देशों ने अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों की परवाह न करते हुए वैश्विक शक्ति बनने की कोशिश की, लेकिन उनकी औकात कुछेक दशकों से ज्यादा नहीं टिक पायी. चाहे वह जर्मनी हो या फिर रूस ही क्यों न हो. चीन भी आगे बढ़ने की कोशिश जरूर कर रहा है, लेकिन वैश्विक राजनीति के जानकार जानते हैं कि उसके अपने पड़ोसियों से तनावपूर्ण सम्बन्ध उसे वैश्विक राजनीति का पुरोधा कभी नहीं बनने देंगे. वह पडोसी चाहे भारत हो, जापान हो या वियतनाम ही क्यों न हो.

स्पष्ट है कि जिस रास्ते पर भारत, चीन, पाकिस्तान इत्यादि राष्ट्र चल रहे हैं, उस रास्ते पर कुछेक दशकों की कौन बात करे, कुछेक सदियों तक की स्थिति भी एशिया के अनुकूल नहीं बन पायेगी. अमेरिकी बड़ी सरलता से एशियाई मूल के लोगों आसमान पर चढ़ाकर कहता है कि २१वीं सदी एशिया की सदी है, ताकि एशियाई मानव-संशाधन उसे अपनी सेवाएं प्रस्तुत करता रहे और एशियाई नेता आपस में भिड़ते रहें. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं महान कूटनीतिज्ञ अटल बिहारी बाजपेयी का कहा यह तथ्य कहावत में ही रह जाए कि मित्र तो बदले जा सकते हैं, लेकिन पडोसी नहीं, इसलिए पड़ोसियों के साथ सम्बन्ध बेहतर करना जरूरी है. आप भी इन एशियाई नेताओं की तरह खुशफहमी में बने रहिये कि अगली सदी, अगले दशक आप ही के हैं. शायद हम नागरिकों के भी हज़ारों मित्र होंगे, फेसबुक पर तो होंगे ही, लेकिन चूँकि हम एशिया के हैं, इसलिए हम अपने पड़ोसियों को नजरअंदाज कर देते होंगे. ठीक कहा या नहीं, जरूर सोचिये.

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

You can change friends but not neighbours, so make strong relations with neighbours. Article in Hindi by Mithilesh on foreigh policy of India, China, Pakistan and Asian countries.

ऑनलाइन मार्केटिंग से कमाई एवं सावधानियां - Earning through Online Marketing and Precautions

by on 01:27

कई मित्रों ने फेसबुक पर, कई ने फोन करके मुझे पूछा कि फेसबुक से कमाई कैसे होगी. आखिर उनका काफी सारा समय इस प्लेटफॉर्म पर यूँही व्यतीत हो जाता है. जो कुछ मैंने उन्हें अलग-अलग बताया, उसको आपके सामने यहाँ रखता हूँ-


१. कंटेंट (Content is king) : यह सिर्फ फेसबुक के लिए नहीं, बल्कि पूरे इंटरनेट व्यवसाय के लिए सत्य है. यदि आप इंटरनेट के किसी भी माध्यम से पैसा कमाना चाहते हैं, तो आपको अपने कंटेंट की प्रस्तुति को वजनदार रखना होगा. ओरिजिनल (original) रहे तो अच्छा, यदि न भी रहे तो उसकी प्रस्तुति(presentation) निश्चित रूप से अलग रहे. इसके साथ आपके कंटेंट में सम्बंधित तस्वीरें, लिंक्स (Links), सूत्रवाक्य (quotes) इसका वजन बढ़ाने के काम आते हैं. अब एक अच्छा कंटेंट, हेडिंग के साथ तैयार करके आप फेसबुक पर डाल सकते हैं. वैसे बेहतर यह रहता है कि यह कंटेंट आप किसी ब्लॉग (Blog) पर डालें और उससे भी बेहतर रहेगा यदि आप किसी सीएमएस वेबसाइट (CMS Website) पर डालकर फेसबुक पर उसका लिंक और परिचय भर दें. फिर अच्छे कंटेंट की चाह में आपकी वेबसाइट पर फेसबुक से ट्रैफिक आ सकता है. अपनी प्रोफाइल के अतिरिक्त आप ग्रुप (fb groups) का सहारा ले सकते हैं, जो एक बड़ा सोर्स है ट्रैफिक डायवर्ट करने का. पेज का पेड प्रमोशन भी कई मामलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

२. अफिलिएट प्रोग्राम (Affiliate Program): यदि आपने कंटेंट के मामले में समझदारी दिखा दी है तो फिर आगे का रास्ता बहुत मुश्किल नहीं. अधिकाँश लोग यहीं चूक जाते हैं. अगले स्टेप में आपको कुछ सम्बंधित अफिलिएट प्रोग्राम ढूंढने की जरूरत है. इसमें कुछ की लिस्ट मैं नीचे दूंगा. लेकिन अर्निंग के लिए सबसे ज्यादा गूगल एडसेंस इस्तेमाल किया जाता है. और यह सबसे विश्वसनीय होने के साथ-साथ स्पैम-फ्री (Spam-free) भी है. अधिकाँश अफिलिएट प्रोग्राम अविश्वसनीय होने के साथ स्पैम के अड्डे (Spammers) भी हैं, जो आपके पाठक को भ्रमित एवं परेशान करने में कसर नहीं छोड़ते हैं. फिर भी कुछ प्रोग्राम आप और इस्तेमाल कर सकते हैं. अफिलिएट प्रोग्राम में साइनअप करने के बाद अपनी डिटेल भरनी होती है, अपने ब्लॉग/ वेबसाइट के बारे में डिटेल भरनी होती है. गूगल एडसेंस यहाँ बहुत सख्त है, यदि आपका कंटेंट उसकी पॉलिसी के हिसाब से नहीं है तो यह आपके प्रयास को निष्फल कर देगा.(हिंदी को यह सपोर्ट नहीं करता है अभी, लेकिन अकाउंट अप्रूव होने के बाद आप विज्ञापन हिंदी वेबसाइट पर डाल सकते हैं).  अफिलिएट अकाउंट अप्रूव होने के बाद आपको अपने बैंक अकाउंट की जानकारी देनी होती है, फिर एक निश्चित राशि आपके अफिलिएट अकाउंट में जमा होने पर वह राशि आपके बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दी जाती है.

More-books-click-hereकुछ महत्वपूर्ण अफिलिएट प्रोग्राम हैं:



  1. https://www.google.com/adsense/

  2. https://www.flipkart.com/affiliate/signup

  3. https://affiliate-program.amazon.in/gp/associates/join/landing/main.html

  4. http://www.cj.com/

  5. http://www.affiliatefuture.co.uk/

  6. http://www.paidonresults.com/affiliates-sign-up.html

  7. https://www.apple.com/in/itunes/affiliates/

  8. http://www.omgpm.com/india/


सावधानी (Precautions):



  1. जल्दबाजी करने वाले बहुत जल्दी निराश होकर मैदान से बाहर हो जाते हैं. आपको इस मार्किट को समझने और कुछ कमाई के लेवल तक पहुँचने के लिए 6 महीने से 1 साल तक आराम से लग जाएंगे. वह भी तब जब आप प्रत्येक दिन 2 घंटे से ज्यादा समय देंगे. इसलिए जल्दी है तो यह काम शुरू ही न करें.

  2. कंटेंट कॉपी, पेस्ट करके आप अपनी मेहनत ही जाया करेंगे, इसका कोई फायदा नहीं. न तो आपका पाठक-वर्ग बनेगा, न ही इंटरनेट पर इसे कोई रैंकिंग मिलेगी. बल्कि आपकी वेबसाइट या ब्लॉग की साख ख़राब ही होगी.

  3. थोड़ा बहुत तकनीकि समझ बढ़ाने की कोशिश फायदेमंद रहेगी इस श्रेणी में. जैसे किसी वेबसाइट को मैनेज कैसे किया जाय, ऑनपेज एसईओ क्या होता है, टैग, लेवल, इमेज ऑल्ट टेक्स्ट इत्यादि समझने पर बेहतर परिणाम आएंगे. (Get Knowledge)

  4. कभी इस तरह की ग़लतफ़हमी में न फंसे कि यहाँ क्लिक करने से, वहां क्लिक करने से, मेल करने से आप पैसे कमा लेंगे. (Stay away from spammers)

  5. साथ में कमाने के लिए कहीं भी पेड मेम्बरशिप नहीं लें. कई वेबसाइट इस तरह का झांसा देती हैं कि आप यदि इतने डॉलर की मेम्बरशिप लेंगे तो उतना कमा लेंगे. यह बिलकुल फ्रॉड है, झूठा जाल है आपको फंसाने के लिए.

  6. ट्रैफिक बढ़ाने के लिए आप फेसबुक की तरह के दुसरे सोशल नेटवर्क का भी सावधानी से इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसे ट्विटर, स्टंबलउपॉन, गूगल प्लस आदि.

  7. बाकि सीरियस होने पर यदि आपको और जानकारी चाहिए, तो आप मुझे कभी भी संपर्क कर सकते हैं. My email ID is: mithilesh2020@gmail.com; Call at: +91- 9990089080


-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.
How to earn through facebook, guide/ information in hindi. Earning through Online Marketing and Precautions.

Precaution on internet market; how to earn on internet

[caption id="" align="alignnone" width="721"]Social Media Consultant Social Media Consultancy[/caption]

Wednesday, 26 November 2014

वेबसाइट, ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया, कीमत एवं सावधानियां - Blogging, CMS, Website, Promotion, Price and Support Article in Hindi

by on 14:21


  1. You want to make a Website?




  2. You already own a website, but having a lot of issues, related?




  3. Price Confusion?




  4. Social Media, Blogging, CMS, Static Website Confusion, then this article is for you in Hindi, by Mithilesh.




वेबसाइट क्यों? (वृहत्तर विजिटिंग कार्ड): शुरूआती स्तर पर वेबसाइट को आप एक तरह का विजिटिंग कार्ड मान सकते हैं, जो आपकी अनुपस्थिति में भी आपका या आपके पेशे का वृहद परिचय सामने वाले व्यक्ति को देगा. जब आप किसी से मिलते हैं और उसको अपना विजिटिंग कार्ड देते हैं, तो उसमें आपके बारे में आपका फोन न., मेल और पता होता हैं. यदि उसी कार्ड में आपकी वेबसाइट लिखी हैं तो सम्बंधित व्यक्ति आपके बारे में काफी कुछ जान कर आपसे अवश्य भी प्रभावित हो जायेगा. अपनी वेबसाइट के बारे में आप सामने वाले व्यक्ति को फोन द्वारा एक शब्द में बता सकते हैं.

smo-zmuब्लॉग/ फेसबुक/ ट्विटर एवं वेबसाइट में भिन्नता: सबसे बड़ी भिन्नता इसके प्रोटोकॉल को लेकर है. निश्चित रूप से यह सभी माध्यम बड़े ही उपयोगी हैं, किन्तु सभी के लिए इनकी उपलब्धता समान होने के कारण, आपकी विशिष्टता कायम नहीं रह पाती है. इसके अतिरिक्त आप इन सभी को अपने विजिटिंग कार्ड पर छापने में कठिनाई महसूस करेंगे. मार्केटिंग की दृष्टि से भी यह बहुत उपयुक्त नहीं है, क्योंकि इन माध्यमों पर (विशेषकर सोशल मीडिया पर) ट्रैफिक बहुत जल्दी आता है और आकर चला भी जाता हैं. बल्कि कई लोग सोशल प्लेटफॉर्म का ट्रैफिक मोड़कर अपनी वेबसाइट पर लाते हैं, जो एक समझदारी भरा निर्णय है. सोशल मीडिया को आप यदि कोई मार्केटप्लेस (सड़क) मान लें, तो वेबसाइट उस मार्केटप्लेस में स्थित आपकी दूकान है, और सामान तो तभी बिकेगा जब ग्राहक आपकी दूकान में आएगा. यदि ऑडिएंस को ग्राहक मान लें तो वेबसाइट आपकी दूकान है, जहाँ ग्राहक आपके सामान देखकर खरीदने को प्रेरित होगा, जबकि बाहर कन्फ़्यूजिंग-स्टेज होती है. इसके अतिरिक्त ब्लॉग या फ्री प्लेटफॉर्म्स में आपको बहुत ही सीमित डिज़ाइन की सुविधा मिलती है, जो निश्चय ही एक आकर्षक एवं इंटरैक्टिव वेबसाइट से बहुत पीछे होती है. परन्तु यदि आप पैसे खर्च नहीं करना चाहते हैं अथवा आप को बहुत ज्यादे प्रचार-प्रसार की आवश्यकता नहीं है, तो बिलकुल शुरूआती स्टेज के लिए ब्लॉग या फ्री प्लेटफॉर्म भी एक अच्छा माध्यम होता है.

profile-zmu-web-servicesडायनामिक, स्टेटिक, सीएमएस (वेबसाइट के प्रकार): स्टेटिक वेबसाइट, एचटीएमएल की साधारण कोडिंग से बनाया जाता है, जिसमें परिवर्तन करना आम-जनमानस के लिए मुश्किल होता है, क्योंकि इसे कोडिंग, डिजायनिंग, एफटीपी की कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जो कि किसी जानकार के लिए ही मुफीद होता है. डायनामिक वेबसाइट यदि कस्टमाइज़्ड (पीएचपी/ एएसपी/ डॉटनेट में) बनी है तो शुरू में काम अच्छा ही चलता है, लेकिन यदि सर्विस देने वाली कंपनी पुरानी और मजबूत नहीं है तो दिक्कत आनी तय है. छोटी कंपनियों अथवा फ्रीलांसरों से कस्टमाइज़्ड डायनामिक वेबसाइट बनवाना अंततः नुक्सान का सौदा साबित होता है, छोटी-छोटी दिक्कतें बहुत इरिटेट करती हैं और आपका काफी समय एवं धन खर्च होता है, फिर भी कमियां रह ही जाती हैं. इसके अलावा यदि आप कंपनी या डेवलपर बीच में या बाद में भी चेंज करते हैं तो आपका पिछला सारा काम बर्बाद ही समझो, क्योंकि हर एक डेवलपर का अपना काम करने का तरीका होता है, जोकि निश्चित रूप से स्टैण्डर्ड नहीं होता है. इसके अतिरिक्त आप यदि सीएमएस (कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम) के साथ जाते हैं तो आपको खर्च, सुविधाएं और ग्लोबल स्टैण्डर्ड साथ में मिलते हैं, और ऊपर स्टेटिक या कस्टमाइज़्ड डायनामिक वेबसाइट की समस्याएं हल हो जाती हैं. यही नहीं, आपको इनके लिए तमाम सपोर्ट बहुत ही आसानी से उपलब्ध हो जाता है. वर्डप्रेस, जुमला, द्रुपल इत्यादि पॉपुलर सीएमएस की श्रेणी में आते हैं.

google-adwords-by-zmu-web-servicesगूगल, एसईओ, एडवर्ड्स, प्रमोशन: मेरे प्रोफेशनल कैरियर के दौरान जिस एक शब्द के बारे में सबसे कन्फ़्यूजिंग क़्वैरी आयी है, वह गूगल सर्च और अपनी वेबसाइट के प्रमोशन को लेकर है. साधारण सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेशन, आप वेबसाइट बनाते समय, कंटेंट भरते समय भी कर सकते हैं, जिसमें टाइटल सही करना, कंटेंट, इमेज की सही जगह प्लेसिंग होती है, वहीं यदि आप गूगल सर्च में टॉप पर दिखना चाहते हैं या आपको किसी ने सपना दिखाया है, तो आपको सावधान हो जाना चाहिए. यह एक उलझाऊ फिल्ड है, खासकर वेबसाइट की शुरुआत करने वालों के लिए. कीवर्ड, डेंसिटी, लिंक-बिल्डिंग का बहुत ही फ्राड कारोबार मार्किट में उपलब्ध है, जिस से कस्टमर बहुत ही दुखी हैं. इसके लिए आपको निश्चय ही बड़े लेवल पर प्लानिंग और खर्च दोनों करना पड़ता है. इससे बेहतर यदि आप गूगल के पेड-एडवरटाइजिंग (एडवर्ड्स) की ओर जाते हैं तो यह कम खर्च में आपको बेहतर परिणाम दे सकता है. मेरे कई ग्राहक फेसबुक पर भी अपने प्रोडक्ट की अनपेड और पेड दोनों माध्यमों से मार्केटिंग कराकर काफी खुश हुए हैं.

पैसे का खर्च और साधारण हिसाब-किताब: वेबसाइट के सन्दर्भ में मार्किट में यह सबसे गन्दा और भ्रम पैदा करने वाला क्षेत्र बन गया है. वेबसाइट बनवाने की इच्छा रखने वाले ग्राहक के मन में निन्यानवे रूपये से लेकर लाखों रूपये का फिगर दिमाग में बना हुआ है और वह इनके बीच अंतर समझ पाने में अधिकांश बार विफल हो जाता है. इसके लिए आपको स्टेप-बाय-स्टेप बताने का प्रयास कर रहा हूँ-

  • डोमेन-रजिस्ट्रेशन: इसके कई प्रकार के एक्सटेन्सन मौजूद हैं. डॉट कॉम, डॉट इन, डॉट नेट ... इत्यादि. साधारण रूप में इसकी कीमत पांच - छः सौ के आस पास domain-name-registration-zmuहोती है. कई कंपनियां अपने डोमेन बेचने के लिए तमाम ऑफर भी देती हैं, जो निन्यानवे रूपये तक का होता है (इस डोमेन के टीवी पर प्रचार को लेकर भी कई ग्राहक कीमत के मामले में कन्फ्यूज हो जाते हैं, जबकि यह शुरूआती स्टेज है). हालाँकि सस्ता डोमेन देने पर इसमें कई बार उस कंपनी का प्रतिबन्ध भी होता है और अगली साल रिन्यूवल पर वह आपसे काफी ज्यादा पैसा चार्ज कर लेती हैं. बिगरॉक, गोडैडी इत्यादि कंपनियां इस क्षेत्र में कार्य कर रही हैं.

  • वेब होस्टिंग/ स्पेस: इसमें भी डोमेन की तरह ही कन्फ्यूज स्टेज है, परन्तु साधारण वेबसाइट के लिए आपको दो हजार रूपये सालाना में बढ़िया शेयर्ड होस्टिंग मिल जाएगी, जिसमें आपको बढ़िया सपोर्ट, बैंडविड्थ और अच्छा भला मेल सर्वर मिल जायेगा. हालाँकि इससे सस्ती भी होस्टिंग देने का दावा करती हैं कंपनियां, लेकिन फिर आपको उनके पीछे दौड़ना पड़ेगा. स्टैण्डर्ड प्राइस की बात करें तो याहू.कॉम की डोमेन-होस्टिंग ३,५०० और बिगरॉक.इन की ३,००० रूपये सालाना है (१ वेबसाइट, शेयर्ड होस्टिंग). तमाम ऑफर इसमें भी समय-समय पर आते रहते हैं.

  • free-quote-for-website-designवेब डिज़ाइनर, डेवलपर को हायर करना: यदि आप रेडीमेड वेबसाइट-बिल्डर की तरफ नहीं जाते हैं तो आपको किसी कंपनी या फ्रीलांसर को हायर करना पड़ेगा. यहाँ आप जरूर देखें कि वह कंपनी अथवा फ्रीलांसर कम से कम चार-पांच सालों से इंडस्ट्री में काम कर रहा है कि नहीं. चेक करने का बढ़िया तरीका उसके द्वारा किये गए काम होते हैं. उसके कुछेक क्लायन्टों से बात करने में आप हिचकिचाएं नहीं. और यहाँ ध्यान रहे कि आप 'सीएमएस' को ही प्रिफर करें. जहाँ तक कीमत की बात है, साधारण वेबसाइट के लिए यह पांच हज़ार से लेकर पचास हज़ार तक हो सकता है. आप वेब डिज़ाइनर का काम, परफेक्शन, उसकी नॉलेज, सपोर्ट की व्यवस्था और पिछले काम का स्तर देखकर उसकी कीमत और दी जा रही सुविधाओं के बारे में कम्पेयर करें. कोशिश करें कि एक से अधिक वेब डिजायनरों को अपने पैमाने पर रखें, इससे आप फीचर-वाइज तुलना कर पाएंगे. हाँ! किसी अन्य व्यवसाय की भांति वेब डिजायनर का व्यवहार-अध्ययन भी भविष्य में आपको काफी सहूलियत दे सकता है.


-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

किसी प्रकार की असुविधा होने पर, मुझे किसी भी समय संपर्क करें. मेरा फोन न. 9990089080 है: और मेरी मेल है: mithilesh2020@gmail.com

Great-CMS-Websites-7-years-experience-delhi-company-wordpress-technologyBlogging, CMS, Website, Promotion, Price and Support Article in Hindi by Mithilesh, havingh 7+ years experience in Website Designing, Development and SEO, SMO and Brand Promotion.

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