Thursday, 8 January 2015

Family and their good products, Joint Family Discussion!

by on 10:50

पारिवारिक मूल्यों पर विचार करते हुए यह बात ध्यान आती है कि किसी एक लड़के को उसके माँ-बाप और कई बार उसके भाई मेहनत-मजदूरी करके, मिलकर पढ़ाते हैं, उच्च शिक्षा दिलाकर उसे सरकारी या बढ़िया प्राइवेट जॉब दिलाते हैं. कई बार उसके बीजा के लिए लाखों खर्च करके उसे विदेश भिजवाते हैं... ...
लेकिन, वह लड़का सेटल हो जाने के बाद उसी परिवार को पिछड़ा समझकर उससे पीछा छुड़ाने लगता है. अपने आर्थिक हितों को साधने के लिए, वह तमाम तरह की व्यवहारिक / अव्यवहारिक समस्याओं को दोष देने लगता है, मसलन गाँव में माँ-बाप के पास जाना उसके लिए संभव नहीं है (कई बार इंडिया में आना उसके लिए असंभव हो जाता है), उसके माँ-बाप जिद्दी हैं, उसके भाई उससे जलते हैं, गाँव में गंदे और ईर्ष्यालु लोग रहते हैं इत्यादि-इत्यादि. ... प्रश्न यह है कि
1. योग्य और सक्षम व्यक्तियों के द्वारा अपनाया जाना वाला यह दोहरापन किस प्रकार सही है ? और
2. क्या उन्हें भी कुछ समय बाद ठीक इसी प्रकार की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा?
यह एक्सेप्शनल केस नहीं है, बल्कि 99 फीसदी कथित योग्य और सभ्य लोग इसी श्रेणी के हैं. शायद, आप और हम भी, इसलिए अपनी राय जरूर दें.


[From the Facebook wall of Mithilesh]

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Family and their good products, Joint Family Discussion in Hindi.

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Wednesday, 7 January 2015

संयुक्त परिवार - United Family Concepts and Discussion

by on 10:46

भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में समस्त समस्याओं का सामने आना 'संयुक्त परिवार' नामक संस्था का असफल होना प्रतीत होता है... और समस्याओं का समाधान भी निश्चित रूप से इसकी सफलता ही है.
(...शेष आगे!)


United-Joint-Family-Discussion-Platform

 

 

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United Family Concepts and Discussion in Hindi, initiated by Mithilesh.

क्रोध, प्रेम, घृणा, दया, मानवता की मिसाल है मेट्रो ... !! Poem on Delhi Metro in Hindi

by on 04:01

बैठ गया ब्लू लाइन मेट्रो पर
सुबह-सुबह जाना था आगे
पहुंचे स्टेशन पर भागे-भागे
लम्बी लाइन लगी थी
सबको ही जल्दी थी
टोकन के लिए आगे खिसके
लाइन में खड़े लोग भड़के


मजबूरी में दस मिनट लगाया
फिर चेकिंग के बाद एंट्री पाया
सोचा लिफ्ट में घुस जाता हूँ
बिना मेहनत प्लेटफॉर्म पर चढ़ जाता हूँ
लिफ्ट में कुछ बुजुर्ग आये
मुझे दो-चार जुमले सुनाये
कहा, तुम तो हो अभी जवान
सीढ़ियों से जाओ और हमें न करो परेशान
ओवरलोड थी लिफ्ट, मन मसोस उतर गया
सीढ़ियों से जाकर पीली लाइन पर अकड़ गया


बेमिसाल टेक्नोलॉजी और थी साफ़-सफाई
दिल्ली में सबकी तरह मेट्रो मुझे भी भाई
ट्रेन आयी, मैंने पहले ही डब्बे में छलांग लगाई
ये लेडीज डब्बा है, औरतें चिल्लाई
मैंने दरवाजे पर खड़े जोड़ों के बीच से राह बनाई


फिर धक्कम-धुक्की के बीच हो गया खड़ाBuy-Related-Subject-Book-be
इधर उधर, हिलते डुलते गाड़ी आगे बढ़ी
एक-एक स्टेशनों पर भीड़ और भी चढ़ी
बीच-बीच में आती रही आटोमेटिक आवाज
लोग आते रहे, जाते रहे जैसे पंछी करें परवाज

तभी मेरा पर्स - मेरा पर्स, कोई जोरों से चिल्लाया
किसी जेबकतरे ने उसका बटुआ उड़ाया
कोई दांव चलते न देखकर उसने गुहार लगाई
पर्स के पैसे रख लो, उसमें पड़े डॉक्युमेंट्स दे दो भाई
पर वह बिलबिलाता रहा लगातार
आस-पास के चेहरों को घूरता रहा बार - बार


लेकिन, मेट्रो अपनी रफ़्तार से चलती रही
एक के बाद दुसरे पड़ावों को पार करती रही
मैं भी अपने स्टेशन पर उतर गया
काम निबटाते-निबटाते शाम का पहर गुजर गया


लौटने की बारी थी
फिर मेट्रो की सवारी थी
ऑफिस से थके लौटते लोग
बात-बेबात पर भिड़ते लोग
मुंह की बदबू फैलाते लोग
सुख-दुःख की बतियाते लोग
कुछ कम भीड़ होने पर एक कोने में नजर गई
खुलेआम दृश्य, इमरान हाशमी की याद ताज़ा कर गई
एक दूसरी सीट पर प्रेमिका का थामे हाथ
मनुहार कर रहे प्रेमी के चेहरे पर थे कई भाव साथ-साथ


अगले स्टेशन की आई अनाउंसमेंट, मैं उतर गया
उतरते ही हाथ अपने पर्स और मोबाइल की तरफ गया
सब सलामत था! लाखों की तरह मंजिल पर लाइ मेट्रो
ऐसा लगा मानो हर सुख दुःख की गवाह है मेट्रो
क्रोध, प्रेम, घृणा, दया, मानवता की मिसाल है मेट्रो


- मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.
Poem on Delhi Metro in Hindi
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Tuesday, 6 January 2015

जलस्रोत बनाया मरूभूमि में ... Poem on Gurukul in Bhilwara, Rajasthan.

by on 05:13

प्रथम पूज्य गणपति विनायक
उनका नाम ही शुभ फलदायक
विघ्नों का पल में करते नाश
होते भक्तों के सदा सहायक



था राष्ट्र हमारा तब महान
गुरुकुल में मिलता था जो ज्ञान
स्वाभिमान की थी जब संस्कृति
नारी का होता था सम्मान



विकृति नहीं थी प्रकृति मेंMore-books-click-here
सुंदरता थी हर आकृति में
मन, हृदय हमारा स्वच्छ बने
फैले सुगंध देव संस्कृति में



विद्यापीठ के प्रांगण की हवा
गुरुजनों की सीख है और दुआ
हैं मंदिर, कोमल पुष्प यहीं
मानव-चरित्र की यही दवा



हैं कर्मवीर अभिमान शून्य
सींचा है नींव और लिया है पुण्यshiksha-kya-hai-book-search
जलस्रोत बनाया मरूभूमि में
अधिष्ठाता योगदान अमूल्य



हे देव विनायक! अर्पित तन-मन
विद्या हमें दो, हम हैं विपन्न
इस संस्थान से लें गुण अपार
बन राष्ट्र-भक्त सच करें सपन



(विनायक विद्यापीठ, भीलवाड़ा, राजस्थान के शैक्षणिक योगदान के प्रति समर्पित चंद पंक्तियाँ) guru-gurukool-education-shiksha
- मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.


Poem on Gurukul in Bhilwara, Rajasthan

Keyword: Ganpati, Ganesh Dev, Pratham Pujya, Vighn Vinashak, Gurukul, Nature, Sanskriti, Culture, Vidyapeeth, Vinayak Vidyapeeth Bhilwara, Human Character, Founder, Education means

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Monday, 5 January 2015

सुविख्यात साहित्यकार डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव के द्वारका स्थित निवास पर डॉ. विनोद बब्बर की अध्यक्षता में सरस संगोष्ठी का आयोजन - Kavi Sammelan in Dwarka, Delhi

by on 01:31
दिनांक ४ जनवरी २०१५ को, नव वर्ष के उपलक्ष्य में हिंदी और भोजपुरी के गणमान्य विद्वानों की उपस्थिति से द्वारका सेक्टर-२१ स्थित डॉ.रमाशंकर श्रीवास्तव का निवास गुलज़ार रहा. काव्य पाठ, गीत-संगीत एवं विचारों के नव-प्रवाह ने वातावरण पर अपना अद्भुत प्रभाव डाला. राष्ट्र किंकर के संपादक डॉ. विनोद बब्बर की अध्यक्षता में हिंदी, भोजपुरी के नामी विद्वानों जिनमें बलिया के डॉ. अशोक द्विवेदी, परिचयदास, संतोष पटेल, जितेंदर सिंह इत्यादि की उपस्थिति प्रमुखता से रही, वहीं डॉ. राहुल, नत्थी सिंह बघेल जी ने अपनी कविताओं से श्रोताओं का मन मोह लिया. नए कवियों एवं कवियित्रियों, जिनमें मिथिलेश, मधु, कौशलेश आदि थे, उन्होंने अपनी रचनायें प्रस्तुत कीं, जिनका वरिष्ठों ने उत्साहवर्धन किया. स्व.मुकेशजी के गानों पर शोध के लिए मशहूर 'प्रदीप' जी ने म्यूजिक के साथ मुकेश के कई लोकप्रिय गानों पर अपनी प्रस्तुति देकर श्रोताओं को धन्य कर दिया, वहीं हारमोनियम के साथ कल्याणजी ने शास्त्रीय संगीत से कवि-हृदयों को भाव-विभोर कर दिया. डॉ. अशोक द्विवेदी ने ग्रामीण पृष्ठ की  कविताओं को उकेरा, तो परिचयदास जी ने प्रेम के ढाई आखरों को अपनी कविता में घोला. पूरे कार्यक्रम के दौरान डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव के गरिमामय, हाजिरजवाब सञ्चालन से श्रोता एवं कवि मुस्कुराते रहे. कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन से डॉ. विनोद बब्बर ने सभी वक्ताओं, कवियों के हृदय के झकझोरते हुए डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव की धर्मपत्नी एवं उनके भाई का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि- किसी भी कार्यक्रम में परदे के पीछे की भूमिका कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. दिल्ली की द्वारका एवं कृष्ण की द्वारका की तुलना ने माहौल को ऐतिहासिक संस्मरणों से सीख लेने को प्रेरित किया. कार्यक्रम के अंत में जलपान लेकर सभी  विद्वानों, कवियों ने एक दुसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएं दीं.

Kavi Sammelan in Dwarka, Delhi

Sunday, 4 January 2015

Amir Khan Controversial Movie PK, Pee Ke

by on 06:08
Amir Khan Controversial Movie PK, Pee Ke

पॉलिटिकल चालाकी की गयी है, आमिर खान का हस्तक्षेप दीखता है फिल्म में, सॉफ्ट कार्नर इस्तेमाल किया है उन्होंने, धर्म-विशेष के प्रति. इस्लाम को बस नाम मात्र का प्रतीकात्मक रूप से टच किया गया है, जो 'सेकुलर' लोगों को भी खलेगा....

पाकिस्तान का सीन जबरदस्ती घुसेड़ा गया है. ...

वैसे इतनी बुरी नहीं है फिल्म, इसका इतना विरोध नहीं होना चाहिए था.
--
परेश रावल और अक्षय कुमार की 'ओ माई गॉड' (OMG ) इससे हर स्तर पर बेहतरीन फिल्म है. यदि आपने वह फिल्म देख ली है तो इस फिल्म में बिलकुल मजा नहीं आएगा. संवाद से लेकर प्रेजेन्टेशन तक कोई अंतर नहीं है और पटकथा के लेवल पर 'ओ माई गॉड' के सामने यह फिल्म कहीं नहीं ठहरती है.


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Amir Khan Controversial Movie PK, Pee Ke

Friday, 2 January 2015

गोडसे के बहाने!

by on 17:49
पिछले दिनों से जो बात राष्ट्रीय राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चित हुई है, वह निश्चित रूप से नाथूराम गोडसे के ऊपर हो रही चर्चा ही है. नाथूराम गोडसे का प्रश्न सर्वप्रथम भाजपा के साक्षी महाराज ने उठाया और चूँकि भारत के वैश्विक ब्रांड माने जाने वाले महात्मा गांधी को अब भारत के संघी प्रधानमंत्री भी स्वीकार कर चुके हैं तो साक्षी महाराज को अपने कदम पीछे खींचने ही थे. हिंदुत्व के दुसरे मुद्दों की तरह संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों पर नरेंद्र मोदी संजय जोशी के समय से ही लगातार दबाव बना पाने में सफल रहे हैं. लेकिन, कांग्रेस की तरह मोदी को भी यह भ्रम हो गया लगता है कि देश में भाजपा और संघ के अतिरिक्त दूसरी संस्थाएं मृतप्राय हो चुकी हैं. लेकिन, लोकतंत्र और विशेषकर चुनावी राजनीति की खासियत ही यही है कि यहाँ पक्ष और विपक्ष होंगे ही. यह ठीक बात है कि आज़ादी के पहले से अब तक देश की मुख्य पार्टी रही कांग्रेस मिटने की ओर अग्रसर हो रही है, और उसका मिट जाना ही ठीक है, क्योंकि उसके ऊपर परिवारवाद का गहरा दाग लग गया है, जिसे अयोग्यता की हद तक ढोया जाना, लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है. कांग्रेस का मिटना, सिर्फ एक पार्टी या नेहरू खानदान के राजवंश के मिटने भर की कहानी ही नहीं होगी, बल्कि इसकी डोर राष्ट्रपिता कहे जाने वाले 'मोहनदास करमचंद गांधी' तक भी पहुंचेगी.

आज़ादी के बड़े नायकों में से एक माने जाने वाले महात्मा गांधी के बारे में आम जनमानस की धारणा यही बनी है कि उनकी महानता को सत्ता ने बढ़ा- चढ़ाकर देश पर थोपा है. इस बात से कई लोग सहमत नहीं हो सकते हैं, लेकिन कम से कम संघ और भाजपा से जुड़े लोगों को इस बात की More-books-click-hereघुट्टी उनके बालपन से पिलाई गयी है. इस पर बात आगे करेंगे, लेकिन यहां यह बताना सामयिक होगा कि महात्मा गांधी ने आज़ादी के तुरंत बाद कांग्रेस को खत्म करने की वकालत की थी. इस ऐतिहासिक उद्धरण को नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में लगातार उठाते रहे हैं. अब प्रश्न उन संघियों की बड़ी जमात का है, जो महात्मा गांधी के चरित्र के बारे में सरकारी नजरिये से अलग नजरिया रखते हैं और चूँकि वह काफी सक्रीय और अनुशासनप्रिय भी माने जाते हैं तो उनका प्रभाव देश के कई छोरों तक पहुंचा है. महात्मा गांधी के ऊपर संघ के स्वयंसेवक और देश के प्रधानमंत्री का यू-टर्न इन संघियों को कहीं न कहीं कुरेद रहा है. संघी, अटल बिहारी बाजपेयी से भी इसीलिए नाराज रहते थे, क्योंकि वह अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि के प्रति ज्यादा सजग हो गए थे, और विचारधारा उस छवि से दब गयी थी. नरेंद्र मोदी भी अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि चमकाने एवं दूसरी मजबूरियों के चलते गांधी को अपना तो रहे हैं, लेकिन इन सब लोगों को काबू करने में उनको भी पसीना आ ही रहा होगा. सुना तो यह भी गया है कि अपने इस्तीफे तक का दांव चलने तक की नौबत आ गयी थी हमारे नए गांधीभक्त को. खैर, जैसे-तैसे धमकी काम कर गयी और सीधे तौर पर संघ और विहिप आदि के पदाधिकारी खामोश हो गए, लेकिन अंदर ही अंदर तमाम संगठन धर्मान्तरण समेत नाथूराम गोडसे के मुद्दे को उठाने में लगे रहे.

इस मुद्दे को उठाने में जो संस्था सर्वाधिक जोर लगा रही है, वह अखिल भारत हिन्दू महासभा नामक संगठन है. वीर सावरकर के नाम से पहचानी जाने वाली संस्था का मुख्यालय केंद्रीय दिल्ली के मंदिर मार्ग पर स्थित है. भव्य भवन में आतंरिक दरारें जरूर पड़ी हैं, लेकिन इससे जुड़े लोग टीवी, अख़बारों पर नाथूराम गोडसे का यथासंभव गुणगान कर रहे हैं. मीडिया भी इस विषय को खूब कवरेज दे रहा है और संयोग देखिये कि यह संस्था धीरे-धीरे सक्रीय होने का प्रयत्न भी करने लगी है. इस संस्था में अभी के समय बड़ी गहमागहमी बनी रहती है, जो कुछ महीने पहले तक देखने को नहीं मिलती थी. मुख्यालय पर जाने के बाद नाथूराम गोडसे से इस संस्था के जुड़ाव को, उनकी प्रतिमा को, नाथूराम के साहित्य को आप आसानी से समझ जायेंगे. वर्तमान हिन्दू महासभाई लोगों में से कुछ लोग अंदरखाने महात्मा गांधी की हत्या को जायज़ नहीं ठहराते हैं, लेकिन बड़े गर्व से बताते भी हैं कि यदि नाथूराम गोडसे महात्मा गांधी को नहीं मारते तो पाकिस्तान को कथित रूप से 55 करोड़ रूपये दिया जाता और पाकिस्तान और बांग्लादेश (तब का पूर्वी पाकिस्तान) के बीच कई किलोमीटर चौड़ा रास्ता भारत सरकार को देने के लिए मजबूर होना पड़ता. तब देश की स्थिति क्या होती, यह समझा जा सकता है. यही नहीं, कई हिन्दू महासभाई आज़ादी के समय लाखों लोगों के क़त्ल-ए-आम के लिए गांधी को सीधे तौर पर जिम्मेवार ठहराते हैं. कुरेदने पर वह साफ़ कहते हैं कि आज़ादी के कई साल पहले से मुस्लिम आंदोलन देश में खड़ा हो रहा था, जिसमें गांधी की तुष्टिकरण की नीति भी काफी हद तक जिम्मेवार थी. इसके बावजूद देश के हिन्दू गांधी को अपना नेता मान कर उसके साथ खड़े रहे, जबकि मुसलमानों ने गांधी को कभी अपना नेता नहीं माना. गांधी कहता रहा कि देश उसकी लाश पर बंटेगा, इसलिए कोई हिन्दू इधर से उधर न हों. परिणाम यह हुआ कि लाखों लोग इस विभाजन के दौरान काट डाले गए.

इतिहास में इस प्रकार का वीभत्स नरसंहार कभी नहीं हुआ था. हिन्दू महासभाई इस बात पर भी रोष प्रकट करते हैं कि जब देश का विभाजन धर्म के आधार पर तय हो गया तब भी गांधी ने अपनी मर्जी चलाकर कहा कि हिन्दू-मुसलमान जहाँ चाहे रह सकते हैं और इस प्रकार गांधी की कमजोरी की वजह से यह देश आज भी हिन्दू-मुसलमान की समस्याओं से घिरा हुआ है. हिन्दू महासभा से जुड़े लोग साफ़ कहते हैं कि इस देश को गांधी का देश बताकर आम जनमानस के साथ सबसे बड़ा छल किया गया है, क्योंकि उस व्यक्ति का व्यक्तिगत चरित्र भी संदिग्ध था. अंग्रेजों ने उसे भारत के क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए तैयार किया था, और गांधी ने किया भी यही. देश की आज़ादी के असल नायकों भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चन्द्र बोस जैसे क्रांतिकारियों को इस व्यक्ति ने कभी बर्दाश्त नहीं किया. यहाँ तक कि जब सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीत गए थे तब इस व्यक्ति के दर्शन ने क्या किया, यह इतिहास में दर्ज है. हिन्दू महासभाई गोडसे के बहाने गांधी के चरित्र पर बात करते हुए कहते हैं कि आज़ादी के बाद भी जब देश की अधिकांश प्रांतीय समितियां सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थीं, तब गांधी की भूमिका के चलते नेहरू प्रधानमंत्री बने और देश को मिला परिवारवाद का नासूर. हिन्दू महासभाई इस बात से बेहद रूष्ट नजर आते हैं कि यह देश एक तरफ तो भगवान राम तक को कठघरे में खड़ा कर देते हैं. उनके ऊपर एक धोबी प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देता है और उसकी बात सुनी जाती है. इस प्रकार के लोकतान्त्रिक चरित्र वाले भारतवर्ष में गांधी की गलतियों को पूरा देश जानने समझने के बावजूद चर्चा करने से हिचकिचाता क्यों है? गांधी के दुर्गुणों पर चर्चा को अपराध कैसे मान लिया जाता है?

संघियों और हिन्दू महासभाइयों का दर्द किसी हद तक जायज भी है. महात्मा के नाम से मशहूर गांधी ने निश्चित रूप से देश के हित में भी कई काम किये, जिनमें अछूतों के उद्धार-कार्यक्रम, देश को किसी हद तक जोड़ने का कार्य, देश को संगठित करने का कार्य भी शामिल है. उनके इन कार्यों की प्रशंसा देश और समूचा विश्व करता है, लेकिन इन बातों से उनकी कमियों पर पर्दा भला कैसे डाला जा सकता है. क्या गांधी भगवान राम से भी बढ़कर इस देश में हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम राम के एकाध कृत्यों पर तमाम सकारात्मक, नकारात्मक चर्चा लोग करते हैं, तो गांधी पर क्यों नहीं? चर्चा उनके veer-savarkar-books-kitabसत्य के प्रयोग नामक उन अध्यायों पर भी होनी चाहिए, जिसे भारतीय लोग 'चरित्र' कहते हैं. गोडसे के बहाने ही सही, गांधी के चरित्र की शिनाख्त होनी ही चाहिए, क्योंकि उन्हें राष्ट्रपिता के तौर पर देश और भावी पीढ़ी को बताया जाता है. और अपने पिता के बारे में जानने का हक तो हर एक बच्चे को होता ही है. उसका पिता किन मामलों में अच्छा है या था, कहीं वह शराबी तो नहीं था, कहीं वह औरतों का रसिया तो नहीं था और यदि था यह गर्व का विषय कैसे है? कहीं अपने आप को भगवान समझने की भूल करके उस व्यक्ति ने देशद्रोह का कार्य तो नहीं किया? देश के बंटवारे में आखिर उसकी और उसकी नीतियों की क्या भूमिका थी? प्रश्न सिर्फ नाथूराम गोडसे का नहीं है, बल्कि वह बंटवारे के बाद आम जनमानस में गांधी के प्रति उपजे रोष के प्रतीक मात्र दीखते हैं. देश बंटने के बाद गांधी की नीतियों से देश का बहुसंख्यक बेहद नाराज हो गया था और इन हालातों की जानकारी गांधी के साथ-साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को भी थी. राजनीति, विपक्ष की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन इन तमाम प्रश्नों पर चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि हमारे देश के लोगों को अब प्रश्न पूछना और तह तक पहुंचना सीखना ही होगा. कभी गांधी को, कभी नेहरू को तो कभी मोदी को भगवान बना देने से इस देश का भला नहीं होने वाला है, बल्कि देश का हित इसमें है कि लोग हर एक बात पर, प्रत्येक चरित्र पर पैनी नजर रखें और उसकी जीवनी की कठोर व्याख्या करें. गांधी जैसों के सन्दर्भ में इस प्रकार के प्रश्न उठाना और भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि उनके सिद्धांतों को देश में योजनाबद्ध तरीके से थोपा गया है. प्रश्न पूछने के तरीके या माध्यम पर सवाल उठाने की बजाय उसके उत्तर, सही उत्तर की खोज होनी चाहिए. उद्देश्य तो सिर्फ सच्चाई तक पहुँचने का होना चाहिए. बेशक उसका माध्यम कोई अंगुलिमाल बने या कोई बुद्ध, कोई गांधी बने या कोई नाथूराम गोडसे! कोई संघी बने या कोई हिन्दू महासभाई!

मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Nathuram Godse, Hindu Mahasabha and Characteristics of Mahatma Gandhi
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हिंदुत्व के पंच प्राण - Hindutv ke panch pran by Veer Savarkar!

by on 04:26

स्वातंत्र्य वीर सावरकर जी की पुस्तक में हिंदुत्व एवं राष्ट्रीयता का उद्घोष (पुस्तक पढ़ने के बाद मेरे विचार)


भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए वीर सावरकर कोई अपरिचित नाम नहीं हैं. एक तरफ इस नाम के त्याग और बलिदान के सदृश कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों के वक्तव्य विनायक सावरकर को अतिवादी कहकर उनपर निशाना साधने से नहीं चूकते हैं. हिंदी साहित्य सदन द्वारा प्रकाशित 'हिंदुत्व के पंच प्राण नामक पुस्तक में उनके कुछ संकलित लेखों को पढ़ने का सुअवसर मिला. अनुवादक विक्रम सिंह ने इन लेखों को अच्छे से सहेजा है. इस पुस्तक में वीर सावरकर के ९ लेख शामिल किये गए हैं, जो वीर सावरकर की हिन्दू समाज के प्रति गहन समझ का परिचय देते हैं. इस पुस्तक को पढ़ने के उपरान्त इस बात में कोई संशय नहीं रह जाता है कि हिंदुत्व के महान विचारकों में वीर सावरकर का स्थान अक्षुण्ण है, विशेषकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अंग्रेज़ों से लोहा लेने के अतिरिक्त आपने हिन्दू समाज को संगठित करने में अपनी समस्त बौद्धिक ताकत झोंक दी, जो उस दौर के मुस्लिम कट्टरपंथ से निपटने के लिए भी समयानुकूल था. एक तरफ महात्मा गांधी के प्रभामंडल से देश के बड़े जननेता अभिभूत होकर उनके सही-गलत कदमों का अंध समर्थन कर रहे थे, वहीं देशहित की खातिर आपने महात्मा गांधी तक की कटु आलोचना करने में कोई कोताही नहीं की. आपने महात्मा गांधी के कई सिद्धांतों की जमकर बखिया उधेड़ी है, जिनमें 'मुस्लिम तुष्टिकरण' और 'आत्यंतिक अहिंसा' प्रमुख है. आपकी तरह देश के अन्य देशवासी भी यह बात मानते हैं कि तमाम योगदानों के बावजूद देश बंटवारे, सांप्रदायिक हिंसा एवं अंग्रेजों के अत्याचारों में महात्मा गांधी की गलत नीतियां काफी हद तक जिम्मेवार रही हैं. इस ऐतिहासिक पुस्तक में आपने 'हिंदुत्व की व्यापक परिभाषा' देने के साथ राष्ट्रभाषा हिंदी, छुआछुत, हिन्दुओं की घटती संख्या, अहिंसा की गलत परिभाषा के कारण हिन्दुओं में पनप रही कायरता, धर्म का हृदय में स्थान एवं उसकी उपयोगिता, जाति-भेद पर कटु प्रहार एवं उससे होने वाले नुक्सान पर गहन दृष्टि डाली है.

'हिन्दू' शब्द का अर्थ एवं उसकी व्याख्या करते हुए आपने इस सूक्ति को उद्धृत किया है-
आसिंधुसिंधुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका.
पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै 'हिन्दु' रिति स्मृतः.


यह प्रश्न सदैव से उठता रहा है कि हिन्दु कौन? आपने उसकी स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा है कि असिन्धु-सिंधु जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों भारतवर्ष हो, वह हिन्दु कहलाने का अधिकारी है. तमाम भारतीयों के भ्रम को दूर करते हुए वीर सावरकर कहते हैं कि हिन्दु शब्द की उत्पत्ति मुसलमानों या किसी अन्य द्वारा नहीं हुई है, बल्कि हिन्दु, हिंदुस्तान, हिन्द इन प्राकृत शब्दों का मूल उद्गम ऋग्वेदकालीन सप्तसिंधु नामक हमारे अपने प्राचीनतम राष्ट्रीय अभिधा में ही है. ऋग्वेद में 'सप्तसिन्धवः' प्रयुक्त होने के साथ उस प्राचीन काल में हमारे निकटस्थ ईरान, बेबोलियन, प्राचीन अरब आदि राष्ट्र हमें हमारे 'सप्तसिंधु' इसी राष्ट्रीय अभिधा से जानते थे. 'पारसियों ने' ढाई हजार वर्ष पूर्व के उनके धर्मग्रंथों में हमारे राष्ट्र को 'हप्तहिन्दु' से ही सम्बोधित किया है. तत्कालीन प्राचीन 'बेबोलियन' ग्रंथों में हमारे देश से निर्यातित झीने तथा सुन्दर वस्त्रों को 'सिंधु' या 'सिन्धुव' कहा हुआ है. आगे हिन्दु शब्द पर प्रकाश डालते हुए वीर सावरकर कहते हैं कि अलेक्जेंडर से दो सौ वर्ष पूर्व का ग्रीक इतिहासकार हेकाटेआस भी हमारे प्राचीन राष्ट्र को हमारे ही सिंधु शब्द के ग्रीक रूप Indu India इसी नाम से उल्लेख करता है. बुद्धकाल में हिन्दुस्थान में आये हुए 'चीनी' यात्री हुएनत्संग ने भी हमारे राष्ट्र को सिंधु शब्द का चीनी अपभ्रंश 'शिन्दु' इसी अभिधा से सम्बोधित किया था. यही नहीं, मुसलमानों के पैगम्बर मोहम्मद साहब के जन्म से पूर्व अरबी लोग जब शैव एवं शाक्त पंथ सदृश धर्म के अनुयायी थे तब भी हमारे राष्ट्र का वर्णन करे हुए हिन्द एवं हिन्दु नामों का उन्होंने गौरव से उच्चारण किया है. इसमें वर्णित एक पंक्ति देखिये-
अया मुवारकल अर्जे या शैयेनोहा मिनल हिंदे.
वा अरा दक्क़ला हो मइयो नज्जेला जिकतून.

इस लेख में हिन्दु शब्द के उल्लेखों का उदाहरण देते आप भविष्य पुराण के उद्बोधक श्लोकों का वर्णन करते हैं-
जानुस्थाने जैनुशब्दः सप्तसिंधु स्तथैव च.
हप्तहिन्दुर्यावनीति पुनज्ञेया गुरुण्डिका.

इसी प्रकार शालिवाहन कुल के राजाओं की कथाओं का वर्णन करते हुए इसी पुराण में कहा गया है कि बाल्हिक, चीन, तार्तार आदि मलेच्छ शत्रुओं का समूल नाश करने के उपरान्त उस भूपति ने सिंध को अपने उत्तम आर्य राष्ट्र की सीमा निश्चित किया. सिंधु के इस ओर का जो प्रदेश है वह हमारा सिन्धुस्थान एवं उस ओर का जो प्रदेश है वह मलेच्छस्थान है, ऐसा सीमांकन किया, अटक उल्लंघन के निषेध नियम भी इसी समय में प्रचलित हुआ. 'नागन्तव्य त्वया भूप पैशाचे देशधूर्तके' इस भविष्यपुराण के श्लोकों में भी सिंधु उल्लंघन का बंधन उद्धृत है.
पृथ्वीराज चौहान के समकालीन चंदभाट के काव्य में भी हिन्दुस्थान शब्द का गौरवयुक्त प्रयोग किया गया है.
अटल थाट महिपाट अटल तारा गढ़ थानम्.
अटल नगर अजमेर अटल 'हिंदव-अस्थानम्.

जब आज के आधुनिकतम समय में हिन्दू शब्द की राष्ट्रीयता पर कुछेक लोग प्रश्न उठाने की धृष्टता करते हैं, तो समझा जा सकता है कि आज़ादी के समय मुस्लिम लीग और छद्म सेकुलरवादियों द्वारा बहुलता से हिन्दू शब्द को साम्प्रदायिक बताने की कोशिश हुई होगी. उन सभी पर प्रहार करते हुए वीर सावरकर उद्घोष करते हैं कि हिन्दू शब्द पूर्ण रूप से राष्ट्रीय है. इसे सिद्ध करते हुए वह कहते हैं कि- मैं आर्य हूँ, मैं भारतीय हूँ इस स्वतः की स्थिति से अनभिज्ञ होने वाले लाखों लोग मिल सकते थे पर मैं 'हिन्दू हूँ' यह भावना झोंपड़ी-झोंपड़ी में करोड़ों लोगों में जम चुकी थी. पूरे देश के आम जनमानस के साथ पंजाब में श्री गुरुगोविंद सिंह जी का जो जीवित कार्य था वह उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार वर्णित है-

सकल जगत में खालसा पंथ जागे.
जगे धर्म 'हिन्दू' सकल भंड भाजे.


महाराष्ट्र के समर्थ रामदास जी को भी जो पीड़ा थी वह भी यही कि
'या भूमंडळाचे ठाई.
हिन्दू ऐसा उरला नाहीं.
(भावार्थ- इस भूमण्डल में मानो 'हिन्दू' तो बचा ही नहीं.)


गुरु तेगबहादुर के सामान हजारों हुतात्माओं ने 'हिन्दू शब्द का परित्याग करो, नहीं तो प्राणत्याग हेतु तत्पर हो जाओ!' ऐसी शत्रु की धोंस पर प्राण त्याग दिए, पर इस 'हिन्दू' शब्द का परित्याग नहीं किया. पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक सभी जातियां, सम्प्रदाय अपने को हिन्दू मानने और कहने में सदा से गर्व करती आयी हैं. हिन्दू शब्द के इतिहास से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह शब्द मूलतः तथा मुख्यतः देशवाचक एवं राष्ट्रवाचक है, किसी विशिष्ट पूजा-पद्धति भर का ही निदर्शक नहीं है.

अपनी किताब 'हिंदुत्व के पंच प्राण' में सावरकर जी स्पष्ट कहते हैं कि हिंदुत्व कोई धर्ममत नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीयता का द्योतक है. जिसकी पितृभू एवं पुण्यभू भारत है, वही हिन्दू है. पितृभू अर्थात केवल वह भूमि नहीं जहाँ अपने माता-पिता का जन्म हुआ हो, पितृभू तो उस भूमि को कहा जाता है जिसमें प्राचीन काल से एक परंपरा से हमारे पूर्वज निवास करते आये हैं. इसी प्रकार पुण्यभू का तात्पर्य उस भूमि से है जिस भूमि में किसी धर्म का संस्थापक, ऋषि, अवतार प्रकट हुआ, उसने उस धर्म को उपदेश दिया, उसके निवास से उस भूमि को धर्म क्षेत्र का पुण्यत्व प्राप्त हुआ, वह उस क्षेत्र की पुण्यभू है. हिंदुत्व की यह परिभाषा जितनी ऐतिहासिक है उतनी ही वर्तमान स्थिति के अनुसार भी है. वह जितनी सत्य है उतनी ही इष्ट भी. जितनी व्यापक है, उतनी ही व्यावर्तक भी.

सावरकर जी के लेखों में लिखी बातें काफी हद तक सत्य प्रतीत होती हैं. हिन्दू शब्द के बारे में भ्रम की स्थिति पर वह कहते हैं कि यदि हिन्दू की यह परिभाषा प्रारम्भ में ही उपलब्ध हो जाती तो 'हिन्दू' शब्द को किसी खास पूजा-पद्धति से जोड़ने की भ्रान्ति ही उत्पन्न नहीं होती. मुसलमान राजसत्ता ने स्वतः की सुविधा हेतु, धर्मान्धता के नशे में हिन्दुस्थान के करोड़ों लोगों को हिन्दू एवं मुसलमान इन दो टुकड़ों में बाँट दिया- इस प्रकार जो भी व्यक्ति मुसलमान नहीं था वह हिन्दू माना जाने लगा. इस कारण से मुसलमान जातियों के अतिरिक्त सभी जातियां एक ध्वज के नीचे संगठित हुईं और इससे यह साबित हुआ कि हिन्दू शब्द का अर्थ सिर्फ सनातनियों या आर्यसमाजियों के लिए ही नहीं था बल्कि इसमें समस्त भारत के लोग शामिल थे. हिन्दू शब्द को वेदनुयायियों से जोड़ने का कारण वह विचारक ही रहे जो हिंदुत्व की सर्वांगीण व्याख्या राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक आधार पर न करने के कारण उसके उन प्रमुख अंगों की ओर दुर्लक्ष्य होकर, उसकी धार्मिक परिभाषा को प्रतिपादित करने लगे और हिन्दू समाज के बहुसंख्यक लोग वेदानुयायी होने के कारण यह धारणा बलवती होती गयी. यही कारण रहा कि सिक्ख, जैन, बौद्ध, आर्यसमाज, ब्रह्मोसमाज, देवसमाज आदि पंथ कई बार हिन्दू शब्द के सम्बन्ध में भ्रम पाल लेते थे. अपनी स्पष्टवादिता के कारण अंग्रेजों से लेकर कांग्रेसी सत्ता तक का दंश झेल चुके वीर सावरकर बिना किसी लाग-लपेट के खुल कर कहते हैं कि मुसलमान और ईसाई हिन्दू नहीं माने जा सकते क्योंकि धर्मपरिवर्तन से वह भ्रष्ट हो चुके हैं, उनकी पुण्यभू अरब स्थान, पैलेस्टाइन आदि हो चुके हैं अतः उनकी निष्ठा बंट गयी है. इस प्रकार अपने विस्तृत लेख में जिस प्रकार हिन्दू, अहिन्दू की राष्ट्रीय व्याख्या वीर सावरकर जी ने स्पष्ट रूप में की है, वह कहीं अन्यत्र मिलना दुर्लभ है.

अपने अगले लेख में संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थन करते हुए वीर सावरकर खास वर्ग के दोहरेपन की धज्जियां उड़ाने से चूके नहीं हैं. राष्ट्रीय विचारों के प्रति वह प्रखर रूप में सामने आते हैं, और ढोंगियों के तुष्टिकरण की जमकर खिंचाई करते हैं. एक उद्धरण देखिये- हम हिन्दुओं में एक ऐसा वर्ग है, veer-savarkar-books-kitabजिसकी यह विचित्र धारणा है कि कोई भी 'राष्ट्रीय' आंदोलन तब तक राष्ट्रीय हो ही नहीं सकता जब तक कोई ऐरा-गैर मुसलमान उसमें ला करके न बिठाया जाय. वह सिर्फ आलोचना ही नहीं करते हैं, बल्कि महात्मा गांधी के द्वारा हिंदी के प्रति किये गए योगदान को सराहते भी हैं, लेकिन मुसलमानों के प्रति उनके झुकाव को राष्ट्र के प्रति विक्षिप्त धारणा बताने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं. हिंदी को राजभाषा बनाने को लेकर जिस प्रकार मुसलमानों ने विरोध किया और देश के हिन्दुओं तो छोड़िये, अधिकाधिक मुसलमानों में भी न समझी जाने वाली उर्दू के लिए ज़िद्द की, वह इतिहास में दर्ज अध्याय है. महात्मा गांधी ने उनके दबाव में आकर हिंदी के साथ अन्याय भी किया. हिंदी की वकालत करते हुए वीर सावरकर जी कहते हैं कि किसी भी देश की राष्ट्रभाषा तो वह होती है, जिसमें उस राष्ट्र का सारा उच्च साहित्य होता है. मुसलमानों द्वारा फ़ारसी लिपि अपनाये जाने की वकालत करने पर वीर सावरकर ने नागरी लिपि के पक्ष में ज़ोरदार तर्क प्रस्तुत किये हैं. अपने तर्कों को वह भाषा में जातिक्रम से लेकर उर्दू की दरिद्रता और मुसलमानों की हठधर्मिता की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. यहाँ तक कि उर्दू का बंगाल के मुसलमानों ने भी खुल कर विरोध किया था, उसके बावजूद देश के कुछ मुसलमानों के साथ महात्मा गांधी हाँ में हाँ मिलाते रहे. वीर सावरकर उर्दू के साथ अंग्रेजी शब्दों को हिंदी में मिलाने के सख्त खिलाफ थे और उन्होंने स्पष्ट कहा कि 'संस्कृतनिष्ठ हिंदी ही हम हिन्दुओं की राष्ट्रभाषा है एवं संस्कृतनिष्ठ नागरी लिपि ही हम हिन्दुओं की राष्ट्रलिपि है.'

'हिंदुत्व के पंच प्राण' पुस्तक को पढ़ते हुए आपको भी मेरी तरह लगेगा कि वीर सावरकर आपके सम्मुख आपसे बात कर रहे हों, प्रत्येक मुद्दे पर व्यवहारिक दृष्टिकोण लाजवाब है. जैसे- जाति-भेद पर वह सवर्णों को कड़ी फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि जिन निचली जातियों को तुम गले नहीं लगाते हो, वह मुसलमान, ईसाई बनकर तुम्हारे शत्रु बन जायेंगे. इसके लिए वह मुस्लिम और ईसाईयों को शुद्धिकृत करने का प्रयास भी करने को कहते हैं. लेकिन शूद्रों के साथ शुद्धिकृत हिन्दुओं को सवर्ण जातियों द्वारा भेदभाव का शिकार बनाये जाने पर उनका मन क्षोभ से भर उठता है. एक उद्धरण देखिये वीर सावरकर के ही शब्दों में-
एक बड़े ही प्रामाणिक शुद्धिकृत व्यक्ति से हमें एक पत्र प्राप्त हुआ है, उसमें वे लिखते हैं, मेरे हिन्दू धर्म-प्रवेश से किसी भी प्रकार रूष्ट न होते हुए मिशनरियों ने मुझे संक्रांति पर्व पर मुंह मीठा करने हेतु परम्परानुसार तिल-गुड भेजा है. मेरे पुत्रों को दस-दस रूपये की मिठाई भेजी है, हमसे दूर होते हुए भी वे प्रति सप्ताह मेरा कुशलमंगल पूछते रहते हैं, इन सब बातों का रहस्य मैं भली-भांति जानता हूँ; परन्तु जब वे उनकी धर्मध्वजा के नीचे लाने के उद्देश्य से विधर्मियों से इतना मीठा बोल सकते हैं, तो हमारे हिन्दुधर्म की ध्वजा के नीचे जब हम सब खड़े हैं तब स्वजनों को परस्पर में एक दुसरे से तो मीठा बोलना चाहिए.! पर! जब मैं और मेरे पुत्र रास्ते से जाते हैं, तब मेरे ये हिंदुबंधु मेरी ओर तिरस्कार से हँसते हैं और दुसरे रास्ते से चले जाते हैं. किसी के बरामदे में अभी भी हम बैठ नहीं सकते. तीज-त्यौहार पर प्रेम से दो शब्द भी कोई नहीं बोलता. ऐसी अवस्था में केवल एक आत्मिक संतोष जो मुझे मेरे हिन्दू पूर्वजों के वास्तु में निवास करने से प्राप्त हो रहा है, के कारण ही विपक्ष के प्रलोभन एवं स्वपक्ष के तिरस्कार का कुछ भी प्रभाव नहीं लगता. मैं हिन्दू हूँ, इस भावना के सुख का उपभोग मैं कर सकता हूँ, इतना ही मेरे लिए पर्याप्त है.

अगले लेख में अपनी प्रखर शैली को जारी रखते हुए वीर सावरकर हिन्दुओं को अपनी संख्या एवं गुण दोनों को विकसित करने पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि संख्याबल सबसे बड़ी शक्ति है, इसलिए उसका संरक्षण एवं संवर्धन करो. मुसलमानों का उदाहरण देते हुए वीर सावरकर तब के सन्दर्भ में कहते More-books-click-hereहैं कि- दिल्ली की मुसलमानी परिषद के भाषणों और प्रस्तावों को देखो: मुहम्मद अली से लेकर छोटे-मोटे गुंडों तक प्रत्येक मुसलमान को कम से कम दस-बारह हिन्दुओं को तो भ्रष्ट करना ही चाहिए, इस प्रकार दहाड़ें मार रहे हैं- क्योंकि, हिन्दुस्थान में मुसलमानों की संख्या को हिन्दुओं से अधिक बनाना है. इसी के कारण हिन्दू स्त्रियों को बहला फुसलाकर एवं जबरदस्ती अपने साथ ले जाते हैं क्योंकि उन्हें मुसलमानों के संख्याबल को हिन्दुओं से ज्यादा बनाना है. ईसाइयों से भी हिन्दुओं को सचेत रहना पड़ेगा क्योंकि प्रतिवर्ष कम से कम दस लाख लोगों को ईसाई निगल जा रहे हैं, उनको ईसाई बना रहे हैं. ऐसे में हिन्दुओं को अपनी रक्षा के लिए बेहद सचेत होना पड़ेगा. वीर सावरकर जी आगे कहते हैं कि सर्वप्रथम यह ध्यान में रखना चाहिए कि यदि समाज-जाति अस्तित्व में होगी तब ही तो उसमें गुणरूपी शक्ति बढ़ाने का प्रश्न उत्पन्न होता है, इसलिए निरे संख्याबल में क्या रखा है, ऐसा कहने वाले धूर्तों को खरी-खरी सुनाओ एवं अपनी संख्या बढ़ाओ. हमें गुणबल तो आवश्यक ही है, पर संख्याबल भी हमें आवश्यक है. हमारा हिन्दुराष्ट्र हम संख्या के रूप में भी घटने नहीं देंगे, गुणों में भी घटने नहीं देंगे. गुणबल पंगु है तो अकेला संख्याबल अंध है, इस सामाजिक सत्य को हिन्दुओं को समझना पड़ेगा.

अपने अगले लेख में गांधी की अव्यवहारिक अहिंसा की धज्जियाँ उड़ाते हुए वीर सावरकर घोषणा करते हैं कि 'प्रतिघात का साहस हिन्दुओं में कूट-कूट कर भरा है'. हिंसा एवं अहिंसा के अर्थों की वर्तमान में गांधीजी जैसे पोंगापंडितों ने जो उधेड़बुन मचा रखी है, उससे वे वचन भले ही परस्पर विरोधी दिखाई देते हों, परन्तु हिन्दुधर्म के मर्मज्ञ आचार्य, पूर्व से ही इस शब्द का जो अर्थ बताते आये हैं, उसको ध्यान में लेने पर,
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय, युद्धाय रितनिश्चयः
का गर्जन करते हुए अपना सुदर्शन-चक्र ऊँचा उठा कर कंस का मर्दन करने वाले कृष्ण एवं उनकी गीता ये दोनों ही हिन्दुधर्म एवं हिन्दुराष्ट्र के प्रमुखतम आराध्या देवता क्यों बने यह सबके समझ में आने जैसी बात है. इसके अलावा गांधीजी जिस युधिष्ठिर की बात निरी अहिंसा के लिए करते हैं, उन्होंने भी अट्ठारह दिनों तक युद्ध किया था. मुसलमानों से हिन्दुओं को अलग एवं बौद्धिक बताते हुए वीर सावरकर कहते हैं कि हिन्दू मुसलमान की भांति विक्षिप्त कटटर नहीं, पर हिन्दू कटटर अवश्य है. हिन्दू मुसलमान की भांति धर्मोन्मत जानवर नहीं, पर हिन्दू धर्मवीर अवश्य है. इसलिए ऐ खडग, तेरी विजय हो! गुरु गोविंदसिंह जी ने स्वतः की तलवार के सम्बोधन में रचे हुए काव्य में भी कुछ ऐसा ही कहा है-
सुखसंताकरणम् दुर्मतिहरणम् खलदलदलनम् जयतेग्रम.

वीर सावरकर की 'हिंदुत्व के पंच प्राण' पुस्तक को पढ़कर, एक से बढ़कर एक रोचक प्रसंग, उदाहरण, उद्धरणों को समझकर इस स्वातंत्र्य वीर के प्रति श्रद्धा में सिर आप ही झुक जाता है. और मन गा उठता है-

'तेरा वैभव अमर रहे माँ
हम दिन चार रहें न रहे'


मिथिलेश, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

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Thursday, 1 January 2015

'न्यू ईयर' का 'रतजगा' - Happy New Year 2015 Poem in Hindi

by on 14:25

सुबह-सुबह जब आज जगा था
सर्दी से सूरज भी डरा था
कल की रात न सोये हम सब
'न्यू ईयर' का रतजगा था


 

ठंडी में खूब शोर मचाकर
बेसुरा गाना गा गाकर
'बीजी' थे सब फोन में ऐसे
जैसे 'एप्स' हों ज्ञान का सागर


 

जाने कौन-कौन थे लोगMore-books-click-here
फास्ट- फूड, पिज्जा का डोज
इंग्लिश, पंजाबी, भोजपुरी
'पीके' फिल्म के जैसा रोग


 

मुझे समझ तो कुछ न आया
न्यू ईयर कह कर भरमाया
दादी का त्यौहार है बढिया
कर्म, धर्म का 'मर्म' बताया


- मिथिलेश (1 जनवरी 2015 की शाम, नई दिल्ली)

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Happy New Year 2015 Poem in Hindi

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Wednesday, 24 December 2014

भारत रत्न व राजधर्म - Bharat Ratn and Rajdharm!

by on 07:32
आखिर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नायकों में से एक अटल बिहारी बाजपेयी को भारत-रत्न पुरस्कार देने की घोषणा कर ही दी गयी. साथ में आज़ादी के नायक एवं कांग्रेस के पांच बार अध्यक्ष रह चुके पंडित मदन मोहन मालवीय को भी यह पुरस्कार देने की घोषणा भी की गयी है. निश्चित रूप से दोनों महापुरुषों का योगदान अपने-अपने समय में अतुलनीय रहा है और देश का आम जनमानस इनसे सुपरिचित भी है. एक तरफ मदन मोहन मालवीय को आज़ादी के पहले के उन शिक्षाविदों में अग्रणी माना जाता Bharat-Ratn-Atal-Bihari-Bajpayeeहै, जिन्होंने मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा-प्रणाली, जो कि भारतीयता को नष्ट करने के इरादे से ही लागू की जा रही थी, उसका न सिर्फ उचित विरोध किया बल्कि आपने उसकी वैकल्पिक शिक्षा-नीति पेश की एवं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के माध्यम से भारतीय विचारों की अलख जगाये रखा. महामना मालवीय सिर्फ शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि गंगा, हिंदुत्व, संस्कृति के प्रबल संरक्षक के तौर पर उभरे. जलपुरुष के नाम से विख्यात, मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित श्री राजेंद्र सिंह इतिहास के पन्नों से श्री मालवीय का उद्धरण देते हुए कहते हैं कि 'जब अंग्रेज प्रशासक भारतीय संस्कृति की प्रतीक गंगा नदी में नाले के माध्यम से शहर की गन्दगी डालने का प्रस्ताव लाये तो श्री मालवीय ने हर स्तर पर इस बात का विरोध किया'. वहीं अटल बिहारी बाजपेयी का योगदान इस मायने में अद्वितीय है कि एक अपरिपक्व लोकतंत्र, जिसमें एक परिवार का लगभग कब्ज़ा हो गया था और लोग लोकतंत्र में भी राजशाही की घुटन महसूस करने लगे थे, उसका न सिर्फ सार्थक विकल्प दिया, बल्कि आपने उस विकल्प को 5 साल तक सफलतापूर्वक आजमा कर आगे के लिए भी रास्ता साफ़ कर दिया. वस्तुतः बाजपेयी को यदि आधुनिक लोकतंत्र का सर्वश्रेष्ठ नायक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. बिना किसी रक्तरंजित, अतिवादी उदाहरण के आपने सद्भावना, देशभक्ति, विकास की अद्भुत मिसाल पेश की, जिसको समझने में वर्तमान भारतीय नेतृत्व को भी सालों लग सकते हैं. आपके प्रशंसक न सिर्फ देश में बल्कि पाकिस्तान, अमेरिका सहित तमाम देशों में भी रहे हैं, जो आपके विराट व्यक्तित्व का प्रतीक है. देश की राजनीति में भी आपने भारतीय जनता पार्टी को स्वीकृत बनाने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया. यह बताना आवश्यक नहीं है कि आप जिस विचारधारा से जुड़े रहे, उसे आम जनमानस में स्वीकृत होने में 70 सालों से ज्यादा समय लग गया, और देश इस बात का कृतज्ञ रहेगा कि आपने राष्ट्रवादी विचारधारा को अतिवादी होने से बचाया एवं उसे मुख्य धारा में समाहित करने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया.

अटल बिहारी बाजपेयी को भारत-रत्न देने पर कुछ महत्वपूर्ण बयानों का ज़िक्र करना सामयिक होगा. जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने कहा कि- यूपीए(कांग्रेस) सरकार को पहले ही भारत-रत्न दे देना चाहिए था. वहीं बाजपेयी के सहयोगी रहे एवं अब भाजपा के प्रबल विरोधी नितीश कुमार ने बाजपेयी को भारत-रत्न देने की प्रशंसा करते हुए उनके उदार-हृदय की प्रशंसा करते हुए वर्तमान सरकार पर राजनैतिक निशाना साधने में देरी नहीं की. भाजपा के लौह-पुरुष कहे जाने वाले लाल कृष्ण More-books-click-hereआडवाणी ने भी बाजपेयी को भारत-रत्न पुरस्कार का सच्चा हकदार बताया. आडवाणी जी के अतिरिक्त भाजपा से कोई ख़ास उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी. आप यदि इन तीनों ज़मीनी व्यक्तित्वों पर गौर करें तो कहीं न कहीं भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इनकी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता कटु रूप में जगजाहिर है. भाजपा के दो शीर्ष पुरुष, जिन्होंने भारतीय सत्ता पर अपना अधिकार सिद्ध किया है, वह अटल बिहारी बाजपेयी और नरेंद्र मोदी ही हैं. इसके साथ बिडम्बना यह भी है कि दोनों शीर्ष नेताओं की छवि जनता में बिलकुल अलग तरह की है. निसंकोच रूप से कहा जा सकता है कि भारत रत्न बाजपेयी और नरेंद्र मोदी दोनों अपने-अपने समय में जनता में बेहद लोकप्रिय हैसियत के नेता रहे हैं, लेकिन दोनों के प्रशंसकों में भी ज़मीन-आसमान का अंतर है. पिछले दिनों संघ के एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला. उस कार्यक्रम में एक संघ के पुराने प्रचारक आये हुए थे. अपने भाषण (बौद्धिक) के दौरान वह उद्धृत करना नहीं भूले कि दिल्ली में अब 'राष्ट्रीय विचार एवं सत्ता के विचार' में एकरूपता आ गयी है. वह यह बताने से भी नहीं चूके कि 'अटल बिहारी बाजपेयी' के शासन काल में कथित 'राष्ट्रीय विचार एवं सत्ता के विचार' में एकरूपता नहीं थी, बल्कि कहीं न कहीं कन्फ्यूजन था. उस कार्यक्रम में ही क्यों, दिल्ली में पिछले दिनों हुई बहुचर्चित 'हिन्दू-कांग्रेस' में विहिप के अंतर्राष्ट्रीय पदाधिकारी अशोक सिंघल ने सीना ठोक कर कहा कि दिल्ली में 800 सालों बाद राष्ट्रीय विचार की सरकार बनी है. कितनी अजीब एवं कृतघ्न विडम्बना है कि जिन दो महापुरुषों ने संघ परिवार को मुख्य धारा में चलने लायक बनाया, उसको गांधी-हत्या, अतिवादी विचारधारा से बाहर निकाल कर लाने में मुख्य भूमिका निभाई, उन दोनों को हासिये पर डाल दिया गया है. आडवाणी को राजनैतिक रूप से परे धकेल दिया गया है, वहीं बाजपेयी से वैचारिक रूप से दूरी बनाने की कोशिश की जा रही है. खैर, अटलजी का कद इतना बड़ा है कि भारत रत्न उनको मिलना ही था, लेकिन संघ परिवार की तरफ से इस पुरस्कार पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं आयी है, जिसको नोटिस किया जा सके, हाँ! सामान्य प्रतिक्रिया तो आएगी ही, क्योंकि बाजपेयी भी तो स्वयंसेवक ही रहे हैं. बाजपेयी की तरह संघ से तालमेल बिठाने में नरेंद्र मोदी भी कसरत कर रहे हैं, लेकिन वह सफल होंगे या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा. हाँ! एक बात स्पष्ट है कि यदि नरेंद्र मोदी को भी भारत-रत्न कहलाना है तो उन्हें बाजपेयी से प्रेरणा लेनी ही होगी एवं उनके समरस, सद्भावना इत्यादि गुणों को ग्रहण करना ही होगा. 25 दिसंबर को बाजपेयी जी का जन्मदिवस है, मोदी भी उनसे 'राजधर्म' के आशीर्वाद की अपेक्षा कर रहे होंगे, क्योंकि असली 'राजधर्म' के ज्ञान की जरूरत नरेंद्र मोदी को अब है. तीन-चार दिन पहले बाजपेयी जी के ऊपर दो-पंक्तियाँ लिखीं थीं-

हे युगपुरुष! तुमको नमन
सींचा है तुमने नव चमन
दिया तंत्र सच में लोक को
जन जन के तुम आलोक हो


सद्भावना के कर्म फल
अनेकता में भी सफल
समरसता के प्रयत्न हो
तुम सच में ‘भारत रत्न‘ हो


- मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.

Bharat Ratn and Rajdharm, Atal Bihari Bajpayee and Narendra Modi, article in Hindi.

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Sunday, 21 December 2014

'राष्ट्र निर्माण में पत्रकारों की भूमिका' विषय पर गोष्ठी का सफल आयोजन - Press Release on Journalism

by on 11:29

आज २१ दिसंबर २०१४ को, भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ़ एप्लाइड साइंसेज, सेक्टर-२, फेज-१ नई दिल्ली में आयोजित गोष्ठी में देश भर के नामी पत्रकारों सहित, पत्रकारिता के छात्र एवं क्षेत्रीय गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में 'राष्ट्र निर्माण में पत्रकारों की भूमिका' विषय पर गोष्ठी का सफल आयोजन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उत्तम जिला के माध्यम से संपन्न हुआ. श्री पवन सिंघल की अध्यक्षता में देश के नामी पत्रकार एवं ब्रॉडकास्टर्स एडिटर्स एसोसिएशन के पदाधिकारी श्री एन.के. सिंह समेत, नेटवर्क-१८ से जुड़े श्री भूपेंद्र चौबे, हरियाणा के मुख्यमंत्री के ओएसडी श्री राजकुमार जी, हिंदुस्तान समाचार एजेंसी से जुड़े श्री भाला जी, राष्ट्र किंकर के संपादक डॉ. विनोद बब्बर, उत्तम नगर के जिला कार्यवाह श्री अंबरीश जी समेत अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने भारत माता के चित्र के सामने दीप-प्रज्ज्वलन करके कार्यक्रम की शुरुआत की.


 

कार्यक्रम का सफल सञ्चालन करते हुए भास्कराचार्य कॉलेज के आचार्य श्री विकास त्यागी ने सभी अतिथियों का पुष्प-गुच्छ से स्वागत कराने के उपरांत डॉ. विनोद बब्बर द्वारा विषय-परावर्तन किया गया. डॉ. बब्बर ने सटीक शब्दों में महाभारत के दो चरित्रों श्री कृष्ण एवं दिव्यदर्शी संजय का More-books-click-hereउद्धरण देकर पत्रकारिता को स्पष्ट करते हुए कहा कि पत्रकार केवल संजय की भांति कोर कॉमेंटेटर नहीं है, बल्कि उसका रोल श्रीकृष्ण की भांति देश को जगाने का है. श्री भूपेंद्र चौबे जी ने बाजारवाद को पत्रकारिता के ऊपर हावी बताते हुए जनता को कार्यक्रम पसंद न होने पर चैनल बदल देने या अख़बार न पढ़ने का तर्क दिया, जिसका विरोध करते हुए राष्ट्र किंकर के उप-संपादक मिथिलेश ने कहा कि यदि समाज के सभी वर्ग के लोग जनता को ही जिम्मेवार ठहराएंगे तो यह अपनी जिम्मेवारी से मुंह मोड़ने वाली बात होगी. हरियाणा के मुख्यमंत्री के ओएसडी श्री राजकुमार ने हरियाणा में जमीनों के बिकने के बाद आये अथाह पैसे के दुरूपयोग का ज़िक्र करते हुए उसे पत्रकारिता से जोड़ने की कोशिश की. मुख्य वक्ता के रूप में श्री एन.के. सिंह ने बड़ी स्पष्टता से कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग में गिरावट आयी है और उससे निश्चित रूप से पत्रकार जगत भी अछूता नहीं है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रशंसा करते हुए श्री सिंह ने कहा कि समस्या का हल चरित्र निर्माण के अतिरिक्त कुछ और नहीं है. उन्होंने इशारों इशारों में चरित्र निर्माण की प्रथम पाठशाला यानि परिवार, संयुक्त परिवार की तरफ ध्यान दिलाया.


 

वहीं पत्रकार जगत में काम करने वाले व्यक्तियों को उन्होंने अपनी जरूरतें कम रखकर देश-सेवा करने को प्रमुखता से बताया. श्री भाला ने अपने सभी पत्रकार बंधुओं को हिंदुस्तान समाचार एजेंसी से जुड़कर राष्ट्रीय विचारों को आगे लाने का आग्रह किया. कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय भाषण श्री सिंघल के द्वारा संपन्न हुआ, जिसके बाद पत्रकारिता के विद्यार्थियों ने अतिथियों से प्रश्न भी किये. कार्यक्रम के अंत में उत्तम नगर ज़िले के कार्यवाह श्री अंबरीश जी ने सभी अतिथियों एवं पत्रकारों का आभार व्यक्त करते हुए भोजन प्रसाद लेने का आग्रह करते हुए कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की.


-मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.


Press Release on Journalism in Hindi by Mithilesh

Saturday, 20 December 2014

अटल बिहारी बाजपेयी के जन्मदिवस पर - Poem on Atal Bihari Bajpayee by Mithilesh

by on 11:51

हे युगपुरुष! तुमको नमन
सींचा है तुमने नव चमन
दिया तंत्र सच में लोक को
जन जन के तुम आलोक हो


 

सद्भावना के कर्म फल
अनेकता में भी सफल
समरसता के प्रयत्न हो
तुम सच में 'भारत रत्न' हो


मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.


Poem on Atal Bihari Bajpayee, in Hindi by Mithilesh

Friday, 19 December 2014

स्कूल जाते एक बच्चे की भावना - Poem on child feeling at Terrorism

by on 00:59

ना डरें हैं, ना डरेंगे
तुम जो भी कर लो
आतंक से लड़ते रहेंगे
बंदूकें अपनी पूरी भर लो


 

ना समझो हमको छोटी जान
वतन हमारा हिन्दुस्तान
नामो निशां मिटायेंगे
होने दो हमको तुम जवान


-मिथिलेश कुमार सिंह, उत्तम नगर, नई दिल्ली.


 

Children-feeling-at-Peshawar-attack-poem-by-Mithilesh

Poem on child feeling at Terrorism

Type in Hindi Unicode - हिंदी टाइप टूल

by on 00:49
नोट - (यहां आप अंग्रेजी (रोमन हिंदी) में टाइप कर सकते हैं। जैसे- आपके द्वारा meri(space) rai(space) hai(space) टाइप करते ही ये वाक्य - 'मेरी राय है'  में बदल जाएगा।)




 

 

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