Sunday, 6 September 2015

ब्लॉगिंग अभिरूचि और डिजिटल इंडिया

by on 14:53
Blogging oppotunity in India and digital India initiative by Government, blog iconब्लॉगिंग दुनिया में एक जाना पहचाना और कमाऊ करियर ऑप्शन है तो भारत में भी यह बेहद तेजी से आगे बढ़ रहा है. हालाँकि, आज भी भारत में 'प्रोफेशनल ब्लॉगिंग' को वह दर्जा हासिल नहीं है जो उसे होना चाहिए. सरकारें जिस प्रकार 'डिजिटल इंडिया' पर जोर दे रही हैं, उससे हम समझ सकते हैं कि आने वाले दिनों में ब्लॉगिंग और इंटरनेट गतिविधियों की श्रृंखला और तेजी से बढ़ने वाली है. डिजिटल इंडिया भारत में ज्ञान समाज और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की स्थापना की दिशा में दूरदर्शी कदम सिद्ध हो सकता है लेकिन बिना अनुकूल माहौल, परिस्थतियों, मानसिकता और ढाँचे के इसकी कामयाबी संदिग्ध बनी रहेगी. दुर्भाग्य से हमारे यहाँ ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना के रास्ते में आने वाली रुकावटों की कोई कमी नहीं है और इनमें सबसे पहली समस्या बिजली को लेकर आने वाली है. बिडम्बना यह है कि भारत में इंटरनेट से कमाई अभी आमदनी का मुख्य श्रोत नहीं बन पायी है, जिसका कारण भी स्पष्ट है कि अभी देश में एक बड़े वर्ग तक इंटरनेट की पहुँच संभव नहीं हो सकी है. फेसबुक द्वारा चलाये जा रहे प्रोग्राम 'इंटरनेट डॉट ऑर्ग' की यह कहकर आलोचना की जा रही है कि इससे 'नेट न्यूट्रलिटी' प्रभावित होगी, मगर यह समझना आवश्यक है कि तेजी से बढ़ते ज़माने से कदमताल करने के लिए भारत जैसे देशों को इंटरनेट के तेज प्रसार से जोड़ा जाना अति आवश्यक है. इसके आगे जिस दूसरी समस्या पर हम गौर करते हैं, वह है ब्लॉगिंग. लोगों को ब्लॉग लिखने के बारे में समझा पाना थोड़ा कम कठिन होता है, लेकिन यह समझा पाना अत्यंत मुश्किल कार्य है कि ब्लॉगिंग से पैसा भी कमाया जा सकता है. लोग बड़ी हैरत से यह प्रश्न करते हैं कि “क्या सचमुच ब्लॉगिंग से पैसे कमाया जा सकता है ??”
समस्या यही भी है कि हमारी रूटीन शिक्षा प्रणाली, मसलन इंजीनियरिंग, बीसीए, एमसीए या फिर ट्रेडिशनल कंप्यूटर इंस्टिट्यूट इत्यादि में ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया इत्यादि से सम्बंधित जानकारी दी ही नहीं जाती है और थोड़ी बहुत इधर-उधर से जानकारी प्राप्त करके ग्रेजुएट युवा इस बारे में कन्फ्यूज रहते हैं. भारत में अधिकांश लोग ब्लॉगिंग की ताकत और उसकी कमाई के पोटेंशियल से अनजान हैं. इस सम्बन्ध में आपसे एक वाकया शेयर करना चाहूंगा. अपने एक मित्र के यहाँ काफी समय बाद गया तो सामान्य बातचीत के बाद उसके पिता ने मुंह बनाते हुए बताया कि उनका छोटा बेटा भी कम्प्यूटर इंजीनियरिंग कर रहा है. मैंने कहा, यह तो अच्छी बात है और फिर कम्प्यूटर की पढाई और जानकारी तो आजकल अनिवार्य सी बनती जा रही है. उनका तत्काल कहना था कि अब तो कम्प्यूटर इंडस्ट्री 'सैचुरेट' हो गयी है. मैंने उनसे कहा कि अंकल, कम्प्यूटर मार्किट जॉब के लिहाज से चाहे जैसी हो, मगर यदि लड़का थोड़ा भी इनोवेटिव है, सोचने विचरने वाला है तो इस फिल्ड में असीमित संभावनाएं हैं. फिर मैंने उनको ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया के साथ साथ यह भी बताया कि किस प्रकार हज़ारों लाखों लोग, एक कांसेप्ट, एक वेबसाइट या ब्लॉग से अपनी पहचान दुनिया भर में बनाये हुए हैं. हालाँकि, बदलाव की प्रक्रिया अब चल रही है और लोगों को बताना पड़ेगा कि ब्लॉगिंग के रूप में, उनके पास ना केवल समाज को बदलने और शिक्षित करने का अवसर है बल्कि उनके पास अपने लिए नाम और धन कमाने का भी पर्याप्त अवसर है. वे अपने लिए और दूसरों के लिए भी पैसे कमाने के नए रास्ते खोलने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं. किसी भी विषय में अपना ब्लॉग शुरू करें, जिसमें आप जानकारी ऑफर कर सकते हैं. यदि आपको लिखना पसंद नहीं है तो वीडियो ब्लॉगिंग एक बेहतर ऑप्शन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं. Digital India and blogging articleब्लॉगिंग के बारे में मोटिवेट करने का सबसे अच्छा तरीका, उन्हें पैसे को लेकर आशान्वित करने का होता है.जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं, पैसा सबसे बड़े उत्प्रेरकों में से एक है, क्योंकि सबको पैसे की जरुरत होती है. ब्लॉगिंग मजेदार और दिलचस्प होती है जिसमें लोगों को पढ़ने और नॉलेज प्राप्त करने के हज़ारों अवसर उपलब्ध होते हैं और यदि लोगों को यह पता चले कि ब्लॉगिंग से पैसे भी कमाए जा सकते हैं तो यह निश्चित रूप से उनके उत्साह को बढ़ा देगा. यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि भारत के कई प्रोफेसनल ब्लॉगर्स केवल ब्लॉगिंग से ही हर महीने लाखों की कमाई कर लेते हैं, जो किसी दुसरे पेशेवर के दो से तीन साल तक की कमाई के बराबर या उससे ज्यादा भी होता है. इसके अतिरिक्त, तमाम कंपनियां भी ब्लॉगिंग को गंभीरता से ले रही हैं. आप किसी भी कंपनी की वेबसाइट पर जाएँ, चाहे ट्विटर, फेसबुक, गूगल या कोई और उसका ब्लॉग और रेगुलर अपडेट आपको अवश्य ही दिख जायेगा. इसी वजह से, अब तमाम दूसरी कंपनियां भी ब्लॉगिंग को गंभीरता से ले रही हैं, और अपने व्यापर बढ़ाने के प्रयास में वे प्रोफेशनल ब्लॉगर्स के साथ भी जुड़ रही हैं. मार्केटिंग के महत्व को समझते हुए ज्यादातर कंपनियां ब्लॉगिंग के सम्बन्ध में 'यूजर इंगेजमेंट' और 'बाउंस बैक' से बचने के लिए अब अलग से बजट तैयार कर रही हैं. वास्तव में, उनमें से कई प्रेस कॉन्फ्रेंस के अतिरिक्त ब्लॉगर्स के लिए एक अलग कार्यक्रम भी रखने लगे हैं. ब्लॉगिंग के बढ़ते हुए प्रभाव को समझने के लिए हमें ब्लॉगअड्डा (BlogAdda) और इंडीब्लोगर (Indiblogger) जैसे फोरम्स की ओर देखना चाहिए, जो भारतीय ब्लॉगर्स के लिए एक कम्युनिटी बनाने में कड़ी मेहनत कर रहे हैं और साथ ही वे कॉर्पोरेशन्स को भारतीय ब्लॉगर्स के साथ जोड़ने के लिए भी काम कर रहे हैं.
बदलते हुए राजनीतिक परिदृश्य में हमें इंटरनेट से सम्बंधित कार्यों के प्रति और भी गंभीर हो जाना चाहिए, क्योंकि आने वाले समय में ऐसा कोई क्षेत्र शायद ही बचे, जो इसके प्रभाव और व्यापकता से अछूता रहे. जहाँ तक बात डिजिटल इण्डिया जैसे प्रोग्राम्स की है तो तमाम विसंगतियों के बारे में हमें समझ लेना चाहिए कि डिजिटल इंडिया का सफल क्रियान्वयन कोई असंभव कार्य भी नहीं है. एस्तोनिया जैसे छोटे से देश ने, जो सन् 2007 में भीषण साइबर हमले का शिकार हुआ था, अपने आपको सफलतापूर्वक एक डिजिटल राष्ट्र में बदलकर दिखा दिया है. उस साइबर हमले ने एस्तोनिया के समूचे आर्थिक, प्रशासनिक और कारोबारी तंत्र को कई दिन के लिए ठप्प कर दिया था, लेकिन उस देश ने एक संकल्प लिया और उसे पूरा करने का साहस दिखाया. अनेक पश्चिमी देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को नोटों के प्रयोग से मुक्ति दिलाने का लक्ष्य बनाया है. स्वीडन और डेनमार्क कैशलेश समाज में बदलने जा रहे हैं जहाँ धन के भुगतान और लेनदेन में या तो प्लास्टिक कार्डों का प्रयोग होगा या फिर ऑनलाइन माध्यमों का और वे अपने लक्ष्य के बहुत करीब पहुँच भी चुके हैं. साफ़ है कि देर-सबेर यह सुविधाएं हमारे देश में आएँगी ही, बल्कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में जल्द से जल्द आने के लिए तैयार हैं. तो फिर भारतीय ही देर क्यों करें, अपनी कलम उठाएं और उन तमाम समस्याओं और उसके निराकरण के बारे में सवा अरब आबादी को रूबरू कराएं. और इसका प्लेटफॉर्म बनेगा ब्लॉगिंग. जी हाँ! ब्लॉगिंग और डिजिटल इंडिया के सम्मिश्रण से न केवल हमारा देश सूचना प्रोद्योगिकी का सही इस्तेमाल कर पायेगा, बल्कि धन कमाने और रोजगार पैदा करने का भी एक बड़ा क्षेत्र बन सकेगा. आप यह जरूर सोचेंगे कि इस लेख में ब्लॉगिंग और डिजिटल इंडिया के बारे में काफी कुछ कहा गया है मगर 'कमाई' कैसे होगी? आप निश्चिन्त रहिये और अगर आप ब्लॉगिंग के बारे में खुद की रुचि जगाने में सफल हो गए तो फिर इस डाली को कस कर पकडे रहिये, क्योंकि आप यदि लगातार ब्लॉगिंग करते रहे तो खुद समझ जायेंगे कि गूगल एडसेंस, अफिलिएट मार्केटिंग और सोशल मीडिया का नेटवर्क किस तरह कार्य करता है और किस प्रकार बड़ी और स्थायी कमाई के साथ 'स्वतंत्र कमाई' का रास्ता खोलता है. और फिर काम जब राष्ट्रभाषा हिंदी और मातृभाषा में हो तो दिल और दिमाग एक साथ कार्य करते हैं, जिससे शानदार परिणाम आने निश्चित हो जाते हैं. मेरे दुसरे लेखों में इस बारे में ज़िक्र है और होता रहेगा, तब तक के लिए ढेरों शुभकामनाएं.
- मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर.
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Saturday, 5 September 2015

उन्हें बारम्बार प्रणाम...

by on 09:45
पत्नी, प्रिये, अर्धांगिनी 
और धर्मपत्नी

जीवन संतुलन, उत्थान
और सृष्टि की कथा- 

सुख दुःख, संयोग वियोग 
और रुचि अरूचि में 

बंध, प्रबंध, सम्बन्ध
और समर्पण भी

दिन रात, सुबह शाम 
और हर क्षण में 

(प्रिय पत्नी के जन्मदिवस पर रचित दो पंक्तियाँ)


Wednesday, 2 September 2015

लीडरशिप 

by on 12:30
मित्रों के समूह में लीडरशिप पर ज़ोरदार चर्चा चल रही थी. कोई लीडर्स में उद्देश्य के क्लियर होने की बात कर रहा था तो कोई उसकी डायनामिक पर्सनालिटी को लीडरशिप के लिए आवश्यक बता रहा था. 
इसके अलावा भी समर्थकों का हजूम, पैसे की पॉवर, अच्छा वक्ता, हाजिरजवाब जैसे अनेक गुण गिनाये गए, बल्कि कई लोगों ने तो आधुनिक काल में दबंगई को भी जरूरी बताया. हर कोई एक से बढ़कर एक खूबियों की बातें कर रहा था, मगर कोने की चेयर पर बैठा राजीव सबको सुन रहा था और उसे अपनी डायरी में नोट करता जा रहा था. 
अरे तू भी कुछ बोल राजीव! यह मोंटी का स्वर था.
'लीडरशिप इज़ एन एक्स्ट्रा क्वालिटी', राजीव का स्वर साफ़ और स्पष्ट था.
मतलब?
तो? सबने एक साथ बोला.
तो, लीडर जिस जगह हैं पहले उस काम को बेहतर तरीके से करना शुरू करते हैं और उस कार्य को बेहतर तरीके से करने के लिए दूसरों को प्रेरित भी करते हैं, यही तो लीडरशिप है. मतलब, जो काम करना हम जानते हैं, उसके लिए दूसरों को प्रेरित करना ही तो लीडरशिप है!
और यह प्रेरित करना हमारी 'एक्स्ट्रा क्वालिटी' ही तो है. 
शायद नहीं! क्योंकि जो अपने काम से पीछा छुड़ाता रहता है, वह तमाम चोंचलों के बाद भी अपनों को सच्चाई से प्रेरित नहीं कर सकता है और कुछ ईंटों के बाद ही उसका झूठा महल भरभरा कर गिरने लगता है. उन ईंटों को बचाने के लिए ही भ्रष्टाचार, अपराध, छल, स्वार्थ का साथ ले लेता है और अपनों को दूर धकेल देता है... एक सूर में राजीव ने कह डाला!
चलो चलो, कैंटीन चलते हैं, माहौल को हल्का करने की गरज से मोंटी ने कहा. 
हाँ! हाँ ... और मित्रों का समूह कैंटीन की ओर चल पड़ा, मगर सामान्यतः ऐसी बैठकों के बाद ठहाकों और हल्केपन की बजाय एक गंभीरता व्याप्त थी और लीडर बनने को उत्सुक लड़के सोचने में लगे थे कि वह कौन-कौन से कार्य बेहतर तरीके से कर सकते हैं, क्योंकि 'लीडरशिप इज एन एक्स्ट्रा क्वालिटी'.

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Tuesday, 1 September 2015

कॉर्पोरेट सहानुभूति

by on 08:00
कैरियर के लिहाज से बेहद सफल थी मेहनाज और उससे भी मजबूत था उसका नेटवर्क. मीडियाकर्मी, कॉर्पोरेट पर्सनालिटीज, नेता और लॉबिस्ट से उसके गहरे संपर्क थे. कहना मुश्किल था कि उससे जुड़े लोग उसकी अथाह दौलत के पीछे थे या उससे लगाव रखते थे. खैर, जो भी हो उसकी ज़िन्दगी सरपट दौड़ती जा रही थी.
इस बीच उसके परिवार में किसी की हत्या हो गयी और शक की सुई घुमी मेहनाज़ पर.
गिरफ्तारी के बाद शक यकीन में तब्दील होने लगा और चूँकि मामला हाई प्रोफाइल था, इसलिए मीडिया में मेहनाज़ के पास्ट की परतें खुलने लगीं. एक के बाद एक लगातार चार शादियां, होटलों में छापों के दौरान कॉल गर्ल के रूप में पकड़ा जाना, सरकारी अधिकारियों के साथ अंतरंग संबंधों की पड़ताल होने लगी. जाहिर था, ऊंचाइयां छूने के लिए मेहनाज़ ने अनेक मर्यादाओं को कुचल डाला था. मामला कुछ यूं चला कि मेहनाज़ का बचाव मुश्किल होता जा रहा था.
अगले ही दिन, एक बड़े पत्रकार का इंटरव्यू छपा जिसमें मेहनाज़ की ज़िन्दगी पर उन महाशय ने प्रकाश डालते हुए कहा कि मेहनाज़ के बचपन में उसका शोषण हुआ था, इसलिए उसकी मानसिक दशा कुंठा का शिकार हो सकती है. 
उसी दिन शाम को एक बड़े चैनल पर एक अन्य प्रभावशाली व्यक्ति कह रहे थे कि मेहनाज़ के पिता, बचपन में उसको बेरहमी से पीटा करते थे!
इन ट्वीस्ट से मीडिया की टीआरपी जहाँ आसमान छूने लगी, वहीं मेहनाज़ के प्रति 'सहानुभूति' का बीजारोपण होने लगा... या फिर किया जाने लगा... कॉर्पोरेट अंदाज में!!
 
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Monday, 31 August 2015

अवचेतन मन

by on 09:42
Price of onion, pyaj, hindi articleक्या आम क्या ख़ास, इस प्याज ने कइयों को उलझा रखा है तो कइयों की नाक में दम कर रखा है. प्याज से जुड़ा मेरा अनुभव भी है, जिसे लिखते वक्त मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इसे साहित्य की कौन सी विधा में शामिल किया जा सकता है. खैर, यह मेरी व्यक्तिगत समस्या है लेकिन उनका क्या करूँ, जिनको मैं प्याज देने का वादा कर चुका हूँ, वह भी पुराने दाम पर...
शहर के एक क्षेत्र में 'देशी प्याज' बेचने बिल्कुल सुबह-सुबह दो बन्दे आ धमकते थे. देशी प्याज के फायदे, उसके गुणों का बखान करता हुआ उनके ट्रैक्टर पर तेज आवाज में लॉउडस्पीकर बजता था और चूँकि वह बाजार भाव से 10 रूपये तक कम लगाता था तो ट्रैक्टर पर भीड़ लगी रहती थी. श्रीमतीजी की कई दिन की लगातार टोकाटाकी के बाद, अपनी नींद में खलल डालकर मैं भी पांच किलो एक साथ ले आता था, हालाँकि वह रोज या एक दिन छोड़कर आ ही जाता था, मगर रोज अपनी सुबह की प्यारी नींद कौन ख़राब करे? इधर कब प्याज की कीमत आसमान छूने लगी, मगर मेरे अवचेतन मन में वह देशी प्याज वाला ही बना हुआ था, जिसका अहसास मुझे तब हुआ जब एक एनजीओ के मित्र ने मुलाकात में मुझसे कहा, यार! प्याज का रेट आसमान छू रहा है. मेरे मुंह से तत्काल मेरे मोहल्ले के देसी प्याज वाली बात निकल गयी कि मेरे यहाँ तो 100 रूपये की पांच किलो है. बस मित्र महोदय ने तत्काल 100 का नोट हाथ में पकड़ाते हुए बनावटी कातर स्वर में बोले, यार 5 किलो मेरे लिए लेते आना और मैंने अवचेतन मन के प्रभाव में वह नोट पकड़ भी लिया. बस फिर क्या था, तभी से न उनके दफ्तर जा रहा हूँ और दुआ कर रहा हूँ कि कहीं किसी जगह उनसे सामना न हो जाय...
अवचेतन मन ने धोखा जो दे दिया था.
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Sunday, 30 August 2015

25 साल ...

by on 10:42
कालरा साहब का ग्राफ़िक डिज़ाइन और बैनर प्रिंटिंग का बिजनेस बढ़िया चल रहा था और इसी की बदौलत वह खटारा स्कूटर से होण्डा सिटी तक आ गए थे. इसके लिए न केवल उनकी मेहनत, बल्कि उनका स्टाफ भी सालों तक लगा रहा. राम बहादुर तो उनके पास 25 साल से लगा हुआ था और ऑफिस में झाड़ू लगाने से लेकर साइट पर जाने और ग्राहकों से पैसे वसूलने तक सभी काम बड़ी लगन से किया करता, हालाँकि वह चपरासी नहीं था बल्कि एक तरह से कालरा साहब का मुंहलगा था. राम बहादुर के अलावा भी सीटू, दिलीप, उमाकांत इत्यादि भी दसियों साल से कालरा साहब के पास जमे हुए थे, तब कंपनी की पहचान बनी थी.
मगर, पिछले दिनों से धीरे धीरे कालरा साहब के बदलते व्यवहार की बातें ऑफिस में होने लगीं तो राम बहादुर ने सबको धैर्य से समझाया था, मगर व्यवहार कहीं समझाने से बदलता है भला!
एक दिन दोपहर में कुर्सी पर बैठे-बैठे राम बहादुर को झपकी लग गयी कि कालरा साहब ने लगभग चिल्लाते हुए कहा कि पंखों पर धूल जमी है, उसे साफ़ कर दे. पता नहीं जानबूझकर या नींद के कारण राम बहादुर उठा नहीं तो कालरा साहब ने अपने केबिन से आकर उसे झिंझोड़ते हुए अपनी बात दुहराई तो राम बहादुर ने भी अनमने भाव से कहा कि पंखे साफ़ करना उसका काम नहीं है, चपरासी कर देगा.
उसका इतना कहना था कि कालरा साहब का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुँच गया और उसे लगभग धक्का देते हुए बोले, जुबान लड़ाता है , कल से ऑफिस आने की जरूरत नहीं है तुझे!
अगले दिन राम बहादुर ऑफिस नहीं आया तो उमाकांत के फोन करने पर वह फ़फ़क उठा. बोला- पूरी जवानी तो कालरा की कंपनी को दे दी. वह तो 'अम्बानी' बन गया मगर मैं अब बुढ़ापे में कहाँ जाऊं?
तीसरे दिन सुबह-सुबह ही उमा समेत, सीटू, दिलीप और चपरासी कालरा से हिसाब लेने उसके केबिन में पहुँच गए तो कालरा के पैरों तले जमीन ही खिसक गयी. फिर भी बात सँभालते हुए बोला कि तुम लोगों के बारे में कंपनी ने कितना सोचा है और कम से कम मुझे अल्टीमेटम तो देते तुम लो... ..
जब 25 साल देने वाले के बारे में नहीं सोचा कंपनी ने तो हमारे बारे में क्या ख़ाक सोचेगी? सीटू ने भी अपनी भड़ास निकाली..
तुम लोग करोगे क्या? कालरा ने आखिरी दांव फेंका.
हमने ऑफिस ले लिया है काम्प्लेक्स में... और उसका उद्घाटन राम बहादुर के हाथों कराएँगे ... ... कल!
कालरा ने अपने टेबल पर पड़े पानी की गिलास को झट से मुंह लगा लिया और पानी का धीमा घूँट भरते-भरते ही अपनी कंपनी के लिए अनुभवी डिज़ाइनर, राम बहादुर जैसा आल राउंडर और अपने ग्राहक टूटने का आंकलन कर रहा था...
उसका अनुभव उसे बता रहा था कि '25 साल' को धक्का मारना उसे महंगा नहीं बहुत महंगा पड़ने वाला था!
 
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Wednesday, 26 August 2015

जातिवाद ही खतरा है... Hindi poem by Mithilesh Anbhigya, based on casteism in India

by on 02:46
न भ्रष्टाचार खतरा है Hindi poem by Mithilesh Anbhigya, based on casteism in India, no reservation based on caste
न अत्याचार खतरा है
ऊंच- नीच, भेदभाव ने
 

न कोई हिन्दू खतरा है
न मुसलमान खतरा है
हज़ारों साल गुलामी के
 

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न पाकिस्तान खतरा है
फ़िज़ा में जाति ज़हर है जो
 

न नक्सलवाद खतरा है
न आतंकवाद खतरा है
इस पावन मातृभूमि पर
 

 
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Hindi poem by Mithilesh Anbhigya, based on casteism in India, no reservation based on caste system

Thursday, 6 August 2015

प्रॉपर्टी / फ्लैट खरीदते समय सावधानियां - Precaution should be taken at the time of purchasing flat, plot

by on 11:54
घर बनाने का सपना लोगों में उस समय से ही घर करने लगता है जब वह शिक्षा ग्रहण करते हैं. उसी समय से ही घर की चाहत रखने वाले लोग एक-एक पैसा जुटाना शुरू कर देते हैं ताकि भविष्य में उनका सपना साकार हो सके. इस समय प्रॉपर्टी सबसे अधिक रिटर्न देने वाला निवेश बन चुका है. अगर आप भी चाहते हैं कि आपके पास भी अपनी प्रॉपर्टी हो तो इसके लिए जरूरी है कि आप एक जमीन का टुकड़ा याPrecaution should be taken at the time of purchasing flat, plot फ्लैट खरीदें. यहाँ समझना आवश्यक है कि प्रॉपर्टी कोई भी हो, उसकी कीमत इतनी तो होती ही है कि एक आम आदमी उस कीमत को जाेड़ने के लिए कई साल लगाता है. अगर बैंक लोन से भी प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं तो आपको बैंक लोन की कीमत कई साल चुकानी पड़ेगी. जब इतना लम्बा समय पैसों की अरेंजमेंट में लगाना ही है तो खरीददारी के समय थोड़ी पूछताछ क्यों न कर ली जाय... अगर किसी हाउसिंग प्रोजेक्ट में निवेश कर रहे हैं ताे यह जानना जरूरी है कि उस प्रोजेक्ट को डिप्टी डायरेक्टर लोकल बाडीज डिपार्टमेंट की ओर से पास किया गया है या नहीं? लोन लेते वक्त भी बैंक से लोन की पूरी जानकारी ले लें. इससे आप ठगी से बच सकते हैं. बिल्डर द्वारा किया जाने वाला एग्रीमेंट ध्यान से पढ़ना जरूरी है. ये ध्यान रखें कि जो एग्रीमेंट के समय आपको सुविधाएं बताई जा रही हैं वो बिल्डर अपको तय समय में दे रहा है या नहीं! अगर आप किसी बड़े प्रोजेक्ट की बजाए ऐसी रिहायशी कॉलोनी में घर खरीद रहे हैं कि जहां इंडिविजुअल प्लॉट्स या मकान हैं तो इनमें किसी धोखे से बचने के लिए राजस्व विभाग से पहले ही पड़ताल कर लेना ठीक रहता है. पटवारी के पास प्रत्येक प्रॉपर्टी के बारे में रिकार्ड मौजूद रहता है. यह भी पता चल जाता है कि किस कॉलोनी में किस नंबर का प्लाट किसके नाम है, यह प्लाट कब से किसके नाम हैं. इसके अलावा भारमुक्त सर्टिफिकेट भी खरीददार से लेना भूलना नहीं चाहिए. इन जनरल पॉइंट्स के अतिरिक्त नीचे कुछ तकनीकी टिप्स दिए जा रहे हैं जो आपको धोखाधड़ी से बचाने में मदद कर सकते हैं:
नकली डॉक्यूमेंट (Fake documents): बहुधा प्रॉपर्टी खरीदने वाले व्यक्तियों को बाद में पता चलता है कि उन्हें नकली डॉक्यूमेंट दे दिया गया है और वह अपनी गाढ़ी कमाई खो देते हैं. इससे बचने के लिए सब रजिस्ट्रार ऑफिस से प्रॉपर्टी की वेरिफिकेशन फायदेमंद रहती है.
Precaution should be taken at the time of purchasing flat, plot, hindi articleप्रॉपर्टी पर लोन/ कर्ज (double mortgage /loan): प्रॉपर्टी खरीदने के लिए बहुधा लोग प्रॉपर्टी डीलर/ एजेंट के पास जाते हैं और वह उन्हें अच्छी लोकेशन पर जगह दिखाता है. फिर पैसे का लेन-देन होता है और प्रॉपर्टी खरीददार के नाम पर रजिस्टर भी हो जाती है. कुछ दिनों बाद पता चलता है कि प्रॉपर्टी पर बैंक-लोन लिया गया है. कई बार एक से ज्यादे बैंको का लोन भी प्रॉपर्टी पर होता है, जबकि प्रॉपर्टी बेचने के बाद फ्रॉड व्यक्ति फरार हो जाता है और खरीददार बेचारा कोर्ट केस के चक्कर में फंस जाता है. इस तरह के संदेहात्मक प्लाट और फ्लैट खरीदते समय बेहद सावधानी आवश्यक है.
मल्टिपल 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (Multiple General Power of Attorney): प्रॉपर्टी खरीदने में आजकल पावर ऑफ़ अटॉर्नी का चलन है. यह एक के बाद दूसरी और फिर आगे तक एक लम्बी चेन बनती जाती है. कई बार एक ही प्रॉपर्टी की अलग अलग लोगों को पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी कर दी जाती है. कई बार दो से भी ज्यादा दावेदार हो जाते हैं सम्बंधित प्रॉपर्टी का फ्रॉड करने वाला व्यक्ति देश छोड़कर फरार हो जाता है. इससे बचने के लिए सब रजिस्ट्रार ऑफिस से सम्बंधित व्यक्ति की ओनरशिप वेरीफाई करनी आवश्यक है.
अनधिकृत लेआउट (Unauthorized Layouts): कई बार ऐसी केस भी आती हैं, जब प्रॉपर्टी डीलर गवर्नमेंट की प्रॉपर्टी को ही अपना बताकर बेच देते हैं. नकली कागजात बनाना फ्रॉड लोगों के लिए आसान है. इस विषय पर एक फिल्म 'खोसला का घोसला' भी बन चुकी है. इससे बचने के लिए जमीन के बारे में लोकल इन्क्वायरी आवश्यक हो जाती है जैसे पड़ोसियों, गांववालों से पूछताछ इत्यादि.
कब्ज़ा (Encroachments): कई बार प्रॉपर्टी डीलर कब्ज़ा किये हुए प्लाट को बेच देते हैं और बाद में जब खरीददार उस प्लाट पर पहुँचता है, तब उसे पता चलता है कि उसने किसी और का कब्ज़ा किया हुआ प्लाट खरीद लिया है और नतीजा यह होता है कि वह हाथ मलता रह जाता है.

वेरिफिकेशन के लिए इन डाक्यूमेंट्स पर नजर डालिये (Important documents to verify for property purchase):

  1. अपने क्षेत्र की म्युनिसिपालिटी या सब रजिस्ट्रार ऑफिस से ओनरशिप जरूर वेरीफाई कीजिये और जरूरत पड़ने पर लोकल पूछताछPrecaution should be taken at the time of purchasing flat, plot, hindi article by mithilesh और कानूनी सलाह जरूर लीजिये.
  2. सभी डाक्यूमेंट्स पर हस्ताक्षर जरूर चेक करें और फिंगर प्रिंट्स के साथ वेरीफाई करें.
  3. पावर ऑफ़ अटॉर्नी लेते समय ध्यान दें कि जो व्यक्ति आपको दे रहा है, वास्तव में उसे इसका अधिकार है कि नहीं. जरूरत पड़ने पर एक दो स्टेप पीछे जाएँ और सीरीज चेक करें.
  4. लैंड यूज चेक करना जरूरी है कि वह असाइन लैंड है, भूदान लैंड है, एग्रीकल्चर लैंड है या इनाम लैंड है.
  5. ज़मीन पर किसी तरह का बकाया तो नहीं है, मसलन ULC , SRO, बिजली, पानी, सीवर बिल इत्यादि.
  6. विवादित जमीन के लिए, Bailiff (कन्सर्न्ड कोर्ट) अथवा माननीय हाई कोर्ट द्वारा अपॉइंट किये गए 'Arbitrator' से कंसर्न करें.

जमीन के क्लियर टाइटल को MRO ऑफिस से चेक करें और निम्नलिखित कॉपी जरूर कलेक्ट करें:

  1. पहनी कॉपी 1956 से
  2. प्रोसिडिंग ऑफ़ पट्टा पासबुक
  3. स्टाम्प ड्यूटी पूरा पेड करें
  4. प्रॉपर्टी की फिजिकल डिलिवरी टाइटल deed के साथ प्राप्त करें.

इन तमाम तकनीकी बातों के अतिरिक्त, आप को निम्नलिखित पॉइंट्स पर भी ध्यान देना चाहिए:

  • आप जिस इलाके में घर लेने की सोच रहे हैं उस इलाके की कीमतों को सबसे पहले समझें. साथ ही यह भी ध्यान रखें कि आप किस तरह के प्रोजेक्ट में घर ले रहे हैं. उदाहरण के लिए एक ही इलाके में ग्रुप हाउसिंग और बिल्डर फ्लैट की कीमतें अलग-अलग होती हैं. अगर ग्रुप हाउसिंग में घर ले रहे हैं, तो उस प्रोजेक्ट की सभी यूनिटों के रेट्स ले लें. फिर उनकी तुलना करें.
  • प्रॉपर्टी की खरीदारी में बैंक लोन की एक अहम् भूमिका होती है. कर्ज लेने से पहले बैंकों की ब्याज दरों की तुलना अवश्य कर लें . जो बैंक सस्ता लोन दे रहा हो, उसी से लोन लेने की कोशिश करें. कर्ज के लिए बैंक से संपर्क करते समय एक पत्र तैयार करें जिसमें आप अपनी जरूरत की राशि और उसके लिए हर महीने देने वाले किश्त का जिक्र जरूर करें. महीने की आमदनी तथा क़र्ज़ की अवधि का भी ब्योरा स्पष्ट रूप से रखें. जिस प्रोजेक्ट को केवल एक बैंक लोन कर रहा हो वहां बिल्डर के दबाव में घर खरीदनें से बचना चाहिए
  • घर खरीदने से पहले उसकी लोकेशन तय करने का पैरामीटर हमेशा अपनी रोजमर्रे की जरूरत को बनाएं. उस इलाके का इन्फ्रास्ट्रक्चर, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, मेट्रो, स्कूल, हॉस्पिटल, बाजार और अपने ऑफिस की कनेक्टिविटी के बारे में छानबीन कर लें . आधुनिक दौर में मॉल और मनोरंजन के दूसरे स्थल भी काफी मायने रखने लगे हैं. क्यूंकि प्रॉपर्टी की कीमतें अब इनके आधार पर भी तय होने लगी है.
  • इस तरीके से आप ज़मीन या फ्लैट में अपने निवेश को काफी हद तक सुरक्षित बना सकते हैं. उपरोक्त वर्णित टिप्स के अलावा, आप की सक्रियता, बड़े- बुजुर्गों से सलाह सोने पर सुहागा होती है. सक्रीय रहने से यह फायदा होता है कि यदि ज़मीन से सम्बंधित कोई छुपा तथ्य हो तो वह सामने आ जाता है.
Precaution should be taken at the time of purchasing flat, plot
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Sunday, 26 July 2015

कैसे लें अपनी वर्डप्रेस वेबसाइट का बैकअप, हिंदी में जानकारी - How to take backup of your wordpress website, know in hindi

by on 08:59
वेबसाइट में सबसे महत्वपूर्ण काम इसका बैकअप(File backup) लेते रहना है. इंटरनेट की दुनिया में विभिन्न कारणों से ऐसा करना आवश्यक है, क्योंकि वायरस(Virus), सर्वर का बदलाव(Server shifting), फाइल करप्ट(File corruption) होना जैसे वाकये होते ही रहते हैं और यदि इस स्थिति में आपके पास बैकअप नहीं होता है तो आपका काम कई गुना न सिर्फ बढ़ जाता है, बल्कि कई बार यह शर्मिंदगी और भारी डेटा-लॉस(Data loss) का कारण भी बन जाता है. जैसा कि हम सब जानते हैं कि वर्डप्रेस एक पॉपुलर सीएमएस(cms) के रूप में सर्वाधिक प्रचलित है. इस लेख में हम इसी प्लेटफॉर्म में बैक अप लेने के विभिन्न उपायों पर चर्चा करेंगे:

मैन्युअल बैकअप(Manual Backup):

  1. यदि आप सीपैनल(cPanel) इस्तेमाल करते हैं तो आप डेटाबेस बैकअप के लिए PhpMyAdmin ओेपन कीजिये और सीधे “Export” टैब को क्लिक कीजिये, फिर मनचाहा कम्प्रेसन फॉर्मेट क्लिक करें और गो दबाते ही फाइल आपके कंप्यूटर में सेव होने लगेगी.
  2. इसके अतिरिक्त, आप सीपैनल में सीधे जाकर, फाइल सेक्शन के अंतर्गत, बैकअप पर क्लिक करें. इस सेक्शन में न केवल डेटाबेस का, बल्कि इसके साथ-साथ पूरी वेबसाइट(Website backup) का या होम डाइरेक्ट्री का या ईमेल फारवर्डर, ईमेल फिल्टर का भी बैकप लिया जा सकता है. इस सेक्शन में आपको यह सब रिस्टोर(Restore) करने का ऑप्शन भी दिखेगा.
  3. इसके आलावा, सीपैनल के फाइल सेक्शन में ही, बैकअप विज़ार्ड नाम से दूसरा ऑप्शन मिलेगा, जहाँ आप सिंगल क्लिक से ही वेबसाइट का पूरा या पार्शियल बैकअप(Partial backup) ले सकते हैं.
  4. फाइल सेक्शन में ही आप 'फाइल मैनेजर'(File manager) को क्लिक करेंगे तो खुलने वाली विंडो में सर्वर पर मौजूद सभी फाइल्स, फोल्डर की लिस्ट आपको दिखने लगेगी. आप यहाँ पर अपनी सुविधानुसार राइट क्लिक करके आसानी से फ़ोल्डर्स को मनचाहे फॉर्मेट में कम्प्रेस कर सकते हैं और फिर उसे डाउनलोड करके अपने कम्प्यूटर की हार्डडिस्क में सेव कर सकते हैं.
इसके अतिरिक्त, यदि आप सीपैनल में कम्फर्टेबल नहीं हैं तो आप वर्डप्रेस एडमिन में निम्नलिखित प्लगइन की सहायता से आसानी से काम चला सकते हैं. इनका इस्तेमाल आसान है और यदि कोई तकलीफ होती है तो इस नाम से यूट्यूब पर वीडियो देखना न भूलिए:
  1. https://wordpress.org/plugins/backwpup/
  2. http://austinmatzko.com/wordpress-plugins/wp-db-backup/
  3. https://wordpress.org/plugins/dropbox-backup/
  4. https://wordpress.org/plugins/backup-wp/




सर्विसिंग (हिंदी लघु कथा)

by on 05:12
साहब! बाइक की सर्विसिंग आप लेट मत कराया कीजिये, इंजिन को नुकसान पहुँचता है, देखिये बहुत कम तेल बचा है और इसका लुब्रिकेशन भी खत्म हो चुका है. हाँ! हाँ! अगली बार जल्दी करा लूंगा, कहकर राहुल ने अपने मुंहलगे मैकेनिक से पल्ला झाड़ लिया. वह अक्सर अपनी बाइक उसी मैकेनिक से ठीक कराया करता था. आदतन, अगली बार भी उसने सर्विसिंग में काफी लेट किया तो उसकी पुरानी बाइक का साइलेंसर धुंआ फेंकने लगा. उसने सोचा कि, अब सर्विस करा लेना चाहिए, लेकिन टालमटोल की आदत से मजबूर था, इसलिए आजकल पर टालता ही रहा. एक दिन वह सुबह-सुबह किसी से मिलने तेजी से जा रहा था कि उसकी गाडी चलते-चलते बंद हो गयी अचानक! उसने सोचा कि पेट्रोल खत्म हुआ होगा, इसलिए 'रिजर्व' में लगा कर किक मारने की फिर कोशिश की, लेकिन यह क्या! किक तो हिल भी नहीं रही थी.... उसने फिर ज़ोर लगाया, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही रहे! सुबह का समय था और आस पास किसी मैकेनिक की दुकान भी नहीं खुली थी. पूछते-पूछते आधे किलोमीटर दूर किसी मेकेनिक की दुकान तक बाइक को धक्के लगाता हुआ पहुंचा. दो घंटे के इन्तेजार के बाद मैकेनिक ने दुकान खोली तो राहुल ने चैन की सांस ली. हालाँकि, उसका चैन तब बेचैनी में बदल गया जब मैकेनिक ने बताया कि आपका इंजिन 'सीज़' हो गया है क्योंकि इसमें इंजिन-आयल खत्म हो चुका था. खर्चा कितना लगेगा, राहुल के मुंह से पहला शब्द निकला!
यही करीब, चार हजार से पैंतालीस सौ के आस पास पड़ जायेगा.
क्या? सहसा राहुल को विश्वास ही नहीं हुआ, तीन सौ के इंजिन ऑयल के बदले इतना ज्यादा खर्चा!
कुछ कम में जुगाड़ कर दो भाई, उसने रिक्वेस्ट की !
इसमें कोई जुगाड़ नहीं हो सकता, पूरा इंजिन खोलना पड़ेगा और पूरा दिन लग जायेगा साब!
राहुल को फिर भी विश्वास नहीं हुआ, उसने सोचा कि सुबह का समय पाकर यह मैकेनिक उसे ठग रहा है. तब तक दिन चढ़ चुका था और गर्मी की धूप अपनी चढ़ान पर थी. चूँकि, मोटे खर्चे की बात थी, इसलिए पूछते पूछते वह पास की मार्किट में अपनी बाइक को धक्के लगाता हुआ पहुंचा. एक मैकेनिक की दूकान पर उसने बाइक खड़ी कर दी. मैकेनिक ने पहले किक चेक किया, फिर तेल की टंकी उतारी, फिर इंजिन खोलना शुरू किया और उसने भी वही सारी बात कही, जिसका डर था. इंजिन जाम हो चुका था. पिस्टन, गरारियां, गराद और न जाने किन किन शब्दों से उसका परिचय एक के बाद एक से होता जा रहा था, साथ में मैकेनिक उसको यह भी याद दिलाता जा रहा था कि यदि उसने टाइम पर सर्विसिंग करा ली होती तो आज यह स्थिति न आती. घड़ी की सुइयां खिसकती जा रही थीं और ऑटोमोबाइल दूकान पर खड़ा राहुल सोच रहा था कि बाइक की 'सर्विसिंग' कराने में देरी ने उसे अच्छा सबक दिया आज! उसकी सोच का दायरा बाइक से हटकर, कार - सर्विसिंगbike, car, servicing, mechanic, lifestyle, service, views, vichar, mithilesh2020, laghukatha, short stories, hindi kahani और फिर 'जीवन की सर्विसिंग' पर घूमने लगीं. कार तक तो बात ठीक थी, किन्तु 'मानव जीवन की सर्विसिंग' पर वह कन्फ्यूज हो गया कि सच में ऐसी कोई सर्विसिंग होती है क्या? यदि हाँ! तो उसमें लापरवाही की सजा कितनी बड़ी होगी ... ??
इन विचारों से वह जब तक बाहर निकलता तब तक शाम के चार बज चुके थे और मैकेनिक उसे फिर समझा रहा था कि इंजिन खुलने के बाद बाइक को 500 किलोमीटर चलाते ही सर्विसिंग जरूर करा लीजियेगा, उसके बाद रेगुलर,यानि...
यानि 1500 किलोमीटर पर ही सर्विसिंग जरूरी है, मैकेनिक की बात राहुल ने पूरी कर दी और मुस्कुरा उठा!
घर आते समय उसके मन में कई शब्द और विचार गड्डमगड्ड हो रहे थे, लेकिन एक बात साफ़ थी कि बाइक की सर्विसिंग टाइम से जरूर करायेगा, नहीं तो इंजिन 'सीज़' हो जायेगा!
- मिथिलेश 'अनभिज्ञ'
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Friday, 3 July 2015

माननीयों की 'विशिष्टता' एवं सेलरी का अंकगणित

by on 10:04
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ दिनों से 'घरेलु गैस' के ऊपर सब्सिडी छोड़ने की ज़ोरदार अपील कर रहे हैं. देश के विकास के लिए चिंतित हमारे पीएम इस अपील को कई कई बार दोहरा चुके हैं. हालाँकि, देश की संसद के सदस्य और खुद भाजपा से जुड़े नेता भी इस अपील पर कितना ध्यान दे रहे हैं, यह देखने वाली बात है. सब्सिडी छोड़ने की बात आयी तो, प्रत्येक मुद्दे की तरह सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा होनी स्वाभाविक ही थी. बात होते - होते किसी ने संसद के कैंटीन में मिल रही जबरदस्त सरकारी सब्सिडी (80 फीसदी से भी ज्यादा) पर चर्चा छेड़ दी, यह मुद्दा भी गरम हो गया और लोग प्रधानमंत्री से संसद-कैंटीन को दी जा रही सब्सिडी रद्द करने की मांग करने लगे. इस से सम्बंधित समिति के एक सांसद ने तो कह दिया कि 'सांसदों' के पेट पर लात नहीं मारने दिया जायेगा, जबकि हमारे समझदार प्रधानमंत्री ने अब चुप रहना सीख ही लिया है, इसलिए उन्होंने दोबारा सब्सिडी के मुद्दे पर अपना मुंह नहीं खोला. खैर, यह तो एक बात थी, लेकिन दूसरी मुख्य बात यह है कि गोरखपुर से भाजपा-सांसद योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली एक समिति ने सांसदों के वेतन और पूर्व सांसदों की पेंशन में भारी बढ़ोतरी की सिफारिश कर दी. अब लोगों के जले पर नमक तो पड़ना ही था, क्योंकि लगभग हर तरह की सुख - सुविधा और पावर के साथ चलने वाले लोग भी सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ डालने को तत्पर रहेंगे तो देश में बाकी भूखों का क्या होगा? अभी हाल ही में आयी एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट में साफ़ कहा गया था कि भारत में 20 करोड़ से ज्यादे लोग आज भी भूखे सोने को मजबूर हैं. पंद्रह जून से सैनिक जंतर मंतर पर वेतन और पेंशन के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं लेकिन हमारे सांसद कितनी सहजता से अपनी सुख सुविधा और वेतनमान बढ़ाने का प्रस्ताव भेज देते हैं, यह अपने आप में आश्चर्य उत्त्पन्न करने वाला प्रश्न है. एक राष्ट्रीय अख़बार में ख़बर छपी कि संसदीय कमिटी ने सांसदों की तनख्वाह डबल करने का सुझाव दिया है. एक संसद सदस्य के ऊपर सामान्य रूप से कितना खर्च होता है, इसकी रूपरेखा कुछ यूं होती है, लोकसभा की वेबसाइट से एक सांसद की मार्च 2015 की सैलरी का हिसाब निकाला, तो  कुछ ऐसी तस्वीर बानी: मार्च 2015 में उन 'माननीय' को कुल 3 लाख 8 हज़ार 666 रुपये मिले थे, जिसमें बेसिक - 50,000, संसदीय क्षेत्र भत्ता - 45000, आफिस का खर्चा - 15000, सहायक की सैलरी - 30000, यात्रा और दैनिक भत्ता - 1,68,666. ऐसे में आप समझ सकते हैं कि दुसरे क्षेत्रों से तुलना करने पर इनका वेतनमान पहले ही कितना अधिक है. कमेटी ने सुझाव दिया है कि बेसिक को 50,000 से बढ़ाकर 1 लाख कर दिया जाए. पूर्व सांसद के पेंशन को 20,000 से बढ़ाकर 35,000 कर दिया जाए. सहायक को भी सांसद के साथ रेल में प्रथम श्रेणी एसी का फ्री टिकट मिले. पूर्व सांसद को भी एक साल में हवाई यात्रा के लिए 20-25 टिकट फ्री मिले. सवाल यह है कि सिर्फ सांसदों को ही सरकारी दामाद क्यों बनाया जाय? क्या वास्तव में लोकतान्त्रिक प्रणाली में वह किसी नागरिक से ज्यादा सुविधाओं के हकदार हैं? हालाँकि, इसके पीछे उनके ऊपर तमाम जिम्मेवारियों का लेखा - जोखा दिखाकर सेलरी की बात को जस्टिफाई करने की कोशिश की जा सकती है. लेकिन, यहाँ बताया जाना चाहिए कि देश में किस नागरिक या कर्मचारी के ऊपर जिम्मेवारियों का बोझ नहीं है. आखिर, दुसरे सार्वजानिक क्षेत्रों से अलग व्यवस्था माननीयों के लिए क्यों रहना चाहिए? इसके सन्दर्भ में यहाँ यह बात भी विचारणीय है कि एक बार सांसद या विधायक चुने जाने के बाद कई माननीय बंगला और दूसरी सरकारी सुविधाओं पर ताउम्र जमे रहते हैं, जिसके कई उदाहरण आपको आसानी से मिल जायेंगे. और सिर्फ माननीय ही क्यों, बल्कि उनके परिवार के साथ उनके चाहने वालों को भी वगैर नियम कानून के लाभ पहुँचाया जाता रहा है. समस्या यह है कि सरकारी कार्यों के अतिरिक्त, अनेक व्यक्तिगत कार्यों का बोझ भी ये माननीय सरकारी ख़ज़ाने पर डालना अपना संवैधानिक अधिकार क्यों समझते हैं. कई बार तो सिर्फ अपने महिमा - मंडन के लिए नेतागण कुख्यात हो जाते हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री ने हाल ही में अपने बजट में कई गुणा बढ़ोतरी की है, जिसे लेकर उनकी आलोचना हो रही है. इसी महिमा-मंडन के सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय का फैसला भी आया है, लेकिन उसकी मनमानी व्याख्या करके धज्जियां उड़ाने में कई मंत्री, मुख्यमंत्री कई कदम आगे हैं. इससे आगे बढ़कर कहा जाय तो अपने कई पिछले चुनावों का खर्च भी 'माननीय' 5 साल के दौरान ही वसूल लेना चाहते हैं. यह एक तथ्य है कि चुनाव सुधार के वगैर इस व्यवस्था में तमाम विकृतियां बनी ही रहेंगी, क्योंकि चुनावों में करोड़ों करोड़ रूपये एक माननीय के द्वारा खर्च किये जाते हैं और इसके मद में जीता हुआ कैंडिडेट अपनी बाकी उम्र और परिवार के लिए सुविधाओं की गारंटी दिमाग में बिठाकर चलता है. आखिर सरकारी अधिकारियों, आईएएस या सेना के ऑफिसर्स से ज्यादा वेतनमान और सुविधाएं किसी सांसद या विधायक को क्यों होनी चाहिए? और किसी नेता द्वारा चुनाव में जबरदस्त खर्च क्यों किया जाता है? जब तक इन प्रश्नों का हल नहीं ढूंढ लिया जाता है, तब तक इस तरह के प्रस्ताव आते ही रहेंगे और हमारे 'माननीय' करदाताओं के पैसे को कभी घोटालों के माध्यम से तो कभी बेतहाशा सब्सिडी के माध्यम से अपनी जेब में भरते ही रहेंगे. यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि किसी नेता का विदेशी टूर और दुसरे ऑफिसियल खर्चे पहले ही सरकार द्वारा वहां किये जाते हैं. अब कोई सांसद अपनी ससुराल पूरे लाव-लश्कर सहित जाय, या फिर कोई विधायक किसी शादी समारोह में जाए तो इन खर्चों को सरकारी कैसे माना जा सकता है? इन बातों की चर्चा होते समय एक अख़बार के संपादक महोदय ने मुझसे कहा कि सांसदों को बहुत लोगों से मिलना - जुलना होता है, इसलिए उनके वेतनमान में बढ़ोतरी का प्रस्ताव ठीक हो सकता है. उनकी बातों में सांसदों के प्रति 'विशिष्टता' को बोध देखकर मुझे गहरी पीड़ा हुई. लेकिन, यह एक सच्चाई और बिडम्बना है कि हमारे देश में 'नेता-वर्ग' को विशिष्ट भाव से देखा जाता है और 'माननीय' खुद भी स्वयं को विशिष्ट समझ कर राजनीति करते हैं, जबकि अमेरिका इत्यादि देशों में आपको यदि कोई सीनेटर अपनी गाड़ी साफ़ करता मिल जाए तो आश्चर्य नहीं होगा. समस्या इनको भी 'आम' बनाने की है, मगर 'आम' बनाये कौन? क्योंकि यह कार्य बिल्ली के गले में घंटी बांधने से भी ज्यादे कठिन लगता है, तभी तो आज तक संभव नहीं हो पाया है.


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Thursday, 2 July 2015

भारत में सोशल मीडिया, मतलब क्या ?

by on 06:45
आज के समय में सोशल मीडिया के इस्तेमाल न सिर्फ स्टेटस सिम्बल के लिए, बल्कि एक जरूरत के रूप में आकार ले चूका है. इस बात में कोई शक नहीं है कि इंटरनेट क्रांति के दौर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के रूप में दुनिया को एक बेहतरीन तोहफा मिला है. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सप्प, पिंटरेस्ट, टंब्लर, गूगल प्लस और ऐसे ही अनेक प्लेटफॉर्म पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोने की ताकत रखते हैं. यह बात कोई हवा हवाई नहीं है, बल्कि इन प्लेटफॉर्म्स ने विभिन्न अवसरों पर अपने महत्त्व को साबित भी किया है. चाहे देशी चुनाव हो अथवा विदेशी धरती पर कोई आंदोलन हो या फिर पर्सनल ब्रांडिंग ही क्यों न हो, आज लाइक्स, फालोवर्स, शेयर जैसे शब्द हर एक जुबान पर छाये हुए हैं. एक स्टडी के अनुसार 2014 में भारत के लोकसभा चुनाव में लगभग 150 सीटों पर सोशल मीडिया ने जीत में अपनी भूमिका निभाई थी, वहीं दिल्ली राज्य के बहुचर्चित चुनाव में अरविन्द केजरीवाल द्वारा नवगठित पार्टी ने अपना 80 फीसदी कैम्पेन सोशल मीडिया के माध्यम से ही किया, और परिणाम पूरी दुनिया ने देखा. इसके अतिरिक्त मिश्र देश में हुए आंदोलन में सोशल मीडिया की भूमिका हम सब जानते ही हैं और व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल नेताओं, खिलाडियों, अभिनेताओं द्वारा धड़ल्ले से किया जा रहा है. थोड़ा और आगे बढ़ा जाय, तो बड़े नेताओं के साथ छुटभैये नेता भी फेसबुक, ट्विटर प्रबंधन और मेलिंग के लिए आईटी- प्रोफेशनल्स से संपर्क साध रहे हैं, या फिर अपने किसी रिश्तेदार, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा हो, या जॉब कर रहा हो, उससे इस सम्बन्ध में सहायता ले रहे हैं. आप चाहे गाँव में ही क्यों न हों, आपको तमाम नवयुवक अपने फेसबुक और जुड़े मित्रों से सम्बंधित गतिविधियाँ शेयर करते नजर आएंगे. पर इन सकारात्मक दृश्यों के पीछे एक कड़वी परत भी दिखती है, जिसमें सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है. मुज़फ्फरनगर में पिछले दिनों हुए दंगों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल की खबरें बड़ी तेजी से फैली थीं, तो जम्मू कश्मीर में भी आये दिन इस तरह की खबरें देखने को मिलती ही रहती हैं. इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में नफरत भरे संदेशों को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाया जा रहा है, कई बार इरादतन और संगठित रूप में तो कई बार बहकावे में युवक - युवतियां ऐसे कदम उठा देते हैं, जो उनकी गिरफ़्तारी तक जा पहुँच जाता है. हालाँकि, इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, जिसमें तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गयी है, उससे इन माध्यमों का गलत इस्तेमाल करने वालों द्वारा फायदा उठाने की सम्भावना भी बढ़ सकती है. अभी हाल ही में कविता कृष्णन और बॉलीवुड के आदर्शवादी 'बाबूजी' कहे जाने वाले सीनियर अभिनेता आलोक नाथ के बीच ट्विटर पर गाली - गलौच किये जाने का शो हावी रहा, जिसको लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने ज़ोरदार, मगर नकारात्मक सक्रियता दिखाई. इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपना वह दर्द नहीं छुपा पाये, जिसे उन्होंने एक लम्बे समय तक झेला है. एक खबर के अनुसार पीएम ने सोशल मीडिया पर सक्रिय अपने 100 समर्थकों से बातचीत के दौरान कहा, 'सोशल मीडिया पर मुझे जिन भद्दे और गाली जैसे शब्दों का सामना करना पड़ा है, यदि उनके प्रिंट निकाले जाएं तो पूरा ताजमहल ढंक जाएगा.' इसके बावजूद पीएम मोदी ने आलोचनाओं को शालीनता से सुनते हुए अपने समर्थकों से परिपक्व बर्ताव करने की नसीहत दी, जिसे सराहा ही जाना चाहिए. वैसे, मजाक में कहा जा सकता है कि शायद सोशल मीडिया पर गाली - गलौच झेलने के बाद ही नरेंद्र मोदी इसके प्रति सीरियस हुए होंगे और तभी उनको इसकी मजबूती का अहसास भी हो गया होगा. वो कहते हैं न कि अपने ऊपर फेंके हुए पत्थरों से जो घर बना ले, असली विजेता वही है. नरेंद्र मोदी के मामले में यह बात चरितार्थ होती दिखी है. वैसे, यह एक बात है लेकिन प्रधानमंत्री की दूसरी बात पर गौर करना भी उतना ही आवश्यक है, जिसमें पीएम ने कहा है कि उनके समर्थक सकारात्मक सोच रखें, क्योंकि गलत भाषा का इस्तेमाल सोशल मीडिया जैसे रोमांचक माध्यम के लिए खतरा हो सकती है. यह बात दूरदर्शी होने के साथ साथ उतनी ही तथ्यात्मक भी है, क्योंकि गाली-गलौच होने से आम जनमानस की रुचि धीरे-धीरे कम होने लगती है और अंततः समाप्तप्राय हो जाती है. उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री की अपील का असर न सिर्फ उनके समर्थकों, बल्कि विरोधियों और ट्विटर इत्यादि को विवादित स्थल बनाने का प्रयास करने वाले सेलेब्स पर भी पड़ेगा. शायद इससे सोशल मीडिया का असली उद्देश्य समझने में सहायता मिलेगी और उसके सही प्रयोग की दिशा में हम एक कदम बढ़ा सकने में सफल होंगे. आखिर, सोशल मीडिया को विवादित बनाने में आम आदमी ही नहीं, बल्कि सेलेब्स भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. आपको गायक अभिजीत भट्टाचार्य का वह विवादित ट्वीट तो याद ही होगा, जिसमें उन्होंने गरीब आदमी को 'कुत्ता' कहते हुए ट्विटर पर लिखा कि 'कुत्ता सड़क पर सोयेगा तो मरेगा ही, सड़क गरीब के बाप की नहीं है.' वह बिचारे सलमान खान की चापलूसी या समर्थन कर रहे थे, लेकिन ट्विटर को खामख्वाह बदनाम कर गए. इसके अतिरिक्त आजकल देश से फरार, पूर्व क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी के ट्वीट्स ने देश की राजनीति में उथल-पुथल मचा रखी है. कहने का तात्पर्य यह है कि हम आज भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल विवाद फ़ैलाने में या अपनी कुंठित सोच को जाहिर करने में करते हैं, मगर हमें उन लोगों से प्रेरणा लेने में जाने क्यों संकोच हो जाता है, जो बेहतरीन नेटवर्किंग और ब्रांडिंग में इन प्लेटफॉर्म्स का बेहतरीन उपयोग करते नजर आते हैं. अपने देश में खुद प्रधानमंत्री इसके बेहतरीन उदाहरण हैं, जो अपने प्रत्येक मंतव्य को इंटरैक्टिव ढंग से लोगों के बीच ज़ोरदार ढंग से पहुँचाने की कोशिश करते हैं. दुसरे उदाहरणों के रूप में हम पर्सनल स्टाइल ब्लॉगर डैनियला बर्नस्टेन का नाम ले सकते हैं, जिन्हें एक इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए करीब 10 लाख रुपये तक मिलते हैं. उन्हें यह पैसा वे ब्रैंड्स देते हैं जो चाहते हैं कि उनके प्रॉडक्ट्स को वे 9,92,000 लोग फॉलो करें जो ऐप पर बर्नस्टेन को फॉलो करते हैं. समझा जा सकता है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल इस युवा लड़की ने किस प्रकार किया है. विदेशी उदाहरणों की ओर थोड़ा और बारीक दृष्टि से देखें तो एक - एक पेज की वेबसाइट बना बनाकर छोटे व्यापारी भी अपने प्रोडक्ट को वर्ल्डवाइड फैला देता हैं, जो संभव होता है सोशल मीडिया के माध्यम से. ब्लॉग, तस्वीर, पोस्ट, ट्वीट इत्यादि शब्दावलियाँ कितनी ताकतवर हो सकती हैं, हम इन उदाहरणों से समझ सकते हैं. व्हाट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर पर गाली-गलौच करने वाले हमारे देश के युवा क्या बेहतरीन ब्लॉगर बनकर सूचना के संसार में अपनी जगह नहीं बना सकते हैं? इन माध्यमों पर बौद्धिक विलास करने वाले बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिए कि वह खुद इस माध्यम पर मात्र पार्टीबाजी ही करते हैं अथवा युथ के लिए कुछ इंस्पिरेशन छोड़ने में सक्षम हो पाते हैं. समस्या सोच बदलने की है, जिससे सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स हमारे लिए वाकई बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं. जरूरत है इसकी उपयोगिता समझने की और इसको अपने जीवन में उपयोगी तरीके से ढालने की और इसके लिए नकारात्मकता हमें छोड़नी ही होगी, क्योंकि इसके सिवा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है.




Social Media use in India, hindi article on misuse of twitter, facebook by mithilesh2020

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Wednesday, 1 July 2015

आईटी 'यूथ' के लिए डिजिटल इण्डिया में क्या ?

by on 08:04
नौ-सूत्रीय अजेंडे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना डिजिटल-इंडिया को लांच कर दिया है. इस प्रोग्राम में मुख्य रूप से ब्रॉडबैंड हाइवेज, यूनिवर्सल एक्सेस तो फोन्स, पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम, ई-गवर्नेंस, ई-क्रांति, सभी के लिए सूचना, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, आईटी फॉर जॉब्स और अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम की चर्चा की गयी है. हालाँकि, तमाम शोर-शराबे के बावजूद इस 'डिजिटल इण्डिया' प्रोग्राम से आईटी यूथ कितना प्रभावित होगा, यह कहना मुश्किल है. एक बड़े प्रोग्राम में, तमाम सीनियर मंत्रियों और ब्यूरोक्रेट्स के साथ शीर्ष उद्योगपतियों की उपस्थिति में नरेंद्र मोदी ने इस प्रोग्राम को धूम - धड़ाके से लांच किया और यह उनके प्रबंधन का ही कमाल है कि देश के अनेक उद्योगपतियों ने भी इस प्रोग्राम में बड़े निवेश की घोषणा भी तत्काल कर दी. रिलायंस इंडस्‍ट्रीज डिजिटल इंडिया में 2,50,000 करोड़ का निवेश करेगी, तो आदित्य बिड़ला ग्रुप अगले पांच साल में 7 बिलियन डॉलर का निवेश करेंगे. टाटा सहित दुसरे ग्रुपों ने भी डिजिटल इंडिया में अपने योगदान को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री की जमकर तारीफ़ की. इस कड़ी में प्रधानमंत्री की इस बात के लिए तारीफ़ करनी होगी कि वह पुराने सामानों को बेहतरीन पैकिंग के साथ जोश-खरोश के साथ पेश करते हैं, जो सहयोगियों में नए उत्साह उत्पन्न करने में काफी हद तक सहायक होता है, लेकिन एक साल तैयारी करने के बाद इस प्रोग्राम में और भी बहुत कुछ शामिल किया जा सकता था. डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के कई भाग, मसलन देश को ब्रॉडबैंड से जोड़ना, मोबाइल फोन्स पर इंटरनेट की उपलब्धता, सभी के लिए सूचना इत्यादि पहले ही चल रहे हैं. यदि कुछ नए सिरे से जोड़ने की कोशिश की गयी है तो वह है गाँवों को भी ब्रॉडबैंड इंटरनेट से जोड़ने की घोषणा, जिसे 'ब्रॉडबैंड हाइवेज' नाम के जुमले से सम्बोधित किया गया है. हालाँकि, यह लक्ष्य कैसे पूरा होगा, इसकी चर्चा नहीं की गयी है. ऐसे में जिन गांवों में रोजगार नहीं हैं, कृषि छोड़कर लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं, ऐसे में यह लक्ष्य हवा - हवाई ज्यादा दिखता है. इसके अतिरिक्त घर-घर इंटरनेट पहुँचाने में सबसे बड़ी बाधा नेशनल ऑप्टिक फ़ाइबर नेटवर्क का प्रोग्राम है, जो निर्धारित समय से तीन-चार साल पीछे चल रहा है. सरकार को ये समझना होगा कि जब आप गांव-गांव तार बिछाने जाएंगे तो आप उन लोगों को ये काम नहीं सौंप सकते जो पिछले 50 साल से कुछ और बिछा रहे हैं. आपको वो लोग लगाने होंगे जो ऑप्टिक फ़ाइबर नेटवर्क के महत्त्व को समझते हैं और प्रतिबद्धता से अपने काम को पूरा करने की जिम्मेवारी उठाने का माद्दा रखते हैं. वैसे, शहरों में ई- गवर्नेंस को मजबूत करने के लिए मोदी सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाये हैं और पब्लिक से इंटरेक्शन करने हेतु कुछ बेहतरीन वेबसाइट का निर्माण भी कराया है, जिनमें मायजीओवी.इन और डिजिटललॉकर जैसी सुविधाएं उल्लेखनीय हैं. इसमें मायजीओवी जहाँ यूथ को सरकारी प्रोग्राम्स के बारे में जानकारी देने और सुझाव लेने का बेहतरीन प्लेटफॉर्म बनता जा रहा है, वहीं डिजिटल लॉकर भी आने वाले समय में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है. हालाँकि, इस तरह के प्राइवेट प्रोग्राम्स जैसे ड्रॉपबॉक्स, गूगल ड्राइव इत्यादि उपलब्ध हैं, किन्तु सरकारी वेबसाइट 'डिजिटल लॉकर' अपनी विश्वसनीयता के साथ-साथ आधार-कार्ड से लिंक की वजह से और दुसरे सरकारी विभागों से होने वाले सिंक्रोनाइजेशन के लिहाज से सर्वोत्तम विकल्प साबित हो सकती है. नयी बन रही वेबसाइट के लिए मोदी सरकार की इसलिए भी तारीफ़ करनी होगी कि वह पुरानी, थकी हुई सरकारी वेबसाइटों की तुलना में हज़ार गुना बेहतर और इंटरैक्टिव है, जो किसी निजी कंपनी से मुकाबला करती नजर आती है. सूचना के स्तर पर खुद प्रधानमंत्री का ऑफिस बेहद इंटरैक्टिव हो गया है और जनता से सीधे जुड़ने की कोशिश करता नजर आता है. इस प्रोग्राम की अगली कड़ी 'इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन' का लक्ष्य भी कुछ कम कठिन नहीं है. देश में अधिकतर विदेशी कंपनियों ने इस क्षेत्र में लगभग कब्ज़ा कर रक्खा है, चाहे मोबाइल हो, कम्प्यूटर हो या चिप-निर्माण ही क्यों न हो, भारत का स्थान इसमें कहीं नहीं दिखता है. कुछेक कंपनियां अपने देश में भी सक्रीय जरूर हैं, लेकिन वह असेम्ब्लिंग का काम ही ज्यादा करती हैं, बजाय कुछ ओरिजिनल पेश करने के अथवा विदेश में बनने वाले प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग और सर्विस भर करके संतुष्ट हो लेती हैं. इस प्रोग्राम की अगली कड़ी 'आईटी फॉर जॉब्स' का महत्त्व जरूर गिनाया जा रहा है, लेकिन सरकार इस क्षेत्र को समझ भी पायी है, इसमें संदेह दिखता है. आईटी में अब तक अपने देश ने बेहतर प्रगति की है, इसलिए गली कूचे से लेकर बड़े शहरों तक कम्प्यूटर-शिक्षा के साथ छोटे-छोटे रोजगार के बृहद अवसर उभरे हैं. मसलन डेटा-इंट्री जॉब्स, सोशल मीडिया एनालिसिस, डिज़ाइन एंड डेवलपमेंट जॉब्स इत्यादि महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरे हैं. बिना किसी बड़ी कम्पनी की सहायता के भी भारतीय युवा बेहतर तरीके से वैश्विक बाजारों में 'फ्रीलांसर' के रूप में अपना मजबूत दखल रखते हैं. लघु उद्योग के इस स्वरुप को समझकर संरक्षित करने की आवश्यकता थी, जो बिलकुल नहीं किया गया. इस क्षेत्र को थोड़ा और स्पष्ट किया जाय तो बड़ी कंपनियों की मार्केटिंग रणनीति से आप इसे समझ सकते हैं. गूगल 'एडसेंस' के माध्यम से तो अमेजन, फ्लिपकार्ट और दूसरी बड़ी कंपनियां अफिलिएट प्रोग्राम के माध्यम से 'फ्रीलांसर्स' तक सीधी पहुँच बना कर अपने वैश्विक कारोबार में बढ़ोतरी कर रही हैं. ऐसे में डिजिटल इण्डिया के सपने में, भारत सरकार द्वारा यह हिस्सा छूट गया लगता है. हालाँकि, मोदी सरकार की इस बात के लिए सराहना करनी चाहिए कि देश में पहली बार सूचना प्रोद्योगिकी को लेकर एकीकृत प्रयास करने की कोशिश हुई है, जो निश्चित रूप से भविष्य के लिए फलदायी साबित होगा. पर क्या यह बेहतर नहीं होता कि विदेशों से धन लाने वाले फ्रीलांसर्स को भी सहूलियतें दी जातीं. अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि बाहर से आने वाले फ्रीलांसर्स के पैसे पर 'बैंकिंग रवैया' बिलकुल ठीक नहीं है. पिछले दिनों गूगल एडसेंस की 100 - 100 डॉलर की पेमेंट मैंने दो बैंकों में मंगाई, जिसमें एक बड़ा प्राइवेट बैंक था तो एक सरकारी बैंक, पर दुर्भाग्य के साथ बताना पड़ रहा है कि दोनों ने एक बड़ा अमाउंट कमीशन के रूप में अपने आप काट लिया, जिसे मेरी पास-बुक में भी नहीं चढ़ाया गया. इसके अतिरिक्त, दिल्ली जैसे शहर में भी पैसे अकाउंट में आने में लगभग सप्ताह भर का समय लग गया. डिजिटल इण्डिया में बड़ा योगदान करने वाले आईटी यूथ की इसी तरह की दूसरी व्यवहारिक समस्याएं भी हैं, मसलन यदि किसी फ्रीलांसर की पेमेंट कहीं फंसती है (जो कि होता ही रहता है), तो वह बेचारा मन मसोसकर रह जाता है. जरूरत इस इंडस्ट्री को पहचान देने की है, जिससे फ्रीलांसर्स अपने भविष्य को सुरक्षित महसूस कर सकें और मुख्य धारा में अपने योगदान को पहचान सकें. सिर्फ विदेशी काम ही क्यों, बल्कि देश में भी डेटा-एनालिसिस इत्यादि के कामों का बड़े स्तर पर ठेका किसी विदेशी कंपनी को देकर छुटकारा पा लिया जाता है. क्या वाकई, इससे देश का सशक्तिकरण होता है? क्या ऐसे प्रोग्राम्स में आईटी यूथ को शार्ट-टर्म के लिए हायर किया जा सकता है, जिन्हें जरूरत पड़ने पर ट्रेनिंग देकर सशक्त बनाया जा सके. इन सभी बातों पर ध्यान देने से अभी काफी कुछ गुंजाइश नजर आती है, लेकिन हिंदी कहावत 'नहीं मामा से काना मामा अच्छा' के हिसाब से देखें तो 'डिजिटल इण्डिया' शुरुआती स्तर पर एक महत्वपूर्ण प्रोग्राम है, जिसकी जरूरत वाकई इंडिया को थी और इसके साथ यह भी सच है कि प्रत्येक प्रोग्राम की तरह आने वाले समय में इसमें सुधार की गुंजाइश भी बनी रहेगी.



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Digital India and IT Youth Expectations, hindi article by mithilesh2020

Monday, 29 June 2015

समाजवादी कार्यकर्ताओं की ज़मीनी राजनीति

by on 07:32
उत्तर प्रदेश का नाम कानून व्यवस्था के लिहाज से हमेशा ही 'अति' प्रशंसनीय रहा है. गुंडा, गुंडई, दादागिरी जैसे शब्द उत्तर प्रदेश की जनता के लिए आम शब्द जैसे प्रतीत होते हैं. हालाँकि, राजनीति में गुंडा फैक्टर इस्तेमाल करना भारतीय राजनेताओं के लिए कोई नई बात नहीं है, किंतु अन्य जगह यह बहुधा ऊपरी स्तर पर ही होता है, जिससे आम जनता को कोई विशेष मतलब नहीं होता है. परंतु उत्तर प्रदेश के नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता कुछ ज्यादे ही समाजवादी किस्म के हैं, इसलिए बड़े और छोटे में भेद नहीं करते, बल्कि सबको समान रूप से दुखी किया करते हैं. यह बात सिर्फ हम ही नहीं कह रहे हैं, बल्कि तमाम आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. इसी अपराध को लेकर अमिताभ बच्चन ने एक बार समाजवादी पार्टी के लिए विज्ञापन किया था कि 'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहाँ हैं कम'! इस विज्ञापन को लेकर जैसी छीछालेदर अमिताभ बच्चन की मची, उसे वह आज तक नहीं भूले होंगे. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी बुरी तरह से परास्त हुई थी. यह अलग बात है कि जातिवादी तिकड़मों और बेहतर विकल्प होने के अभाव में समाजवादी पार्टी ने सत्ता हासिल की, जिसमें युावा अखिलेश यादव का चुनाव प्रचार भी शामिल था. हालाँकि, सपा की जीत पर विश्लेषकों को आश्चर्यमिश्रित दुःख अवश्य हुआ होगा. अपराध की पुष्टि यूं तो कई एजेंसियां करती रही हैं, किन्तु यदि खुद पार्टी का प्रमुख नेता ही यदि अपनी ही पार्टी के नेताओं को गुंडा और जनता को परेशान करने वाला कहे तो ऐसी स्थिति को 'जनता को मुर्ख बनाने' की कला के अतिरिक्त और क्या कहा जाय. विदेशी पढाई कर लौटे और बड़ी उम्मीदों के साथ उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बैठे अखिलेश यादव कई सालों के बाद अगर यही अनुभव जुटा पाये हैं कि उनकी पार्टी के नेता गुंडे हैं और ज़मीन कब्ज़ा करने के साथ थाने की राजनीति में बड़ी दिलचस्पी लेते हैं, तो इसे उनकी नादानी समझी जाय अथवा इक्कीसवी सदी में जनता को नादान समझने की सोच! जी हाँ! उत्तर प्रदेश का यह अनुभव तो अधिकांश बाशिंदों को था ही, लेकिन इसकी सार्वजानिक स्वीकारोक्ति, वह भी एक कार्यरत मुख्यमंत्री के मुंह से, हमारी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है. याद दिलाना उचित होता कि यह वही अखिलेश यादव हैं, जिन्होंने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय की खुलेआम आलोचना की थी, जिसमें माननीय कोर्ट ने जनता के पैसे से नेताओं को अपना धुआंधार विज्ञापन करने पर सख्ती से निर्देश जारी किये थे. तब कड़ी टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने कहा था कि 'सुप्रीम कोर्ट हमें यह भी बता दे कि हमारा पहनावा क्या हो'! सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च न्यायिक संस्था के निर्णयों पर बारीक निगाह रखने वाले और उसका विरोध करने का साहस रखने वाले अखिलेश यादव, भला अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं के व्यवहार से अनजान कैसे बने रहे? या फिर यदि उनको इसके बारे में जानकारी थी तो उन्होंने इसे नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाये? इससे भी आगे बढ़कर कहा जाय तो अब जब उन्हें अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की असलियत पता चल गयी है तो वह इन्हें अनुशासित करने के लिए अब भी क्या कदम उठाने वाले हैं? यदि इन्हें नियंत्रित करने के लिए मुख्यमंत्री ठोस कदम नहीं उठाते हैं तो भला यह कैसे समझा जाय कि उनकी बातों में गंभीरता है और वह वास्तव में उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित करना चाहते हैं. वैसे यह पूरी बात अखिलेश यादव ने आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के सन्दर्भ में कही है. ऐसे में उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि वह पार्टी कार्यकर्ताओं को अनुशासित सिर्फ चुनाव तक ही करना चाहते हैं, फिर अगले चुनावों तक गुंडई करने की खुली छूट दे देंगे! वैसे, जिस प्रदेश में पत्रकारों पर घोर अत्याचार हो रहे हों, ज़िंदा जलने की घटनाएं सामने आ रही हों और खुद अखिलेश सरकार के मंत्री इसमें फंसे हों, तो भला ऐसे एकाध बयान देने के अतिरिक्त वह कर भी क्या सकते हैं. आखिर, अपनी झेंप भी तो मिटानी है. यह गुण निश्चित रूप से उन्होंने अपने पिता एवं चतुर राजनेता मुलायम सिंह यादव से हासिल किये होंगे. वह भी अपने कार्यकर्ताओं की बद्तमीजियों को सार्वजनिक रूप से डांट देते हैं, जबकि बाद में वह यह कहने से भी गुरेज नहीं करते हैं कि 'बच्चों से जवानी में गलतियां' हो जाती हैं.'  सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही क्यों, उनकी पार्टी का इतिहास भी मायावती के 'झूला फ़ाड़ कांड' के रास्ते से होकर गुजरा है और प्रदेश के तमाम बाहुबलियों की शरण स्थली बना रहा है. ऐसे में अखिलेश यादव का यह कहना बेमानी ही है कि उनकी पार्टी पर दूसरों की तुलना में ज्यादा जिम्मेदारी है. अब कार्यकर्ता थाने की राजनीति छोड़ दें. अब सपाईयो को ज्यादा पढऩे-लिखने की भी जरूरत है, जिससे कि गांव से लेकर शहर के कोने तक समाजवादी सिद्धांत जनता तक पहुंच सकें. हमको सत्ता में शीर्ष पर रहने के लिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है. आखिर, अब समाजवादी कार्यकर्त्ता कितनी मेहनत करें भला! रात दिन मेहनत कर करके इन्होंने पूरे भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में अपना नाम कमाया है. समाजवादी सिद्धांत को गाँव गाँव तक ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया है. आखिर, पत्रकारों के जलने से लेकर, जमींन कब्जाने और थाने की राजनीति करने की स्वीकृति खुद मुख्यमंत्री ने ही कर ली है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में कानून के राज पर भला किसे शक हो सकता है. आज 21वीं शदी, जब दुनिया चाँद को लांघकर मंगल और उससे आगे जाने के मंसूबे बाँध रही है, ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य, अदद कानून के राज के लिए तरसें, यह शर्मनाक विषय है. अखिलेश यादव ने जिस 'थाने की राजनीति' का ज़िक्र किया है, उसमें आम जनता ही पिसती है और उसे दलाली के रूपयों से लेकर पक्षपात तक का शिकार बनने पर मजबूर किया जाता है. ज़रा मुख्यमंत्री के बयान 'थाने की राजनीति' और पुलिस पर एक पत्रकार द्वारा खुद को मंत्री के दबाव में जलाये जाने वाले आरोप पर गौर कीजिये, आपको बहुत कुछ समानता नजर आ जाएगी. जांच रिपोर्ट चाहे जो भी कहे, किन्तु मुख्यमंत्री के उदगार बहुत कुछ बताने के लिए अपने आप में पर्याप्त हैं. निराशा की बात यह है कि आने वाले सालों में भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कानून का राज कैसे स्थापित हो इसकी दिशा दिख नहीं रही है, ऐसे में जातिवादी दंश को झेलना उत्तर प्रदेश की जनता की मजबूरी बने रहने की सम्भावना ज्यादा दिखती है. हाँ! यदि जनता खुद चेते और जातिवादी राजनीति को ठोकर मार कर किनारे करे और योग्यता के आधार पर चुनावों में वोट करे तो तस्वीर अवश्य ही बदलेगी! पर यक्ष प्रश्न यही है कि क्या वाकई में जनता यह सोचेगी? 
samajwadi party politics in up and crime graph in state, hindi article by mithilesh

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