Tuesday, 2 December 2014

गूगल सर्च, जीमेल एवं गूगल कैलेण्डर :: कुछ अन्य फीचर्स - Google Search, Gmail and Google Calenders!

by on 23:48

  • गूगल सर्च: दुनिया का सबसे बड़ा सर्च इंजिन. इसकी महत्ता का अंदाजा आप इस बात से ही लगा लीजिये कि गूगल भगवान, गूगल देवता इत्यादि उपनाम सब इसी गूगल-सर्च के ही हैं. यदि इंटरनेट आज सूचनाओं का इतना बड़ा श्रोत बना है तो उसमें गूगल का योगदान सर्वाधिक है. हम आप सर्च करते ही हैं, लेकिन सर्च को और भी स्पेसिफिक बनाने के लिए कई लोगों की तरह आप भी 'सर्च टूल' का इस्तेमाल करें. 'सर्च टूल' सर्च बार के ठीक नीचे ही होता है. इस 'सर्च टूल्स' को क्लिक करते ही देश के हिसाब से, समय के हिसाब से ऑप्शन मिल जायेंगे. यदि आप इमेज सर्च कर रहे हैं तो इमेज की साइज, कलर, टाइप इत्यादि ऑप्शन आपकी सर्च को काफी हद तक सुविधाजनक बना सकते हैं. यदि आप बोल कर सर्च करना चाहते हैं तो 'सर्च बटन' के पास में माइक्रोफोन का ऑप्शन आपकी मदद कर सकता है. आपके मोबाइल फोन में यह ऑप्शन तो आपकी बहुत मदद करता है.


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  • जीमेल: गूगल की दूसरी सबसे लोकप्रिय सर्विस इसकी मेल सर्विस है. आज के समय में पूरे विश्व की इमेल्स में २३ फीसदी से ज्यादा मार्किट शेयर अकेला जीमेल का है, जबकि इसके सबसे करीब याहू (१० फीसदी) और हॉटमेल (१० फीसदी) ही हैं. आप में से अधिकांश लोग भी इस मेल को जरूर इस्तेमाल करते होंगे. मेल भेजने के अतिरिक्त आप इसकी सेटिंग में जाकर तमाम सुविधाओं का लाभ भी ले सकते हैं, जिसमें सिग्नेचर एड करना, वेकेशन रेस्पोन्डेर एड करना, लेबल्स (फोल्डर) मैनेज करना, इनबॉक्स की प्रायोरिटी मैनेज करना, POP3 अकाउंट से मेल भेजना एवं प्राप्त करना, मेल को फ़िल्टर करना एवं अपनी सभी मेल को या फ़िल्टर्ड मेल को दूसरी मेल पर फॉरवर्ड करना, जीमेल ऑफलाइन इस्तेमाल करना (क्रोम-प्लगइन), विभिन्न प्रकार की थीम/ डिज़ाइन इस्तेमाल कर सकते हैं. यह सभी फीचर अत्यंत ही उपयोगी एवं इस्तेमाल में सरल हैं. इसके अतिरिक्त जीमेल-सेटिंग की 'लैब'-टैब में आपको तमाम सुविधाएं मिलेंगी, जिन्हें सक्रीय करके आप अपने मेल अनुभव को और भी बेहतर कर सकते हैं जैसे- मेल अनडू (मेल भेजने के कुछ सेकण्ड बाद तक आप उसे वापस कर सकते हैं). इसी तरह अनरीड-आइकॉन, मल्टिपल इनबॉक्स जैसी तमाम सुविधाएं आपका मनमोह लेंगी. हालाँकि इन्हें इस्तेमाल करने के लिए, पहले पहल थोड़ी उलझन जरूर होगी, लेकिन आगे आप खुद ही समझते जायेंगे. किसी प्रकार की असुविधा होने की स्थिति में आप मुझे, यानि मिथिलेश को- 9990089080 पर फोन कर सकते हैं.


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  • गूगल कैलेंडर: गूगल की जो दूसरी सबसे प्यारी एवं उपयोगी सर्विस लगती है, वह निश्चित रूप से गूगल कैलेंडर ही है. इसमें आप अपने तमाम कार्य सूचीबद्ध (Schedule) कर सकते हैं, और यह ठीक नियत समय पर, या उसके पहले आपको मेल द्वारा, पॉप अप द्वारा आपको याद दिल देगा कि आपको अमुक काम करना है. यही नहीं, आप इसके माध्यम से किसी भी इवेंट के लिए गेस्ट की मेल भी डाल सकते हैं, जिससे वह इस इवेंट की अपडेट से पल-पल जुड़ा रहेगा. इसे आप एक ईआरपी की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं.


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गूगल की शेष सर्विसेस के बारे में आपसे आगे चर्चा होगी.

Google Search, Gmail and Google Calenders informations, tips in Hindi by Mithilesh

Poem on Fear factor in Hindi by Mithilesh

by on 05:56
Bhay n ho to kshay n ho poem by mithilesh

 

भय न हो,
तो क्षय न हो
डर हो गर,
तो स्वर न हो
नित्य बात यूंही कर
चुनौतियां जाएं मुकर



- मिथिलेश (दो पंक्तियाँ)

‪#‎fear‬ ‪#‎poem‬, ‪#‎kavita‬ ‪#‎problems‬ ‪#‎raise‬

Poem on Fear factor in Hindi by Mithilesh

Deepika Cleavage Issue and Gohar Khan slapped issue

by on 05:53
Deepika Cleavage Issue and Gohar Khan slapped issue

 

जूनियर आर्टिस्ट काम करने वाले अकील ने बताया कि वह उनकी तरफ सेक्शुअली अट्रैक्ट हो जाता है, जो छोटे शॉर्ट स्कर्ट पहनती हैं...
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आमतौर पर हर मामले पर अपनी आवाज बुलंद करने वाले बॉलिवुड सिलेब्स इस मामले पर बिलकुल चुप हैं। इन सिलेब्स ने दीपिका पादुकोण के क्लीवेज विवाद पर भी काफी मुखर होकर अपने रिऐक्शन दिए थे, लेकिन 2 दिन से गौहर के मुद्दे पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। सलमान खान तो बिग बॉस के होस्ट हैं, इसके बावजूद उन्होंने बिग बॉस के पिछले सीजन की विनर गौहर के सपोर्ट में कुछ नहीं कहा। आमिर खान, जो सत्यमेव जयते में महिलाओं के मुद्दों को उठाते हैं, उन्होंने भी इस पर कुछ नहीं बोला।
‪#‎celebs‬ ‪#‎film‬ ‪#‎gauhar‬ ‪#‎sexuality‬ ‪#‎crime‬ ‪#‎slap‬
http://goo.gl/YfGyT3

Deepika Cleavage Issue and Gohar Khan slapped issue

Keyword: Deepika, Gohar khan, Short dresses, Cleavage issue, slapping issue

संस्कृति के तथाकथित 'ठेकेदार' - Indian Culture and The Contractors!

by on 03:47
समाज कल्याण के लिए एक समय जिस परंपरा को लोग सहर्ष स्वीकार करते हैं, वही परंपरा कई बार अपने सड़े-गले रूप में सामने आती है, जिससे सिवाय दर्द और मवाद के कुछ और नहीं निकलता है. भारतवर्ष में इसका सर्वोत्तम उदाहरण इसकी जाति-व्यवस्था है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के जिस वर्गीकरण के माध्यम से हमारे ऋषि-मुनियों एवं प्राचीन समाज शास्त्रियों ने सामाजिक व्यवस्था को सरल बनाने का प्रयास किया था, कालांतर में वह व्यवस्था दूषित होती गयी. न सिर्फ प्राचीन काल, मध्य काल में बल्कि आधुनिक काल में भी इस जाति व्यवस्था ने समाज को जितनी हानि पहुंचाई है, उतनी हानि शायद परमाणु बम या कोई दूसरा आधुनिक हथियार भी नहीं पहुंचा सकता है. एक तरफ देश भर के राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति को साधने के लिए जाति-भेद को टकराव के रास्ते पर ले जाते हैं, तो दूसरी ओर समाज भी देशभक्ति एवं शिक्षा को दरकिनार कर जातिगत टकराव को बढ़ाने का कार्य निरंतर जारी रखे हुए है. अपनी महानता का गुण गाते न थकने वाली विभिन्न जातियों, उपजातियों के पास सिर्फ एक कार्य है, और वह है दूसरी जातियों को नीचा दिखाना और अपने अनुकूल स्थिति होने पर उनके प्रति शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हिंसा करना, उनका शोषण करने की कोशिश करना.

यह भी एक कटु सच है कि भारतीय समाज की ऊँची जातियों ने अब तक अपने से कमजोर जातियों का भरपूर शोषण किया है, और जैसा कि परिवर्तन संसार का नियम है तो धारा अब विपरीत दिशा में बहने को तैयार बैठी है. मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय की अगली पीढ़ी के अधिकांश युवक परले दर्जे के नालायक और कामचोर बन रहे हैं. उनके पूर्वजों ने जो ज़मीन इकट्ठी कर रखी थी, उस पर उनसे खेती होती नहीं है, साथ में आधुनिकता के लिहाज से उनसे अध्ययन भी नहीं होता है, जिससे सरकारी नौकरियों में उनके अवसर सीमित हो गए हैं. बिचारे समाज के ठेकेदार रहे हैं, समाज को दिशा देने और उसकी रक्षा करने का गर्व माथे पर लगाये घुमते हैं, तो उनसे छोटा-मोटा काम भी नहीं होता है, मसलन कोई दूकान, कोई प्राइवेट जॉब या कोई चतुर्थ श्रेणी की नौकरी. इतने पर भी अपनी ढोंगी वाणी, पोथी-पत्रा और हेकड़ी से वह काम चला लेते थे, लेकिन पिछले कुछ दशकों में तो राजनीतिक सत्ता भी उनके हाथ से निकल चुकी है. बड़ी बुरी हालत में हैं बिचारे! अब तो पेंडुलम की भांति बिचारे कभी इधर तो कभी उधर. उदाहरण स्वरुप उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों की हालत देख कर सिवाय दया के कुछ नहीं आता है. लोक-परलोक, आध्यात्म, वेदों के ठेकेदार कभी बसपा में, कभी भाजपा में और कभी अधमरी कांग्रेस में ठोकरें खाते हैं. जिन जातियों को वह अपनी बराबरी में बैठाने से हमेशा संकोच करते रहे थे, अब उसी जाति के नेताओं के चरणों में बैठकर अपना अस्तित्व ढूंढते फिरते हैं. हे ईश्वर! यह तुमने क्या किया? यह तेरा कैसा न्याय है?

राजपूतों की हालत तो इससे भी बुरी है. गाँव के इन बड़े साहबानों के खेत में पहले मजदूरों की लाइन लगी रहती थी, तो अब वह बड़े साहब मजदूरों के घर के चक्कर लगा रहे हैं, उनकी मिन्नतें करते हैं और वह अपनी मर्जी और अपनी शर्तों पर कभी काम करता है, कभी ठेंगा दिखा देता है. एक रोचक बात बताऊँ आपको मेरे गाँव में एक बार किसी मजदूर की अकड़ पर एक राजपूत महोदय बिगड़ गए और क्षत्रिय शान के अनुसार उनकी जुबान गालियां बकने लगीं. अब क्या कहें उन महाशय को, बदले हुए निष्ठुर समय को वह पहचान नहीं पाये, अपने से नीची जाति मानने वालों की बस्ती में थे. बाद में गाँव के लोगों को पता चला कि बिचारे के शरीर पर लाल निशानों के साथ मुंह पर नाखूनों के कई निशान बन गए थे. फिर वह महोदय कभी उस बस्ती की ओर नहीं गए. एक दुसरे राजपूत महाशय तो कई दिनों तक भगवान कृष्ण की जन्मस्थली में पड़े रहे, बड़ी मुश्किल से उनकी ज़मानत हुई.

More-books-click-hereलेकिन, वह रस्सी ही क्या जिसके बल चले जाएँ, बेशक वह जल क्यों न गयी हो. और वह ब्राह्मण, राजपूत ही क्या जो जातिवादी मानसिकता छोड़ दे. हालाँकि नयी, पढ़ी-लिखी पीढ़ी में कुछ सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है और वह जाति-भेद को नकार रहे हैं. लेकिन अभी भी अधिकांश ब्राह्मण नेता वही हैं जो परशुराम-जयंती के बहाने शक्ति-प्रदर्शन करते हैं और बड़े गर्व से कहते फिरते हैं कि क्षत्रियों को यदि किसी ने ठीक किया तो वह परशुराम ही थे. राजपूत नेता भी भला कम क्यों रहे, वह भी कहते हैं हमारे राम, भीष्म की तो बात छोड़ ही दो, जिन्होंने परशुराम को झुकाया, एक बालक यानि लक्ष्मण ने परशुराम की ऐसी-तैसी कर दी. एक और ख़ास बात है इन जली हुई रस्सियों की कि यह आपस में इतना प्रेम करते हैं कि एक-दुसरे की टांग खींचने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. कई जगहों से एक पत्रकार के नाते मुझे परशुराम-जयंती, क्षत्रिय-सम्मलेन का बुलावा आता है, लेकिन वहां आप कभी मत जाइयेगा क्योंकि वहां आपको कोई सम्मलेन नहीं दिखेगा, बल्कि एक ब्राह्मण दुसरे की टांग खींचता दिखेगा, और एक राजपूत दुसरे राजपूत की ऐसी की तैसी करने का अवसर ढूंढता मिलेगा. ऐसी ही एक जगह एक ब्राह्मण महोदय अपनी विद्वता का घोल पिला रहे थे कि भारत की संस्कृति को मुसलमानों, ईसाइयों से ब्राह्मणों ने ही बचाया है तो मेरा सीधा प्रश्न था कि क्या भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के 90 फीसदी से ज्यादा मुसलमान एवं ईसाई नीची जाति के लोग नहीं हैं, जिन्हें आप ब्राह्मणों ने मंदिर में घुसने नहीं दिया, अपने पास बिठाया नहीं और बकवास करते हो संस्कृति-रक्षा की. कश्मीरी-मुसलमानों एवं कश्मीरी-पंडितों की कहानी कौन नहीं जानता. इस सवाल पर वह संस्कृतिरक्षक ब्राह्मण महोदय खी-खी करके रह गए. कई सच्चे ब्राह्मण विद्वान ऑफलाइन इस बात को स्वीकार करते हैं कि ब्राह्मणों ने इस देश का जितना अहित किया, उतना अहित अंग्रेजों एवं मुस्लिम आक्रमणकारी भी नहीं कर पाये.

Buy-Related-Subject-Book-beआज-कल में ही छत्तीसगढ़ के किसी मंत्री का बयान आया कि 'ब्राह्मण ही बचा सकते हैं भारतीय संस्कृति'! क्यों भाई, कोई और संस्कृति की रक्षा करने की कोशिश करेगा, वेदों की ऋचाओं का श्रवण करेगा तो उसके कानों में पिघला शीशा डालोगे आप! छत्तीसगढ़ के मंत्री महोदय, आपने अपने राजनीतिक भाई, बिहार के मुख्यमंत्री सर्वश्री जीतनराम मांझी को नहीं सुना शायद! वह कहते हैं कि बड़ी जातियां उन्हें न सिखाएं, क्योंकि वह उनसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं और उनसे ज्यादा बुद्धि उनके पास है. आधुनिक काल में भी यदि मूषक प्रजाति बड़बोले मांझी को अपना शत्रु मानती है तो माने, लेकिन वह अपना सीना ठोक कर कहते हैं कि वह किसी रिमोट-कंट्रोल से नहीं चलते हैं. वह अपनी मेहनत से सीएम बने हैं, और पीएम भी बनेंगे. यह अलग बात है कि उनके सर पर किसका हाथ है, यह सभी जानते हैं. आप शायद उनके उस राजनीतिक दांव को भी भूल गए, जब वह किसी मंदिर गए और बाहर आकर उन्होंने बयान दे दिया कि मैं दलित हूँ, इसलिए मेरे मंदिर में प्रवेश के बाद मंदिर को गंगाजल से धोया गया. इस बयान के बाद पूरा प्रदेश और उस मंदिर का ब्राह्मण पुजारी सकते में था और उस पुजारी ब्राह्मण को अपनी रक्षा भारी पड़ रही थी और छत्तीसगढ़ के मंत्री महोदय, आप कहते हैं कि ब्राह्मण ही संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं. अरे! पहले अपनी रक्षा तो करना उन्हें सिखाइये. उन्हें सिखाइये कि कामचोरी और भगवान की दलाली छोड़कर कुछ काम धंधा करें, मेहनत करके अपनी एवं अपने परिवार की रक्षा करें. संस्कृति का ठेका आप लोग छोड़िये, यह अपनी रक्षा आप ही कर लेगी. आप चुनाव की तैयारी कीजिये और अपनी सीट बचाइये और हाँ! ऐसे बयान जारी मत किया करिये, नहीं तो अपने मंत्रिपद की रक्षा आपको मुश्किल लगने लगेगी. समय की मांग भी यही है कि राजपूत, दलित, ब्राह्मण, व्यापारी इत्यादि का भेदभाव छोड़कर सच्चाई से सब लोग मेहनत से अपने कार्यों में लगें, तब भारतीय संस्कृति की रक्षा आप ही हो जाएगी. अपने-अपने कुछ महापुरुष गढ़ कर आपस में विद्वेष फ़ैलाने वाले ढोंगी कर्मकांडों से इस देश का और मानवता का सत्यानाश ही होगा, हमेशा की तरह. स्वयं विचार कीजिये.

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Indian Culture and The Contractors, article on casteism by Mithilesh in Hindi. What is Brahman, Kshatriya, Vaishya and Shudra in today's era. Read clearly here from the pen of Mithilesh.

Sunday, 30 November 2014

News Channels in Today's Era

by on 06:02
News Channels in Today's Era

 

ब्रेकिंग:- प्रधानमंत्री ने 'मक्खी' जाति की बुराई करते हुए 'मधुमक्खी' को श्रेष्ठ बताया, उसके डंक मारने को प्रमोट करके हिंसा को बढ़ावा दिया, जिससे साबित होता है कि वह शांति के पक्षधर नहीं हैं.
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सौजन्य से- सबसे तेज, साच को आंच नहीं, ना काहू से दोस्त..., आपको रखे पीछे ... इत्यादि-इत्यादि न्यूज.

News Channels in Today's Era, analysis in hindi.

पडोसी बदले नहीं जा सकते, इसलिए ... You can change friends but not neighbours!

by on 05:17
अमेरिका के महाशक्ति बनने को लेकर पिछली सदी में कई देशों ने ईर्ष्या का रोग पाला है लेकिन इसके साथ यह भी एक कड़वा सच है कि वह सभी देश कहीं न कहीं नेस्तनाबूत होते चले गए, अपनी हस्ती खोते चले गए और अमेरिका जस का तस बना रहा. यही नहीं, उसकी ताकत लगातार बढ़ती ही चली जा रही है. कुछ तो बात है, जो एशियाई देश पकड़ नहीं पा रहे हैं या पकड़ना चाहते ही नहीं हैं. जानना दिलचस्प होगा कि अमेरिका की वैश्विक सक्रियता उसके अपने महाद्वीप से बाहर बहुत ज्यादा रहती है, विशेषकर एशिया, यूरोप और अफ्रीका में. वैश्विक शक्ति बनने के लिए उसने अपने इर्द-गिर्द कुछ इस प्रकार का जाल बुना है, जिसे तोडना तो दूर, एशियाई देश छू भी नहीं पाते हैं. अमेरिका का सिर्फ नाम ही नहीं है 'संयुक्त राज्य अमेरिका' बल्कि इस नाम की संयुक्त सार्थकता उसने अपनी राजनीति में व्यवहारिक रूप से समाहित की है, वह भी आज नहीं, बहुत पहले से. जब कुछ विश्लेषक कहते हैं कि २१वीं सदी एशिया की है, भारत की है या चीन की है तो इस बात पर बड़ी जोर की हंसी आना स्वाभाविक ही है. जी हाँ! यह बात सुनकर किसी अंधभक्त को बड़ी तेज मिर्ची लग सकती है, लेकिन यह सच है कि एशिया, विशेषकर भारतीय उप-महाद्वीप बारूद के ढेर पर खड़ा है और न सिर्फ खड़ा है, उस बारूद को अक्सर ही बाहर-भीतर के लोगों द्वारा चिंगारियां दिखाने की कोशिशें भी जारी हैं. परमाणु शक्ति-संपन्न तीन बड़े राष्ट्र चीन, भारत और पाकिस्तान, जो वैश्विक राजनीति में गलत सही कारणों के साथ चर्चा में भी बने रहते हैं और कुछ हद तक दखल भी रखते हैं, उनके आपसी सम्बन्ध अत्यंत उलझे हुए एवं अस्पष्ट हैं.

जरा याद कीजिये चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के हालिया भारत-दौरे को जब चीनी राष्ट्राध्यक्ष अहमदाबाद में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ झूला झूल रहे थे और चीनी सैनिक भारतीय सीमा में कबड्डी खेलने पर उतारू हो गए. हाल ही में संपन्न हुई १८वीं सार्क शिखर समिट पर गौर कीजिये, जब पूरा विश्व मोदी और शरीफ के हाथ मिलने-मिलाने पर चर्चा कर रहा था, बजाय की इस सम्मलेन की चुनौतियों, योजनाओं पर चर्चा करने के. इस सम्मलेन में भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने पहले के भाषणों की तरह जब लच्छेदार भाषण दिया, दिलों को मिलाने की खूब वकालत की, सार्क देशों की सीमाओं को खोलने की वकालत की तब उस पर टिप्पणी करते हुए मेरे गुरु ने कहा कि पहले जुबां तो खोलें, सीमाएं फिर तो खुलेंगी. उनका मतलब साफ़ था कि भारत को वैश्विक राजनीति की जिम्मेवारियों को समझते हुए बड़ा दिल करना चाहिए था. एक और बात जो बड़ी चर्चा में रही वह नेपाली प्रधानमंत्री का भारत और पाकिस्तान को अपने मतभेद भुलाने का उपदेश देना था. वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर हो रहे शक्तिशाली देश के लिए इससे शुभ लक्षण और क्या हो सकता था भला. कई कार्टूनों में मजाक में यह बात लिखी गयी कि किसी की न सुनने वाले प्रधानमंत्री पर आरोप झूठे हैं, क्योंकि वह काठमांडू की सुनते हैं. खैर, जैसा कि होना था यह सम्मलेन हाथ मिलाने, न मिलाने, पत्रिका पढ़ने की बातों तक सीमित रह गया. इसके बावजूद कि भारत की काबिल विदेश मंत्री यह मानती और कहती हैं कि कूटनीति में कभी फुलस्टॉप नहीं होता. प्रश्न जरूर उठता है कि काबिल विदेश मंत्री की सलाहों की इस तरीके से अनदेखी कैसे हो पा रही है. काठमांडू में हमारा अड़ियल रवैया पूरे विश्व ने देखा. क्या सच में हम इस रास्ते से वैश्विक महाशक्ति का दर्ज पा जायेंगे.

जब सम्मेलनों की चर्चा चल रही है तो ब्रिस्बेन में हुए आर्थिक महाशक्तियों के ग्रुप जी-२० की चर्चा न करना नाइंसाफी होगी. जैसा कि हमेशा होता आया है, बड़े सम्मलेन अपने मूल उद्देश्यों को पूरित करें न करें राजनीतिक उद्देश्य कार्यान्वयन में जरूर लाये जाते हैं. जिस प्रकार काठमांडू में नवाज शरीफ को अलग-थलग करने की कोशिशें हुईं, उसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अलग थलग करने की कोशिश की गयी. लेकिन सार्क सम्मलेन और जी-२० में हुई राजनीति में एक बारीक फर्क पर आप गौर कीजिये. एक तरफ रूस के राष्ट्रपति को ऑस्ट्रेलिया समेत पश्चिमी देशों ने एक सूर में लताड़ा और कनाडा के प्रधानमंत्री हार्पर ने रूसी राष्ट्रपति को यहाँ तक कह दिया कि 'मैं आपसे हाथ मिलाऊंगा, लेकिन आप यूक्रेन से बाहर निकलिए'. निश्चित रूप से इस राजनीति के पीछे अमेरिका का ही होमवर्क था. दूसरी ओर भारत के प्रधानमंत्री को नेपाल जैसे छोटे राष्ट्र ने उपदेश दे दिया कि उन्हें पाकिस्तानी शरीफ से हाथ मिलाना चाहिए. और पूरे वैश्विक मीडिया में शरीफ के प्रति सहानुभूति गयी तो भारतीय पक्ष का नकारात्मक अड़ियल रवैया ही सामने आया. यही नहीं, किसी सार्क देश ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत का साथ भी नहीं दिया. प्रश्न बड़ी बेरहमी से उठाया जा सकता है कि भारत के किस पडोसी के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं? अभी हाल ही में भूटान के राजा जिग्मे खेसर ने बयान दिया था कि भारत में उनका सत्कार ठीक ढंग से नहीं किया गया. वहीं नेपाल में चीन जिस प्रकार से अपनी घुसपैठ बढ़ा रहा है, उसकी काट भारत के पास यथार्थरूप में है नहीं. हाँ! भाषणों में हम चाहे जो कह लें, मुंह ही तो है. श्रीलंका के साथ समुद्री विवाद और चीन से उसकी निकटता हमें लगातार परेशान कर रही है. भारत की या कहें कि मोदी की विदेश-नीति की प्रशंसा करने वाले महानुभावों की बुद्धि पर तरस आता है, क्योंकि वह मैडिसन स्कूवेयर पर बड़ी सभा और मोदी-मोदी के नारों को कूटनीति समझते हैं अथवा वह फिजी के समुद्री तट पर मोदी की इंस्टग्रामी फोटो को दूरगामी नीति का परिणाम मानते हैं या आस्ट्रेलिया में मोदी-एक्सप्रेस चलाने वाली मार्केटिंग को वह देशहित में मानते हैं. माफ़ कीजियेगा, लेकिन यह सारे काम तो बॉलीवुड का हीरो ऋतिक रोशन भी करता है, शाहरुख़ भी नाच गाकर मनोरंजन करता है और भीड़ भी हूटिंग करती है... यो, यो ....!!

More-books-click-hereहमें बड़े ही स्पष्ट रूप से समझना होगा कि अमेरिका के अपने पडोसी देशों के साथ सम्बन्ध बड़े प्रगाढ़ हैं, वह चाहे कनाडा हो, बहामास हो, जमैका, कोस्टा रिका, पनामा, अरूबा या फिर मैक्सिको, बरमूडा ही क्यों न हो. गौर करने वाली बात है कि यदि अमेरिका भी कनाडा के साथ सीमा-विवाद में उलझा होता तो क्या वह वैश्विक ताकत बन पाता. कई देशों ने अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों की परवाह न करते हुए वैश्विक शक्ति बनने की कोशिश की, लेकिन उनकी औकात कुछेक दशकों से ज्यादा नहीं टिक पायी. चाहे वह जर्मनी हो या फिर रूस ही क्यों न हो. चीन भी आगे बढ़ने की कोशिश जरूर कर रहा है, लेकिन वैश्विक राजनीति के जानकार जानते हैं कि उसके अपने पड़ोसियों से तनावपूर्ण सम्बन्ध उसे वैश्विक राजनीति का पुरोधा कभी नहीं बनने देंगे. वह पडोसी चाहे भारत हो, जापान हो या वियतनाम ही क्यों न हो.

स्पष्ट है कि जिस रास्ते पर भारत, चीन, पाकिस्तान इत्यादि राष्ट्र चल रहे हैं, उस रास्ते पर कुछेक दशकों की कौन बात करे, कुछेक सदियों तक की स्थिति भी एशिया के अनुकूल नहीं बन पायेगी. अमेरिकी बड़ी सरलता से एशियाई मूल के लोगों आसमान पर चढ़ाकर कहता है कि २१वीं सदी एशिया की सदी है, ताकि एशियाई मानव-संशाधन उसे अपनी सेवाएं प्रस्तुत करता रहे और एशियाई नेता आपस में भिड़ते रहें. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं महान कूटनीतिज्ञ अटल बिहारी बाजपेयी का कहा यह तथ्य कहावत में ही रह जाए कि मित्र तो बदले जा सकते हैं, लेकिन पडोसी नहीं, इसलिए पड़ोसियों के साथ सम्बन्ध बेहतर करना जरूरी है. आप भी इन एशियाई नेताओं की तरह खुशफहमी में बने रहिये कि अगली सदी, अगले दशक आप ही के हैं. शायद हम नागरिकों के भी हज़ारों मित्र होंगे, फेसबुक पर तो होंगे ही, लेकिन चूँकि हम एशिया के हैं, इसलिए हम अपने पड़ोसियों को नजरअंदाज कर देते होंगे. ठीक कहा या नहीं, जरूर सोचिये.

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

You can change friends but not neighbours, so make strong relations with neighbours. Article in Hindi by Mithilesh on foreigh policy of India, China, Pakistan and Asian countries.

ऑनलाइन मार्केटिंग से कमाई एवं सावधानियां - Earning through Online Marketing and Precautions

by on 01:27

कई मित्रों ने फेसबुक पर, कई ने फोन करके मुझे पूछा कि फेसबुक से कमाई कैसे होगी. आखिर उनका काफी सारा समय इस प्लेटफॉर्म पर यूँही व्यतीत हो जाता है. जो कुछ मैंने उन्हें अलग-अलग बताया, उसको आपके सामने यहाँ रखता हूँ-


१. कंटेंट (Content is king) : यह सिर्फ फेसबुक के लिए नहीं, बल्कि पूरे इंटरनेट व्यवसाय के लिए सत्य है. यदि आप इंटरनेट के किसी भी माध्यम से पैसा कमाना चाहते हैं, तो आपको अपने कंटेंट की प्रस्तुति को वजनदार रखना होगा. ओरिजिनल (original) रहे तो अच्छा, यदि न भी रहे तो उसकी प्रस्तुति(presentation) निश्चित रूप से अलग रहे. इसके साथ आपके कंटेंट में सम्बंधित तस्वीरें, लिंक्स (Links), सूत्रवाक्य (quotes) इसका वजन बढ़ाने के काम आते हैं. अब एक अच्छा कंटेंट, हेडिंग के साथ तैयार करके आप फेसबुक पर डाल सकते हैं. वैसे बेहतर यह रहता है कि यह कंटेंट आप किसी ब्लॉग (Blog) पर डालें और उससे भी बेहतर रहेगा यदि आप किसी सीएमएस वेबसाइट (CMS Website) पर डालकर फेसबुक पर उसका लिंक और परिचय भर दें. फिर अच्छे कंटेंट की चाह में आपकी वेबसाइट पर फेसबुक से ट्रैफिक आ सकता है. अपनी प्रोफाइल के अतिरिक्त आप ग्रुप (fb groups) का सहारा ले सकते हैं, जो एक बड़ा सोर्स है ट्रैफिक डायवर्ट करने का. पेज का पेड प्रमोशन भी कई मामलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

२. अफिलिएट प्रोग्राम (Affiliate Program): यदि आपने कंटेंट के मामले में समझदारी दिखा दी है तो फिर आगे का रास्ता बहुत मुश्किल नहीं. अधिकाँश लोग यहीं चूक जाते हैं. अगले स्टेप में आपको कुछ सम्बंधित अफिलिएट प्रोग्राम ढूंढने की जरूरत है. इसमें कुछ की लिस्ट मैं नीचे दूंगा. लेकिन अर्निंग के लिए सबसे ज्यादा गूगल एडसेंस इस्तेमाल किया जाता है. और यह सबसे विश्वसनीय होने के साथ-साथ स्पैम-फ्री (Spam-free) भी है. अधिकाँश अफिलिएट प्रोग्राम अविश्वसनीय होने के साथ स्पैम के अड्डे (Spammers) भी हैं, जो आपके पाठक को भ्रमित एवं परेशान करने में कसर नहीं छोड़ते हैं. फिर भी कुछ प्रोग्राम आप और इस्तेमाल कर सकते हैं. अफिलिएट प्रोग्राम में साइनअप करने के बाद अपनी डिटेल भरनी होती है, अपने ब्लॉग/ वेबसाइट के बारे में डिटेल भरनी होती है. गूगल एडसेंस यहाँ बहुत सख्त है, यदि आपका कंटेंट उसकी पॉलिसी के हिसाब से नहीं है तो यह आपके प्रयास को निष्फल कर देगा.(हिंदी को यह सपोर्ट नहीं करता है अभी, लेकिन अकाउंट अप्रूव होने के बाद आप विज्ञापन हिंदी वेबसाइट पर डाल सकते हैं).  अफिलिएट अकाउंट अप्रूव होने के बाद आपको अपने बैंक अकाउंट की जानकारी देनी होती है, फिर एक निश्चित राशि आपके अफिलिएट अकाउंट में जमा होने पर वह राशि आपके बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दी जाती है.

More-books-click-hereकुछ महत्वपूर्ण अफिलिएट प्रोग्राम हैं:



  1. https://www.google.com/adsense/

  2. https://www.flipkart.com/affiliate/signup

  3. https://affiliate-program.amazon.in/gp/associates/join/landing/main.html

  4. http://www.cj.com/

  5. http://www.affiliatefuture.co.uk/

  6. http://www.paidonresults.com/affiliates-sign-up.html

  7. https://www.apple.com/in/itunes/affiliates/

  8. http://www.omgpm.com/india/


सावधानी (Precautions):



  1. जल्दबाजी करने वाले बहुत जल्दी निराश होकर मैदान से बाहर हो जाते हैं. आपको इस मार्किट को समझने और कुछ कमाई के लेवल तक पहुँचने के लिए 6 महीने से 1 साल तक आराम से लग जाएंगे. वह भी तब जब आप प्रत्येक दिन 2 घंटे से ज्यादा समय देंगे. इसलिए जल्दी है तो यह काम शुरू ही न करें.

  2. कंटेंट कॉपी, पेस्ट करके आप अपनी मेहनत ही जाया करेंगे, इसका कोई फायदा नहीं. न तो आपका पाठक-वर्ग बनेगा, न ही इंटरनेट पर इसे कोई रैंकिंग मिलेगी. बल्कि आपकी वेबसाइट या ब्लॉग की साख ख़राब ही होगी.

  3. थोड़ा बहुत तकनीकि समझ बढ़ाने की कोशिश फायदेमंद रहेगी इस श्रेणी में. जैसे किसी वेबसाइट को मैनेज कैसे किया जाय, ऑनपेज एसईओ क्या होता है, टैग, लेवल, इमेज ऑल्ट टेक्स्ट इत्यादि समझने पर बेहतर परिणाम आएंगे. (Get Knowledge)

  4. कभी इस तरह की ग़लतफ़हमी में न फंसे कि यहाँ क्लिक करने से, वहां क्लिक करने से, मेल करने से आप पैसे कमा लेंगे. (Stay away from spammers)

  5. साथ में कमाने के लिए कहीं भी पेड मेम्बरशिप नहीं लें. कई वेबसाइट इस तरह का झांसा देती हैं कि आप यदि इतने डॉलर की मेम्बरशिप लेंगे तो उतना कमा लेंगे. यह बिलकुल फ्रॉड है, झूठा जाल है आपको फंसाने के लिए.

  6. ट्रैफिक बढ़ाने के लिए आप फेसबुक की तरह के दुसरे सोशल नेटवर्क का भी सावधानी से इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसे ट्विटर, स्टंबलउपॉन, गूगल प्लस आदि.

  7. बाकि सीरियस होने पर यदि आपको और जानकारी चाहिए, तो आप मुझे कभी भी संपर्क कर सकते हैं. My email ID is: mithilesh2020@gmail.com; Call at: +91- 9990089080


-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.
How to earn through facebook, guide/ information in hindi. Earning through Online Marketing and Precautions.

Precaution on internet market; how to earn on internet

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Wednesday, 26 November 2014

वेबसाइट, ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया, कीमत एवं सावधानियां - Blogging, CMS, Website, Promotion, Price and Support Article in Hindi

by on 14:21


  1. You want to make a Website?




  2. You already own a website, but having a lot of issues, related?




  3. Price Confusion?




  4. Social Media, Blogging, CMS, Static Website Confusion, then this article is for you in Hindi, by Mithilesh.




वेबसाइट क्यों? (वृहत्तर विजिटिंग कार्ड): शुरूआती स्तर पर वेबसाइट को आप एक तरह का विजिटिंग कार्ड मान सकते हैं, जो आपकी अनुपस्थिति में भी आपका या आपके पेशे का वृहद परिचय सामने वाले व्यक्ति को देगा. जब आप किसी से मिलते हैं और उसको अपना विजिटिंग कार्ड देते हैं, तो उसमें आपके बारे में आपका फोन न., मेल और पता होता हैं. यदि उसी कार्ड में आपकी वेबसाइट लिखी हैं तो सम्बंधित व्यक्ति आपके बारे में काफी कुछ जान कर आपसे अवश्य भी प्रभावित हो जायेगा. अपनी वेबसाइट के बारे में आप सामने वाले व्यक्ति को फोन द्वारा एक शब्द में बता सकते हैं.

smo-zmuब्लॉग/ फेसबुक/ ट्विटर एवं वेबसाइट में भिन्नता: सबसे बड़ी भिन्नता इसके प्रोटोकॉल को लेकर है. निश्चित रूप से यह सभी माध्यम बड़े ही उपयोगी हैं, किन्तु सभी के लिए इनकी उपलब्धता समान होने के कारण, आपकी विशिष्टता कायम नहीं रह पाती है. इसके अतिरिक्त आप इन सभी को अपने विजिटिंग कार्ड पर छापने में कठिनाई महसूस करेंगे. मार्केटिंग की दृष्टि से भी यह बहुत उपयुक्त नहीं है, क्योंकि इन माध्यमों पर (विशेषकर सोशल मीडिया पर) ट्रैफिक बहुत जल्दी आता है और आकर चला भी जाता हैं. बल्कि कई लोग सोशल प्लेटफॉर्म का ट्रैफिक मोड़कर अपनी वेबसाइट पर लाते हैं, जो एक समझदारी भरा निर्णय है. सोशल मीडिया को आप यदि कोई मार्केटप्लेस (सड़क) मान लें, तो वेबसाइट उस मार्केटप्लेस में स्थित आपकी दूकान है, और सामान तो तभी बिकेगा जब ग्राहक आपकी दूकान में आएगा. यदि ऑडिएंस को ग्राहक मान लें तो वेबसाइट आपकी दूकान है, जहाँ ग्राहक आपके सामान देखकर खरीदने को प्रेरित होगा, जबकि बाहर कन्फ़्यूजिंग-स्टेज होती है. इसके अतिरिक्त ब्लॉग या फ्री प्लेटफॉर्म्स में आपको बहुत ही सीमित डिज़ाइन की सुविधा मिलती है, जो निश्चय ही एक आकर्षक एवं इंटरैक्टिव वेबसाइट से बहुत पीछे होती है. परन्तु यदि आप पैसे खर्च नहीं करना चाहते हैं अथवा आप को बहुत ज्यादे प्रचार-प्रसार की आवश्यकता नहीं है, तो बिलकुल शुरूआती स्टेज के लिए ब्लॉग या फ्री प्लेटफॉर्म भी एक अच्छा माध्यम होता है.

profile-zmu-web-servicesडायनामिक, स्टेटिक, सीएमएस (वेबसाइट के प्रकार): स्टेटिक वेबसाइट, एचटीएमएल की साधारण कोडिंग से बनाया जाता है, जिसमें परिवर्तन करना आम-जनमानस के लिए मुश्किल होता है, क्योंकि इसे कोडिंग, डिजायनिंग, एफटीपी की कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जो कि किसी जानकार के लिए ही मुफीद होता है. डायनामिक वेबसाइट यदि कस्टमाइज़्ड (पीएचपी/ एएसपी/ डॉटनेट में) बनी है तो शुरू में काम अच्छा ही चलता है, लेकिन यदि सर्विस देने वाली कंपनी पुरानी और मजबूत नहीं है तो दिक्कत आनी तय है. छोटी कंपनियों अथवा फ्रीलांसरों से कस्टमाइज़्ड डायनामिक वेबसाइट बनवाना अंततः नुक्सान का सौदा साबित होता है, छोटी-छोटी दिक्कतें बहुत इरिटेट करती हैं और आपका काफी समय एवं धन खर्च होता है, फिर भी कमियां रह ही जाती हैं. इसके अलावा यदि आप कंपनी या डेवलपर बीच में या बाद में भी चेंज करते हैं तो आपका पिछला सारा काम बर्बाद ही समझो, क्योंकि हर एक डेवलपर का अपना काम करने का तरीका होता है, जोकि निश्चित रूप से स्टैण्डर्ड नहीं होता है. इसके अतिरिक्त आप यदि सीएमएस (कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम) के साथ जाते हैं तो आपको खर्च, सुविधाएं और ग्लोबल स्टैण्डर्ड साथ में मिलते हैं, और ऊपर स्टेटिक या कस्टमाइज़्ड डायनामिक वेबसाइट की समस्याएं हल हो जाती हैं. यही नहीं, आपको इनके लिए तमाम सपोर्ट बहुत ही आसानी से उपलब्ध हो जाता है. वर्डप्रेस, जुमला, द्रुपल इत्यादि पॉपुलर सीएमएस की श्रेणी में आते हैं.

google-adwords-by-zmu-web-servicesगूगल, एसईओ, एडवर्ड्स, प्रमोशन: मेरे प्रोफेशनल कैरियर के दौरान जिस एक शब्द के बारे में सबसे कन्फ़्यूजिंग क़्वैरी आयी है, वह गूगल सर्च और अपनी वेबसाइट के प्रमोशन को लेकर है. साधारण सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेशन, आप वेबसाइट बनाते समय, कंटेंट भरते समय भी कर सकते हैं, जिसमें टाइटल सही करना, कंटेंट, इमेज की सही जगह प्लेसिंग होती है, वहीं यदि आप गूगल सर्च में टॉप पर दिखना चाहते हैं या आपको किसी ने सपना दिखाया है, तो आपको सावधान हो जाना चाहिए. यह एक उलझाऊ फिल्ड है, खासकर वेबसाइट की शुरुआत करने वालों के लिए. कीवर्ड, डेंसिटी, लिंक-बिल्डिंग का बहुत ही फ्राड कारोबार मार्किट में उपलब्ध है, जिस से कस्टमर बहुत ही दुखी हैं. इसके लिए आपको निश्चय ही बड़े लेवल पर प्लानिंग और खर्च दोनों करना पड़ता है. इससे बेहतर यदि आप गूगल के पेड-एडवरटाइजिंग (एडवर्ड्स) की ओर जाते हैं तो यह कम खर्च में आपको बेहतर परिणाम दे सकता है. मेरे कई ग्राहक फेसबुक पर भी अपने प्रोडक्ट की अनपेड और पेड दोनों माध्यमों से मार्केटिंग कराकर काफी खुश हुए हैं.

पैसे का खर्च और साधारण हिसाब-किताब: वेबसाइट के सन्दर्भ में मार्किट में यह सबसे गन्दा और भ्रम पैदा करने वाला क्षेत्र बन गया है. वेबसाइट बनवाने की इच्छा रखने वाले ग्राहक के मन में निन्यानवे रूपये से लेकर लाखों रूपये का फिगर दिमाग में बना हुआ है और वह इनके बीच अंतर समझ पाने में अधिकांश बार विफल हो जाता है. इसके लिए आपको स्टेप-बाय-स्टेप बताने का प्रयास कर रहा हूँ-

  • डोमेन-रजिस्ट्रेशन: इसके कई प्रकार के एक्सटेन्सन मौजूद हैं. डॉट कॉम, डॉट इन, डॉट नेट ... इत्यादि. साधारण रूप में इसकी कीमत पांच - छः सौ के आस पास domain-name-registration-zmuहोती है. कई कंपनियां अपने डोमेन बेचने के लिए तमाम ऑफर भी देती हैं, जो निन्यानवे रूपये तक का होता है (इस डोमेन के टीवी पर प्रचार को लेकर भी कई ग्राहक कीमत के मामले में कन्फ्यूज हो जाते हैं, जबकि यह शुरूआती स्टेज है). हालाँकि सस्ता डोमेन देने पर इसमें कई बार उस कंपनी का प्रतिबन्ध भी होता है और अगली साल रिन्यूवल पर वह आपसे काफी ज्यादा पैसा चार्ज कर लेती हैं. बिगरॉक, गोडैडी इत्यादि कंपनियां इस क्षेत्र में कार्य कर रही हैं.

  • वेब होस्टिंग/ स्पेस: इसमें भी डोमेन की तरह ही कन्फ्यूज स्टेज है, परन्तु साधारण वेबसाइट के लिए आपको दो हजार रूपये सालाना में बढ़िया शेयर्ड होस्टिंग मिल जाएगी, जिसमें आपको बढ़िया सपोर्ट, बैंडविड्थ और अच्छा भला मेल सर्वर मिल जायेगा. हालाँकि इससे सस्ती भी होस्टिंग देने का दावा करती हैं कंपनियां, लेकिन फिर आपको उनके पीछे दौड़ना पड़ेगा. स्टैण्डर्ड प्राइस की बात करें तो याहू.कॉम की डोमेन-होस्टिंग ३,५०० और बिगरॉक.इन की ३,००० रूपये सालाना है (१ वेबसाइट, शेयर्ड होस्टिंग). तमाम ऑफर इसमें भी समय-समय पर आते रहते हैं.

  • free-quote-for-website-designवेब डिज़ाइनर, डेवलपर को हायर करना: यदि आप रेडीमेड वेबसाइट-बिल्डर की तरफ नहीं जाते हैं तो आपको किसी कंपनी या फ्रीलांसर को हायर करना पड़ेगा. यहाँ आप जरूर देखें कि वह कंपनी अथवा फ्रीलांसर कम से कम चार-पांच सालों से इंडस्ट्री में काम कर रहा है कि नहीं. चेक करने का बढ़िया तरीका उसके द्वारा किये गए काम होते हैं. उसके कुछेक क्लायन्टों से बात करने में आप हिचकिचाएं नहीं. और यहाँ ध्यान रहे कि आप 'सीएमएस' को ही प्रिफर करें. जहाँ तक कीमत की बात है, साधारण वेबसाइट के लिए यह पांच हज़ार से लेकर पचास हज़ार तक हो सकता है. आप वेब डिज़ाइनर का काम, परफेक्शन, उसकी नॉलेज, सपोर्ट की व्यवस्था और पिछले काम का स्तर देखकर उसकी कीमत और दी जा रही सुविधाओं के बारे में कम्पेयर करें. कोशिश करें कि एक से अधिक वेब डिजायनरों को अपने पैमाने पर रखें, इससे आप फीचर-वाइज तुलना कर पाएंगे. हाँ! किसी अन्य व्यवसाय की भांति वेब डिजायनर का व्यवहार-अध्ययन भी भविष्य में आपको काफी सहूलियत दे सकता है.


-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

किसी प्रकार की असुविधा होने पर, मुझे किसी भी समय संपर्क करें. मेरा फोन न. 9990089080 है: और मेरी मेल है: mithilesh2020@gmail.com

Great-CMS-Websites-7-years-experience-delhi-company-wordpress-technologyBlogging, CMS, Website, Promotion, Price and Support Article in Hindi by Mithilesh, havingh 7+ years experience in Website Designing, Development and SEO, SMO and Brand Promotion.

Sunday, 23 November 2014

China, Pakistan and Indian Policy

by on 06:35
National Security Advisor Ajit Dobhal China and Pakistan

डोभाल ने कहा कि चीन, पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर भारत के प्रति निर्भर करने की आवश्यकता है। अगर देश की विकास दर आठ-नौ फीसद हो जाए तो दुनिया का कोई देश हमारी ओर आंख उठाकर नहीं देख सकता। लेकिन इसके बावजूद हमें सेना को शक्तिशाली करना होगा। ‪#‎NationFirst‬ ‪#‎Security‬ ‪#‎Defence‬ ‪#‎Economy‬

China, Pakistan and Indian Policy mentioning in Hindi

... क्यों आएं युवा आपके पास! Youth and Writers, Article by Mithilesh in Modern age perspective!

by on 00:46
पिछले दिनों देवबंद की साहित्यिक भूमि पर गया. अवसर था महान साहित्यकार, देशभक्त स्व. डॉ. महेन्द्रपाल काम्बोज की पहली पुण्यतिथि का. इस महान विभूति के जीवित रहते सिर्फ एक बार मिलने का अवसर तब मिला जब काम्बोज जी के मित्र डॉ. विनोद बब्बर द्वारा लिखित किताब-विमोचन का समारोह आयोजित हुआ था. आप उस कार्यक्रम में संचालक की भूमिका में थे. एक श्रेष्ठ मंच संचालक, जिसकी दृष्टि सभागार के हर एक कोने से परिचित थी और हर एक कोना भी उनके सञ्चालन निर्देश का मानो इंतज़ार कर रहा था. चमकता हुआ लालाट, सौम्यता, वक्तृत्व-शैली और उनकी सरलता ने एक नजर में मुझे अपने प्रभाव में ले लिया. सच कहूँ, तो उस कुछ घंटे के कार्यक्रम में आधे से ज्यादा समय डॉ.काम्बोज का प्रभामंडल मुझ पर हावी रहा.

खैर, ऐसा कई लोगों के साथ होता है, कई प्रभावित करने वाले व्यक्तित्व मिलते हैं, बिछड़ते हैं और उनका प्रभाव समाप्त हो जाता है. संयोग से उनके देहावसान के कुछ महीनों बाद उनके सुपुत्र ने मुझसे संपर्क करके अपने पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व को संरक्षित करने के लिए वेबसाइट बनवाने हेतु मुझसे संपर्क किया तो मेरे सामने उनकी धुंधली पड़ती यादों को सहेजने का अवसर भी मिला. उनकी पहली पुण्यतिथि पर इस वेबसाइट का उद्घाटन उनके मित्रों एवं सम्बन्धियों द्वारा देवबंद में किया गया. लेकिन मुख्य बात इसके बाद की है जो आपसे ज़िक्र करना चाहता हूँ. इस पुण्य-तिथि के लिए डॉ.काम्बोज के परम मित्र और हमारे गुरु डॉ.विनोद बब्बर के अलावा नागरी लिपि परिषद जैसी महत्वपूर्ण संस्था के बड़े विद्वान के साथ मैं भी गाडी में बैठा हुआ था. दिल्ली से देवबंद का रास्ता लगभग ३ घंटे के आस पास है, तो इन ३ घंटों के दौरान कई मुद्दों पर महानुभावों की चर्चा भी सुनने को मिलती रही. युवाओं, उनकी साहित्यिक जागरूकता पर भी कई प्रश्न और उत्तर होते रहे. दिल्ली से देवबंद जाने के दौरान मैं भी युवाओं की साहित्यिक उदासीनता के प्रति थोड़ा निराश था, क्योंकि इससे पहले भी कई लोग इस आसान प्रश्न को उठाते ही रहते हैं.

कई दिनों, महीनों और सालों से इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने की कोशिश करता रहा था, लेकिन देवबंद की साहित्यिक धरती पर, स्व. काम्बोज जी की पहली पुण्यतिथि के कार्यक्रम ने इन समस्त सवालों की पोल खोल दी. डॉ.कांबोज जी के तमाम शिष्य, उनके आस पास के युवक थे, जो एक से बढ़कर एक कविताएं कह रहे थे, अपने गुरु के प्रति श्रद्धांजलि दे रहे थे, नम्र थे, सजग से और इन सबसे बढ़कर संवेदनशील थे. सभी के हृदय से यह भाव बारम्बार मुख पर आ रहा था कि उन्हें तो कलम पकड़ने का ढंग भी नहीं था, लेकिन डॉ. काम्बोज ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया, आगे बढ़ाया, प्रोत्साहित किया. यहाँ खुद को साहित्य-जगत का पुरोधा समझने वाले, युवकों की उदासीनता की शिकायत करते रहने वाले बड़े साहित्यकारों को दर्पण के सामने खड़ा होने की जरूरत है. यूं भी साहित्य की दो परिभाषाएं सर्वाधिक प्रचलित हैं. पहली 'साहित्य समाज का दर्पण है और दूसरी 'सबको साथ लेकर चलने वाला'. युवकों को नालायक, बदमिजाज, संस्कृतिविहीन और जाने क्या-क्या बताने वाले स्वनामधन्य साहित्यकार अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को इन दो परिभाषाओं की कसौटी पर कसने के लिए तैयार हैं क्या?

कृतित्व से जहाँ समाज में घट रही घटनाओं का विभिन्न विधाओं में, प्रचलित माध्यमों के द्वारा प्रकाशन है, जिससे समाज को सहज रूप से दर्पण की भांति अपनी तस्वीर दिख सके और अपनी कमियों का आंकलन कर वह उसमें सुधार कर सके. एक तरफ अधिकांश साहित्यकारों को यह पता ही नहीं चल पा रहा है कि समाज में कितनी तेजी से बदलाव आया है, रिश्ते-नातों की परिभाषाएं कहाँ से कहाँ तक पहुँच गयी हैं, तो वह साहित्य के नाम पर अपने कभी के पुराने अनुभव थोपते रहते हैं. जिन साहित्यकारों को थोड़ी बहुत आधुनिक परिप्रेक्ष्य, समाज की समझ भी है, उनके साहित्य में आत्म-प्रवंचना, स्व-दैनन्दिनी अथवा चाटुकारिता का पुट साफ़ झलकता है. क्या यही पढ़ने के लिए, यही समझने के लिए आप युवाओं को अपने पास बुलाना चाहते हैं? इस पैरा की पहली लाइन में मैंने माध्यमों की बात भी की है. बदलते तकनीकि युग में ८० फीसदी से ज्यादा साहित्यकार, उन्हीं पुराने माध्यमों की रट लगाये हुए हैं. उनके लिए वेबसाइट जैसे शब्द अनजान हैं, अधसुने हैं या फिर भ्रमित करने वाले हैं. जबकि युवा पीढ़ी के मामले में यही अनुपात बिलकुल उल्टा है. ८० फीसदी से ज्यादा युवा वेबसाइट के माध्यम से ही संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं. एक बड़ा गैप. अब समझना होगा कि एक ही कविता, एक ही वक्तव्य विभिन्न सभाओं में सुनाने वाले कथित 'साहित्यकारों' का कितना प्रभाव इन युवकों पर पड़ेगा, यह अपने आप समझ में आ जाने वाली बात है.

More-books-click-hereदूसरी बात 'व्यक्तित्व' की न ही करें तो उचित रहेगा. सम्मान के लिए गुटबाजी, थैली (पुड़िया/ नकद) के लिए मारामारी, नाम का लालच, साथी कवियों / लेखकों को हर मौके बेमौके नीचा दिखाना, शिष्य के नाम पर युवाओं/ युवतियों का दैहिक, आर्थिक शोषण करना, अपने परिवार तक को न संभाल पाना (बहुतायत में), शराब और दूसरी तमाम बुराइयों की लत पकड़ लेना इत्यादि ढेरों सुन्दर गुणों का दिव्यदर्शन आपको आज के साहित्यकारों में सुलभता से हो जायेगा. नाम की भूख, पैसे की भूख, पद की भूख .... भूख ही भूख!! यही साहित्यकार का व्यक्तित्व है क्या? इसी के बल पर आप युवाओं को अपने पास बुलाते हैं? अरे आप याद करिये मुंशी प्रेमचंद को, निराला को और आधुनिक जगत में स्व. डॉ. महेंद्र पाल काम्बोज को. उस डॉ.काम्बोज को, जो अपने अंतु-लाखा जैसे खंड-काव्य में ग्रामीण-चरित्रों की बात करते हैं, बिना इस बात की परवाह किये कि उसे पदमश्री, बुकर प्राइज या राष्ट्रपति पुरस्कार मिलेगा या नहीं. गावों को भारत की आत्मा कहा गया है. कोई बताएगा कि भारत की आत्मा पर कितने प्रमाणित ग्रन्थ आ रहे हैं? अथवा पुराने ग्रंथों का नवीनीकरण भी हो रहा है या नहीं? डॉ.काम्बोज ने अपने आस पास के युवकों को प्रेरित किया, क्योंकि वह जानते थे कि वह अब बुजुर्ग हो चुके हैं और आने वाला समय इन्हीं युवाओं का है. नए ज़माने का साहित्य वही दे सकते हैं. उन्हें किसी प्रकार का विशेष 'भ्रम' नहीं था कि वह ही दुनिया को समझ रहे हैं, यह युवक तो मुर्ख हैं, इन्हें क्या पता! अपने कृतित्व और व्यक्तित्व के माध्यम से उन्होंने साहित्य की दोनों परिभाषाओं को सार्थक किया है. समाज का दर्पण भी आपने प्रस्तुत किया और सबको साथ लेकर भी आप चले. साहित्यिक रूप से उनको सबल बनाया, सिर्फ उन्हें अपने पीछे-पीछे घुमाने वाला 'चेला' नहीं बनाया. इसलिए मरने के बाद भी आपके शिष्यत्व के लिए मेरे जैसे नालायक युवकों की आँखों में आंसू हैं. आपको नमन है 'युगपुरुष'!

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Youth and Writers, articles by Mithilesh in modern age perspective, in Hindi.

Friday, 21 November 2014

Islam Musalman Politics in India

by on 06:40
Islam-Musalman-politics-in-India

 

इमाम की इस शाही राजनीति का मूल केंद्र मीडिया है. बुख़ारी उन छवियों का राजनीतिकरण करते हैं जो इस धारणा पर टिकी हैं कि हिन्दुस्तानी मुसलमान एक ऐसा समुदाय है जो जड़ है, पुरातनपंथी है और जिसकी राजनीती पर सिर्फ और सिर्फ उनका क़ब्ज़ा है.
-BBC Hindi (previous status's link)
भारत का मुसलमान, इन ठेकेदारों द्वारा कब तक मुर्ख बनेगा ????

नवाज़ शरीफ़ को दस्तारबंदी में बुलाने से अहमद बुख़ारी का यह कदम, कई हलकों में, हिन्दुस्तानी मुसलमानों को एक बार फिर पाकिस्तान के विचार से जोड़ने के तौर पर देखा जाएगा. उनके वक्तव्य से यह सन्देश भी निकलता लगता है कि जैसे कि आज भी पाकिस्तान, भारतीय मुसलमानों के लिए राजनीतिक प्रेरणा हो...
- BBC Hindi Analysis (Read here: http://goo.gl/A0Wmji)

Islam Musalman Politics in India, Imam, Shahi Imam Bukhari, Imam, Musalman, Islam, Politics, Rajniti, Muslim

अनाथों का नाथ बनें; सीखें बिगड़ैल से... Orphan, Orphanages and Civil Society!

by on 04:34
कई बार लोग, जिन्हें बिगड़ैल, बद्तमीज और ऐसी ही अन्य संज्ञाओं से नवाजते हैं, वह दुनिया को कुछ ऐसी सीख दे जाते हैं, जिसकी मिसाल ढूंढें नहीं मिलती. बात इस बार मायानगरी से है. एक तरफ हिंदी फिल्में पूरे विश्व में भारत की एक खास पहचान बना चुकी हैं, वहीं देश में जिन दो चीजों के प्रति, गैर-परंपरागत रूप से सर्वाधिक आकर्षण है, वह निश्चित रूप से क्रिकेट और बॉलीवुड ही है. आज कल के शहरी और देहाती दोनों प्रकार के अधिकांश युवक या तो बड़े क्रिकेटर बनने का सपना देखते हैं अथवा किसी एक्टिंग क्लास में हीरो बनने का प्रयास दिख जाना सामान्य बात है. क्रिकेट में इन युवकों के आदर्श सचिन तेंदुलकर होते हैं, वहीं हीरोगिरी दिखाने के शौकीनों के सलमान खान. जी हाँ! खबर भी इन्हीं साहिबान की है. माचो मैन, मोस्ट एलिजिबल बैचलर, लेडी-किलर, दोस्तों का दोस्त, दुश्मनों का दुश्मन इत्यादि तमाम उपनाम इन्हें इस मायानगरी से मिले हैं. इनके कार्यों में तमाम हिट फिल्मों के अतिरिक्त किसी को भी थप्पड़ लगा देना, महिलाओं की बेइज्जती करना, गैर-कानूनी रूप से काले हिरणों का शिकार करना जैसे तमाम विवाद शामिल रहे हैं. आगे परिचय बढ़ाते हुए इनके बारे, इनकी समझ के बारे में राजनीति के लोग भी लोहा मानते हैं. आम चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी के साथ इनके पतंग उड़ाने को लेकर कड़ा विवाद उत्पन्न हो गया था, लेकिन विवाद और सलमान खान एक दुसरे के पूरक कहे ही जाते हैं, तो इसमें कोई नयी बात है नहीं.

पिछले दिनों से सलमान खान लगातार मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं और संयोग से इसका कारण सकारात्मक है. फूटपाथ पर मरी हुई माँ के पास एक छः महीने की बच्ची रो रही थी, जिसे सलमान खान के परिवार ने सहारा दिया. बिना इमोशनल सीन में घुसे आप इस बात पर भी गौर कीजिये कि इस बच्ची को पूरी कानूनी प्रक्रिया के बाद गोद लिया गया और उसके लालन-पालन में सलमान खान ने उसी सोशल स्टेटस को अपनाया, जो शायद उनके अपने परिवार के बच्चों को मिला है. दुनिया ने उनकी शादी की रस्म को देखा ही, समझा ही. इस बारे में अख़बारों में, चैनलों में खूब बातें कही गयीं, सुनीं गयीं, लेकिन कहीं भी इसके मानवीय पहलू पर चर्चा सुनने का अवसर नहीं मिला. संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिये कि कुछ लोग इस पूरे प्रकरण की चर्चा भाग्य के रूप में करते मिले कि उस फूटपाथ की लड़की की कितनी सुन्दर किस्मत है कि आज वह लाखों की गाड़ी पर चल रही है, करोड़ों के महलों में रह रही है. पूरी दुनिया की अजब हालत हो गयी है कि वह हर रिश्ते को अर्थ के तराजू में लाकर खड़ा कर देती है. उसके लिए संवेदना का मोल भी चंद सिक्के हो गए हैं. इस अर्थहीन, अंतहीन, निरर्थक, भाग्यवादी और लालची चर्चा ने इस पूरे उदाहरण को बहुत ही गलत तरीके से पेश किया है. नचनिया कह कर बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों के बीच अपमानित किया जाने वाला बॉलीवुड और इसके बिगड़ैल कहे जाने वाले सलमान खान ने अपने इस कृत्य से बुद्धिजीवियों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा है. थप्पड़ लगाने का अभ्यास तो उनको पहले ही था, लेकिन उनका यह तमाचा पूरे समाज पर पड़ा है. समाज के ठेकेदारों को यह बात समझ लेनी चाहिए.

More-books-click-here२०१३ में आयी एक रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में २० लाख बच्चे अनाथ हैं. कमोबेश, देश के सरकारी कर्मचारियों की संख्या भी इतनी ही है. राजनेता, अभिनेता, व्यापारी इत्यादि सक्षम लोगों का वर्ग छोड़ भी दें तो यह आंकड़ा शर्मिंदा करने वाला ही है. देश में करोड़ों ऐसे लोग हैं, जो सलमान खान की तरह एक-एक हाथ बढ़ाएं तो अनाथ होने का अभिशाप देश से २४ घंटे के भीतर समाप्त हो सकता है. लेकिन नहीं! यह हमारी जिम्मेवारी नहीं है, यह तो सरकार करेगी! किसी 'स्वच्छता-अभियान', 'आदर्श गावं अभियान' की तरह 'अनाथ-अभियान' चलाएगी, फिर सभी ५४३ सांसद एक-एक बच्चे को गोद लेकर फोटो खिंचायेंगे और बाद में उन लड़कों का भी पता नहीं चलेगा. एक और वाकया याद आ रहा है. एक दंपत्ति हैं, ईश्वर ने उन्हें धन-धान्य से परिपूर्ण किया है, लेकिन बिचारे संतानसुख से वंचित हैं वह. कभी उस दंपत्ति के मन में भी किसी को गोद लेने की इच्छा जगी होगी, तो वह अपने से छोटी जाति के गरीब बच्चे को शहर लाये. पढ़ाया लिखाया भी बिचारे को, लेकिन जब वह जवान हुआ तो उसके साथ इसलिए रिश्ता खत्म कर दिया, कि वह उनकी संपत्ति में हिस्सेदार न बन जाए. मतलब साफ़ है, उन्होंने उस बच्चे को कभी अपनाया ही नहीं, बल्कि दूसरी भाषा में कहा जाय तो उन्होंने उसे नौकर ही समझा. यह सिर्फ एक उदाहरण नहीं है, बल्कि आपको गोद लेने के नाम पर ऐसे तमाम वाकये नजर आ जायेंगे, जहाँ हमारा सभ्य समाज इनका शोषण करने में जरा भी कोताही नहीं करता है.

अनाथालय के नाम पर बच्चों से नशीली दवाओं का कारोबार कराना, भीख मांगने के लिए देश के बच्चों को विवश करना, उनके शारीरिक अंगों का व्यापार करना इत्यादि कुकृत्य बेहद आम हैं. शर्म आनी चाहिए, हमें खुद को सभ्य कहते हुए. हमसे अच्छा तो वह बिगड़ैल बच्चा है, जो किसी के भी गाल पर थप्पड़ लगा देता है, लेकिन किसी की आत्मा, जिस पर ज़िन्दगी भर थप्पड़ पड़ते, उसको उसने बचा लिया. एक की ही सही! आपसे भी तो एक की ही जिम्मेवारी लेने की अपेक्षा करता है देश का अनाथ! आप भी तो उसी परमात्मा के अंश हैं न, उसी नाथ की कृपादृष्टि से धनवान बने हैं, बड़े बने हैं, योग्यता हासिल की है, फिर क्या विवशता है इन बेसहारों के सर को छाँव देने में. स्वयं विचार करें !

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Orphan, Orphanages and Civil Society, article by Mithilesh in Hindi, related with Salman and Arpita Khan relations.

Wednesday, 19 November 2014

ट्रेन का टाइम ... Train Timing, Social Poem by Mithilesh

by on 04:59
बेटा, आज तो रुक जा
अभी तो आया है, अब जा रहा है
माँ बोलीं
पिछली बार भी तू न रुका था
तब मेरा मन खूब दुखा था

उन्हें लगा, बुरा न लग जाए
बोलीं-
तुझे भी कितना काम है,
एक पल ना आराम है
और फिर बहु भी शहर में अकेली है
पोता बदमाश, पोती अलबेली है

अरे सुन-
उसको भी तो गाँव ले आ
उसकी जड़ों से उसको मिला
उसके दादा उसकी फ़ोटो सहलाते हैं
मिलने को उससे रोज तड़प जाते हैं

कहते हैं-
छोटी बहु भी घर नहीं आयी
मायके से वापसी की टिकट कटवाई
देख न पाया छोटे पोते को
कहते हुए, आँखें डबडबाई

थोड़े अमरुद ले जा,
निम्बू के आचार बहू बना देगी
ये सरसों का शुद्ध तेल है,
पोते की मालिश वह करेगी

सूरज ढल रहा था
मैं माँ को सुन रहा था,
जी किया सुनता जाऊं
लेकिन-
ट्रेन का टाइम हो रहा था।
ट्रेन का टाइम हो रहा था।

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Train Timing, Social Poem by Mithilesh

Sunday, 16 November 2014

अति का भला न ... Ati ka Bhala n - Political Article by Mithilesh

by on 20:40
यूं तो प्रत्येक साहित्य में काफी कुछ होता है सीखने को, और जब वह साहित्य कबीर जैसे स्पष्टवादी संत के मुख से प्रस्फुटित हुआ हो, तो फिर क्या कहने! कबीर के दोहे पढ़ने पर प्रतीत होता है कि एक ही दोहे में एक ही बात को दो, तीन या उससे ज्यादा उदाहरण देकर सिद्ध किया गया है. न कोई क्लिष्टता, न कोई गूढ़ शब्द, लेकिन गूढ़तम भावार्थ. उनके एक दोहे को पढ़कर वर्तमान राजनीति के सन्दर्भ में 'अति' शब्द पर विचार करने की इच्छा हुई. पहले उनके दोहे को स्मरण करना उचित होगा, जिसमें कबीरदास बड़ी बेबाकी से कहते हैं कि-

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।


भारत भूमि की यह खासियत रही है कि यहाँ हर प्रकार के महापुरुषों के दर्शन होते रहते हैं. आप कहेंगे कि महापुरुषों के भी प्रकार होते हैं क्या? जी हाँ! एक सिर्फ नाम के महापुरुष होते हैं, दुसरे प्रकार के वे महापुरुष होते हैं, जिन पर महापुरुषत्व थोपा गया होता है. तीसरे प्रकार के महापुरुष, श्रेष्ठ आत्म-प्रवंचक होते हैं. आज कल एक अन्य प्रकार के महापुरुषों का बड़ा जोर है, जिन्हें 'मार्केटिंग महापुरुष' भी कहा जा सकता है. एक और प्रकार के महापुरुष ध्यान में आते हैं, जिन्हें 'खास महापुरुष' भी कहा जा सकता है और यह किसी विशेष उद्देश्य हेतु निर्मित किये जाते हैं, उसके बाद इनके महापुरुषत्व पर ग्रहण लग जाता है. यह बताना उचित होगा कि उपरोक्त वर्णित 'महापुरुषों' को लोकहित, मर्यादा इत्यादि से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता है. वह मर्यादा जिसको निभाकर राम, मर्यादा पुरुषोत्तम बने, वह लोकहित जिसके लिए कृष्ण के मुख से गीता-उद्घोष हुआ और दाधीच जैसे महर्षि ने अपना शरीर बलिदान कर दिया.

मतलब साफ़ है कि आज कल महापुरुष 'ब्रांडिंग' के द्वारा बनाये और बिगाड़े जाते हैं. जी हाँ! और इस कार्य के लिए कई बड़ी मार्केटिंग कंपनियां कतार में खड़ी रहती हैं. वह आपके उठने, बैठने से लेकर चलने, मुलाकात करने की कुछ ऐसी तस्वीरें गढ़ती हैं कि क्या कहने? भारत में २०१४ के आम चुनाव से पहले बड़ी चर्चाएं हुईं कि अमुक पार्टी ने या अमुक नेता ने इस या उस कंपनी को ब्रांडिंग के लिए ५०० करोड़, ५००० करोड़ का ठेका दिया. लेकिन यहाँ फिर कबीरदास की 'अति..." वाली वाणी याद आ जाती है. आधुनिक युग में थोड़ा बहुत तो एडजस्ट हो जाता है, लेकिन 'अति' नुकसानदायक ही होती है, यह लोकसभा के परिणाम से फिर सिद्ध हो गया था. इसी कड़ी में आज के समय में कथित रूप से भारत की विदेशों में छवि चमकाने और डंका बजवाने का बड़ा ज़ोर चल रहा है. कभी-कभी तो लगता है कि कबीरदास की 'अति...' वाली वाणी ऐसी ही परिस्थिति के लिए तो नहीं बनी है. वर्तमान में भारतीय प्रधानमंत्री के लिए विश्वविजयी, अश्वमेघ यज्ञ करने वाला और न जाने क्या-क्या संज्ञाएं प्रयोग में लाई जा रही हैं. कही उनके नाम से ट्रेन चल रही है तो कहीं रेस्टोरेंट खुल रहे हैं. खैर, यह किसी की व्यक्तिगत श्रद्धा भी हो सकती है, मार्केटिंग भी हो सकती है. लेकिन प्रश्न उठता है कि भारत को इन सब गतिविधियों से क्या हासिल होगा? भारतीय जनमानस का जीवन-स्तर किस प्रकार सुधरेगा? ऐसा नहीं है कि सिर्फ वर्तमान में ही ऐसा व्यक्तित्व दिखा है, बल्कि पहले भी ऐसे तमाम व्यक्ति और व्यक्तित्व विश्व-स्तर पर ब्रांडिंग करते रहे हैं. कई लोग इस बात को नकारात्मक कहेंगे, लेकिन एकाध और भारतीय ब्रांडों की चर्चा सामयिक होगी. आपको ब्रांडिंग से सम्बंधित रविंद्रनाथ टैगोर की बात बताता हूँ. बड़े नाम थे, बड़ा व्यक्तित्व था, नोबेल पुरस्कार से सम्मान प्राप्त थे. एक बार वह जापान की किसी यूनिवर्सिटी में बड़ी-बड़ी बातें कह रहे थे, अच्छी बातें, सुन्दर बातें. वहां के एक छात्र ने उठकर सीधे-सीधे पूछा यदि आपके पास इतनी अच्छी बातें हैं, आप का देश इतना महान है तो वहां भूखे-नंगे क्यों हैं? उसे तीसरी दुनिया का देश क्यों माना जाता है? इस बात का जवाब नहीं था इस भारतीय ब्रांड के पास.
स्वामी विवेकानंद का भारतीय समाज में बड़ा योगदान है, लेकिन यह सन्दर्भ उनके उभार के दिनों का है. शिकागो धर्म-सम्मलेन से स्वामीजी विश्वविख्यात हो चुके थे. लेकिन इस प्रश्न ने उनका भी पीछा नहीं छोड़ा, जिसके बात उन्होंने विदेश-प्रवास करना छोड़कर भारत में भूखों को भोजन कराना बेहतर समझा और अपना सम्पूर्ण जीवन गरीबों, पिछड़ों की सेवा में अर्पित कर दिया और कहा 'नर सेवा, नारायण सेवा है'. महात्मा गांधी को भी बड़ा वैश्विक ब्रांड माना जाता है, लेकिन इतिहास को खंगालने पर स्पष्ट हो जाता है कि अंग्रेज उन्हें अपनी उँगलियों पर ही घुमाते रहे. इंग्लैण्ड में हुए गोलमेज सम्मलेन से वह खाली हाथ तो लौटे ही, भारत पाकिस्तान का विभाजन भी उनकी बड़ी भूलों में शामिल था. यह वैश्विक राजनीति चढ़ाकर उतारने में बड़ी सिद्धस्त है. पहले खूब चढ़ाती है, फिर ऐसा गिराती है कि पानी तक नहीं मिलता है. आज़ादी के बाद बड़े भारतीय वैश्विक नेता कहे जाने वाले पंडित नेहरू की चर्चा किये बिना यह सूची अधूरी ही रहेगी. हिंदी-चीनी, भाई-भाई के नारे के बाद हमारी अस्मिता की जो दुर्दशा हुई, उससे हम आज तक मुक्त नहीं हो पाये हैं. बड़े-बुजुर्ग भी छोटों को समझाते हुए कहते हैं कि अपने घर को ठीक करो पहले, बाद में बाहर डींगे मारना, और राजनीति का भी यही सिद्धांत है, यह बात वर्तमान में भारतीय नेतृत्व को समझ आ जानी चाहिए.

महंगे कुर्ते, महंगा चश्मा पहनने से भारत की छवि नहीं बदल जाएगी. विश्व के नागरिकों को भारत की स्थिति के बारे में ठीक से पता है, और वह बस परिस्थिति का फायदा उठाने की फिराक में ही हैं. हो-हल्ला करने से बचना चाहिए, यह नादानों का काम है. ढोल पीटने की 'अतिवादिता' कहीं से लाभकारी नहीं है. उद्यम करना चाहिए, लोगों को सशक्त करना चाहिए, इसी में भारतवर्ष की असल गरिमा है. हमारे चेहरे की बजाय हमारा कार्य हमारी पहचान बने, इस बात का प्रयास हो. वर्तमान सरकार का हनीमून पीरियड समाप्त हो चूका है, उसे विदेशी टूर के प्रति आकर्षण पैदा करने से बाज आना चाहिए. साधारण और उद्देश्यपरक यात्रा, लो-प्रोफाइल दिखने वाली यात्रा लाभ पहुंचाती है, यह बात राजनीति और कूटनीति समझने वाले नीतिज्ञ ठीक मानते हैं. यदि नहीं, तो फिर 'अति' का परिणाम भी इस नेतृत्व को समझ लेना चाहिए. 'भूखे-नंगों' का प्रश्न कल भी था, आज भी है. अशिक्षा, स्वास्थ्य-समस्याएं, क्षेत्रीय समस्याएं, आर्थिक समस्याएं, रोजगार हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं, इस पर ध्यान कब आएगा? कुछ लोग कहेंगे कि प्रधानमंत्री बने उन्हें चंद दिनों ही तो हुए हैं. जवाब में कहा जा सकता है कि वह प्रधानमंत्री बेशक आज बने हैं, लेकिन उनकी उम्र ६० से ज्यादा है. क्या वह इस प्रश्न का जवाब देंगे? या छवि चमकाने की अतिवादिता में ही उलझे रहेंगे?

-मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Ati ka Bhala n bolna, ati ki bhali n chup. ati ka bhala n barasna, ati ki bhali n dhoop... Hindi, Political Article by Mithilesh

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